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बस यूँ ही निट्ठल्ला

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11 Jun 2010
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बेशक पोस्ट टिप्पणीऽऽ ठेलो.. ..

 बेशक पोस्ट टिप्पणी ठेलोऽऽऽऽ.. निट्ठल्ला ये कैताऽ पर ऎसी टुँगी कभी न छोड़ो, जिससे दिल दुखे व भगदड़ मचता हालिया घटनाक्रम से तो यही लग रहा है कि “चलो रसातल ओर हो ब्लॉगर .. चलो रसातल ओर“ भविष्य का... -९९९- पूरा आलेख मूल ब्लॉगपृष्ठ पर पढ़ने हेतु शीर्षक पर
 
डा. अमर कुमार
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बेशक पोस्ट टिप्पणीऽऽ ठेलो.. ..

 बेशक पोस्ट टिप्पणी ठेलोऽऽऽऽ.. निट्ठल्ला ये कैताऽ पर ऎसी टुँगी कभी न छोड़ो, जिससे दिल दुखे व भगदड़ मचता हालिया घटनाक्रम से तो यही लग रहा है कि “चलो रसातल ओर हो ब्लॉगर .. चलो रसातल ओर“ भविष्य का हमारा ब्लॉगगीत बन जायेगा ! फोटो ऎडिटिंग टूल्स के साथ यह
 
डा. अमर कुमार
Jun 07 2010 04:00 AM
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“… .. ….. .. … .. ? ”

इस पोस्ट के कई शीर्षक दिमाग में घूम रहे थे, टिप्पणी मॉडरेशन से अपना कद कैसे बढ़ाये । कुशल टिप्पणी प्रबँधन से ब्लागरीय सौहाद्र कैसे कायम करें विषयपरक टिप्पणियाँ बहुमूल्य है, इसे बरबाद होने से रोकें शेष आगे..>
 
डा. अमर कुमार
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“… .. ….. .. … .. ? ”

इस पोस्ट के कई शीर्षक दिमाग में घूम रहे थे, टिप्पणी मॉडरेशन से अपना कद कैसे बढ़ाये । कुशल टिप्पणी प्रबँधन से ब्लागरीय सौहाद्र कैसे कायम करें विषयपरक टिप्पणियाँ बहुमूल्य है, इसे बरबाद... -९९९- पूरा आलेख मूल ब्लॉगपृष्ठ पर पढ़ने हेतु शीर्षक पर क्लिक करें ।
 
डा. अमर कुमार
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आज कंमेंटियाने की ज़िद ना करो…

इतने दिनों की ग़ैरहाज़िरी की भरपायी करने की ठान रखी थी, सोचा कि आज दो नये पोस्ट अवश्य दूँगा । मेरे सँकल्प को जब नींद टँगड़ी मारने लगी तो, सोने से पहले अम्मा को हिदायद दी कि, एक ज़रूरी काम है.. सो मुझे तीन बजे जगा दीजियेगा । घर में बूढ़े-बुज़ुर्ग होने का यह एक
 
डा. अमर कुमार
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आज कंमेंटियाने की ज़िद ना करो…

इतने दिनों की ग़ैरहाज़िरी की भरपायी करने की ठान रखी थी, सोचा कि आज दो नये पोस्ट अवश्य दूँगा । मेरे सँकल्प को जब नींद टँगड़ी मारने लगी तो, सोने से पहले अम्मा को हिदायद दी कि, एक ज़रूरी काम है.. सो मुझे तीन बजे जगा दीजियेगा । घर में बूढ़े-बुज़ुर्ग होने का यह एक
 
डा. अमर कुमार
Apr 26 2010 07:49 AM
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मैं चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ…

इधर मॉडरेशन बनाम डिस-ऍप्रूवल के खतरें इतने बढ़ते जा रहे हैं कि, मुझे अपनी टिप्पणियों का एक डुप्लीकेट सहेज रख छोड़ना होता है । यह मेरा मौलिक प्रयास है, और कालाँतर में यह आपात्काल के बाद आये हुये साहित्य से भी अधिक हिट होने की सँभावना रखता है ( चाहें तो आप
 
डा. अमर कुमार
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मैं चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ…

इधर मॉडरेशन बनाम डिस-ऍप्रूवल के खतरें इतने बढ़ते जा रहे हैं कि, मुझे अपनी टिप्पणियों का एक डुप्लीकेट सहेज रख छोड़ना होता है । यह मेरा मौलिक प्रयास है, और कालाँतर में यह आपात्काल के बाद आये हुये साहित्य से भी अधिक हिट होने की सँभावना रखता है ( चाहें तो आप
 
डा. अमर कुमार
Mar 08 2010 02:43 AM
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ग़र होश जरा सा अब तक है फ़ाग़ी.. होश तू अपना तौल !

