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गत्‍यात्‍मक चिंतन

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15 Jun 2010
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खुशदीप सहगल जी का मक्‍खन .. आज मेरे ब्‍लॉग पे

मक्‍खन पहली बार शहर जा रहा था , मक्‍खनी को भय था कि वहां मक्‍खन बेवकूफ न बन जाए, क्‍यूंकि उसने सुना था कि वहां के लोग गांववालों को बहुत बेवकूफ बनाते हैं' 'शहर से लौटकर मक्‍खन ने बताया कि वो खामख्‍वाह ही उसे बेवकूफ समझ रही थी , उसने तो शहर
 
संगीता पुरी
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दहेज और कन्‍या देकर भी लडकी वाले जीतते थे .. सबकुछ लेकर भी लडकेवाले हार जाया करते थे !!

एक कथा  में कहा गया है कि पूरी धरती को जीतने वाला एक महत्‍वाकांक्षी राजा अधिक दिन तक खुश न रह सका , क्‍यूंकि वह चिंति‍त था कि आपनी बेटी की शादी कहां करे , क्‍यूंकि इस दुनिया का प्रत्‍येक व्‍यक्ति न सिर्फ अपनी बेटियों का विवाह अपने से योग्‍य लडका
 
संगीता पुरी
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आज की मॉडर्न राधा का दर्शन करें !!

दिल्‍ली यात्रा के दौरान सबसे अधिक मौका भतीजे भतीजियों के साथ रहने का मिला। ये है साढे चार वर्षीय यूरी सेठी , तीन वर्ष की उम्र तक खाना ही नहीं जानती थी , सिर्फ दूध पीकर या दूध में कोई खाद्य पदार्थ पीसकर गटकती रही। आजकल किसी तरह एक घंटे में एक छोटी रोटी खा
 
संगीता पुरी
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मेरे द्वारा 'दृष्टिपात' पत्रिका को भेजी गयी 23 मई 2010 को हुई दिल्‍ली ब्‍लॉगर मीट की रिपोर्ट

हिंदी ब्‍लॉग जगत से जुडने के बाद प्रतिवर्ष भाइयों के पास दिल्‍ली यानि नांगलोई जाना हुआ , पर इच्‍छा होने के बावजूद ब्‍लोगर भाइयों और बहनों से मिलने का कोई बहाना न मिल सका। इस बार दिल्‍ली के लिए प्रस्‍थान करने के पूर्व ही ललित शर्मा जी और अविनाश वाचस्‍पति
 
संगीता पुरी
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क्‍या उनकी उमर थी हमें छोडकर जाने की .. पर अच्‍छे लोग तो यूं ही चले जाया करते हैं !!

दोपहर से कांप रहा है बदन .. न कुछ खाने और न ही कुछ कर पाने की हिम्‍मत है .. मन हल्‍का करने के लिए कभी भाई बहनों को फोन करती हूं .. और कभी दोस्‍तो को ..  फिर भी मन हल्‍का होने का नाम ही नहीं ले रहा .. इंटरनेट भी खोला  तो शब्‍द ही पढे नहीं
 
संगीता पुरी
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एक बार बेईमानी करने से जीवनभर का लाभ समाप्‍त हो जाता है !!

कुछ जरूरी चीजों को लेने के लिए आज मैं बाजार निकली , मेरे पर्स में बिल्‍कुल पैसे नहीं थे , सो एटी एम की ओर बढी। काफी भीड की वजह से लगी लंबी लाइन में लगकर मैने ए टी एम से 5,000 रूपए निकाले , जिसमें एक एक हजार के चार नोट , 500 के एक नोट और सौ सौ के पांच नोट
 
संगीता पुरी
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बैशाखनंदन सम्‍मान प्रतियोगिता में मेरा आलेख : ग्‍लोबल वार्मिंग से लाभ ही लाभ

आज सभी पत्र पत्रिकाओं में .. चर्चा परिचर्चाओं में ग्‍लोबल वार्मिंग का ही शोर है .. बताते हैं पृथ्‍वी गर्म होती जा रही है .. हानि ही हानि है इससे .. चिंता का विषय बना हुआ है ये मुद्दा आजकल .. वैज्ञानिकों के द्वारा वातावरण की वार्मिंग को कम
 
संगीता पुरी
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आज पहली मई है ना .. एक कार्यक्रम में चीफ गेस्‍ट के तौर पर मेरा आमंत्रण है !!

