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कुछ कहानियाँ,कुछ नज्में

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17 Jun 2010
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पहली उड़ान है सपनो की

जबसे उसने हथेली में  उगा चाँद देखा है मैंने उसकी आँखों में उभरता अरमान देखा है निकली है पहली बार वो तनहा सफ़र पर नाजुक परो ने उसके विस्तृत आसमान देखा है पहली उड़ान है सपनो कीसाथ दुआए है अपनों की माँ  की आँखों में आज सुकून और
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मेरी खुद से ही ठन जाती है

कुछ और हुआ मैं करती थी कुछ और ही अब बन बैठी हूँ सुन लो तुम्हारे आकर्षण में खुद से ही लड़ बैठी हूँ जुल्फ मेरी सुनती ही नहीं और आंचल भी बेलौस उड़े जब होंठ मेरे थर्राते है मुस्काते हो तुम मौन खड़े माथे पे पसीने की बूंदे मोती सी दमकने लगती है बढती धड़कन के
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कल रुत तुमको तरसाए

नभ में उमड़े घन बड़े बिजली भी बिन बात लड़ेतुम भी रूठे-रूठे से बोलो कैसे बात बढे बूंदे छेड़े जब मुझको हवा दिखाए रंग नए तुम्हे लगा मैं भूल गई तुम भी तो थे संग खड़े मेघ सदा बरसाए मद जब तुम मेरे साथी हो कैसे ना मदहोश हो हम नयन तुम्हारे साकी हो ऐसा ना हो तन
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मेरे बिना (कहानी)

शाम से अब तक तीन डिब्बी सिगरेट फूंक चुका हूँ ,मुह का स्वाद इतना कडुवा हो चुका है की सामान्य में मुह का स्वाद कैसा होता है याद ही नहीं ...शायद यही कडवाहट मेरी रगों में भी घुल गई है, बिना झुंझलाए बात नहीं कर पाता हूँ, विधि दो तीन बार खाने को पूछ चुकी है,
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मुद्दत बाद पहलु में सनम आया है

उसने हंसकर जब गले लगाया है आँखों में चाँद उतर आया है गालों में पड़े गहरे दो भंवर उनमें डूबकर कौन उबर पाया है कुछ हया उसकी अदा में शामिल है और कुछ अदा से वो शर्माती भी है कभी झिड़क देती है शरारत सेकभी तेवर नए दिखाती भी है कभी उँगलियों से सुलझा देती है कभी
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जब कविता रचनी होती है

जब कविता रचनी होती है मत पूछो क्या क्या करते है हर लम्हा हर पल हम किस वेदना** से गुज़रते है भावो से मिलते शब्द चुने लय गति के संयोजन से तुक मिला मिला कर गीत बुने सार्थक रचने के प्रयोजन सेकभी लगा पहली पंक्ति हलकी अंतिम वाली भारी है माध्यम पंक्ति स्वयं बन
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बंद लिफाफे में गुलाब आता है

आज भी ....ख़त लिखते है तो जवाब आता है बंद लिफाफे में गुलाब आता है देख कर उनको भारी हो जाती है पलकें रुखसार पर रंग लाल छाता है अब भी..... खस गर्मियों में लगा कर निकलते है सुबह- शाम दोनों वक़्त संवरते हैकलफ लगी सूती चुन्नी की ओट सेमूंगे से
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बहुत गर्म दोपहरी है

उन्होंने समेट कर जुल्फे ढीला सा जुडा बनाया है जो इठलाता हुआ गर्दन पे सरक आया है मेरी साँसे उसके खुलने पर ही ठहरी है अब साए को तरसाओ मत बहुत गर्म दोपहरी है
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उफ़ गर्मी (कहानी )

चिपचिपी गर्मी ,तपती धरती ,आग उगलता आसमान ,ना रुकने वाला पसीना .. उस पर तवे पर पड़ी रोटी को सेकना, मीरा की झुंझलाहट बढती जा रही थी ...सारे घर में इन्वेर्टर का कनेक्शन है एक रसोई में छोटा सा पॉइंट लगवा देते तो कम से कम टेबल फेन लगा कर काम तो हो जाता .पर
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मेरी तौबा (लघुकथा )

"कुछ सोच रही हो " मैंने उसका हाँथ हौले से दबाकर पूछा "नहीं तो " नेहा के चेहरे पर शरारत की लहर दौड़ गई अब वो आसानी से बताएगी नहीं ,जब तक मैं उससे ८ -१० बार पूछ नहीं लूँगा .चार सालों से जानते है एक दुसरे को ऑफिस में मिले,दोस्त बने फिर एहसास हुआ हम अपना
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लौकी पी रहे है लौकी खा रहे है

(बैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता के लिए एक व्यंग रचा था आपसब के साथ बाँट लेती हूँ )बड़ी दर्द भरी कहानी है हमारी ,ऐसा युद्ध लड़ा है जैसा ..पूछो मत .ताई जी के बेटे की शादी का कार्ड देखकर ..कितने पकवानों के थाल आँखों के सामने घूम गए थे ..आँखे इमरती..तो दिल में
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क्षणिकाए (दर्द)

वो लड़की झांकती  झरोखे से शायद कही धोखे सेउसकी झलक दिख जाए सारी तृष्णा मिट जाए वो लड़का कुछ बेखयाल साबिगड़े सुरत-ए-हाल सा रस्सी सा एठा है सबसे खफा बैठा है चार आँखे दो पथ निहारती दो सबकुछ वारती शायद एक हो जाए एक दूजे में खो जाए दो अर्थियां
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कंधा (लघुकथा)

उन दोनों का रिश्ता बेहद अजीब था शादी के बीस साल के बाद भी एक अबोलापन था जो दोनों के बीच पसरा रहता ...हर काम मशीन की तरह से चल रहा था ,इस रोबोटिक ज़िन्दगी में भावनाए शायद शुरू से नदारद थी .सुबह उठने से रात सोने तक सब कुछ तय था .एसा नहीं था की वो बहुत खुश
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दिल में उतर रही हूँ मैं

कितना संभल कर चल रही हूँ मैं फिर भी ना जाने क्यों फिसल रही हूँ मैं आइना हर रोज़ दिखता है निशाँ नए इस कदर ना जाने क्यों बदल रही हूँ मैं जब से चढ़ी है नज़र में खुमारी किसी के दिल में उतर रही हूँ मैं कल सरी महफ़िल शमा कतरा गई मुझसे या खुदा इस कदर निखर रही हूँ
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प्रेम के क्षण (१)

१ काँप गई आलिंगन में उन्मुक्तता है इस बंधन में पंख लगे है धडकनों को उबरू कैसे इस उलझन से २ कितने मादक कितने मोहक नैन तुम्हारे मौन में भी कितने मुखर नैन तुम्हारेइन नैनो ने विकल किया ये तो सोये पर जागे रात रात भर नैन हमारे ३ दिन-ब-दिन तुम चढ़ रहे हो
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चाँद को बख्श दो

सुन सुन के आशिकी के तरानेपक गया है चाँद को बख्श दो वो थक गया है शक्ल जब अपने यार की चाँद से मिलाते है आसमान में चाँद मियादेख देख झल्लाते है अपनी सूरत पहचानने में दम उनका चुक गया है चाँद को बख्श दो वो थक गया है बे- बात की बात सारी रात किया करते है
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हर रंग में छांट लूं ...

चलो एहसासों को दुपट्टे में बाँध लूं तुम्हारी छुअन को किनारी सा टांक लूं लिपटे जो मुझसे तो तुम नज़र आओ काँधे से फिसलो तोबाँहों में उतर जाओ दांतों तले दबा लूं तो हया से लगो ऐसे बनो मेरा हिस्सा कभी न जुदा से लगो इतने रंग भर दो के अम्बर को बाँट दूं दुपट्टे की
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गालियाँ सीखूं क्या ?

http://bharhaas.blogspot.com/2010/04/blog-post_9062.htmlआज अनायास ही एक ब्लॉग पर पुन: जाना हुआ इसी ब्लॉग पर सानिया -शोइब प्रकरण पर एक लेख पर एक छोटी सी टिपण्णी डाली थी,जिसमें मैंने गालियों  के प्रयोग को गलत माना था जिसके प्रतिउत्तर में एक पूरी
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वो सहता गया....

दर्द उसको भी होता था खून उसका भी रिसता  था तुम जख्म देते गए वो सहता गया तुम दोस्ती के नाम पर मांगते रहे कुर्बानियाँवो तुम्हारे भरोसे पर हर लम्हा साथ देता गया तुमने मिटा दिया उसने आह भी ना निकाली ये दोस्ती का है इम्तिहान हँस के वो कहता गया..
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डर लगता है

मुझे खुश होने से डर लगता है,जो न पाया उसे खोने से डर लगता है मेरे अश्क बनके तेज़ाब न जला दे मुझको इसलिए रोने से डर लगता है महफ़िल में भी सन्नाटा सुनती हूँमुझे तनहा होने से डर लगता है ख्वाब टूटकर चुभेंगे ज़िन्दगी भर मुझको सोने से डर लगता है तुम्हारी याद
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कायर(कहानी)

