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अनामिका......

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06 Jun 2010
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तुम्हारी खुशबू ...

जी जान से चाहती हूँतुम्हे मैं भुला नहीं सकती.मन में बसी तुम्हारी बातों कीखुशबू मैं मिटा नहीं सकती.सुख दुख में संबल देते हैंतुम संग बीते क्षण वो सारेविरह वेदना में तड़प करये मुहोब्बत छुड़ा नहीं सकती.कठोराघात किये होंगेमैंने भी बहुत..वेदना से जल
 
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जा उद्धो जा... मत कर जिरह..

हे उद्धो ...मत जिरह करोउस छलिया कीजिसने भ्रमर रूप रख हम संग प्रीत बढाईऔर अब हमारी हर रात परपत्थर फैंक कर जाता है ...मन को जख्मी करता है ..हमारे अंतस पर उसी का पहरा है.द्रगंचल परजाले बुन दिए हैं ..अपनी लीलाओ के उसने. .हमारे वजूद कीअट्टालिका सेवो हठी उतरता
 
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बस मेरे पास चले आना..

जब मेरी याद आये चले आनाजब बिन बादल बरसात होऔर रस्ता खोने लगे..तो उदास मत होना मेरे पास चले आना..जब कोई जख्म रिसने लगेदिल हा-हा कर करने लगे तो रोकना मत खुद को बस मेरे पास चले आना. मायूसियाँ जब जकडने लगे अशक जब आंखो से बिन पूछे ही बरसने लगे तो मेरे पास चले
 
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अज्ज नू जी लो यारो, कल दा की पता..

अज्ज नू जी लो यारो, कल दा की पता..केस वेले कोई गम आ सतावेएस गम दा की पता..अज्ज नू जी लो यारो, कल दा की पता..आज को जी लो यारो कल का क्या पता ....किस वक्त कोई गम आ सताए...इस गम का क्या पता...आज को जी लो यारो कल का क्या पता.... !जिन्दगी दे सफ़र वडे लम्बे
 
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महिला ब्लॉगर्स का सन्देश जलजला जी के नाम

मुझे ख़ुशी हो रही है की बहुत सी हमारी ब्लॉगर मित्र इस राजनैतिक कृत्य की भत्सर्ना कर रही हैं. एक जगह ही तो ऐसी बचती है जहाँ हम अपने एहसासों को बांटते हैं. यहाँ हम छोटे बड़े का फर्क ना कर के निर्विघ्न, बिना लिंग भेद के सब के साथ भाई चारे से पेश आये...यहाँ
 
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मुस्कान भी अब मेरी थकने लगी है......

मुस्कान भी अब मेरीथकने लगी हैमजबूरियाँ जो इतनीनिष्ठुर हो चली हैं ..अथक प्रयास कर के भी,कोई उम्मीद जगती नही है..कि तिनका-तिनका होचाहते बिखर सी गई हैं ..!!मुस्कान भी अब मेरीमुझ पर ही हसने लगी है ..!!श्वासों की लय, जोडर डर के चलती है..कि जाने कौन से पल
 
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जिन्दगी...

कैसे कैसे लम्हों सेजिन्दगी गुज़रती है कभी खुशियों केपंख लगा के उडती है.तो कभी अथाह वेदनाओंमें ढलती है .हर तरफ से रिश्तों केहाथ छूटने से लगते हैं.प्यार के बंधन भीगांठे खोलते से लगते हैं.हूक सी दिल मेंशोर करती हैगूंगी घुटन भीपलकों कीझिर्रियों सेबेबसी के
 
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कैसे तुम मुझे मिल गई थी.

