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अपनी भी उमंगें भरती है यू कुलाचे .......................अरशद अली
है आसमान की सीमा जनता है मन ये मेरा पर अपनी भी उमंगें भरती है यू कुलाचे फिर थक कर दूर जाकर नहीं ख़त्म होता अम्बर दिखता है फिर नीचेसब कुछ छोटा ज़मीं पेऔर थक सा जाता पर भी जाना है अपने घर भीहै आसमान सुन्दर पर ज़मीं से दूर होकर फूलने लगती हें सांसे और लौटता
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Jun 14 2010 01:35 PM


Shuffle








