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महफ़िल ए आदाब

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08 Mar 2010
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किस क़द्र सादा हैं हम

किस  क़द्र  सादा  हैं  हम,  कैसी  क़ज़ाएं  माँगेंदुश्मनों  से   भी   मुहब्बत   की  अदाएं  माँगेंहाल यह है कि हुआ पल का गुज़रना भी मुहालकितने  ख़ुशफहम  हैं,  जीने  की 
Feb 23 2010 03:30 PM
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एक ग़ज़ल

बूँद  पानी  की  हूँ  थोड़ी  सी  हवा  है  मुझ मेंउस बिज़ाआत पे भी क्या ज़रफ़ा इना है मुझ मेंये  जो  एक  हश्‍र  शबो  रोज़  बपा  है  मुझ मेंहो न हो  कुछ  और  भी 
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दिल की दिल में

दिल की दिल में न रह जाये यह कहानी कह लोचाहे  दो  हर्फ़  लिखो  चाहे  ज़बानी  कह  लोमैंने  मरने  की  दुआ  मांगी थी  वो पूरी न हुईबस  इसको  मेरे  जीने  की  कहानी  कह
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कितने मौसम बीत गये हैं

कितने मौसम बीत गये हैं  दुख सुख की तन्हाई मेंदर्द की  झील नहीं सूखी  है  आँखों की अंगनाई मेंबीती  रातों  के झोंके  आए जब मेरी  अंगनाई मेंदिल  के  सौ  सौ  टांके टूटे  एक एक 
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एक शायर

रात भर एक जिस्म था जिस पर कई ख़न्जर चलेदिन निकल आया तो हर सिम्त से पत्थर चलेअपने सब मंज़र लुटा कर शाम रुख़्सत हो गईतुम भी वापस लौट जाओ हम भी अपने घर चलेनींद की सारी तन्नाबें टूट कर गिरती गईंमुझ को तन्हा छोड़ कर ख़्वाबों के सब पैकर चलेक़र्ब जब तख़लीक का हद से
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जिगर मुरादाबादी

निगाहों का मरकज़ बना जा रहा हूंमुहब्बत  के  हांथों लुटा  जा रहा हूंन जाने कहां से, न जाने किधर कोबस एक अपनी धुन में उड़ा जा रहा हूंमुझे  रोक  सकता  हो  कोई  तो  रोकेकि  छुपकर  नहीं  बरमला  जा
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दुनिया सजी हुई है

दुनिया   सजी  हुई  है   बाज़ार   की तरहहम  भी  चलेंगे  आज  ख़रीदार  की तरहटूटे  हों  या  पुराने हों  अपने तो  हैं यहीख़्वाबों को जमा करता हूं आसार  की
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एक ग़ज़ल

दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वालावही  अंदाज़  है  ज़ालिम का ज़माने वालाकया कहें कितने मरासिम थे हमारे उससेवो जो एक शख़्स है मुंह फैर के जाने वालाक्या ख़बर थी जो मेरी जां में घुला रहता हैहै   वही   सरे - दार  भी 
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मीना कुमारी

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली। जिसका जितना आंचल था, उतनी ही सौग़ात मिली।। जब चाहा दिल को समझें, हंसने की आवाज़ सुनी। जैसे कोई कहता हो, लो फिर तुमको अब मात मिली।। बातें कैसी ? घातें क्या ? चलते रहना आठ पहर। दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी
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जीना है कैसे मुझको

जीना है कैसे  मुझको तन्हा  न  फैसला करख़ुशियों से राय ले ले ग़म से भी मशवरा करदुनिया की भीड़ में मैं गुम हो के रह गया हूंऎ  आईने  मुझे  तू  माज़ी   ज़रा अता करथक कर न बैठ जाना राहों में ऎ मुसाफिरमंज़िल तुझे मिलेगी
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एक शायर

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखोज़िन्दगी क्या है किताबों को हटाकर देखोसिर्फ आंखों से ही दुनिया नहीं देखी जातीदिल की धड़कन को भी बीनाई बनाकर देखोपत्थरों  में  भी  ज़बां होती है दिल  होते हैंअपने घर की दरो-ओ-दीवार सजा कर देखोवो सितारा
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एक ग़ज़ल

मेरी ज़ुबां से मेरी दास्तां सुनो तो सहीयकीं करो न करो मेहरबां सुनो तो सहीचलो ये माना कि मुजरिमे मुहब्बत हैंहमारे जुर्म का हमसे बयां सुनो तो सहीबनोगे मेरे दोस्त तुम, दुश्मनों एक दिनमेरे हयात की आबो गुहा सुनो तो सहीलबों को  सी के जो बैठे हैं महफ़िल
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एक ग़ज़ल

ग़म रात - दिन रहे तो ख़ुशी भी कभी रहीएक  बेवफा  से  अपनी  बड़ी  दोस्ती  रहीउनसे  मिलने की शाम  घड़ी दो  घड़ी रहीऔर फिर  जो रात आई तो बरसों खड़ी रहीशामे   विसाल   दर्द   ने 
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कहा न जाए

तय होंगे किस तरह से मराहिल कहा न जाएइस  तीरगी  में  क्या  है हासिल कहा न जाएख़ुद  दे  दिये  हैं  मैंने  उसे  हाथ  काट  करवो लिख दिया है जो सैरे महफ़िल कहा न जाएपत्थर  हुए  वो 
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एक ग़ज़ल