कैसे तुम मुझे मिल गई थी..मैं तो बद-किस्मती से समझोता कर चुका था..खुदा के दर से भी खफा हो चुका था..मौत का रास्ता चुन चुका था..इस तन्हा दुनिया से विरक्त हो चला था..अपने नसीब पर भी बे-इन्तहा रो चुका था..अब और कोई आस बाकी ना बची थी..जीने की आरजू भी ख़तम हो
 
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घूँघट

दोस्तो आज कुछ हट के लिखने की कोशिश की है...आशा है इसे पढ कर आनंदित होंगे...असल में किसी ने पेशकश की कि सुहागरात या घुंघट पर कोई रचना लिख कर भेजे..तो हमने क्या खुद को किसी से कम समझना था, बैठ गये दिमाग की कलम घिसने और जो जो लफ्जो की उठा-पटक हुई वो इस रचना
 
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कुटज तरू सा मेरा मन

मरू भूमि सी ऊष्णकठोर जिन्दगी कीविषम परिस्थितियों सेटकराता, गिरता पड़ताचोटिल होता मेरा मन.शिव की जटा-जूट सासूखा, नीरसशिवालिक बनाये मेरा मन.कुटज तरु की भांतिफिर भी सदैवमुस्कराने को तैयारये मेरा मन.अलमस्त, अटखेलियाँ करताअंतस में फैले अवसाद परकफ़न चढ़ाता
 
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हिंदी पर राजनीतिक प्रकोप

हमारे देश की प्रमुख भाषा हिन्दी है किंतु हिंदी के कतिपय विरोधी अपने ही राजनीतिग्य और उच्च पदा-धिकारी हैं जो अपने स्वार्थो और राजनीतिक हितों को दृष्टिगत रखते हुए हिन्दी के विरोध पर उतारू हैं.सन 1950 में हिन्दी राष्ट्र भाषा घोषित होने के बावजूद भी उच्च
 
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शब्दो का कलरव

मेरा क्षुब्ध मनकई बार मुझसेबगावत करता हैमुझसे अनुरोध भीकरता है..बार बार मचलताऔर रूठ्ता है .मुझे उत्तेजित भी करता हैकि इस के भीतर केअंतर्द्वंद कोशब्दो सेबिखेर दू..आंखे प्रणय-कलहउत्पन्न करती हैंबुद्धीकुछ सुनना नही चाहतीमैं इस झगडालू कुटुंब कोसमझाती हुं .
 
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जिंदगी और बता .....????

जिंदगी और बता, गम कितने तू मुझे देगी..मैं हँसता जाऊंगा..क्या हँसी भी मेरी तू छीन लेगी..?जिंदगी और बता गम कितने तू मुझे देगी.....??मस्त चाले देख मेरी, ना तू गश खाना..ढेरो ठोकरे देकर भी कहीं तू ना थक जाना..सागर के हिलोरे माना मुझे तहस-नह्स कर देंगे,.गम
 
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आपका प्यार ...

आपने इस काबिल समझाऔर सीने से लगाया..मुझ ना -चीज़ को चाहा ..बेशुमार प्यार दिया..!!मुझ ना समझ की ..हर बात को माना,हर भूल को माफ़ किया..!!भूल गई आज कितन्हाई किसे कहते है..जलन क्या है ..और खलिश किसे कहते है..!!आप के प्यार में जानाकि जिंदगी कितनी हसीं
 
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मेरी हर सोच मे तुम क्यों हो????

मेरी हर सोच मे तुम क्यों हो?मेरी हर साँस मे तुम क्यों हो?मेरा तुम्हारा तो कोई रिश्ता भी नहीफ़िर मेरे दिन और रात मे तुम ही क्यों हो?मैंने तुम्हें चाहा तो क्या हुआ ..मैंने तुम्हें पूजा तो क्या हुआ ..मेरे हर लम्हात पर तुम्हारा हक़ क्यों है?मैं चाहे हक़ न भी
 
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मेरा बचपन ...

दोस्तो, कभी कभी अपना बचपन कितना याद आता है...वैसे मेरा बचपन कुच्छ खास अच्छा नही बीता लेकिन बचपन तो बचपन है..कुच्छ ना कुच्छ तो चंचलता, भोलापन, ठिठोलिया लेकेर ही चलता है अपने साथ और हम कितने भी बड़े हो जाए वो यादे कभी दिल को हंसा जाती है..और ठंडी ठंडी हवाओ
 
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शहीद भगत सिंग ...

