सर्जना's Image
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
08 Mar 2010
कुल प्रविष्टियां
17
पाठक भेजे
243
पसंद
0
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
14.29
पसंद करें
0
नापसंद करें

”नहीं किसी को बहुत अधिक हो /नहीं किसी को कम हो”/पुस्तक-समीक्षा/सरस्वती-पुत्र

सरस्वती-पुत्र के बारे में ये युवा, कवि, कहानीकार और पत्रकारिता में डिग्रीधारी हैं। स्वभाव और रहन-सहन मुक्तिबोध की याद दिलाता है। कई वर्षों से जानता हूँ। इनकी कई रचनायें, कहानियाँ प्रकाशित होती रहती हैं। थोडे से लापरवाह हैं। मेरे आग्रह पर एक
 
डॉ. रामकुमार सिंह
Feb 20 2010 12:48 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

‘मेरे लेखों को उकेरा नहीं जाता’/13 गजलें /डॉ. रामकुमार सिंह

इन गजलों के बारे में – बहुत दिनों से …..या कहिये वर्षों से जो ‘ओढ़ता-बिछाता’ रहा …..उनमें से कुछ छपीं …..कुछ डायरियों के पन्नों पर बिखरी रहीं। …दुष्यंत से हमेशा प्रभावित रहा हूँ….इन गजलों में भी वह प्रभाव आ
 
डॉ. रामकुमार सिंह
Feb 19 2010 02:08 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

‘पत्थर पर घास’/कविता-संग्रह/डॉ. रामकुमार सिंह

इस संग्रह के बारे में…….. 18 साल पहले ….. चम्बल के मुख्यालय मुरैना की सड़क – एम.एस. रोड पर कक्षा-नवमीं का एक विद्यार्थी जा रहा है। उसके साथ उसका एक पड़ोसी……….मित्र भी। उसने पूछा कि ‘पत्थर पर घास’
 
डॉ. रामकुमार सिंह
Feb 11 2010 03:13 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

गांधी को प्रासंगिक नहीं रहने देंगे हम ?

दस साल बाद……इस अग्रलेख के बारे में :- यह अग्रलेख प्रथम बार 2 अक्टूबर सन् 2000 को नवभारत समाचार-पत्र के सम्पादकीय पृष्ठ पर ‘गांधी जयंती पर विशेष’ सामग्री के रूप में प्रकाशित हुआ था। उस समय नवभारत ग्वालियर संस्करण के सम्पादक श्री
 
डॉ. रामकुमार सिंह
पसंद करें
0
नापसंद करें

बैठ कुर्सी पर वो उत्सव बन गये/आप-औ’ हम शामियाने हो गये …..हिन्दी गज़ल

इस गज़ल के बारे में :- मेरी यह गज़ल ‘पाखी’ के मार्च 2009 अंक में प्रकाशित हुई थी। ‘सर्जना’ पर ‘पुनर्प्रकाशन’ के अंतर्गत जारी कर रहा हूँ। यह गज़ल पहली बार प्रकाशित करने के लिए ‘पाखी’ एवं सम्पादक अपूर्व जोशी जी
 
डॉ. रामकुमार सिंह
पसंद करें
0
नापसंद करें

”भूख है तो सब्र कर, रोटी नही तो क्या हुआ”/दुष्यंत : सामाजिक पीड़ा की प्रखर अनुभूति

इस अग्रलेख के बारे में : तब मैं साहित्य का नहीं, विज्ञान का विद्यार्थी था। पहली बार दुष्यंत कुमार का नाम पता चला जब ग्वालियर में श्रीमती अंजना मिश्र ने ‘दुष्यंत जयंती’ मनाई। मैं और मेरे साथी दुष्यंत को शकुंतला वाला दुष्यंत समझे थे। फिर
 
डॉ. रामकुमार सिंह
पसंद करें
0
नापसंद करें

‘किसी को तो शिव बनना होगा’

‘किसी को तो शिव बनना होगा : एक चिंतनशील मन की भावुक ‘अपील’ - शेषकुमारी सिंह- पुस्तक : ‘किसी को तो शिव बनना होगा (कविता-संग्रह) कवयित्री : डॉ बिनय राजराम प्रकाशक : अरविन्द प्रकाशन, आगरा रचनाकार भौतिकवाद की प्रतिस्पर्धा में अकादमिक
 
डॉ. रामकुमार सिंह
पसंद करें
0
नापसंद करें

‘सर्जनात्मक अध्येता का समीक्ष्य से एकात्म होना’

प्रस्तुत पुस्तक-समीक्षा ‘आजकल’ पत्रिका (सूचना-प्रसारण विभाग, भारत सरकार) के मई-2009 अंक में प्रकाशित हुई थी, जिसका पुनर्प्रकाशन ‘सर्जना’ पृष्ठ पर किया जा रहा है। —————–
 
डॉ. रामकुमार सिंह
पसंद करें
0
नापसंद करें

‘गाँधी को प्रासंगिक नहीं रहने देंगे हम ?’ / 30 जनवरी आ रही है/

‘गाँधी को प्रासंगिक नहीं रहने देंगे हम ?’ / 30 जनवरी आ रही है/’नवभारत’ समाचार-पत्र में छप चुका डॉ. रामकुमार सिंह का चर्चित अग्रलेख 10 साल बाद पुनर्प्रकाशित होने जा रहा है/ ‘सर्जना’ पर शीघ्र……….
 
