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साहित्य योग

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08 Jun 2010
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माँ बापू कहिन रहा हम तोका, दुलहा तोहरे पसंद का देबे.....'तेज'

माँ बापू कहिन रहा हम तोका, दुलहा तोहरे पसंद का देबे।तोहरे खुसी मां हम अपना, तन-मन न्योछावर कर देबे ।।दिन तो अब पहाड़ लागत है  रात सुबह खातिर रोवत है दिल-तराजू में तौले बिना उनका  प्यार अपनी कीमत वसूलत है।मान राखेन हम समाज-परिवार का पाथर
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सफेदी............'तेज'

दिल में लगे खरोंचों को यादों में जिन्दा दागों कोसिराहने पड़े सपनों कोपोंछ दो मेरी इस सफेदी में लम्बी होती इन दोपहरी को  सामने लिखी उधारी को उनकी दी हुई हर निशानी को पोंछ दो मेरी इस सफेदी में अब ना आयेंगे वो दुबारा  इन
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स्लोवीनिया और ऑस्ट्रिया के जंगलों के कुछ चित्र......... तेज

समय के अभाव में आने में थोडा विलम्ब हुआ....पर चलिए जब आया ही हूँ, तो आप को  पिछले दिनों में स्लोवीनिया और ऑस्ट्रिया के जंगलों के कुछ चित्र दिखा देता हूँ.  तेज 
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हिन्दी साहित्य के नाम पर हिन्दी, उर्दू, फारशी, और इंग्लिश की खिचड़ी परोस रहे हैं ब्लॉगर.....'तेज'

कुछ कारण बिना किसी कारण होते हैं पर जब कारण हद से आगे निकल जाये तो उसका बोध कराना जरुरी होता है.कुछ ऐसा ही हो रहा है ब्लोगवाणी पर, कुछ अच्छे लोगों को छोड़ कर बाकी लोग केवल संख्या बढाने के लिए ब्लोगिंग कर रहे हैं.मैं खुद हिन्दी का देवता तो नहीं हूँ पर जो
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चिअर्स को हिन्दी में क्या कहेंगे..........'तेज'. ...

"Cheers" चिअर्स को हिन्दी में क्या कहेंगे.....आसान सा सवाल है पर मैं फँस गाया इस चिअर्स के चक्कर में. हुआ ये की मैं कुछ अंग्रेज दोस्तों के साथ रात का खाना खाने बाहर गाया. लोगों ने झट से सोमरस (बियर ) का आर्डर कर दिया. अब क्या था कहने की देर थी की सोमरस
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हवा कुछ कहने आई है .........`तेज`

कहीं किसी बंजर मैदान से, कुछ पूराने वृछों से हवा बह आई है अकेले पड़े शमशान के कब्र से, आजादी की सुगंध संग लेकर आई हैहवा कुछ कहने आई है ।। जो भूल गये हैं कीमत आजादी की,  उनको लम्बी नींद से जगाने आई हैपूराने पड़ चुके सोये जंगी हथियारों में,  
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हरिवंश राय बच्चन जी को समर्पित "प्रियतम की बाला"........'तेज'

प्रिय की अधर रस में भीगी माला,अपने ही सृंगार में डूबती छाला,रंग रूप के आवेग में समाती बाला,मृद मधुर मिलन करने आती नित्य देवाला।।9।बार-बार मद-मस्त आता पीनेवाला,छल से छलकती घूँट में जीता जीनेवाला,छलकते प्याले को होंठो से पोंछती बाला,दर्शन आश में प्याले पर
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बाला...नये रूप में.......`तेज`

वैसे हाला और मधुशाला पर बहुत कुछ लिखा गाया है पर मेरी कोशिश आज यहाँ मधुशाला को दूसरे रूप में जिन्दा करना है."बाला" जो की यहाँ "मन" के रूप में होगी, "मधुशाला" "देवाला" और "हाला" "माला" के रूप में. मैंने "बाला" पर जादा जोर दिया है, की वह क्यों देवाला जाती
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देवाला की माला....

(2)अँधेरी तरंगो के नीले नभ में भंवर की सिमटती गहराई में सुलगती आग की लपट मेंअटखेलियाँ करती बाला.... विधवा की जवानी  गद्दार की देश भक्ति राजनीति के गंदे रंग और आतंकवाद की शक्ति से खिन्न होकर आती बाला डालने देवाला के माला.... महबूब
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बाला......

