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अपनी, उनकी, सबकी बातें

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15 Jun 2010
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भोपाल गैस त्रासदी और फिल्म एरिन ब्रोकोविच

"एरिन ब्रोकोविच' मेरी पसंदीदा फिल्म है. पर जब जब इसे देखती हूँ (और Zee Studio n Star Movies की कृपा से कई बार देखी है ) मुझे 'भोपाल गैस त्रासदी ' याद आ जाती है और लगता है कोई मिस्टर या मिस ब्रोकोविच यहाँ क्यूँ नहीं हुए? जो इस बड़ी कम्पनी को घुटने टेकने
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जब हम बादलों पर चले

जब हम बादलों पर चले. जी हाँ सही पढ़ा आपने,बादलों पर भी और बादलों के बीच भी. एक सहेली ने अपने फ्रेंड के ऑर्कुट प्रोफाईल में किसी का स्क्रैप देखा ,जिसमे उसने अपने ट्रेकिंग के अनुभव लिखे थे, उसने जानकारी ली और पता चला, वह पहाड़ी हमारे घर से ज्यादा दूर नहीं.
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आई जस्ट फेल इन लव विद......

मुंबई आने से पहले ,बारिश बस फ़िल्मी परदे पर ही अच्छी लगती थी...खासकर  'लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है...." और "रिमझिम गिरे सावन...." गानों में .जब भी ये गाने सुनती (और ना जाने कितनी बार सुनती )...आँखों के सामने ,दृश्य भी साकार हो उठते .पर यह कभी मेरा
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इंदिरा गाँधी की इस छोटी सी बात ने सोनिया गाँधी का दिल हमेशा के लिए जीत लिया

छोटी छोटी बातें क्या  महत्व रखती हैं??...हर कोई कहता है..ये तो छोटी बात है,ध्यान मत दो...इतनी छोटी बातें दिल पे  लोगे तो कैसे चलेगा...छोटी बातें इग्नोर करनी चाहिए...ये तो बहुत छोटी बात थी...पर क्या ऐसा सचमुच होता है?? ये छोटी बातें अपने आप में
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मोबाइल से बजता कैंसर का रिंग टोन...

मुंबई से बाहर जाने पर अगर यहाँ की कोई चीज़ मैं बड़ी शिद्दत से मिस करती हूँ तो वो है...यहाँ के अखबार. TOI तो हर जगह मिल जाता है...पर उसके सप्लीमेंट्स और मुंबई मिरर, मिड डे , डी. एन. ए. ये सब नहीं मिलते..और रोचक...जानकारीपूर्ण ख़बरें तो उनमे ही होती
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सवाल एक, जवाबी तुक्के कई

कल एक सवाल पूछा था...कई लोगों ने इसे पढ़ा, समझने की कोशिश  की. वक़्त निकाला,और जबाब भी दिया. सबका शुक्रिया...सौरभ,राज जी, महफूज़  को लगा,  अपने कॉलेज के सहपाठी ,जो पहला प्रेमी भी था, उसी से शादी करेगी...क्यूंकि पहला प्यार भुलाना मुश्किल
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एक सवाल

चार,पांच साल पहले मैने , विक्रम सेठ द्वारा रचित एक किताब पढ़ी थी Suitable Boy. जिसे 1994 में common wealth writers prize मिला था .यह 1500 पेज की लम्बी सी किताब है.बिलकुल एक ग्रन्थ के समान. BBC से इसका रेडियो नाट्य रूपांतरण भी प्रसारित हो चुका है. जिसमे
May 28 2010 11:01 PM
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"सरोगेट मदर्स " से जुड़े कुछ नए और रोचक तथ्य

पिछली पोस्ट 'सरोगेट  मदर्स' पर  लिखी थी. उसके बाद से ही टाइम्स ऑफ इंडिया में रोज ही उस से सम्बंधित कुछ रोचक ख़बरें पढने को मिलीं. सोचा आपलोगों से ये भी शेयर कर लूँ,....इसलिए भी कि सारी ख़बरें सुखद हैं, जिनकी आजकल बहुत कमी महसूस होती है. आज के ही
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सरोगेट मदर्स क्या सचमुच एक 'अवन' की तरह हैं??