'अब उठो भी .. छह घंटे तो सो चुके' जमीन में सोए बारह वर्षीय नौकर शिवम् को पहले बात से , फिर डांट से , फिर मार से उठाने में असफल शीला ने आखिरकार उसपर एक लात जड दिया।'अरे , क्‍या कर रही हो ?' बाथरूम से आते शैलेन्‍द्र की नजर उसपर पडी। 'परेशान कर दिया है
 
संगीता पुरी
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व्‍यवसायी इलाज के लिए रखे गए 65 लाख रूपए बचे ही थे .. उसका उपयोग क्‍यूं नहीं हुआ ??

चार वर्ष पूर्व एक व्‍यवसायी को कैंसर हो गया , उन्‍होने व्‍यवसाय में से एक करोड रूपए निकालकर अलग रखे। इस एक करोड रूपयों को निकाल देने से उनके व्‍यवसाय में रत्‍तीभर का भी फर्क न पडनेवाला था , इसलिए पूरी निश्चिंति से इलाज करवाते रहें । तीन वर्ष तक नवीनतम
 
संगीता पुरी
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झूठ और सच

झूठ के पांव होते ही नहीं हैं ,कभी कहीं भी पहुंच सकता है।पर बिना पांव के ही भला वह , फासला क्‍या तय कर सकता है ?भटकते भटकते , भागते भागते , उसे अब तक क्‍या है मिला ?मंजिल मिलनी तो दूर रही , दोनो पांव भी खोना ही पडा !!सच अपने पैरों पर चलकर , बिना
 
संगीता पुरी
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मान्‍यताएं कब अंधविश्‍वास बन जाती हैं ??

सुपाच्‍य होने के कारण लोग यात्रा में दही खाकर निकला करते थे , माना जाने लगा कि दही की यात्रा अच्‍छी होती है। देर से पचने के कारण यात्रा में कटहल की सब्‍जी का बहिष्‍कार किया जाता था , माना जाने लगा कि कटहल की यात्रा खराब होती है। समय के साथ दही को शुभ
 
संगीता पुरी
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भावी पीढी के सही विकास के लिए आवश्‍यक मोह ममता ने ही उनका विकास बाधित किया है !!

इस विविधता भरी दुनिया में प्रत्‍येक जीव जंतु के विकास के लिए प्रकृति की व्‍यवस्‍था बहुत सटीक है। प्राकृतिक व्‍यवस्‍था के हम जितने ही निकट होते हैं , हर चीज में संतुलन बना होता है। प्रकृति से हमारी दूरी जैसे ही बढने लगती है , सारा संतुलन डगमग होता जाता
 
संगीता पुरी
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क्‍या लालू , बालू और कालू की मजेदार कहानी आपको याद है ??

अचानक बचपन में किसी पत्रिका में पढी एक मजेदार कहानी की आज मुझे याद आ गयी। किसी गांव में तीन भाई रहा करते थे .. लालू , बालू और कालू । लालू और बालू खेतों में काम करते , जबकि कालू का काम उस गांव के दारोगा जी के लिए खाना बनाना होता था। खेतों की फसल और कालू
 
संगीता पुरी
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कैसा हो कलियुग का धर्म ??

प्रत्‍येक माता पिता अपने बच्‍चों को शिक्षा देते हैं , ताकि उसके व्‍यक्तित्‍व का उत्‍तम विकास हो सके और किसी भी गडबड से गडबड परिस्थिति में वह खुद को संभाल सके। पूरे समाज के बच्‍चों के समुचित व्‍यक्तित्‍व निर्माण के लिए जो अच्‍छी शिक्षा दे, वो गुरू हो जाता
 
संगीता पुरी
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छोटी छोटी बात में भी मौलिक सोंच के सहारे कोई व्‍यक्ति आगे बढ सकता है !!

पिछले दिनों सहारा इंडिया की विभिन्‍न प्रकार के बचत स्‍कीमों के लिए काम कर रहे एक एजेंट के बारे में जानकारी मिली। रोजी रोटी की समस्‍या से निजात पाने के लिए वह इसका एजेंट तो बन गया , पर यहां भी राह आसान न थी। पांच दस रूपए व्‍यर्थ में बर्वाद करनेवाले और कभी
 
संगीता पुरी
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क्‍या सचमुच हमारे सोने के चेन में उस व्‍यक्ति का हिस्‍सा था ??

