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21 Mar 2010
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चोट

चोट ताज़ा है अभी , थोडा मुस्कुराने दो !वकत लगेगा अभी ,दर्दे दिल सुनाने को !गुमा नहीं था, इस कदर चोट खायेंगे ,ठगे से रह गए , बस तिलमिलाने को !लम्हें चुनने दो , ख्यालों के खंज़र से ,लुटे हैं कितने , हिसाब तो लगाने दो !जितने चाहो , किस्से बुनते रहना ,सच
 
sanjeev kuralia
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होली मुबारक

सभी ब्लोगर दोस्तों को होली की शुभकामनाएं !लेकिन जरा सुरक्षा से मनाएं !
 
sanjeev kuralia
Feb 27 2010 08:02 PM
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श्रीमती निर्मला कपिला से रु-ब-रु

श्रीमती निर्मला कपिला से रु-ब-रुआनंद भवन क्लब नया नंगल के सभागार में २० फरवरी की शाम को एक साहित्यक समारोह का आयोजनअक्खर चेतना मंच नंगल द्वारा साहित्य कला प्रचार एवं प्रसार मंच नंगल के सहयोग से किया गया । इस समारोहका मुख्य मनोरथ नंगल की नामवर लेखिका
 
sanjeev kuralia
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मेरा महबूब !

सूक्षम का शिखर ,नजाकत की लहर ,कयामत का कहर ,मेरा महबूब !सूरज का मीत ,सितारे सा शीत ,रौशनी की जीत ,मेरा महबूब !सागर का नीर ,धरती का धीर ,पातळ का आखीर ,मेरा महबूब !चन्दन की महक ,कोयल की चहक ,हिरन की सहक ,मेरा महबूब !हीरे की चमक ,नूर की दमक ,अम्बर की धमक
 
sanjeev kuralia
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Feb 21 2010 06:23 PM
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सूचना !

सभी ब्लोग्गर दोस्तो को ये जान कर अत्यंत हर्ष होगा किअक्खर चेतना मंच नया नंगलआगामी २० फ़रवरी को शाम ६ बजे आनंद भवन क्लब नया नंगल के सभागार में एक साहित्यक समारोह का आयोजन करने जा रहा है ॥इस कार्यक्रम में आप सब की जानी पहचानी ब्लोग्गर श्रीमती निर्मला कपिला
 
sanjeev kuralia
Feb 17 2010 07:59 PM
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ग़ज़ल

दिल को , दस्तक देता रहता ,धुन्दला ,धुन्दला एक फ़साना !ख्वावों में है , एक ही मंज़र ,उसका आना , उसका जाना !हंसता गुल ,समझाए सबको ,सच है , कल मेरा मुरझाना !राह बदल लेता है , अक्सर ,सीधा चला , कब ये ज़माना !फूल खिला तो , लाश मिली ,मुबारक , भंवरे का मर जाना
 
sanjeev kuralia
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Feb 16 2010 05:50 PM
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चिड़िया

प्यार महोब्बत चिड़िया ऐसी,जिसके सर पे दो दो चोंच !अपना अपना करने वाले ,मिलते ही मौका लेते नोंच !आह : तो भरते तेरे दर्द की ,होता अपनी कमर पे हाथ !प्यार से आंसू पोछने वाले ,पीठ के पीछे मारें लात !भावनाओं का दाना खा खा ,ये चिड़िया फल फूल रही है ,बोली बदल सभी
 
sanjeev kuralia
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ग़ज़ल

पहले नहीं हम लुटने वाले ,आँखों के बाज़ार में !जाने कितने टकरायें अभी , शीशे की दीवार में !ख़त पढ़ते ही रो देंगे वो ,ऐसा तो गुमां ना था ,तौबा कितना दम होता है , कागज़ की कटार में !निसार उनपे क्या किया ,शायद कुछ हिसाब लगे ,पाना तो होता ही नहीं , दिल के अंधे
 
sanjeev kuralia
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स्यासी इश्तिहार

स्यासी इश्तिहार ओढ़ने की ,नाकाम कोशिश करता हुआ ,नींद के नशे मे चूर ,इश्तिहार को खींचता हुआ,कि फट न जाये कहीं ,खुद को थोडा समेटता हुआ ,उलझे बाल, अर्ध नगन सा,सूखा जिस्म,मिटटी सा रंग ,पेट मे घुटने दबाये ,एक बच्चा सो रहा था ......!कभी पांव ढकता , कभी सर
 
sanjeev kuralia
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चंद शेयर

ज़िकर दर्द का मैं ,कैसे कर दूँ ! जान , लफ्ज़ों के हवाले कर दूँ !मैं कोई पीर ,पैगम्बर तो नहीं ,जो सर काट , हथेली पे धर दूँ !ह़क नमक का, अदा करते हैं ,कैसे अश्कों मे, मिश्री भर दूँ !जा पहुँचे ,जो तेरे ख्यालों तक ,बता याद को , कोन से पर दूँ !
 
