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04 Jan 2010
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डेढ़ हजार बराती तो भूखे ही थे!

पिंगलक के मंत्री करटक और उसकी धर्मपत्नी करटकी के जोर डालने पर वीतरागी लघुपतनक चूहे ने इस शर्त पर विवाह करना स्वीकार किया कि विवाह में कोई तड़क भड़क नहीं हो।करटकी बोली–‘भला यह भी कोई बात हुई! विवाह जीवन में एक बार होता है, सो पूरे धूमधाम से होगा।’इस पर
 
Mohanlal Gupta
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हाय! मैं शादी में कब जाऊँगी!

पण्डित विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र के सारे पात्रों को कंवारा ही रहने दिया। बरसों तक वे सब के सब एक कहानी से दूसरी कहानी में कंवारे घूमते रहे। इससे जंगल की जिंदगी बहुत बोरियत भरी हो गई। एक दिन मंत्री करटक ने महाराज पिंगलक को सुझाव दिया–‘महाराज! पण्डित विष्णु
 
Mohanlal Gupta
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बिक गया नंदनवन का बॉर्डर!

पिंगलक आँखें बंद करके सो चुका था और करटक विस्फारित नेत्रों से उसे देख रहा था। फाइल अब भी उसके हाथ में थी जिसमें महाराज पिंगलक के मंत्री संजीवक के विदेशी खातों में जमा धन का हिसाब लिखा था। पिंगलक समझ चुका था कि महाराज इस पर कुछ भी कार्यवाही नहीं करेंगे।
 
Mohanlal Gupta
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डॉक्टर भेडि़या ने मंत्री की किडनी चुरा ली!

करटक आज बहुत दिनों बाद महाराजा पिंगलक से मिलने आया था लेकिन धरती पर बैठने की बजाय ऊँचे पेड़ की शाखा पर बैठकर झूले खाने लगा। पिंगलक ने हैरान होकर पूछा– ‘‘मंत्रिवर! क्या हो रहा है?’’ –‘‘कुछ नहीं महाराज! आपको प्रणाम करने आया हूँ।’’ –‘‘सो तो ठीक किंतु दरबारी
 
Mohanlal Gupta
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जय हो! जय हो! गाइये!

करटक घिसटता हुआ जंगल के राजा पिंगलक के समक्ष आकर बैठ गया, ढंग से नमस्ते भी नहीं की और पूंछ भी नहीं हिलाई। अपने मंत्री की पीली आंखों में मरी हुई दृष्टि देखकर पिंगलक हैरान हुआ। किसी तरह मूंछों पर ताव देकर रुखाई से बोला– ‘कैसे हैं मंत्रिवर !’करटक बोला–
 
Mohanlal Gupta
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Dec 22 2009 03:52 PM
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शांति वार्ता का आँखों देखा हाल

खरगोशलैण्ड वन के सारे खरगोश खुश थे। हों भी क्यों नहीं, उनके पड़ौसी भेडि़यालैण्ड वन से एक हाई लेवल पीस डेलिगेशन जो आ रहा था! इस डेलिगेशन के कई एजेण्डे थे जिनमें सबसे प्रमुख था– सदियों से दोनों वनों के बीच नफरत का जो दरिया बह रहा था, उसका बहाव रोककर उसके
 
Mohanlal Gupta
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