कभी कभी जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं अवश्‍य घट जाती हैं , जिसे संयोग या दुर्योग का पर्याय कहते हुए हम भले ही उपेक्षित छोड दें , पर हमारे मन मस्तिष्‍क को झकझोर ही देती है। आध्‍यात्‍म को मानने वाले इस बात को समझ सकते हैं कि निश्चित परिस्थितियों और निश्चित
 
संगीता पुरी
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कैसा रहा 22 वर्षों का मेरा वैवाहिक जीवन ??

हमारे विवाह के समय के माहौल के बारे में कल ही आपको काफी जानकारी मिल चुकी , 1988 के 12 मार्च को हमारे विवाह के बाद 13 मार्च से शुरू हुई इस यात्रा के आज 22 वर्ष पूरे होने को हैं। इस अंतराल में हम दोनो पति पत्‍नी या हमारे दोनो बेटों के स्‍वास्‍थ्‍य या
 
संगीता पुरी
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हमारे विवाह तय करने में थाने के वायरलेस को भी काम करना पडा था !!

प्रतिवर्ष फरवरी की समाप्ति के बाद मार्च के शुरूआत होते ही शनै: शनै: ठंढ की कमी और गर्मी के अहसास से जैसे जैसे कुछ सुस्‍ती सी छाने लगती है , वैसे वैसे मेरा मन मस्तिष्‍क 1988 की खास पुरानी यादों से गुजरने लगता है। नौकरी छोडकर गांव लौटकर दादाजी के
 
संगीता पुरी
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महिलाएं पुरूषों से अपना अधिकार क्‍यूं मांगे ??

अधिकार और कर्तब्‍यों का आपस में एक दूसरे से अन्‍योनाश्रय संबंध है। चाहे कोई भी स्‍थान हो , कर्तब्‍यों का पालन करने वालों को सारे अधिकार स्‍वयमेव मिल जाते हैं। पर सिर्फ अच्‍छे खाते पीते परिवार की कुछ बेटियों या कुछ प्रतिशत दुलारी बहुओं की बात छोडकर हम
 
संगीता पुरी
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हमारा गांव पेटरवार आर्सेलर-मित्‍तल को भी पसंद आया !!

रांची बोकारो मुख्‍य मार्ग पर बोकारो जिले में स्थित हमारा पैतृक गांव पेटरवार सिर्फ इस क्षेत्र के लोगों का ही नहीं ,दूर दराज के बहुत सारे लोगों का भी पसंदीदा रहा है। काफी दिनों से जहां मारवाडियों को व्‍यावसायिक दृष्टि से यह क्षेत्र पसंद आया है,
 
संगीता पुरी
Mar 06 2010 04:08 PM
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लाइए हमारा इनाम .. हमने आपको झूठी कहानी सुना दी !!

एक राजा को झूठी कहानियां सुनने का बहुत शौक था , मतलब कि ऐसी कहानी जो सच हो ही नहीं सकती। उन्‍होने पूरे राज्‍य में घोषणा कर दी थी कि उनको जो भी झूठी कहानी सुना दे , जो कभी सत्‍य हो ही नहीं सकती , तो राजा की ओर से इनाम के रूप में बडी राशि दी जाएगी। पूरे
 
संगीता पुरी
Feb 25 2010 04:37 PM
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'उत्‍पादकता' से 'प्रकृति' महत्‍वपूर्ण, ये बात गांठ बांध लो सभी !!

डायरी के एक पन्‍ने में मुझे यह कविता दिखाई पडी। पढने पर मुझे याद आया कि पर्यावरण दिवस पर आयोजित किसी कार्यक्रम में बोलने के लिए बेटे को कविता लिखना सिखलाते हुए मैने यह तुकबंदी की थी । यह पन्‍ना इधर उधर खो न जाए , इस ख्‍याल से इस यादगार कविता को यहां
 
संगीता पुरी
Feb 23 2010 12:04 AM
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आस्‍था तो अच्‍छी चीज है ... पर ये कैसे कैसे अंधविश्‍वास ( तीसरा भाग) ??

पहली और दूसरी कडी के बाद आते हैं , तीसरी कडी पर  हमारे अंधविश्‍वास का फल सदा से निरीह जानवारों को भी भुगतना पडता रहा है , सरिता झाजी लिखती हैं
 
संगीता पुरी
Feb 21 2010 10:14 AM
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आस्‍था तो अच्‍छी चीज है ... पर ये कैसे कैसे अंधविश्‍वास ( दूसरा भाग) ??