एक आज समाजशास्त्र की किताब पढ़ते हुए ,मेरा शारीर तो वही रह गया और मन पंख लगा कर उड़ गया, जरुरी पंक्तिया रेकंकित करते हुए न जाने कब किताब के आखिरी पन्ने पर तुम्हे उकेरने लगा,मुझे हमेशा ऐसा लगता है, तुम्हे मेरे से अच्छा कोई भी तस्वीर में नहीं उतार
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तुमको याद ना हो

बहुत मुमकिन है तुमको याद ना हो तुम्हारी डायरी के इक्किस्वे पन्ने पर एक सूखा गुडहल जो तुमने अपने हांथो से लगाया था मेरे जूडे में फिर मान के निशानी दबा दिया डायरी में उसकी साँसे कल तक बाकि थी आज ही दम तोडा है अपने रिश्ते के साथ अब शायद मुझको भी दफ़न कर दोगे
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कुछ लम्हे

---------------------------------हाँथ रख कर मांथे पर ताप क्यों देखते हो मेरी आँखों में देखो भाप की बूंदे उभर आई है ------------------------------------अपनी किस्मत आजमा सकती नई नज़्म गुनगुना सकती एक पल को ही सही शायद मैं मुस्कुरा सकती
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आशा बाकी है लाडली

(यह कविता श्रेष्ठ सृजन प्रतियोगिता अंक- 7 में चयनित हुई तो सोचा आप सब के साथ बाँट लूं )अभी आशा बाकी है लाडलीकुहासा छटेगा धूप निकलेगीबाहें फैला कर भर लेना तुमसारी सीलन उड़ जायेगी अभी कंधो में दम हैतेरे चलने तक उठा सकती हूँघबराना नहीं मेरी गुडियाअँधेरे को
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संवेदनाये मर चुकी है

संवेदनाये  मर चुकी है लाशें जवानो पड़ी है फुर्सत कहाँ हमको सान्या- शोइब से आगे सोचे भावनाए बिक चुकी है जो बुद्धू बक्सा दिखाए उसे सच मानते है हैदराबाद के दंगे का कारण कितने जानते है सोच कुंद हो चुकी हैजब तक हमारे मुह पर चांटा नहीं पड़ेगा दर्द नहीं
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अजीब लड़की (अंतिम किस्त )

आज ही परीक्षा ख़त्म हुई थी ,कालेज से आकर सीधे बिस्तर पर पड़ गई आखिर पिछले १५ दिनों की नींद जो पूरी करनी थी, उफ़ कैसे विचित्र सपने देख रही थी मैं सूनसान सड़क पर जा रही हूँ अचानक एक अजगर दिखाई देता है उसकी शक्ल किसी से मिल रही है...अरे ये तो मधु
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अजीब लड़की (२)

मेरे कमरे में उसकी उपस्थिति मानो किसी कुर्सी मेज की तरह थी मैं उसे पूरी तरह उपेक्षा दे रही थी ..मैं अपनी पढ़ाई में कोई भी व्यवधान नहीं चाहती थी,हालाँकि खाने के समय वो चुप्पी तोड़ने की बहुत कोशिश करती, ऐसा नहीं था मैं उससे जानबूझ कर रुखाई से पेश आ रही
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अजीब लड़की (भाग १)

वो मुझे हमेशा बहुत अजीब सी लगती..पता नहीं क्यों कुछ मरदाना सा चेहरा लंबा कद चौड़े कंधे , नारीसुलभ कोमलता का पूरी तरह अभाव ,बोली अभी अजीब सी मानो आवाज़ को खींच रही हो, होस्टल में सबके साथ घुलती मिलती पर मुझे वो अपनापन सहज नहीं लगता, यहाँ तक उसका छूना मुझे
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अभी और जीना है

कुछ ख्वाब टूटे हुए कुछ अपने छूटे हुए टूटे को सहेजना है छूटे को टेरना हैकुछ खुशबुए बिखरी हुईकुछ लटें उलझी हुई खुशबूं को समेटना है लटों को सवारना हैकुछ जख्म रिसते हुए कुछ अश्क छलके हुए जख्मों को सीना है अश्कों को पीना है सब संवर जाएगा मेरा रूप निखार जाएगा
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ठहरी ज़िन्दगी

मेरे घर के आँगन में धुप तिरछी पड़ती थी ठीक नौ बजे नौबजिया की कली खिलती थी सुबह स्कूल जाने की हडबडाहट में गर्म दाल चावल से अक्सर ऊँगली और जीभ जलती थीनिकलना देर से और पहुँचने की जल्दी में कच्ची पगडण्डी पे कितनी बार गिरती संभालती थी बरस बीत गए लेकिन ज़िन्दगी
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हनुमान जयंती