वैसे हाला और मधुशाला पर बहुत कुछ लिखा गाया है पर मेरी कोशिश आज यहाँ मधुशाला को दूसरे रूप में जिन्दा करना है.बाला जो की यहाँ मन के रूप में होगी, मधुशाला देवाला और हाला माला के रूप में.(1)सुख संचित कर हंसती बाला,जीवन के रंग को जीती बालादुःख में पाँव पसार
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मैं था जिनके इंतज़ार में............

मैं था जिनके इंतज़ार मेंख़्वाबों का दिए जलाये हो गए वो किसी और के बिना अश्कों में आग लगाये....सावन की बूंदों में गिरता रहामेरा ये अश्क लहू बनके मुस्कुराते रहे वो उनकी बाँहों मेंबिना शर्मों-हया शाजाये...... बैठा रहा मैं उनकी आश में, मिलन की
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फहरा दो पताका............

जिंदगी के सवालों से परेशान बहुत हो गाया, अब और नहीं इस बार बदल कर रहूँगा अपनी किस्मत.......लडूंगा हर कठिनाईयों सेहिमालय के शिखर तक पहुचूँगा सारे बंधन तोड़ दूंगा....चाहे कुछ भी हो जाये इस बार बदल कर रहूँगा फिर धीरे से समझाता
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कहीं किसी सड़क पर...........

दिन प्रतिदिन की भीड़ में कहीं किसी सड़क परचिलचिलाती धूप में नगें पैर दौड़ती इधर-उधर.....कभी हिस्से में मिलती नई तो कभी डामर से लतफत सड़क देखती एक टक चलते लोगों को तलाशती कोई अपना इन बदलते लगों में चलती सड़क परदुःख ने छोड़ा ना
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घाव से भरा पत्र.........................

दर्द और यादों का समेटा हैहर पल का लुटता सवेरा हैघाव से भरा पत्र....  जो उसने आज माँ को भेजा हैनिकालो मुझे इस अन्धकार से बाहर की सवेरा भी अब मुंह छिपाने लगा हैमैं और जिन्दा रह नहीं सकती बिना वजह आसुओं के घूँट पी नहीं सकती.....बाबा को
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ये थीसिस अगर मिल भी जाये तो क्या है..!!

ये पेपर.. ये जर्नल.. ये रिसर्च की दुनियाये बालों की दुश्मन कीताबों की दुनियाये पब्लीकेशन की भूखी लोगों की दुनिया  ये दुनिया अगर मील भी जाये तो क्या है...!!हर एक स्कॉलर घायल.. है रूह उसकी प्यासी..नीगाहो में उलझन दिलों में उदासीये लेब है या आलम
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रेलगाड़ी से उतरना मना है...यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है

रेलगाड़ी से उतरना मना है यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है, चलिए थोडा और आगे चलते हैं. (9)यार मोटे उ रामखेलावन का क्या हाल चाल है छोड़ा पूराने, अब हमार उनसे ना पटत है...काहे का हो गाया...बस ऐसे ही, कोई खास बात ना बा...फिर भी  अरे उ ससुर रामखेलावन का जोन
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक और उड़न तश्तरी के अनुरोध पर यात्रा जारी है ....

चलिए यात्रा को और आगे बढ़ाते हैं ...फिर से थोडा गुदगुदाते हैं....(7)गर्मी ने लोगों को इसकदर परेशान कर रखा था की लोग या तो ऊपर बंद पड़े पंखे को देखते या फिर पसीना पोछते...इतने में डिब्बे में प्रवेश हुआ एक दुबले पतले आदमी का जो हाथ का पंखा बेंच रहा था.लिजीये
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चलिए यात्रा आगे शुरु करते हैं ..

चलिए यात्रा आगे शुरु करते हैं ..(5)दे दे बाबा भूखे को कुछ दे दे. जोड़ी सलामत रहे. दो दिन से कुछ खाया नहीं..दे बाबा यार मोटे अब ये कौन सी बला आ गयी. ससुर चैन से साँस भी नहीं लेने देवत.हाँ...ससुर जैयेसे झपकी लागत है कोई ना कोई टपक परत है.सही कहत हो
Apr 18 2010 09:13 PM
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यात्रा जारी है .........खुसखबरी के साथ

आज मैं आप को पहले एक खुसखबरी देता हूँ...हाल ही में मुझे मेडिकल यूनिवेर्सिटी द्वारा बेस्ट पोस्टर अवार्ड मिला था और अब The Jouranl of Immunology ने एक दूसरे शोध को शोध पत्र के रूम मैं छापने के लिए स्वीकार कर लिया......(अंग्रेजी के शब्दों के लिए छमा). आप सब
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रेलगाड़ी की यात्रा ...(हास्य)

मुझे तो लगता है जिंदगी ही हास्य के लतीफों से भरी पड़ी है. जरुरत सिर्फ उसको समझने की है.चलिए मैं आपको रेलगाड़ी की यात्रा कराता हूँ जिसमें आपको तरह-तरह के लोग मिलेगें और उनकी बातें किसी हास्य कवी की रचना से कम ना होगा...............पहला चरित्र मोटे लाल--नाम
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कवी महोदय तो अब आते नहीं लगता है वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के चक्कर में कुछ खाते नहीं......