कल से ही मैं अपने देश में बेवजह फैले अंधविश्‍वास पर हमारे ब्‍लोगरों की निगाह की चर्चा कर रही हूं , इसी की दूसरी कडी आज प्रस्‍तुत है .......ऋषिकेश खोङके "रुह" जी को सुनने में अजीब सा लग रहा है कि किसी के शरीर में देवी आ गयी
 
संगीता पुरी
Feb 20 2010 05:24 PM
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आखिरकार पुलिस ने मुझे ढूंढ ही लिया !!

अपने जीवन की सब सुख सुविधा छोडकर अपने चिंतन के प्रति समर्पित होकर ही कोई लेखक लेखन की निरंतरता बना पाता है। उसका लक्ष्‍य अपने अनुभवों और विचारों का समाज में बेहतर प्रचार प्रसार ही होता है , क्‍यूंकि एक प्रतिशत से भी कम मामलों में ही आर्थिक आवश्‍यकताओं की
 
संगीता पुरी
Feb 17 2010 09:51 PM
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नाम में कितना कुछ छुपा होता है .. ये रहा मेरे परिवार का नाम पुराण !!

कहा जाता है नाम में क्‍या रखा है ? अरे नाम में ही तो सबकुछ रखा है , लोगों के कर्म , लोगों के विचार , लोगों की कल्‍पना , सब नाम में ही तो छुपी होती है। इसलिए परिवार के लोगों के नाम से ही आप उनके परिवार की मानसिकता , उनके संस्‍कार को समझ सकते हैं। इस
 
संगीता पुरी
Feb 14 2010 09:45 AM
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आप ठंड के दिनों में भी ताजे और स्‍वादिष्‍ट दही का मजा ले सकते हैं !!

हमारे शरीर को जितने आवश्‍यक तत्‍वों की जरूरत होती है .. जल , चर्बी , प्रोटीन , शक्‍कर के साथ ही साथ नमक भी दूध से प्राप्‍त हो जाते हैं। इसलिए दूध को एक संपूर्ण आहार कहा गया है। गाय के अतिरिक्‍त भैंस , भेड , बकरी , रेन्डियर और ऊंट से भी दूध प्राप्‍त किया
 
संगीता पुरी
Feb 11 2010 06:40 PM
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वैदिक गणित की जानकारी से चुटकियों में बड़ी-बड़ी गणनाएँ की जा सकती है !!

आज शाम एक आलेख पर नजर पडी वैदिक गणितः चुटकियों में बड़ी-बड़ी गणनाएँ , जिसमें दिया गया है कि भारत में कम ही लोग जानते हैं, पर विदेशों में लोग मानने लगे हैं कि वैदिक विधि से गणित के हिसाब लगाने में न केवल मजा आता है, उससे आत्मविश्वास मिलता
 
संगीता पुरी
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क्‍या प्रकृति में लेने और देने का परस्‍पर संबंध होता है ??

जीवन में बहुत सारे लोग , खासकर आध्‍यात्मिक ज्ञान और रूचि वाले लोग इस बात को मानते हैं कि प्रकृति में लेने और देने का परस्‍पर संबंध है। एक बार पिता पुत्र की देखभाल करता है , तो दूसरी बार पुत्र को पिता के कमजोर होते शरीर को सहारा देना पडता है। इसी प्रकार
 
संगीता पुरी
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नाना मुनि के नाना मत ... हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत के आलेखों को पढकर कमेंट किया जाए या नहीं ??

मैंने हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत से जुडने के सालभर बाद इंटरनेट का अनलिमिटेड डाउनलोड का पैकेज लिया तो इसके आलेखों को अधिक से अधिक पढने और उनमें टिप्‍पणी करने का लोभ संवरण नहीं कर पायी , पर इससे मुझे कितनी फजीहत उठानी पडी , यह तो सबों को मालूम होगा , जिसके कारण
 
संगीता पुरी
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घुंघराले बालों वाली गोरी खूबसूरत कन्‍या बारंबार मेरी अंतरात्‍मा को झकझोर रही है !!

अपने लक्ष्‍य के प्रति मैं जितनी ही गंभीर रहती हूं और सफलता के लिए जितना ही प्रयत्‍न करती हूं , अपने सुख की चिंता उतनी ही कम रहती है। मुझे न तो ईश्‍वर से , न अपने परिवार से और न ही जान या पहचानवालों से कोई शिकायत रहती है। मुझपर बडा से बडा कष्‍ट भी आ जाए ,
 
संगीता पुरी
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अंतहीन कष्‍टों का जीवन झेलने का मजबूर एक दंपत्ति

पिछले दिनों अपनी एक पोस्‍ट में  मैने बताया था कि लेखक का नजरिया ही किसी कहानी को सुखात्‍मक या दुखात्‍मक बनाता है। जीवन के सुखभरे समय में जब कहानी का अंत कर दिया जाता है , तो उसे सुखात्‍मक और जीवन के दुखभरे समय में कहानी का अंत कर दिया जाता है ,
 
संगीता पुरी
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एक मजदूर के घर में कैसे बनी खीर ??