एक विषय कुछ ऐसा है, जिसपर मैं अपना मत नहीं बना पायी हूँ, कि यह सही है या नहीं और इसे बढ़ावा देना चाहिए या नहीं .और वो है सरोगेट मदर्स  का. भारत, दुनिया भर के माता-पिताओं के चेहरे पर मुस्कान लाने में सक्षम हुआ है.दुनिया भर से लोग यहाँ आते हैं.पैसे के
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जावेद अख्तर की एक प्यारी सी नज़्म

,अक्सर मेरे एक  ब्लॉग का मूड  दूसरे ब्लॉग पर भी परिलक्षित होता है, 'मन का पाखी' पर  कहानी ने कुछ गंभीर मोड़ लिया तो बैलेंस करने को यहाँ कुछ  हल्का फुल्का लिखना पड़ा.यहाँ निरुपमा के बहाने लड़कियों के प्रति माता-पिता की उदासीनता के विषय
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महिला ब्लॉगर्स का सन्देश जलजला जी के नाम

कोई मिस्टर जलजला एकाध दिन से स्वयम्भू चुनावाधिकारी बनकर.श्रेष्ठ महिला ब्लोगर के लिए, कुछ महिलाओं के नाम प्रस्तावित कर रहें हैं. (उनके द्वारा दिया गया शब्द, उच्चारित करना भी हमें स्वीकार्य नहीं है) पर ये मिस्टर जलजला एक बरसाती बुलबुला से ज्यादा कुछ नहीं
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बहुत याद आता है , नीम का वो पेड़

कुछ दिन पहले मॉर्निंग वाक पे मेरी सहेली ने, फलों से लदे एक कटहल के पेड़ को दिखाते हुए कहा, '.तुम्हे पता है...कटहल जड़ों के पास  भी फलते हैं'.मैने कहा 'हाँ...मैने भी देखा है'..फिर वो बताने लगी कि केरल के एक गाँव में उसकी मौसी के घर के पास एक कटहल का
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माता-पिता की स्नेहिल छाया के आभाव में ज़िन्दगी की कड़ी धूप में जलती ये निरुपमायें

पता नहीं, निरुपमा की मौत का सच सामने आ पायेगा या नहीं. अगर मान लें , उसके माता-पिता ने हत्या नहीं की पर जमीन तो तैयार की ही उसकी आत्महत्या के लिए. और ये अकेला उदाहरण नहीं है हमारे समाज में,पता नहीं कितनी निरुपमायें, या तो मार दी जाती हैं, आत्महत्या कर
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प्यारी सी मुलाकात 'शिखा वार्ष्णेय' के साथ

यूँ तो शिखा से मिले एक महिना बीत गया. पर मैं इंतज़ार कर रही थी कि वो वापस लन्दन आकर ब्लॉग की दुनिया में लौटे तभी यह संस्मरण पेश करूँ. अभी लिखने बैठी तो लगा अरे..सब कुछ तो वैसा ही ताज़ा सहेजा हुआ है, मस्तिष्क में ,जैसे कल मिले हो. शिखा को पहले उसके दिए,
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मुंबई ब्लॉगर्स मिले कुछ ऐसे, बहुत पुरानी पहचान हो जैसे

अभय तिवारी,युनूस खान,विवेक रस्तोगी, बोधिसत्व,विमल कुमार,राज सिंहं, अनिल रघुराज,आभा मिश्र, विभारानी, ममता,अनीता कुमारइस बार सोच रखा था, सिर्फ तस्वीरें लगा कर मुंबई ब्लॉगर्स मीट में सम्मिलित लोगों का परिचय करवा दूंगी. विवेक रस्तोगी जी विस्तारपूर्वक रिपोर्ट
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वक़्त का घूमता पहिया और ये पति परमेश्वर

पहली बार व्यंग-विधा को आजमाने की कोशिश की है और इसका श्रेय जाता है कुछ मित्रों को. सबसे पहले तो चंडीदत्त  शुक्ल जी ने कहा,आप व्यंग लिखने की भी कोशिश कीजिये. पर मैंने उनकी बात बिलकुल ही अनसुनी कर दी क्यूंकि अब तक  Jack of All Trades, Master of
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इस बार का संस्मरण 'विदाउट टिकट यात्रा' का

पिछली पोस्ट में अपने 'विदाउट रिजर्वेशन ' यात्रा का जिक्र किया था,इस बार सोचा 'विदाउट टिकट' वाली कहानी भी सुना ही दी जाए. वैसे भी  यह संस्मरण अपने कॉलेज के दिनों में ही मैंने 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के 'याद आते हैं, वे क्षण ' कॉलम के लिए लिखा था.
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इस बार की ट्रेन यात्रा कुर्ला से पटना तक....