दोस्तो शहीद भगत सिंग जी की याद में कुछ फूल समर्पित है...जैसा कि वो अपनी बुलंद आवाज में लोगो में नयी स्फूर्ती का आवाहन करते थे..उसी लय में कुछ पंक्तीया मैने लिखी है जो आपकी नजर है..इतनी तन्हाई...इतनी बेबसी कहाँ से लाए हो..बाजुओ मे अभी दम है..अभी क्यू
 
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मेरी आत्मा कहती है...

मेरे जिस्म में ठहरी आत्मारोज मुझसे कहती है ..मुझे मैला मत करना !आज तुम्हारी हू,कल किसी और का होना है !तुम अपनी झूठी वाणी सेमुझे मत पुकारना !अपनी लालसा भरी आंखो सेमुझे मत देखना !मुझे उजळी रहने दोअपनी सच्चाई से ,अपनी विनम्रता से !मुझे शुद्धता देनाअपने
 
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करीब आने तो दो..

अपनी बाहो के घेरे में, थोडा करीब आने तो दो..सीने से लगा लो मुझे, थोडा करार पाने तो दो..छुपा लो दामन में, छांव आंचल की तो दो .सुलगते मेरे एह्सासो को, हमदर्दी की ठंडक तो दो..दिवार-ए-दिल से चिपके दर्द को आसुओ में ढलने तो दो ..शब्दो को जुबा बनने के लिए, जमी
 
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ताली एक हाथ से नही बजती ....

ताली एक हाथ से नही बजतीमगर मैने बजते हुये देखा हैंदूरिया दोनो तरफ से नही चाही जातीपर एक तरफ से बढते हुये देखा हैंप्यार दोनो करे तो जन्नत का एहसास हैंइक तरफा हो तो,तडप तडप के मरते देखा हैं .ताली एक हाथ से नही बजतीमगर मैने बजते हुये देखा हैंतीखे प्रहारो से
 
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मै हू ओस..

छोड दे रात भर आज तू मुझे रोने क लिए..समेटा करुंगा शब- ए- रात गम, तेरी ख़ुशी के लिएतेरी रजा यही है तो यही ही सहीमै पळ पळ मरता रहूंगा, तेरी चाहत के लिएनसीबो के खेळ छिपे हैं अपनी अपनी लकीरो मेंतू सो चैन की नींद, मै हू ओस, शब पर बहने के लिएमजबूरियो के नाम
 
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Mar 04 2010 05:11 PM
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कहो तो लौट जाते है.

कहो तो लौट जाते है..आधी राह चल लिए तो क्या..आधी जिंदगी खो जाए तो क्या..आधी जिंदगी जी भी तो लिए है..कहो तो लौट जाते है..अभी तो अश्क पलकों में कैद है..अभी जज़्बात दिल के आगोश में है..अभी सैलाब नही आए..अभी जुबान ने ज़हर नही उगले..अभी तो हर बात अपने हाथ में
 
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Feb 28 2010 05:40 PM
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लम्हा-दर-लम्हा मुझे तड्पाते क्यू हो,

लम्हा-दर-लम्हा मुझे तड्पाते क्यू हो,हर पळ मुझे याद तुम आते क्यू हो ..!लो मैने रख तो दिया तुम्हारा हाथ अपने सीने परतिनका तिनका अब मुझे और जलाते क्यू हो ??मुहोब्बत की है हमने, तो ये अधूरी सी क्यू है ,जुदाई की सजा है हर पळ, मिलन को दूरी क्यू है !जला के खुद
 
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Feb 24 2010 05:19 PM
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कटु सत्य

बिछोह की कराहती वेदना सेमै अस्त-व्यस्त सा हू.अतीत के रेश्मीन धागेजल चुके है.जो बाकी हैं..वो वेदना और व्यथा से सने हुये हैं .कर्कशता और कुप्ता काघाव लिए हुये हैं .अब आगे की ओर कूच करना है .जीवन की बंजर भूमी परएक छोटा सा सोता लाना जरुरी है .मगर अभी तो पानी
 
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Feb 17 2010 09:48 PM
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ज़रुरत नही थी तुमको..

