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Arshad ke man se........

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14 Jun 2010
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अपनी भी उमंगें भरती है यू कुलाचे .......................अरशद अली

है आसमान की सीमा जनता है मन ये मेरा पर अपनी भी उमंगें भरती है यू कुलाचे फिर थक कर दूर जाकर नहीं ख़त्म होता अम्बर दिखता है फिर नीचेसब कुछ छोटा ज़मीं पेऔर थक सा जाता पर भी जाना है अपने घर भीहै आसमान सुन्दर पर ज़मीं से दूर होकर फूलने लगती हें सांसे और लौटता
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तुम्हारी कसम मै जहाँ छोड़ जाऊं.................अरशद अली

खुला राज तो तेरी रुसवाई होगी मै राजे मुहब्बत निहाँ छोड़ जाऊं जिसे खूने दिल से मै लिखता रहा हूँ अधूरी हीं वो दास्ताँ छोड़ जाऊं मेरा ख़ून जो तेरे दर पे गिरेगातो फिर हश्र तक भी नहीं उठ सकेगा मै ये सोंचता हूँ की टकरा के सर को तेरे दर पे अपनी निशान छोड़ जाऊं
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कुछ पंक्तियाँ भेट करना चाहूँगा ,शायद आपको थोडा आराम मिले

जीवन दीपक जलते जलते थक कर एक दिन बुझ जायेगा अन्धकार जो मिट न पाया अंत प्रकाश में मिट जायेगा-----------------------------छन्भंगुर एहसास नित नए रंगों में बनते टूटते नए नए जाने कितने ख़वाबराजा बन मन गढ़ंत न तख़्त न ताज रंक रंक के शोर मेंदबते सब
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हम मुस्लिम,हम हिन्दू ,हम अच्छे, तुम बुरे..(कितने शर्म की बात है की हमारे मध्य कुछ लोग शान से ऐसा कहते हैं )...अरशद अली

नकाबों में चेहरा छुपाये इन्सान अपने-अपने उम्र को गुज़ार रहा है...अनुभवों को जमा करते हुए ...सुधारते हुए अपने जीवन शैली को...बिडम्बना हीं है की जो भी अर्जित किया उसे आने वाले पीढ़ी को बाँट देना है और जो भी अर्जित नहीं हुआ उसे पा लेने के लिए एड़ी पर शारीर
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समस्याएं जो भी हें ..ईश्वर के आस्था से, आकाश गंगा से ,पहाड़ से,ग्रेनाईट के चट्टान से यहाँ तक की ट्रक से भी छोटी है,, अरशद अली

कई साल पहले ग्रेनाईट के चट्टान पर चढ़ते हुए महसूस किया थकानसीधी खड़ी चढ़ाई चाहिए था कुछ आराम ..बैठा ख्यालों में टकटकी लगाये उस हाईवे पर जो ग्रेनाईट के चट्टानके नीचे नीचे गुजरता था और गुजरता था कई बड़े ट्रकों को पत्थर ढ़ोते हुए ...एक सनसनी छा गयीमै सोंचता
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विगत बर्षों में मैंने चौपाल को मरते देखा है..........अरशद अली

चौपाल बर्चस्व की लड़ाई का प्रतीत सदेव बना है हर बार दो गुटों में समझौता करवाते पंचों में बैठे चौधरी जी सदेव बड़े न्यायी दिखे हैं बन्दर वाला ग्याहे -ब्याहे दुग्दुगी बजा चौपाल पर भीड़ लगा हीं लेता है चौपाल हर बार दुर्गापूजा में सज-धज कर चमक दमक में अपनी
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विवाद संस्कृति के नाम पर करने से मत चुको,ऐसा करो चाँद में भी दाग है,सर उठाओ और चाँद पर भी थूको ----अरशद अली

सबसे पहले गुरु जी को सादर प्रणाम कीजिये ....वही गुरु जी जो, कमाल कर दिए हैं महिलाओं के छत्ते में हाँथ डाल कर ,अब लिखने में माहिर तो हैं हीं, हारेंगे थोड़े न,अगला पोस्ट लिखबे करेंगे ...नहीं तो लिख भी दिए होंगे थोडा ब्लोग्वानी पर जाकर पता लगवा लीजिये
Mar 06 2010 07:05 PM
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मै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.