कुछ गंभीर विषयों पर लिखने की सोच रखी थी.पर दूसरे ब्लॉग पर कहानी ने ऐसा मोड़ ले लिया है कि unwind होना बहुत जरूरी है .और  उसे बैलेंस करने के लिए कुछ हल्का-फुल्का लिखने का मन हो आया. मेरी एक पोस्ट पीक आवर्स" में मुंबई लोकल ट्रेन में यात्रा लोगों को
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एक मुख़्तसर सी मुलाकात....'कैलाश सेंगर' के साथ

पिछले कुछ दिन काफी व्यस्तता भरे थे , एक तो बच्चों की छुट्टियाँ,उनकी फरमाईशें और उनमें आकाशवाणी से एक कहानी की फरमाईश भी शामिल .कई मित्र नाराज़ भी होंगे...उनलोगों के इतने शौक और मेहनत से लिखे पोस्ट्स भी नहीं देख पायी. ब्लॉगजगत में भी रेडियो से जुड़े कई लोग
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हास्य कलाकार जो सिर्फ पहली अप्रैल को ही नहीं..पूरे साल,हमें हंसाते हैं

यह पोस्ट कल डालने की सोची थी, कल हंसने हंसाने का दिन था. तो सोचा क्यूँ ना अपने प्रिय फिल्म कलाकारों वाली पोस्ट डाल दूँ,जो बरसों से बिना अप्रैल,या दिसंबर देखे हमें हंसाते आए हैं.पर कुछ दिन काफी व्यस्तता भरे थे और देर रात वक़्त मिला तो कहानी की अगली किस्त
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क्यूँ मुश्किल है,पुरुष ब्लॉगर पर फिल्म बनाना

(सभी पुरुष ब्लॉगर्स से क्षमायाचना सहित ,यह केवल एक निर्मल हास्य है )अपनी जुली न जूलिया की पोस्ट का लिंक जब मैंने buzz पर  डाला तो अविनाश जी और प्रवीण जी के ये कमेंट्स मिले अविनाश वाचस्पति - एक ऐसी फिल्‍म भी बतलाएं जिसमें नायक को हिन्‍दी
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एक खूबसूरत फिल्म जिसकी नायिका एक ब्लॉगर है

हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म "जूली एन जूलिया 'का रिव्यू पढ़ा तो तय कर लिया यह फिल्म तो हर हाल में देखनी ही है. पर वही बेटे के दसवीं के बोर्ड ने हर राह पर तालेबंदी कर रखी थी.उसकी परीक्षा ख़त्म हुई और मैंने अपने तमाम व्यस्तताओं को धता बताकर इसे देखने का समय
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सपनो के शहर मुंबई में सच होता एक सपना

आज Mumbai Mirror (लोकल अखबार) में एक खबर पढ़ी तो सोचा आप सब से बाँट लूँ. आजकल अखबारों में हत्या,लूटपाट,धोखा धडी की ख़बरों से ऐसा पटा होता है कि ऐसी कोई खबर पढो तो लगता है हाँ ज़िन्दगी सांस ले रही है. उम्मीद मिटी नहीं है.ईमानदारी, मानवता सब इस दुनिया में
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'जब वी मेट' के निर्देशक 'इम्तियाज़ अली' एक फिल्म और बना सकते हैं 'जब वी फेल'

'जब वी मेट' के पहले भी इम्तियाज़ अली ने एक फिल्म बनायी थी ,'सोचा ना था' यह सुपर हिट तो नहीं हुई पर कई लोगों के फेवरेट फिल्म की फेहरिस्त में शामिल है.(मेरे भी ) बॉलीवुड का रुख करने से पहले, 'इम्तियाज़ अली' सात साल तक टेलिविज़न से जुड़े रहें. जी.टी.वी. के
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बैगन की व्यथा कथा