मेरे प्यार की शायद ज़रुरत तो नही थी तुमको..मैने ग़लत समझा...जो तुम्हे प्यार किया..तुम्हे प्यासा समझा..तुम्हे जी जान से चाहा किया..तुम्हे तो चाह ही नही थी फिर क्यू ये प्यार किया..!!दिल मे बिठा के तुमने मुझे अपना कहा..बस अपना कहा..पर मन से ना इकरार
 
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Feb 14 2010 09:33 PM
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मुझे क्षमा करना...

सागर तो हू..मगर सतह मरूस्थल सी हैऔर तासीर उस रेगीस्तान जैसी..जो प्यासा है प्यार के लिए..मै तुम से दूर रह करखुद को भुलाये रहता हू..उमडते सागर कीकल-कल करती लहरो सालोगो की भीड मेंसवयं को उलझाये रहता हू.मगर पाता हू जब भीतुम्हे अपने करीब..भूल जाता हू
 
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Feb 10 2010 11:12 PM
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मत करो मां मुझे इतना प्यार...

मत लगाओ अपने सीने के पासमत करो मां मुझे दिल से प्यारनसीब ने ठोकरे दी हो जिसेक्यू सुखाने चले तुमउसके आंसू तमामछोड दो अकेलाजहां में उसेछोड दिया जिसके रब ही ने जिसेरेहने दो उसे उसकीकडवाहटो के साथमत बढाओ मा दर्द मेरादेकर अपने आंचल की छांवसूख चला जो वृक्ष हू
 
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सात फेरो का छळ

न जाने वो कैसे छली गई???अपने भाग्य की रेखाओं से??उसने तो भरोसा किया था खुदा परखुदा का फ़ैसला मान सर झुकाती गई...उफ़ ये क्या खता हो गई...सात फेरो के बंधन मे वो छली गई...!!उम्र भर के गमो की सलाखो मे देखो..बे-गुनाह...मासूम वो कैद हो गई....!!त्याग कर के भी
 
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अधूरापन....

आज भी कितने अधूरेपन मे जीती हे वो...उसके अंदर जो मा का प्यार पाने का आभाव है..जो आज भी उसे एक अजीब सी खलिश दे जाता है...बचपन मे मिला ये अधूरापन उसकी ज़िंदगी का अधूरापन बन चुका है..ये ऐसा दर्द हे जिसे वो शब्दो मे ढाल कर भी कम नही कर पाती..!!जब मा की गोद
 
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ढँके जज्बात

दोस्तो, यह कविता मैने हिंद युग्म की दिसंबर माह की युनीकवि प्रतियोगिता के लिए भेजी थी जिसे १४वा स्थान मिला. अब इसे में आपकी राय के लिए प्रस्तुत करती हू..अब मै ढाँप लेती हूँअपने जज्बातो को तुमसे भीऔर ओढ़ लेती हूँएक स्वाँग भरी मुस्कान कोछुपा लेती हूँ सारा
 
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नये दौर की मुहोब्बत...

अब शिकायतो का दौर खतम हो गयातेरी महफिल से उठा और बेगाना हो गयातूने पलट के भी ना देखा अपने तलबगार कोऐसा छिटका दामन से कि दिल से भी जुदा हो गयाहश्र ऐसा होगा मुहोब्बत का तेरी महफिल मेंदर्द वालो के ही घर में दर्द अजनबी हो गयाक्या फरक रह गया तुझमे और बे- वफाओ
 
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जलने दे मुझको यू ही...

तन्हा हू तो रहने दे तन्हा मुझको यू हीजलने मे भी मज़ा है जलने दे मुझको यू हीख्वाब टूट गये हैं रुसवा हो गई है खुशियादुनिया को क्या देखु, अश्क नही देखते कुच्छ भीधुंधला गयी है आँखे, दिल टूटा है कुच्छ यू ही..तन्हा हू तो रहने दे तन्हा मुझको यू ही...!!सावन जो
 
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समझो मुझे....