लगा कि ये साल वी सुक्खा-सुखियाँ ही निकल जाने को है, पर वह न हुआ । अपना आज कुछ ऎसा डौल लग गया कि, लगदा है आज सब बेडौल ही लिक्खा जावेगा । ऒऎ कोई नहीं, वो तो जैसे ही सन्दीप ने एक ठोका, यो लाग्या कि अब आगया मौका. लेकिन जैसे ही भाई परभजोत ने शेष आगे..>
 
डा. अमर कुमार
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ग़र होश जरा सा अब तक है फ़ाग़ी.. होश तू अपना तौल !

लगा कि ये साल वी सुक्खा-सुखियाँ ही निकल जाने को है, पर वह न हुआ । अपना आज कुछ ऎसा डौल लग गया कि, लगदा है आज सब बेडौल ही लिक्खा जावेगा । ऒऎ कोई नहीं, वो तो जैसे ही सन्दीप ने एक ठोका, यो लाग्या कि अब आगया मौका. लेकिन जैसे ही भाई परभजोत ने More >
 
डा. अमर कुमार
Mar 06 2010 01:24 AM
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मैं चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ…

इधर मॉडरेशन बनाम डिस-ऍप्रूवल के खतरें इतने बढ़ते जा रहे हैं कि, मुझे अपनी टिप्पणियों का एक डुप्लीकेट सहेज रख छोड़ना होता है । यह मेरा मौलिक प्रयास है, और कालाँतर में यह आपात्काल के बाद आये हुये साहित्य... -९९९- पूरा आलेख मूल ब्लॉगपृष्ठ पर पढ़ने हेतु शीर्षक
 
डा. अमर कुमार
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ग़र होश जरा सा अब तक है फ़ाग़ी.. होश तू अपना तौल !

लगा कि ये साल वी सुक्खा-सुखियाँ ही निकल जाने को है, पर वह न हुआ । अपना आज कुछ ऎसा डौल लग गया कि, लगदा है आज सब बेडौल ही लिक्खा जावेगा । ऒऎ कोई नहीं, वो तो जैसे ही सन्दीप ने एक ठोका, यो लाग्या कि अब... -९९९- पूरा आलेख मूल ब्लॉगपृष्ठ पर पढ़ने हेतु शीर्षक पर
 
डा. अमर कुमार
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मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है

एक्ठो रहें बड़े ओहदे वाले बड़का ब्लॉगर.. सो डिस्केशन डिस्केशन में उनका डिलेवर भी ब्लॉग-श्लॉग लिख लेने लगा रहा । उनकी काम वाली बाई भी कुछ कविताई की बेहयाई कर लेती रही, सो  वहू  ब्लॉगर को पकड़... -९९९- पूरा आलेख मूल ब्लॉगपृष्ठ पर पढ़ने हेतु शीर्षक पर
 
डा. अमर कुमार
Mar 05 2010 09:30 AM
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चलो, मेरा लिखा मत पढ़ो, पर इसको तो न छोड़ो

जब कौल कर ही लिया है, तो मैं आज कुछ न लिखूँगा.. तो आप भी कुछ न पढ़ना । आपको ब्लागवाणी पर यह ज़ब्बर टाइप शीर्षक दिखला कर यूँ ही फुसला कर बुला लूँ, और यहाँ एक वाह-वाह आलेख पकड़ा दूँ… यह ... -९९९- पूरा आलेख मूल ब्लॉगपृष्ठ पर पढ़ने हेतु शीर्षक पर
 
डा. अमर कुमार
Mar 05 2010 09:30 AM
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माडरेशन की प्रतीक्षा में

इस पहेली को हल करने के प्रयास में मुझे एक घटना याद आ गयी, दो दोस्त आपस में उलझे हुये थे, शायद उन्हें कुछ लगी हुई थी । पहले ने कहा, " अगर मैं चाहूँ तो, तुम्हारे ऊपर पेशाब भी कर दूँ और तू... -९९९- पूरा आलेख मूल ब्लॉगपृष्ठ पर पढ़ने हेतु शीर्षक पर क्लिक
 