हनुमान जी को अगर एक व्यक्तित्व के रूप में देखा जाए तो बहुत कुछ समझ में आता है ...अपरिमित शक्ति , साहस, बल धैर्य के साथ प्रेरणा पुंज, एक वानर जो अजर अमर है हज़ारों सालों के बाद भी उनके प्रति श्रधा वैसी ही है, सिक्स पैक एब्स बनाने वाला हो या अखाड़े का पहलवान
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दोमुहे जानवर (कहानी)

सच में घुटन होती है इस समाज में इनलोगों के बीच ..मुग्धा ने अपने चेहरे से पसीना पोछते हुए सोचा,वो अभी भी पसीने से भीगी अपनी पीठ पर मिस्टर शुक्ला की निगाहें महसूस कर रही थी उस आदमी को देख कर हमेशा मुग्धा को लिजलिजापन महसूस होता है ...जैसे भाव छिपकली को देख
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आप बताइए

अभी अभी पोस्ट डाल कर गए ही थे कुछ रोचक मिला सोचा आपको भी दिखा दूं ...मैं ज्यादा नहीं लिखूंगी पर आप बताइए ये चित्र देख कर सबसे पहले आपके मन में क्या आता है
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दुआ दूं या बददुआ

आज तुम्हारी बेवफाई से वाकिफ हुए है क्या समझोगे कितने दर्द से गुज़रे हैं जब थे मेरे साथ और ख़याल था गैर का ऐसे लम्हे भी ज़िन्दगी से गुज़रे हैं तुम थे खामोश हम समझे खफा हो गुमसुम थे तो समझे कुछ जुदा हो कोशिश की खुशिया भर दूं दामन में अनजान थे तुम किसी और के
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नैनो की आत्महत्या!

ये तो होना ही था भैया आखिर कब तक कोई कार अत्याचार सहन करे, बड़े लाड से लाये थे नैनो को तारीफ़ में भी पुल क्या पूरे पूरे flyover बना दिये..छोटी सी प्यारी सी सजी धजी नैनो लोगों की आँखों का सपना बन गई.. कार मेले में जब मुह दिखाई हुई तो भीड़ के सारे रिकॉर्ड
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सीटी बज गई

"अरे लल्ला कहे किताबन में मूढ़ घुसाए बैठा है तानी सिट्टी बजाये की परकत्तिस तो कर लेव" अरे राम रे पूरे गाम का बवाल मचा, जवान और बुड्ढे सभी सिट्टी बजाये में लगे है , जब से पहिलवान जी कहिन है संसद में सिट्टी बजिहें तभी से सब होंठ गोल किये घूम रहे है, जो
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त्राहिमाम !!!!

त्राहिमाम !!!!आजकल ब्लॉग जगत पर धर्म-चर्चा पर महासंग्राम मचा है ,लोग लैपटॉप मोबाइल लेकर जुट गए है ,ऐसी-तैसी करने में और करवाने में, अपन को तो ये एकदम हिट टोपिक लगता है बीड़ू, वो क्या कहते है हिंग लगे ना फिटकरी और रंग चोखा..गूगल उठाओ और ऐसी हज़ारों मेल में
टैग: धर्म
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माफ़ कर दे कृति

कृति अपने हाँथ गौर से देख रही थी आँखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे ,कोई तो बता दे कौन सी है किस्मत की रेखा ...उसने तो नहीं खिची तो फिर काकी क्यों कोसती है उसको, कृति के माँ पिताजी एक दुर्घटना में नहीं रहे थे जब वो सिर्फ तीन साल की थी ,इश्वर का
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वो जिद पे अड़ा है

वो जिद पे अड़ा है वो सबसे बड़ा है मुद्दत से यही तो वो दोहरा रहा है दुनिया का बोझ लिए अपने दिमाग पर अपने ही घर को भूला जा रहा है बात करता है हरदम वो मजहब खुदा कीइंसानियत तो उसको याद ही नहीं है चुन चुन कर निशाना वो साधे हुए है किसी की सुनने कोतैयार ही नहीं
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बिन पानी सब सून

अभी अभी पता चला , २२ मार्च अंतरास्ट्रीय जल दिवस है , तो हमने सोचा जल से जुड़े कुछ मुहावरे याद किये जाए १. जल में रहकर मगर से बैर२.आँखों का पानी मरना३. चुल्लू भर पानी में डूब मरना ४. पानी पी पी कर कोसना५. पानी उतर जाना बाकी कुछ आपलोग योगदान कीजिये , रहीम