एक मजदूर के घर में कई दिनों से घर में खीर बनाने का कार्यक्रम बन रहा था , पर किसी न किसी मजबूरी से वे लोग खीर नहीं बना पा रहे थे। बडा सा परिवार , आवश्‍यक आवश्‍यकताओं को पूरी करना जरूरी था , खीर बनाने के लिए आवश्‍यक दूध और चीनी दोनो महंगे हो गये
 
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बीटी बैगन की खेती के विरोध में यत्र तत्र विरोध .. क्‍या विचार हैं हमारे हिन्‍दी ब्‍लागरों के !!

हाल के दिनो में बीटी बैगन की खेती के विरोध में यत्र तत्र विरोध हो रहा है । ये बीटी बैगन क्‍या है , बता रहे हैं पवन कुमार अरविंद जी .....बीटी बैगन- बैगन की सामान्य प्रजाति में आनुवंशिक संशोधन के बाद तैयार की गई नई फसल। आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें ऐसी
 
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मैने अपने जीवन में जिस महिला को सर्वाधिक कष्‍टप्रद जीवन झेलते देखा है !!

ज्‍योतिष जैसे विषय से जुडे होने के कारण अपने को दुखी कहनेवाले और सुखी होने के लिए सलाह के लिए आनेवाले लोगों की मेरे पास कमी नहीं , पर मेरे विचार से ये सारे लोग दुखी नहीं होते। उनके पास जीवन के सारे सुख हैं ,  ये बडी बडी गाडियों में
 
संगीता पुरी
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सुखात्‍मक और दुखात्‍मक कहानियों का क्‍या रहस्‍य होता है ??

वास्‍तविक जीवन में हम कई प्रकार की घटनाओं को देखते हैं, हरेक लोगों के जीवन की नैया एक ही रूप में आगे नहीं बढती है , प्रत्‍येक व्‍यक्ति के जीवन में सुख और दुख की चरम सीमा को दिखाने के बाद कई मोड आते हैं , जो उनके जीवन को पुन: एक नयी दिशा में मोडने को
 
संगीता पुरी
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क्‍या 'मितव्‍ययिता' का सही अर्थ यही है ??

मुझे वह समय पूरी तरह याद है , जब मैने मित्‍तव्‍ययिता शब्‍द को पहली बार सुना था। उस वक्‍त जाने पहचाने शब्‍दों पर ही लेख लिखने की आदत के कारण इस अनजाने शब्‍द पर लेख लिख पाना बहुत कठिन लग रहा था। घर आकर लेख लिखने की कई पुस्‍तकों में इस शब्‍द को ढूंढा ,
 
संगीता पुरी
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सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए लिखी गयी रचनाओं में से कुछ आप भी पढें !!

हमारे समाज में ब्‍लागिंग के बारे में बहुत गलतफहमियां हैं , लोग ऐसा मानते हैं कि हमलोग व्‍यर्थ में अपना समय जाया करते हैं, पर मुझे ऐसा नहीं महसूस होता। आज हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग में किसी क्षेत्र के विशेषज्ञों की संख्‍या नाममात्र की है , फिर भी मुझे ब्‍लोगरों
 
संगीता पुरी
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2008 में गणतंत्र दिवस के मौके पर राजपथ पर हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत की झांकी निकली थी !!

दो वर्ष पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर राजपथ पर हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत की झांकी निकली थी , उसकी रिपोर्ट मैने बनायी थी ,जो आज आपके लिए पुन: प्रेषित कर रही हूं ..........इंडिया गेट न्यूज से अजय सेतियाजी की खबर है कि आज गणतंत्र दिवस के मौके पर
 
संगीता पुरी
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महंगाई के बारे में इतना शोर है .. कहां है महंगाई ??

विवाह के बाद अपने को वैज्ञानिक दृष्टिकोण का माननेवाले मेरे ससुराल वाले बात बात पर मेरे ज्‍योतिषिय ज्ञान की परीक्षा लेते और मेरे पोथी पत्रे तक फेक डालने की धमकी दिया करते थे। उस वक्‍त मैं उनपर हंस ही सकती थी , क्‍यूंकि जहां तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सवाल
 
संगीता पुरी