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19 Jan 2010
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Second Opinion

इस बार प्रस्तुत हैं अनिल पुष्कर कवीन्द्र की कवितायें ... पुष्कर जे.एन.यू.से रिसर्च कर रहे हैं .ज्यूँ ही लिखा! देह जब मैंने रचा - 'प्रेम-युग' तुम नहीं बदली जब रचा - 'शांति पर्व' तुम नहीं बदली जब तक जिया - 'क्रान्ति-काल' तुम नहीं बदली जब कहा - सर्वत्र फैला
 
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इस बार प्रस्तुत हैं अनिल पुष्कर कवीन्द्र की कवितायें ... पुष्कर जे.एन.यू.से रिसर्च कर रहे हैं . ज्यूँ ही लिखा! देह जब मैंने रचा - 'प्रेम-युग' तुम नहीं बदली जब रचा - 'शांति पर्व' तुम नहीं बदली जब तक जिया - 'क्रान्ति-काल' तुम नहीं बदली जब कहा - सर्वत्र
 
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मैं हूँ मानवी

मैं हूँ समर्पण है ,समझौते हैं ,और तुम हो बहुत करीब मैं हूँ हँसी है ,खुशी है और तुम हो नजदीक ही मैं हूँ दर्द है ,आंसू है ,तुम कहीं नहीं मैं हूँ मानवी ओ सभ्य पुरुष !!      --संध्या नवोदिता
 
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तुम्हारी तरह मैं प्यार करता हूँ

तुम्हारी तरह  मैं प्यार करता हूँ प्यार को, ज़िंदगी को, चीजों की मीठी खुशबुओं को, जनवरी माह के आसमानी नज़ारे को  प्यार करता हूँ मेरा लहू उबलता है मेरी आँखें हंसती हैं कि मैं आंसुओं की कलियाँ जानता हूँ मुझे भरोसा है कि दुनिया खूबसूरत है और कवित
 
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तुम्हारी तरह मैं प्यार करता हूँ

तुम्हारी तरह  मैं प्यार करता हूँ प्यार को ज़िन्दगी को चीज़ों की मीठी खुशबुओं को जनवरी माह के आसमानी नज़ारे को प्यार करता हूँ मेरा लहू उबलता है मेरी आँखें हंसती हैं कि मैं आंसुओं की कलियाँ जानता हूँ मुझे भरोसा है कि दुनिया खूबसूरत है और कविता रोटी
 
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काकोरी के शहीदों के लिए प्रेम के आंसू ........

मरते बिस्मिल रौशन लहरी अशफाक अत्याचार से                                                 होंगे
 
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फिर भी इन्द्रधनुष देखेंगे

आती रुत के मन पर घाव जाती रुत के ज़ख्म हरे हैं  कुछ खोया है कुछ पाया है नश्तर ये काफ़ी गहरे हैं  फिर भी इन्द्रधनुष देखेंगे फिर भी हम पकड़ेंगे चाँद आंसू वाली आँखों में उम्मीदों के भी रंग भरे हैं
 
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गलती वहीं हुई थी

तुम्हारे अंधेरे मेरी ताक में हैं और मेरे हिस्से के उजाले तुम्हारी गिरफ्त में हाँ , ग़लती वहीं हुई थी जब मैंने कहा था तुम मुझको चाँद लाके दो और मेरे चाँद पर मालिकाना तुम्हारा हो गया .
 
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एक दिन बेटियाँ

माँ काश सब बेटियों की माएँ हों बिल्कुल तुम सी बेटी की बला ले लें अपने ऊपर उसके खौफ़, उसकी पाबन्दियाँ, उसके पहरे सब बदल जाएँ घने प्रेम और विश्वास में कहें बेटियों से कंधे सीधे रखो और सिर ऊँचा नाज़ुक नहीं मज़बूत बनो बेटियाँ पतंग नहीं होतीं न बेटियाँ वर्तम
 
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इन दिनों

एक जंगल सा उग आया है मेरे भीतर इन दिनों वहाँ रास्ते नहीं पगडंडियाँ नहीं कोई जाने पहचाने निशान नहीं कोई जल्दी नहीं बेखबर है यह दुनिया समय की हलचलों से चाँद उग आया है यहाँ उल्टा होकर !
 
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रिश्ता

मेरे पास चिड़िया है चिड़िया के पास हैं पंख पंखों के पास है परवाज़ और परवाज़ के पास है पूरा आसमान पंख, चिड़िया, परवाज़, आसमान और मैं यह रिश्ता बहुत पुराना है.
 
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