आजकल एक मामूली सी उपेक्षित सी सब्जी बैगन ख़बरों में है.उस पर विदेशियों ने प्रयोग किये हैं और एक ऐसे बैगन(BT Brinjal ) की किस्म तैयार की है जिसमे कीड़े नहीं लगेंगे.और.(GEAC) ने अक्तूबर से इसके कमर्शियल रिलीज़ की अनुमति दे दी है.कृषि मंत्री 'शरद पवार' ने कहा
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ऐसी है, आज की नारी

जब से ब्लॉगजगत में शामिल हुई हूँ, अपनी सहेली द्वारा वर्णित इस घटना के विषय में लिखने की सोच रही थी. और आज महिला दिवस के अवसर पर इसका जिक्र सबसे उपयुक्त लगा.पहले अपनी सहेली का संक्षिप्त परिचय दे दूँ. (परिचय क्यूँ जरूरी है,आपको आगे पता चल जायेगा) .
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हिंदी ब्लॉगर्स, भी ले सकते हैं प्रेरणा, इन मराठी बंधुओं से

आज मॉर्निंग वाक पर मेरी सहेली ने २८ फरवरी के हिन्दुस्तान टाईम्स में छपे एक आलेख का जिक्र किया.मेरे अनुरोध पर उसने वह अखबार मुझे भेज दिया.इसमें मराठी के ब्लॉगर्स का जिक्र है कि कैसे जनवरी की एक दोपहर करीब ६० मराठी ब्लॉगर्स. पुणे के 'पी.एल.देशपांडे' उद्यान
Mar 02 2010 08:53 PM
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फ़िल्मी नगरी की गैर फ़िल्मी होली

मुंबई में होली के बहुत ही अलग अलग अनुभव हुए.शुरू में एक बहुत बड़ी सोसायटी में रहते थे.वहाँ बहुत ही वृहद् से रूप होली मनाई जाती थी.एक दिन पहले पार्टी होती थी.गेम और्गनाइज़र बुलाये जाते.जो बच्चों के,महिलाओं के,कपल्स के फिर पूरे परिवार के..अलग अलग गेम्स
Feb 27 2010 12:16 PM
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होली के रंग,गाँव की सोंधी मिटटी के संग

(यूँ तो दो संसमरण लिखने के बाद बोरियत होने लगती है और किसी और विषय पर लिखने का मन होता है पर एक तो आजकल ब्लॉगजगत पूरी तरह होली के रंग में डूबा हुआ है और फिर इस साल यादों के सहारे ही होली गुजारनी है क्यूंकि बेटे की बोर्ड परीक्षा 4th march से है.एक और भी
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Feb 25 2010 11:43 AM
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दर्शक से श्रोता में तब्दील होने की दास्तान

'स्पोर्ट्स डे' की तरह ही स्कूल के 'वार्षिक प्रोग्राम' की तैयारी भी बड़े लगन और मेहनत से की जाती है.पर इसमें सारा दारोमदार टीचर पर होता है.प्रोग्राम के चयन से लेकर सैकड़ों बच्चों में से कुछ को चुनना फिर रिहर्सल करवाना.कॉस्टयूम निश्चित करना..आजकल वार्षिक
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Feb 22 2010 09:07 PM
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वह सिलसिला भी अब ख़त्म हुआ...

कुछ दिनों पहले एक सफ़र पूरा हुआ जो बारह साल पहले शुरू हुआ था.वो था बच्चों के स्कूल में 'स्पोर्ट्स डे' में उपस्थिति का सिलसिला.मेरे छोटे बेटे का स्कूल में यह अंतिम 'खेल दिवस' था और मैं प्रोग्राम देखते हुए यादों के समंदर में डूब उतरा रही थी. ठीक बारह साल
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कुछ 'वैलेंटाइन डे'...ऐसे भी, गुजरते हैं

काफी साल पहले की घटना है,जब मेरे बच्चे बहुत छोटे थे पर मुंबई में 'वैलेंटाइन डे'की धूम कुछ ऐसी ही रही होगी,तभी तो इनलोगों ने अपने टीचर से पूछा होगा,कि ये 'वैलेंटाइन डे' क्या बला है? और टीचर ने इन्हें बताया कि आप जिसे सबसे ज्यादा प्यार करते हैं ,इस दिन,उसे
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हिंदी लेखन में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग...कितना उचित??