रिक्तता में खोजता हूँ...शुन्य तक निहारता हूँ कल्पनाओं के रूपों में आकार धुन्धता हूँ..बहुत सोंच कर भे कहा सोंच पता हूँशुन्य से चल कर शुन्य तक पहुँचता हूँमै तुम्हे क्या लिखूं,तुम्हारे बिषय में जानता भी तो नहीं.निशब्द परिभाषाओं का अर्थ लगता हूँखुद को
Mar 04 2010 07:51 PM
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आपका नाता आपके प्रतिद्वंदी से क्या है? थोडा सोंचिये.

संबंधों की इस दुनिया में रिश्ते नाते जाने कितनेहर नातों के कितने नातेंनातों के भी कितने गांठें उन सब में एक और है नाताता उम्र जो संघ चलता है प्रतिद्वंदी बन वो जो कहता है कर्मों का है प्रतिध्वनि होता है लाख नकारे मन फिर भी प्रतिद्वंदी सदेव संघ रहता है
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चाय के साथ सिगरेट पीने वालों के लिए सन्देश

अब जरा मिजाज़ हल्का किया जाए ..बहुत हुआ मरने मारने की बात शायद आपको इल्म हो एक नया बलोग " उम्मीद " जो राजवंत दीदी ने शुरू किया है ने मेरे पिछले पोस्ट पर एक टिपण्णी दिया था की भाई ज़िन्दगी की बात करो ...तो चलिए ज़िन्दगी की बात करते है .सिगरेट पीना स्वस्थ
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एक सत्य (कविता)

उम्र के हिसाब से ये कविता मुझे नहीं लिखनी चाहिए थी मगर मुझे नहीं पता मैंने ऐसा क्यों सोंचा और कैसे कैसे ये कविता कागज पर उतर आये... एक सत्यमृत्यू सत्य है,डर जाओगे तुम भी एक दिन मर जाओगे बचपन के डर को मरते देखा फिर बचपन को मरते देखा युवा में सब नया नया सा
Feb 19 2010 08:12 PM
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यदि आप लड़की के पिता हें तो शर्मा जी वाली भूल मत कीजियेगा (एक अनुरोध)

आज शर्मा जी चाय की दुकान पर नहीं आये .कल हीं बतला रहे थे की बेटी के ससुराल जाना है,शादी को एक वर्ष भी नहीं गुजरा और लेन-देन को लेकर ससुराल वालों की प्रताड़ना शुरू हो गयी.शायद कुछ समझौता करना पड़े.कोई रास्ता तो निकलना होग अन्यथा बेटी को कुछ दिनों के लिए
Feb 12 2010 08:32 PM
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कुछ तो लोग कहेंगे

पुरानी धुन सुना तो ऐसा लगा की मेरे मन की छुपी बात को हीं गायक ने दुहराया हैकुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना............... आज पड़ोस के अंकल ने मुझसे कई साल बाद पूछ हीं लिया की मुझे अंकल क्यों कहते हो भैया कहा करो.मेरा मन खुश था की मुझे अपने आस पास
टैग: ones again
Feb 10 2010 10:24 AM
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एक तुम हो जो निश्चिंत हो दुनिया के भीड़ में गुम

कल माँ की अचानक तबियत ख़राब होने के कारण उन्हें हॉस्पिटल में भारती करना पड़ा..कल दिन भर एक मायूसी छाई रही... कई बार सोंचा चिंता न करूँ सब ठीक हो जायेगा मगर चिंताएं दस्तक कहा देती धडधडाते हुए मन मस्तिस्क पर छाती रही...ऐसे तो मै चार भाई बहनों में तीसरे
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मरने के बाद अगर मुझे एक कविता लिखना हो तो क्या लिखूंगा .....