एक दिन शौचालय भी हंस कर बोल पड़ामैं तो एक हूँ पर लोग क्यों अनेक हैं किसी का मोटा, किसी का पतला कोई गोरा तो कोई काला................ सब अपनी तशरीफ़ रखते हैं खुद तो पकवान खाते हैं मुझे सडा-गला बचा हुआ खिलाते हैं हर दिन कुछ नया मिलता
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घिस रही है उधडे रंग के टूटे धागों में..........

किनारे दीवारों पर लटकता पर्दासामने पड़ी लाल रंग की चटाईयाद दिला रही हैं उसको अपनेबीते कल की जुदाई.....वही रंग है दोनों का जो कभीदेखा था उसने अपने गाँव के बने घर पर......ढलता जा रहा है उसका भी रंग धीरे-धीरेलटकते पर्दों के साथ.....घिस रही है उधडे रंग केटूटे
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सिन्दूर की अभी भी है कमी............

उँगलियों से टटोलती मांग को अपने सर पर रखकर हाथ सोंचती  सिन्दूर की अभी भी है कमी....निहारती दर्पण को एक टक फिर रो पड़ती सहसा.....धूमिल हो जाते सपने आँखों से गिरते बूंदों के बदल से.....कोई ना आया पकड़ने उसका हाथ और ना ही पोंछा आसुओं भरी
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खड़ी दोपहरी में देखा था उसको छत पर......

खड़ी दोपहरी में देखा था उसको छत पर...... अम्बार दुःख का झूल रहा थाआँखों में उसके.....एक हाथ में पानी का कटोरा  दूसरे में उल्झी-अधूरी लकीरें तन काला कि जैसे सारी धूप सोख ली हो उसने.....हाथ-पैर समशान की लकड़ी की  तरह जल रहे
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विधवा-शहीद

सफेद वस्त्रों में लिपट गयी छोड़ कर जीवन के रंग एक ही सवाल है बस मन में क्यों गए मेरे पिया छोड़ मेरा संग रात होती थी पहले दिन के बाद अब तो दिन भी लगते हैं रात इंतज़ार का दुःख भी खत्म हुआ बचा शेष तो सिर्फ अवसाद जननी
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ऐसा कोई हंसी दिलदार मांगता हूँ.......

निंद्रा नहीं स्वप्न मांगता हूँ कभी ना बीते वो रात मांगता हूँ आकर जो पोंछ जाये मेरी आँखों से आंसू, ऐसा कोई हंसी दिलदार मांगता हूँ....... लिख गाया अपनी मुस्कुराहट से इस दिल के शीशे-दिल पर अपना नाम कि टुटा तो भी मुस्कुराया  हर
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तुम्ही निकले ...........

सुख चैन छीन कर कहते हो सजा तो नहीं है जलाकर कपूर कहते हो राख तो नहीं है जाऊं भी तुम्हे छोड़ कर तो कहाँ जाऊं मंदिर, मस्जिद और भगवान भी तुम्ही निकले अधर चुम्बन देकर कहते हो बेशर्मी तो नहीं है तीर धनुष से छोड़ कहते होमृग
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धीरे-धीरे चल....जिंदगी को जी......

भाग रहा है इन्सान दौड़ रहा है अनचाहे सपनों के सड़क पर  कभी दायें तो कभी बायें मुड़ता फिर भी नहीं पहुँचता मंजिल पर सबको पीछे छोड़ने कि ठसक  सबसे आगे दिखने कि जिदमें क्यों है तैयार बिकने को खो गाया है तू कहीं इन्सान क्या हो गया है
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नेता तुम लूट लो............

आम आदमी की आस बड़े वादों का झूठा विस्वास भावनाओ का ब्रत उपवास लूट लो दोनों हाथों से लूट लो नेता तुम लूट लो............चुनाव आते हैं  बार-बार  नयी आस और उम्मीद के साथ कर दिए जाते हैं फिर वही वादे जिनपर इरादे थे
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"युवाओं से है मेरी पुकार...सरदार भगत सिंह की कुछ पक्तियों से...."