कभी मुझ को साथ लेकर कभी मेरे साथ चलकेवो बदल गए अचानक मेरी ज़िन्दगी बदलकेहुए जिस पे महरबां तुम कोई ख़ुशनसीब होगामेरी हसरतें तो निकलीं मेरे आंसुओं में ढलकेतेरी ज़ुल्फ़ ओ रुख़ के कुरबां दिले ज़ार ढूंढता हैवही   चम्पई   उजाले ,  वही 
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उसके दुश्मन हैं बहुत

उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगावो भी मेरी तरह इस शहर में तन्हा होगाइतना सच बोल कि होंठों का तबस्सुम न बुझेरोशनी   ख़त्म   न   कर   आगे   अंधेरा   होगाप्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर
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Dec 02 2009 02:06 PM
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एक शायर

सफ़र    की   दर्द   भरी दास्तान रख दूंगामैं पत्थरों पे लहू का निशान रख दूंगाये आग शहर की गर मैं बुझा न पाया तोदहकते    शोलों   पे अपना मकान रख दूंगा तुझे   ज़मीन  
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एक शायर

कहीं ऎसा न हो दामन जला लोहमारे आंसुऔं पर ख़ाक डालो मनाना ही ज़रूरी है तो फिर तुमहमें सबसे ख़फ़ा हो कर मना लो बहुत रोई हुई लगती हैं आंखें मेरी ख़ातिर ज़रा काजल लगा लो अकेलेपन से खौ़फ आता है मुझकोकहां हो ऎ मेरे ख़ाबों - ख़यालों बहुत मायूस बैठा हूं मैं तुमसे कभी
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जब किसी से कोई गिला रखना

जब किसी से कोई गिला रखनासामने अपने आईना रखनायूं उजालों से वास्ता रखनाशम्मा के पास ही हवा रखनाघर की तामीर चाहे जैसी होइसमें रोने की कुछ जगह रखनामस्जिदें हैं नमाज़ियों के लियेअपने घर में भी कहीं ख़ुदा रखना- निदा फाज़ली
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मेरे शहर के शायर..

आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखाकश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखाबे- वक्त अगर जाऊंगा सब चौंक पडेंगेमुद्दत हुई दिन में कभी घर नहीं देखाजिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र हैआंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखाये फूल मुझे कोई विरासत में मिले
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हमने जुनूने इश्क में

हमने जुनूने इश्क में क्या क्या नहीं सहा हर एक सितम सहा न कभी बे-वफा कहा ता - उम्र तेरे साथ चले बनके हमसफर फिर भी हर एक क़दम पर कुछ फासला रहातेरे सिवा किसी से मुझे वास्ता न था मेरे सिवा सभी से तेरा वास्ता रहा जिसका हुआ कभी तुझे एहसास तक नहीं हमने वो दर्दे
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इंसान

इंसान में हैवान यहां भी है वहां भीअल्लाह निगेहबान यहां भी है वहां भीखूंखार दरिन्दो के फ़क़त नाम हैं अलगशहरों में बियाबान यहां भी है वहां भीरहमान की कुदरत हो या भगवान की मूरतहर खेल का मैदान यहां भी है वहां भीहिन्दू भी मज़े में हैं मुसलमां भी मज़े मेंइन्सान
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Nov 21 2009 04:26 AM
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दिल की दूआ

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरीज़िन्दगी शम्मा की सूरत हो ख़ुदाया मेरीहो मेरे दम से यूं ही मेरे वतन की ज़ीनतजिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनतज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत या रबइल्म की शम्मा से हो मुझको मुहब्बत या रबहो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत
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दिल का रोना ठीक नहीं

दिल का रोना ठीक नहीं है, मुंह को कलेजा आने दोथमते थमते अश्क थमेंगे,नासेह को समझाने दोकहते ही कहते हाल कहेंगे,ऐसी तुम्हें क्या जल्दी हैदिल को ठिकाने होने दो,और आप में हमको आने दोखु़द से गिरेबां फटते थे,अक्सर चाक हवा में उड़ते थेअब के जुनूं को होश नहीं
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अब ये होगा शायद

अब ये होगा शायद अपनी आग में ख़ुद जल जायेंगेतुम से दूर बहुत रहकर भी क्या खोया क्या पायेंगेदुख भी सच्चे सुख भी सच्चे फिर भी तेरी चाहत मेंहमने कितने धोके खाये कितने धोके खायेंगेअक़्ल पे हम को नाज़ बहुत था लेकिन कब ये सोचा थाइश्क के हाथों ये भी होगा लोग हमें
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मिर्ज़ा असदुल्ला ख़ां "ग़ालिब"

शायरे आज़म-: मिर्ज़ा असदुल्ला ख़ां "ग़ालिब"--------------------------------सितारे जो समझते हैं ग़लतफहमी है उनकी ।फ़लक पे आह पहुंची है मेरी, चिंगारिय़ां होकर ॥--------------------------------घर हमारा जो न रोते भी तो वीरां होताबहर अगर बहर न होता तो दरिया
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मेरे शहर के शायर

-: बशी़र बद्र :- किसे ख़बर थी तुझे इस तरह सताऊंगाज़माना देखेगा और मैं न देख पाऊंगा हयातो मौत फिराको विसाल सब यक़ज़ामैं एक रात में कितने दिये जलाऊंगा पला बढ़ा हूं तक इन्हीं अंधेरों मेंमैं तेज़ धूप से कैसे नज़र मिलाऊंगा मेरे मिजाज़ की मादराना फितरत हैसवेरे सारी
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