sanjeev kuralia
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जय हिंद

सभी देश वासियों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं तथा सभी ब्लॉगर दोस्तों को जय हिंद !
 
sanjeev kuralia
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प्यार का ज़ज्बा

वतन से प्यार का ज़ज्बा, हर दिल में जगा दे !वो शमा भगत सिंह वाली , रग रग में जला दे !ना हों ज़ात के झगडे , ना हों धर्मों के हों बंटवारे ,ऐ मालिक सभी का , बस एक ही रिश्ता बना दे !भाषाओं से ना हो , पहचान किसी आदम की ,एक भाषा प्यार की , जन जन को सिखा दे !अपने
 
sanjeev kuralia
Jan 26 2010 11:28 AM
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ज़ज्बा ..एक गीत वतन के नाम

वतन से प्यार का ज़ज्बा , हर दिल में जगा दे ! वो शमा भगत सिंह वाली , रग रग में जला दे ! ना हों ज़ात के झगडे , ना धर्मों के हों बंटवारे , ऐ मालिक सभी का , बस एक ही रिश्ता बना दे ! भाषाओं से ना हो , पहचान किसी आदम की , एक भाषा प्यार की , जन जन को सिखा दे !
 
sanjeev kuralia
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एक गीत वत्तन के नाम

वत्तन से प्यार का ज़ज्बा, हर दिल में जगा दे !वो शमा भगत सिंह वाली , रग रग में जला दे !ना हों ज़ात के झगडे , ना धर्मों के हों बंटवारे ,ऐ मालिक सभी का , बस एक ही रिश्ता बना दे !भाषाओं से ना हो , पहचान किसी आदम की ,एक भाषा प्यार की , जन जन को सिखा दे !अपने
 
sanjeev kuralia
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ग़ज़ल

ये इश्क का अजगर ,निगल गया लाखों ,मगर , कमी न आयी , कहीं दीवानों मे !बिन जले समझा है ,न कोई समझेगा ,कैसा जनून है , मरने का परवानो मे !अजब ये आग है ठंडी, धुआं नहीं करती ,मज़ा आता है बस , जलने जलाने मे !बीमारे इशक को, दरवेश कहूं या दीवाना ,शिवरी को उम्र लगी
 
sanjeev kuralia
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ग़ज़ल

हर हालात को , पुख्ता हल की ज़रुरत है !फ़ेसला तय है , क्या कल की ज़रुरत है !तंगिए दौर , पुर जोर बुलंदी पे है इब्ला ,आवाम को , बस हलचल की ज़रुरत है !इल्म भरपूर है सबको, अमल से परहेज़,मशरूफ नज़रों को ,फुर्सत की ज़रुरत है !रहवर खुद भटके हुए , रास्ता बता रहे
 
sanjeev kuralia
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ग़ज़ल

शायद कोई, दोस्त मिल जाये कहीं ,रकीबों से भी, हाथ मिलाने लगा हूँ !गुलों की चाल से , वाकिफ हूँ अब ,गुलदानों में , कांटे सजाने लगा हूँ !हर सवाल पे ,खामोश मुस्कुराता हूँ ! ढंग दुनियां का , आजमाने लगा हूँ !दिल के धोखे , मैं अब नहीं खाता ,हर एक चोट पे ,
 
sanjeev kuralia
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Jan 15 2010 05:38 PM
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समाज

समाज क्या बोले आज !समय और आज का राज !रिवाजों की रिवायतों में,दफ़न होता आज का संवाद !समाज क्या बोले आज !दुल्हन की आँखों में आंसू ,बाबुल से विछ्ड़ने के हैं कारण ,या कोइ और है राज !समाज क्या बोले आज !हर उम्र खा रही अशलीलता ,किस को, किस से आये लाज !समाज क्या
 
sanjeev kuralia
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आंसू

आँख से टपका हुआ , इक़ बे रंग कतरा , तेरे दामन की पनाह पाता, तो आंसू होता ! बात बात पे जो बहता रहा , वो पानी था ,बिना ही बात जो आता , तो आंसू होता !वस्ल में जागती आँखें ,पथरा गयी होतीं ,पलक झपकते ही आता ,तो आंसू होता !नींदों में ख़लल होता , जो मेरे
 
sanjeev kuralia
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नवज़ात

एक नवज़ात की ज़ात क्या है ?धर्म क्या है , औकात क्या है !रोना ,सोना , विछौना भिगोना ,छाती से दो बूँद ,दूध दोहना ,माँ से बड़ा ,जज़्बात क्या हैएक नवज़ात की जात क्या है !ना भेद ,ना भाव ,ना द्वेष ,ना दावनरम ,नाज़ुक ,निरोल ,बे दाग वो क्या जाने , हालात क्या है !एक
 