आज आप को मैं कुछ उन पक्तियों से परिचय कराता हूँ जब सरदार भगत सिंह जेल में अपनी मंगेतर के याद में गाया करते थे. आजीवन तेरे फिराक जुदाई विछोट्र, विरह, नामिलन के कारण दिल का शीशा इतना कमजोर हो गया कि किसी फूल पत्ती या पराग कि चोट से टूट ना
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ये नहीं है मेरी बरेली........

ये नहीं है मेरी बरेलीजहाँ हाथ में धर्मं का है छूरामन में अंधविश्वास की छायाआदमी-आदमी को मार रहाना कोई मोह ना कोई मायामानवता के हो गए टुकड़े टुकड़ेहर टुकड़े पर घाव बेसुमारजल रहे हैं घर एक-एक कर के  सपने थे जिसमें दस हजारफफक-फफक कर रो रहा  वह मंदिर
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खंजर....समुन्दर....आग

दिल में उतर कर कहते हो दर्द तो नहीं है,खंजर मार कर कहते हो जख्म तो नहीं है,सिकायत करूँ भी तो किससे करूँ जज, मुजरिम और महबूब भी तुम्ही निकले सांसों को चुराकर कहते हो भस्म तो नहीं है, समुन्दर को छेड़ कर कहते हो लहर तो नहीं
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नहला दे सबको सदाचार में............

बादलों के रथ पर बैठ जा ग्रहों को बना ले अपना घर, हाथ सेंक सूरज की तपस सेप्यास बुझा समुन्द्र के जल से...गति में पछाड़ दे मन को इच्छा को बाँट दे दान में, चन्दन का लेप लगा लोभ पर  विजय श्री कहला क्रोध का.... दौड़ कर पकड़ ले सोंच
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दूनिया कहेगी ...पहले आप...पहले आप......

जिंदगी के मार से मर जाना नहीं कल्पना के भंवर में उलझ जाना नहीं, सोंचते रहना अगली कश्ती को समय को यूँ ही गवाना नहीं....शब्दों के जाल में फसना नहीं भावनाओं के लहरों में बहना नहीं, देखते रहना अपनी मंजिल को बीच राह में रुक जाना
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बनते मकान में........लगा है उसके ही सपनों का गारा

बिखरे पड़े हैं टूटे पत्थरों मेंकहीं उसके सपने जो टूटे थे पत्थरों के साथबिना आवाज किये  धूल बनके उड़ गए एक-एक करके सारे सपने  अब बदली सी छायी हैआँखों में उसके, इन बनते मकान में....दीवारों में चुनते जा रहे हैं कुछ भारी कुछ हलके
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बनते मकान...बन गए हैं श्रृंगार....

बनते मकान में चल रही है नंगे पैर सर पर पत्थर की टोकरी नाप रही दोपहरी की धूप बहता पसीना, सूखा जिस्ममन में द्रोपदी सी लज्जा आँखों में नमक का समुन्दर है ना कोई आस जिंदगी सेना कोई मंजिल....बनते मकान में बालों में सूखे
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दूसरा निवाला (फलाने-धमाके)...महिला आरक्षण

लीजिये पेस है दूसरा निवाला.....खबरदार पानी मत पीजिएगा...धमाके...हाँ फलाने... यार!! अगर महिला आरक्षण बिल पहले पास हो गया होता तो बहुत अच्छा होता.क्यों, तो क्या हो जाता ?राहुल महाजन को दुल्हन तलासने के लिए स्वयंवर नहीं करना पड़ता.हा हा हा ....सही कहा
Mar 07 2010 10:05 PM
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घर में लाल आया है

आओ-आओ नगाड़ा बजाओ सबको बुलाओ मिठाई बाँटोपंडित बुलाओ नामकरण कराओ,घर में लाल आया है.....  बड़ा होकर हमारे सपने करेगा पूरा सब आओ जल्दी आओ घर का चिराग आया है,घर में लाल आया है....आंसू पोछेगा बुड़ापे में बुरे समय में हमारे साथ
Mar 07 2010 01:56 AM
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फलाने-धमाके

"भाइयों और उनकी बहनों आज से आपका इंतज़ार खत्म हुआ..पेस है बिलकुल नया और तीखा..फलाने-धमाके के किस्से जो आप को रोज परोसे जाएँगे...खुद भी खाएं और दूसरों को भी खिलाएं. बीच में पानी पीना सख्त मना है.....तो पेस है पहला निवाला........."फलाने....हाँ धमाके?आज खाने
Mar 06 2010 05:47 PM