आज यही सोच रहा था.. जीवन के कई रंगों को जीने की लत लगी हुई है..क्या भला है क्या बुरा चंचल मन भली भाती जानता है .जन्म से मृत्यु तक अनेकों रंग देखना है.जैसा रंग मिलेगा वैसी कविता का जन्म हो जाएगा मगर यदि मरने के बाद एक कविता लिखने का मौका मिले तो मै क्या
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मीठी यादें गावं की (Ek baar aur)

शहरी रंग बेरंग से धूसर मिटटी गावं की धुप शहर की शूल सरीखी इच्छा आम के छाव कीहाय-हेलो की चकाचौंध में स्पर्श बड़ों के पावँ कीअंग्रेजी के कावं-कावं में मीठी बोली गावं कीशाम की बर्गर,रात की पिज्जा पानी पूरी कोको कोला दाल-भात में चोखा-चटनी खाना मेरे गावं की
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अपने अकेलापन को दूर करने के लिए आपको कितने लोंगो की आवश्यकता पड़ेगी?

प्रश्न जटिल नहीं परन्तु उत्तर देना आसन भी नहीं ..गत रात्रि दफ्तर से घर लौटा तो घर की दीवालें प्रश्न कर हीं बैठीं ....."आज भी अकेले घर आये हो , कहाँ गए वो लोग जो तुम्हरे इर्द-ग्रीद हुआ करते थे? "अन्न्यास इस प्रश्न पर मै आश्चर्यचकित था.सोफे में धस कर बैठना
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कैसा लगेगा यदि आपका जन्मदिन हो और किसी अपने के मरने का समाचार आ जाये??

आप भी सोंच रहे होंगे की मै पगला गया हूँ मगर जनाब अगर ऐसा हो जाए तो क्या होगा? जरा सोंचिये बिचारिये,ये अलग बात है आज तक आपने ऐसी कल्पना नहीं की है.परन्तु ये असंभव तो नहीं.भगवान करे आपके साथ ऐसा कभी ना हो मगर भगवान की लीला अपरम्पार है इससे तो किसी को इनकार
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आप भी किसी की बदनामी करने का सोंच रहे है तो कृपया इसे ज़रूर पढ़ें

आज मुझे एक बहुत पुरानी कहानी याद आती है जिसे मेरे बचपन में किसी फेरी वाले अंकल ने सुनाया था.मुझे ठीक से याद नहीं की उन्होंने ये कहानी क्यों और किसके लिए कहा था जब माँ आस पड़ोस के औरतों के साथ दरवाजे पर फेरी वाले अंकल से कुछ खरीद रर्हीं थी.बाज़ार में काफी
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नुक्कड़

सभ्यताएं बदलते हुए कर्मवत जाने किस शुन्य में ले जाएगी प्रश्न काँटों का ताज बन प्रतेक चिन्तक के मस्तक पर चुभती चली जाएगीप्रतेक दिन सजता नुक्कड़ उजाड़ होता जायेगा प्रतेक दिन उजड़े नुक्कड़ को काल पुनः सजाएगी.नुक्कड़ लोगों की भीड़ संस्कृतियों का जमावमन
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एक जनवरी,वर्ष का पहला दिन (एक चिंतन)

आज मोबाईल की हालत ठीक नहीं बधाइयों का ताता लगा हुआ है.चन्द्र ग्रहण भी चर्चा में है.झारखण्ड में सोरेन सरकार अलग उत्सव मना रही घर से कुछ दूर पर लडकें माइक पर गाना बजा रहे हें.दूध वाले ने दूध नहीं भेजवा कर चाय की आफत कर रखी है.टेलीबिजन रात से रंगारंग बना
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सलाह