सबसे पहले मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि मैंने विषय के रूप में हिंदी बस इंटर तक ही पढ़ी है और मेरा सारा हिंदी ज्ञान ,पत्र पत्रिकाओं या हिंदी साहित्यिक पुस्तकों से ही अर्जित किया हुआ है,इसलिए अगर हिंदी में 'एम.ए.' या 'पी.एच.डी.' वालों को मेरी बात अच्छी ना लगे तो
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खुदा महफूज़ रखे इन्हें हर बला से,हर बला से

यह पोस्ट मैंने 'हमज़बान' के लिए लिखी थी या यह कहना सही होगा कि शहरोज़ भाई ने ...मुझसे लिखवा ली थी.उनके जैसे तकाज़े करने वाला और मेरे जैसे टालने वाला.उन्हें ऑनलाईन देखकर ही डर जाती कि अभी पूछ बैठेंगे और जरा सी कुशल क्षेम के बाद वे पूछ ही लेते कभी कभी तो
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निर्मल साफ़ पानी सा बच्चों का ये मन...

अक्सर कई ब्लोग्स पर देखा है और मुंबई ब्लॉगर्स मीट में एक साथी ब्लॉगर ने भी बताया कि वे अक्सर इमेल में आये अच्छे विचारों या बोध कथाओं या चुटकुलों का हिंदी रूपांतरण कर अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर देते हैं. मुझे भी एक ख़याल आया पर यहाँ स्थिति थोड़ी सी अलग थी..
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ब्लॉग जगत एक सम्पूर्ण पत्रिका है या चटपटी ख़बरों वाला अखबार या महज एक सोशल नेटवर्किंग साईट ?

जब पहली बार ब्लॉग जगत से नाता जुड़ा तो ऐसा लगा जैसे पुरानी पत्रिकाओं की दुनिया में आ गयी हूँ.सब कुछ था यहाँ,कविताएं,कहानियां,गंभीर लेख,सामयिक लेख,खेल ,बच्चों और नारी से जुडी बातें. पर कुछ दिन बाद ऐसा लगने लगा..कि यह उच्चकोटि की एक सम्पूर्ण पत्रिका है या
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बदलते वक़्त की जरूरत

इस तस्वीर में ये दोनों लडकियां हमारी और आस पास की बिल्डिंग से कचरा उठाती हैं.और उसके बाद बिल्डिंग के प्रांगण में झाड़ू लगाती हैं.आज सुबह यूँ ही इनपर नज़र पड़ी और मैंने गौर किया कि जो लड़की जींस में थी, वो आराम से अपने काम को अंजाम दे रही थी पर जिसने
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उफ्फ यह जाति की दीवार !!

कहते हैं 'Truth is stranger than Fiction ' .इस घटना पर यह उक्ति पूर्णतः खरी उतरती है.काफी पहले की घटना है,मेरे गाँव से एक छोटे से लड़के को एक उच्च वर्ग वाले अपने शहर नौकर के तौर पर ले गए.उन दिनों ऐसा चलन सा था.पिता खेतों में काम करता और उनके बच्चे शहरों
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जब जगजीत सिंह इस दर्द से रु-बरु हुए तो अकिंचन ब्लॉगर्स किस खेत की गाजर,मूली,शलजम??

आजकल ब्लॉग जगत में दो 'हॉट' टॉपिक चल रहें हैं. एक 'नारी' और दूसरी 'टिप्पणी'.रोज ही एकाध पोस्ट इन दोनों विषयों पर देखने को मिल जाती है.मैंने सोचा,मैं भी बहती गंगा में हाथ धो डालूं.वैसे भी यह पोस्ट 'वाणी गीत' की पोस्ट का एक्सटेंशन भर है.कहीं पढ़ा,ये वाकया
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शिक्षको को अब निभानी पड़ेगी काउंसिलर्स की भी भूमिका

मेरी पिछली पोस्ट 'खामोश और पनीली आँखों की अनसुनी पुकार" पर कई मिश्रित प्रतिक्रियाएँ मिलीं.कुछ लोग मेरी बात से सहमत थे,कुछ को ऐतराज़ हुआ और कुछ लोग इस लेख को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं देख पाए. मैंने यह कहीं नहीं कहा कि इसके जिम्मेवार शिक्षक हैं और यह देखने
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