डा. अमर कुमार
Mar 05 2010 09:30 AM
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मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है

एक्ठो रहें बड़े ओहदे वाले बड़का ब्लॉगर.. सो डिस्केशन डिस्केशन में उनका डिलेवर भी ब्लॉग-श्लॉग लिख लेने लगा रहा । उनकी काम वाली बाई भी कुछ कविताई की बेहयाई कर लेती रही, सो  वहू  ब्लॉगर को पकड़ लिहिस । उनका नौकर भी कहीं से कुछ टीप टाप कर एक रेजिस्टर
 
डा. अमर कुमार
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माडरेशन की प्रतीक्षा में

इस पहेली को हल करने के प्रयास में मुझे एक घटना याद आ गयी, दो दोस्त आपस में उलझे हुये थे, शायद उन्हें कुछ लगी हुई थी । पहले ने कहा, " अगर मैं चाहूँ तो, तुम्हारे ऊपर पेशाब भी कर दूँ और तू भीगेगा भी नहीं !" [...]
 
डा. अमर कुमार
Jan 08 2010 12:21 PM
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माडरेशन की प्रतीक्षा में

इस पहेली को हल करने के प्रयास में मुझे एक घटना याद आ गयी, दो दोस्त आपस में उलझे हुये थे, शायद उन्हें कुछ लगी हुई थी । पहले ने कहा, " अगर मैं चाहूँ तो, तुम्हारे ऊपर पेशाब भी कर दूँ और तू भीगेगा भी नहीं !" [...]
 
डा. अमर कुमार
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चलो, मेरा लिखा मत पढ़ो, पर इसको तो न छोड़ो

जब कौल कर ही लिया है, तो मैं आज कुछ न लिखूँगा.. तो आप भी कुछ न पढ़ना । आपको ब्लागवाणी पर यह ज़ब्बर टाइप शीर्षक दिखला कर यूँ ही फुसला कर बुला लूँ, और यहाँ एक वाह-वाह आलेख पकड़ा दूँ… यह  हमसे  न होगा ! अपने  मुँह मियाँ  मिट्ठू…
 
डा. अमर कुमार
Jan 08 2010 12:21 PM
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चलो, मेरा लिखा मत पढ़ो, पर इसको तो न छोड़ो

जब कौल कर ही लिया है, तो मैं आज कुछ न लिखूँगा.. तो आप भी कुछ न पढ़ना । आपको ब्लागवाणी पर यह ज़ब्बर टाइप शीर्षक दिखला कर यूँ ही फुसला कर बुला लूँ, और यहाँ एक वाह-वाह आलेख पकड़ा दूँ… यह  हमसे  न होगा ! अपने  मुँह मियाँ  मिट्ठू…
 
डा. अमर कुमार
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भईया, तनि हमारौ एकु फोटू चीन्ह देयो

पहेली बूझाने मैं तो आयी.. कहते हैं इसको चीन्हा-चिन्हाई ! चीन्हा-चिन्हाई … चीन्हा-चिन्हाईऽऽ.. चीन्हा-चिन्हाई ! रू रू रू ब्लागिंग भई है, बमचिकाचिक…  त हमहूँ भये हैं, बमचिकाचिक । बमचिकाचिक देखो फोटू बमचिकाचिक ! चीन्हा-चिन्हाई …
 
डा. अमर कुमार
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भईया, तनि हमारौ एकु फोटू चीन्ह देयो

पहेली बूझाने मैं तो आयी.. कहते हैं इसको चीन्हा-चिन्हाई ! चीन्हा-चिन्हाई … चीन्हा-चिन्हाईऽऽ.. चीन्हा-चिन्हाई ! रू रू रू ब्लागिंग भई है, बमचिकाचिक…  त हमहूँ भये हैं, बमचिकाचिक । बमचिकाचिक देखो फोटू बमचिकाचिक ! चीन्हा-चिन्हाई …
 
डा. अमर कुमार
Dec 25 2009 02:43 AM
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भईया, तनि हमारौ एकु फोटू चीन्ह देयो