(१) एक बात को दो बार मत कहना अर्थ अलग लगाया जायेगा पहले बार में सीखेंगे सब दूसरी बार मजाक उड़ाया जायेगासार्थक सोंच तोसार्थक बनी रहेगीपर सार्थकता के अर्थ कोआजीवन छुपाया जायेगाबड़ी ब्यर्थ अर्थ निकालेंगेजब भी कुछ दुहराया जायेगाएक बात को दो बार मत कहना अर्थ
Dec 27 2009 07:10 PM
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शब्दों के चित्र

जो चाहता था हुआ नहीं.जो हुआ पर्याप्त नहीं आशा निराशा की इस गुत्थम-गुत्थी में जित किसी की नहीं मानसिक लड़ाइयों में अंत की कामना करते हीं स्थितियां नयी लड़ाई की पृष्ठ भूमि तैयार करता गया कभी हार कभी जित चक्र बस चलता गया ..........शब्दों का रंग कागज पर
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मीठी यादें गावं की

शहरी रंग बेरंग से धूसर मिटटी गावं की धुप शहर की शूल सरीखी इच्छा आम के छाव कीहाय-हेलो की चकाचौंध में स्पर्श बड़ों के पावँ कीअंग्रेजी के कावं-कावं में मीठी बोली गावं कीशाम की बर्गर,रात की पिज्जा पानी पूरी कोको कोला दाल-भात में चोखा-चटनी खाना मेरे गावं की
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पुनः चिंतन

आज शर्मा जी चाय की दुकान पर नहीं आये .कल हीं बतला रहे थे की बेटी के ससुराल जाना है,शादी को एक वर्ष भी नहीं गुजरा और लेन-देन को लेकर ससुराल वालों की प्रताड़ना शुरू हो गयी.शायद कुछ समझौता करना पड़े.कोई रास्ता तो निकलना होग अन्यथा बेटी को कुछ दिनों के लिए
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चक्कर में चक्कर

किसान को धुरी पर बैलों को घुमाकर धान से चावल के दाने तक आने में.गेहूं को चक्की के पाट में डाल कर दादी को चक्की घुमाने में.कुम्हार को चाक पर मट्टी डाल तन्मन्यता से बर्तन बनाने में संतुष्टि अवश्य प्राप्त होती होगी सभी को ईश्वर के चक्र को दुहराने में.सभी
Dec 15 2009 05:50 PM
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रोटी-कपडा और मकान

हर सुबह की तरह आज भी चाय की दुकान पर शर्मा जी मिले थे ,लम्बी लम्बी बातों में एक छोटा सा आग्रह भी करते जा रहे थे की यादव जी से अच्छा उमीदवार इस बार नहीं मिलने वाला आप सभी उन्हें हीं वोट दीजियेगा,उनको जितने से अपने शहर का भाग्य पलट जाएगा और पता नहीं क्या
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ख़ुशी के पल

आज मेरे मन की मुराद पूरी हो गयी . मेरा अपना एक ब्लॉग है जो मेरे मन को आपके सामने लाने में मदद करेगा . कई दिनों से इच्छा थी की ऐसा हो , और आज पूरी पाकर खुश हूं.
Dec 07 2009 06:24 PM
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कल की तैयारी

मुझे हमेशा लगता रहा है,जहाँ चाह वहीँ राह मगर आज थोडा विश्वाश डगमगाया सा लगा.अपने ऑफिस के काम से आज जितने लोगों से मिला उनमे एक भी मुझे अपनी बात कहने में मदद करते नहीं दिखे .निराश मुझे होने की ज़रूरत नहीं थी मगर निराशा दूर से मुझे ललचाती रही.एक उम्मीद की
Dec 07 2009 06:17 PM
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कुछ तो लोग कहेंगे

पुरानी धुन सुना तो ऐसा लगा की मेरे मन की छुपी बात को हीं गायक ने दुहराया हैकुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना............... आज पड़ोस के अंकल ने मुझसे कई साल बाद पूछ हीं लिया की मुझे अंकल क्यों कहते हो भैया कहा करो.मेरा मन खुश था की मुझे अपने आस पास
Dec 07 2009 05:57 PM