sanjeev kuralia
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ग़ज़ल

ये बात झूठ है, कि सब झूठ है ज़माने में !नहीं फरेब , किसी बच्चे के मुस्कुराने में !!क्या कभी चाँद भी रूठता है , कहीं सूरज से फासला तय ही सही , दोनों के आने जाने मेंआराम खुद ही , सदा दिल को गुदगुदायेगा लगा समय , किसी बजुर्ग के पांव दबाने में !समझ पैगाम ,
 
sanjeev kuralia
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बेटी

बेटी को गले लगाते हुए , इक बाप भी , घबराने लगा है ! कौन है तेरा, रिश्ते में क्या है , बताते हुए , कुछ हकलाने लगा है ! सहमा हुआ सा , अब लोरी के बदले , अखब़ार की ख़बरें , सुनाने लगा है ! अब दिल की, तस्सली को गोया , लड़कों के कपडे ,पहनाने लगा है ! इक बेटी
 
sanjeev kuralia
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जिन्दगी

इस तरह शर्तों पे कैसे, कब तक कटेगी जिन्दगी ! गिर के यूँ कब तक , संभलती रहेगी जिन्दगी ! अपने अपने गरूर की, सीमा पे खड़े हुए हैं हम , बीच मैं गहरी है खाई , गिर कर रहेगी जिन्दगी तनहाइयों के शोर में सिमटे हुए हर शख्स को , यूँ ठहाकों के कफ़न से ,कब तक ढकेग
 
sanjeev kuralia
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क्यूँ ?

आदमी हो, आदमी को, छलते कयूँ हो ? दूसरों के सर रख के पाँव चलते क्यूँ हो ? शोक ही शक्सियत का, ताज है आखिर , बेगाने वज़ूद पे , नाहक जलते कयूँ हो ? आदतों पे हो के कुर्बां, आदम मसीहा बने , सूरज से क्या सवाल, कि ढ़लते कयूँ हो ? आना जाना ही तो, हर शय का उसू
 
sanjeev kuralia
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ग़ज़ल

रात इक ख़्वाब ने , फिर हमको जगाया रात भर ! सिसकियाँ बन के, तमाशाई ने हंसाया रात भर !! दे गया ज़हन को , यूँ बिछड़ी हुयी यादों का भंवर , मैं ढूंढ़ता ही रह गया , ना लौट के आया रात भर ! ये तो तय है कोई, अपना ही था जगाने वाला , ना जाने कितनी ही ,शक्लों से म
 
sanjeev kuralia
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अपने प्यारे पिता....स्वर्गीय श्री संत राम जी को समर्पित

अपनी सूरत मैं तेरी, सूरत नज़र आती है ! आईना धुंधलाता है,आँख छलक आती है ! रात को पेट पे, लेटते हुए ही सो जाना, कभी वो, पीठ की सवारी याद आती है ! हर बात मैं, बस रंग तेरा ही तलाशता हूँ हर आदत मैं, तेरी आदत झलक जाती है ! तेरे होते, किसी दोस्त की कमीं ना थ
 
sanjeev kuralia
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ग़ज़ल

फिर आई उसकी याद, कल रात चुपके-चुपके, बहके मेरे जज़्बात, कल रात चुपके-चुपके..!! दीवाना-वार हो के , हमने बहाए रात आंसू, रोई ये कायनात, कल रात चुपके-चुपके !! मेरी आँखें हुई पुर-नम, उनके दिए अश्कों से, ये लाये वो सौगात, कल रात चुपके-चुपके !! शह देते रहे ह
 
AKHRAN DA VANZARA
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ग़ज़ल

कहीं न कहीं हर दिल मैं , कोई न कोई नासूर है ! कहीं न कहीं हर दिल वाला,गम खाया हुआ ज़रूर है कहीं न कहीं है दरार कोई , सदिओं पुराने रिश्तों मैं , कहीं न कहीं हर रिश्ता, क्यूँ दिलों से कोसों दूर है ! कहीं न कहीं हर इन्सां, ओढ़े हुए है नकली हंसी, कहीं न क
 
sanjeev kuralia
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ग़ज़ल

मौला दर्द ज़माने भर का, ग़र मुझको मिल जाये तो , क्या बिगड़ेगा तेरा या रब, हर चेहरा खिल जाये तो ! लाशें खा खा थक गई होगी, ये धरती बहुत पुरानी है, हर रिश्ते को जीने का, अंदाज़ नया मिल जाये तो !! रंगों का बाज़ार ये दुनिया , न जाने क्यूँ वीरान लगे , बे रंग
 
sanjeev kuralia