पहेली बूझाने मैं तो आयी.. कहते हैं इसको चीन्हा-चिन्हाई ! चीन्हा-चिन्हाई … चीन्हा-चिन्हाईऽऽ.. चीन्हा-चिन्हाई ! रू रू रू ब्लागिंग भई है, बमचिकाचिक…  त हमहूँ भये हैं, बमचिकाचिक । बमचिकाचिक देखो फोटू बमचिकाचिक ! चीन्हा-चिन्हाई …
 
डा. अमर कुमार
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माडरेशन की प्रतीक्षा में

इस पहेली को हल करने के प्रयास में मुझे एक घटना याद आ गयी, दो दोस्त आपस में उलझे हुये थे, शायद उन्हें कुछ लगी हुई थी । पहले ने कहा, " अगर मैं चाहूँ तो, तुम्हारे ऊपर पेशाब भी कर दूँ और तू भीगेगा भी नहीं !" [...]
 
डा. अमर कुमार
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चले जाना नहीं, होश उड़ाय के

मेरे मित्र डा. एस.एम. सिंह, यहाँ एक सफल आर्थोपेडिक सर्ज़न हैं । कभी वह कार्टूनिंग में दखल रखा करते थे । पर जैसा कि इस पेशे में होता है , अधिकाँश जन अपने शौक, ललित प्रतिभा और मनोलालसा को इस पेशे की बलि देने से रोक नहीं पाते । लगातार उकसाये जाने पर वह पिछले
 
डा. अमर कुमार
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चले जाना नहीं, होश उड़ाय के

मेरे मित्र डा. एस.एम. सिंह, यहाँ एक सफल आर्थोपेडिक सर्ज़न हैं । कभी वह कार्टूनिंग में दखल रखा करते थे । पर जैसा कि इस पेशे में होता है , अधिकाँश जन अपने शौक, ललित प्रतिभा और मनोलालसा को इस पेशे की बलि देने से रोक नहीं पाते । लगातार उकसाये जाने पर वह पिछले
 
डा. अमर कुमार
Dec 25 2009 02:41 AM
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चले जाना नहीं, होश उड़ाय के

मेरे मित्र डा. एस.एम. सिंह, यहाँ एक सफल आर्थोपेडिक सर्ज़न हैं । कभी वह कार्टूनिंग में दखल रखा करते थे । पर जैसा कि इस पेशे में होता है , अधिकाँश जन अपने शौक, ललित प्रतिभा और मनोलालसा को इस पेशे की बलि देने से रोक नहीं पाते । लगातार उकसाये जाने पर वह पिछले
 
डा. अमर कुमार
Dec 25 2009 02:41 AM
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चलो, मेरा लिखा मत पढ़ो, पर इसको तो न छोड़ो

जब कौल कर ही लिया है, तो मैं आज कुछ न लिखूँगा.. तो आप भी कुछ न पढ़ना । आपको ब्लागवाणी पर यह ज़ब्बर टाइप शीर्षक दिखला कर यूँ ही फुसला कर बुला लूँ, और यहाँ एक वाह-वाह आलेख पकड़ा दूँ… यह  हमसे  न होगा ! अपने  मुँह मियाँ  मिट्ठू…
 
डा. अमर कुमार
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लै भाई, मन्नैं बी इक पहेल्ली पूछ लैण दे ।

धन्यवाद भाई जी, तन्नैं होश दिलायी के बिन पहेल्ली पुच्छै इह निट्ठल्ले को ब्लागर मानता ए कोण्या ? भाई, आप बात तो ठीक कहवै सौं, बुरी सँगत में पड़कै, मैं भी बड्डी बड्डी पोस्ट लिखण लाग्यै लग सै । जे पहेल्ली ना पुच्छी ते फेर ब्लागर किस्सा ? आज रस्म अदा कैण
 
डा. अमर कुमार
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बच्चा बच्चा… बूढ़ा बूढ़ा… हाल तुम्हारा जाने है

कितनी दुर्गन्ध फैल रही है ? क्या इतनी कि, बच्चा बच्चा नाक पर रूमाल रखने लगा है ? आज पर्यावरण दिवस पर यह एक रस्मी पोस्ट नहीं है, क्योंकि मेरे रिशि जी, ( इनसे आप  यहाँ पहले मिल चुके हैं ) एक अलग तरह का सवाल पूछ बैठे । आज ही सुबह बगीचे में एक [...]
 