क्या तुम अनभिज्ञ होमेरे हालातो से..मैने तो हर प्रष्ठखोल के रख दिया हैंतुम्हारे सामनेअपनी किताब का.क्यू नही समझ पातेतुम, मेरी मजबूरियाऔर दे देते होहर बार इल्जाममेरी विवशताओ कोक्या तुम्हेआडंबर लगती हैंसारी बातेक्यो तुम अविश्वास मेंजीते हो ?और विष उडेलअपने
 
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तू और मैं ....

मेरे स्वप्नो की छाया में रमी हुई मेरी स्मृतियों में बसी सांसो के धागो में बंधी तू...! और मै.......?? तेरी छाया के पीछे दौड़ता एक व्याकुळ, आकुल, बेबस पथिक मात्र हू..! तू अपने ह्र्दय की फुलवारी में किसी और की सोचे बुन रही है तेरी छटपटाहट मेरे लिए नही ह
 
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आज सब कह दो..

मेरी सोचो को थोड़ा आराम दे दो.. मुझ पर एक अपना एहसान दे दो.. बहुत झुलसाती है सोचे.. जब हालात तुम्हे सोचते है.. चीखती है रगे ..., जद्दो-जहद भी बदन तोड़ते है.. मुझे मेरी सोचो से ज़रा से फासले दे दो.. जो दिल में है वो कह दो.. मेरे सीने पे अपना सर रख के..
 
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Dec 27 2009 09:11 PM
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खलिश....

अजब खलिश है सीने में.. नम हर पोर है सीने में.. दग्ध भाव है.. सज़ल नयन है.. चित भाव विभोर है.. मर मर कर इस जीने में..!! ना अरमानो की छाव कही.. ना ख्वाबो के है पाँव कही.. ना सुख की भोर है नयनों में.. ना प्रेमालाप का राग कही..!! असहाए, दरिद्र सी उत्कंठा
 
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Dec 27 2009 09:11 PM
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स्वांग भरी मुस्कान

दोस्तों , यह रचना मैंने हिंद - युग्म में युनिकवी की अक्तूबर माह की प्रतियोगिता में भेजी थी जिसे ११ वा स्थान प्राप्त हुआ था और आज इसे आप सब के बीच पेश कर रही हू ... उम्मीद है पसंद करेंगे । सब कुछ बिखरता जा रहा है लेखनी की सांसे टूटने लगी है .. सारे गम
 
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Dec 27 2009 09:11 PM
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सागर सिमट जाएगा.....

लम्हा दर लम्हा सागर सिमट जाएगा.. कतरा - कतरा कर ख़ुद ही में ये लिपट जाएगा.. तुमको पता भी न चलेगा.. कितने गम...कितनी तन्हाईया ख़ुद ही मे ले कर ये मिट जाएगा.. लम्हा दर लम्हा सागर सिमट जाएगा.. कतरा - कतरा कर ख़ुद ही में ये लिपट जाएगा.. भटकते भटकते एक दि
 
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प्रारब्ध

चेहरे की झुर्रिया.. अपने निशाँ छोड़ने लगी है..!! मौत भी धीरे धीरे .. अपनी चादर फैलाने लगी है...!! क्षणिक सुखो की भावभरी शाखाये भी.. दारुड दुःख में.. सूख चली है..!! मगर..., आह.... ये प्रारब्ध.. हां.... ये निर्दयी प्रारब्ध पैशाचिक नृत्य करता हुआ.. क्षण
 
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Dec 27 2009 09:11 PM
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प्रयाण...

दीपक मंद हो चला है टिमटिमाना धीमा हो गया है आयु का जल भी सूख चला है लौ की उपर उठने की शक्ति क्षीण है आंखो की ज्योति , शरीर की शक्ति , मस्तिष्क की विस्मृति , शमशान सा मौन, विकृति की नीरस शांति प्रयाण के लिये सब साजो - सामान जुटा चुकी है ! खांसी, दम घु
 
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Dec 27 2009 09:11 PM