डॉ. रामकुमार सिंह
पसंद करें
0
नापसंद करें

‘भूख है तो सब्र कर रोटी नही तो क्या हुआ?’- दुष्यंत फिर याद आ रहे हैं/गणतंत्र या गणमान्यों का तंत्र/26 जनवरी आ रही है/

‘आचरण’ समाचार-पत्र में छपने के 10 साल बाद पुनर्प्रकाशित हो रहा है डॉ. रामकुमार सिंह का अग्रलेख दुष्यंत कुमार की कृति ‘ साये में धूप’ पर/’सर्जना’ पर शीघ्र जारी होगा…………..
 
डॉ. रामकुमार सिंह
पसंद करें
0
नापसंद करें

जरदान….एक गँवई का इन्टरव्यू………पढ़िये …………’सर्जना’ पर /’पौर्वात्य’ लिंक में …शीघ्र ………….

चम्बल के बीहड़ी गाँव का एक किसान – जो फक्कड़ है, मस्तमौला है। कई किसानों की दशा का प्रतिनिधि। एक गँवई आशुकवि ….जिसके लिये कोई टेलेन्ट-शो नहीं है…। 15 दिनों की मेहनत रंग लाई और आशुकवि जरदान का इन्टरव्यू लिया जा सका। जरदान की रोचक
 
ramkumarsingh
पसंद करें
0
नापसंद करें

‘डरती है दरियाबी’ / मोहम्मद इलियास की तेलुगु कविता/

मोहम्मद इलियास के बारे में कुछ…….. तेलुगु के युवा कवि मो. इलियास का हिन्दी जगत से परिचय कराते हुए मुझे हर्ष है। उनकी कविताओं में एक ओर भारतीय मानववाद और आध्यात्म की गहराई है तो दूसरी तरफ आम जनमानस, गरीब मुस्लिम, मुस्लिम स्त्री आदि के सम्बन्ध
 
ramkumarsingh
पसंद करें
0
नापसंद करें

'सर्जना'

मोहम्मद इलियास के बारे में कुछ…….. तेलुगु के युवा कवि मो. इलियास का हिन्दी जगत से परिचय कराते हुए मुझे हर्ष है। उनकी कविताओं में एक ओर भारतीय मानववाद और आध्यात्म की गहराई है तो दूसरी तरफ आम जनमानस, गरीब मुस्लिम, मुस्लिम स्त्री आदि के सम्बन्ध
 
ramkumarsingh
पसंद करें
1
नापसंद करें

भूषण को किन मायनों में राष्ट्रीय कहें ?

भूषण को किन परिस्थितियों, किस युग और किस प्रकार की काव्य-कला का कवि कहा जाये, इसके लिए जरूरी है उस युग की प्रवृत्तियों को जानना, जिस युग के जनमानस ने अंतत: अपने बीच से भूषण को तैयार कर लिया। आखिर क्या वजह रही कि तत्कालीन परिस्थितियों में उन्हें भारतीय
 
ramkumarsingh
टैग: uncategorized
पसंद करें
0
नापसंद करें

*टिल्लू* बाल-कहानी (एक विद्यार्थी के आग्रह पर)

टिल्लू ने अंडे को फोड़कर अपना सिर बाहर निकाला। नन्हीं – नन्हीं ऑंखें उसने सबसे पहले एक बड़ी चिड़िया को देखा जिसकी आंखों में अपार ममता भरी थी। यह टिटहरी कोई और नहीं उसकी मां थी जो गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रही थी – टि टी टि हुट् – टि टी टि हुट्।
 
ramkumarsingh
टैग: uncategorized
पसंद करें
0
नापसंद करें

‘सर्जना’

‘सर्जना’ मानव और उसकी रचनात्मक शक्ति की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है। ‘सर्जना’ मात्र आनंद की वस्तु नहीं है। प्रत्येक काल में इसने समाज को एक नयी अनुभूति से ऊर्जस्वित किया है। वर्तमान समय में ‘सर्जना’, जिसे हम यहाँ साहित्यिक
 
ramkumarsingh
टैग: uncategorized
पसंद करें
0
नापसंद करें

Hello world!

Welcome to WordPress.com. This is your first post. Edit or delete it and start blogging!
 
ramkumarsingh
टैग: uncategorized