डा. अमर कुमार
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बच्चा बच्चा… बूढ़ा बूढ़ा… हाल तुम्हारा जाने है

कितनी दुर्गन्ध फैल रही है ? क्या इतनी कि, बच्चा बच्चा नाक पर रूमाल रखने लगा है ? आज पर्यावरण दिवस पर यह एक रस्मी पोस्ट नहीं है, क्योंकि मेरे रिशि जी, ( इनसे आप  यहाँ पहले मिल चुके हैं ) एक अलग तरह का सवाल पूछ बैठे । आज ही सुबह बगीचे में एक [...]
 
डा. अमर कुमार
Dec 25 2009 01:52 AM
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बच्चा बच्चा… बूढ़ा बूढ़ा… हाल तुम्हारा जाने है

कितनी दुर्गन्ध फैल रही है ? क्या इतनी कि, बच्चा बच्चा नाक पर रूमाल रखने लगा है ? आज पर्यावरण दिवस पर यह एक रस्मी पोस्ट नहीं है, क्योंकि मेरे रिशि जी, ( इनसे आप  यहाँ पहले मिल चुके हैं ) एक अलग तरह का सवाल पूछ बैठे । आज ही सुबह बगीचे में एक [...]
 
डा. अमर कुमार
Dec 25 2009 01:52 AM
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Amar Kumar has sent you a cold drink

पहिले निट्ठल्ला फोटुओं का इन्ट्राडेक्सन देगा : उसके बाद लिक्खेंगा.. लीखने का कुछ नेंईं जी, ईहाँ की तो पँच लाइन ही है.. “ सोचेला नहीं.. बस ठेलेला “ और  जब सर पे ख्याल ही न मंडराएं, और बिल्कुल रहा ना जाए , तो ? तो क्या, यदि आप भी कोल्ड ड्रिंक देखि के
 
डा. अमर कुमार
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पहिले निट्ठल्ला फोटुओं का इन्ट्राडेक्सन देगा : उसके बाद लिक्खेंगा.. लीखने का कुछ नेंईं जी, ईहाँ की तो पँच लाइन ही है.. “ सोचेला नहीं.. बस ठेलेला “ और  जब सर पे ख्याल ही न मंडराएं, और बिल्कुल रहा ना जाए , तो ? तो क्या, यदि आप भी कोल्ड ड्रिंक देखि के
 
डा. अमर कुमार
Dec 25 2009 01:52 AM
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Amar Kumar has sent you a cold drink

पहिले निट्ठल्ला फोटुओं का इन्ट्राडेक्सन देगा : उसके बाद लिक्खेंगा.. लीखने का कुछ नेंईं जी, ईहाँ की तो पँच लाइन ही है.. “ सोचेला नहीं.. बस ठेलेला “ और  जब सर पे ख्याल ही न मंडराएं, और बिल्कुल रहा ना जाए , तो ? तो क्या, यदि आप भी कोल्ड ड्रिंक देखि के
 
डा. अमर कुमार
Dec 25 2009 01:52 AM
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हाहा ही ही.. बजट्ट अली बजट्ट अली, हो बजट्ट अली

सोचा कुछ – हुआ कुछ और ही है निट्ठल्लों सँग ही ऎसा होता क्यूँ है सोचा कि कम्पू बेबी को हाथ न लगाऊँगा अपने सड़े विचारों का अचार पक न जाये जब तक शब्दों की खटास में तनिक मिठास न [...]
 
डा. अमर कुमार
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हाहा ही ही.. बजट्ट अली बजट्ट अली, हो बजट्ट अली

सोचा कुछ – हुआ कुछ और ही है निट्ठल्लों सँग ही ऎसा होता क्यूँ है सोचा कि कम्पू बेबी को हाथ न लगाऊँगा अपने सड़े विचारों का अचार पक न जाये जब तक शब्दों की खटास में तनिक मिठास न [...]
 
डा. अमर कुमार
Dec 25 2009 01:52 AM
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हाहा ही ही.. बजट्ट अली बजट्ट अली, हो बजट्ट अली

सोचा कुछ – हुआ कुछ और ही है निट्ठल्लों सँग ही ऎसा होता क्यूँ है सोचा कि कम्पू बेबी को हाथ न लगाऊँगा अपने सड़े विचारों का अचार पक न जाये जब तक शब्दों की खटास में तनिक मिठास न [...]
 
डा. अमर कुमार