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14 Jun 2010
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डॉ. घासीराम वर्मा साहित्‍य पुरस्‍कार-2010 हेतु नाम भेजें

राजस्‍थान के हिंदी लेखन को समर्पित 'डॉ. घासीराम वर्मा साहित्‍य पुरस्‍कार-2010' हेतु 2005-2009 में छपी किसी एक कृति की 30 जून, 2010 तक अनुशंसा/संस्‍तुति करें-prayas.sansthan@rediffmail.com पर।वर्ष-2008 का पुरस्‍कार डॉ. सत्‍यनारायण (सितम्‍बर में रात) व
 
दुलाराम सहारण
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ऐसा प्रकाशक पाठकों के लिए देवदूत होता है : इतनी सस्‍ती किताबें, वाह

राजस्‍थान से हमेशा विभिन्‍न क्षेत्रों में नई पहल होती रही है। राजधानी जयपुर इन दिनों फिर एक नई पहल के कारण चर्चा में है। इस बार चर्चा साहित्‍यकारों और पाठकों की ओर से शुरू हई है। और हो भी क्‍यों न, जब इसका वाजिब कारण मौजूद है।कारण पैदा किया है घग्‍घर की
 
दुलाराम सहारण
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राजस्‍थान के चिट्ठाकार एक मंच पर आएं

राजस्‍थान से नित्‍य-प्रति अनेक चिट्ठे (ब्‍लॉग) लिखे जा रहे हैं। हम जैसे अनेक हैं जो उनको पढ़ना चाहते हैं। खासकर चुनिंदा ताजा प्रविष्ठियों को।परंतु दिक्‍कत ये आती है कि एक जगह सभी की सूचना उपलब्‍ध नहीं है। कुछ प्रयास भी इस दिशा में हुए हैं और कुछ चल भी
 
दुलाराम सहारण
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मीडिया का दायरा बढा नहीं घटा है

राजस्‍थानी के प्रसिद्ध कवि बुद्धिप्रकाश पारीक नहीं रहे। राजस्‍थानी में ढूंढ़ाड़ी बोली के प्रबल हस्‍ताक्षर थे पारीकजी। उनका जाना एक बड़ी क्षति है। मन विचलित है, सबसे बड़ा विचलन उनके चुपचाप चले जाने के कारण है।मेरा यहां अर्थ अखबारों की स्‍थानीयता से है। यह
 
दुलाराम सहारण
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जाना भैंरोसिंह शेखावत का

भारत के उपराष्‍ट्रपति रहे श्री भैंरोसिंह शेखावत का निधन हो गया। वे 87 वर्ष के थे। राजस्‍थान के खाचरिया बास (सीकर) में 23 अक्‍टूबर, 1923 को जन्‍में श्री शेखावत राजस्‍थान के तीन बार मुख्‍यमंत्री रहे। वे लम्‍बे तक नेता प्रतिपक्ष राजस्‍थान विधानसभा भी रहे।
 
दुलाराम सहारण
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क्‍या यह बहस का विषय नहीं ?

गांव रोहिणी, जिला वर्धा, (विदर्भ) महाराष्‍ट्र के समाज सुधार एवं स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े वासु परिवार में 4 मार्च 1935 को जन्‍मी प्रभा हमारे बीच नहीं रहीं। प्रभा राव राजस्‍थान में राज्‍यपाल के रूप में काम कर रही थीं। 26 अप्रेल, 2010 को उन्‍होंने अंतिम
 
दुलाराम सहारण
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लोक-इतिहास के बेजोड़ विद्वान : गोविंद अग्रवाल

लोक संस्‍कृति शोध संस्‍थान नगरश्री चूरू के विषय में मेरी पोस्‍ट के माध्‍यम से थोड़ा-सा जिक्र किया था। इस संस्‍थान के प्राण इतिहासकार श्री गोविंद अग्रवाल के विषय में भी लिखने को मेरा मन चाहा। लोक इतिहास की परम्‍परा में 'चूरू मण्‍डल का शोध पूर्ण इतिहास'
 
दुलाराम सहारण
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एक मुख्‍यमंत्री के साथ पांच घण्‍टे

तुम्‍हें एक जन्‍तर देता हूं। जब भी तुम्‍हें संदेह हो या तुम्‍हारा अहम् तुम पर हावी होने लगे, तो यह कसौटी आजमाओ :'' जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्‍ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए
 
दुलाराम सहारण
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शिक्षा मंत्री जी जवाब दीजिए

1अनिवार्य शिक्षा कानून के पारित होते ही राजस्‍थान में इन दिनों एक अहम् सवाल सबके सामने खड़ा हो गया है। वह यह है कि राज्‍य में मातृभाषा किसे माना जाए ? चूंकि यह सवाल एक मायने में खड़ा हुआ नहीं है, खड़ा किया गया है। कहने का तात्‍पर्य है कि राजस्‍थान के
 
दुलाराम सहारण
Apr 15 2010 10:58 PM
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लोक संस्‍कृति एवं इतिहास की कहानी बयान करता एक आगार

चूरू के इतिहास का जिक्र आते ही हमें बरबस श्री सुबोध कुमार अग्रवाल एवं श्री गोविंद अग्रवाल का स्‍मरण हो आता है। वह इसलिए की 'चूरू मण्‍डल का शोध पूर्ण इतिहास' ग्रंथ के मूल स्रोत ये अग्रवाल बंधु ही हैं। इस ग्रंथ की तथ्‍यात्‍मक सामग्री के पठन-पाठन के बाद ही
 
दुलाराम सहारण
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साहित्‍यकार रामेश्‍वरदयाल श्रीमाली से पहली और आखरी मुलाकात

राजस्‍थानी साहित्‍य की अकूत क्षमता को हम बड़े गर्व से बखान करते हैं। प्राचीन एवं मध्‍यकाल की स्‍वर्णिम आभा के बीच हम वर्तमान युग का जब गौरव गान कर रहे होते हैं तो राजस्‍थानी कहानी की समृद्ध परंपरा के बीच श्री रामेश्‍वरदयाल श्रीमाल़ी का नाम अपने-आप ही आ
 
दुलाराम सहारण
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मिनखां री माया

आप बूझ्यो,जे मिनखइण भौम माथै नीं हुवैतोकांई फरक पड़ै ?ठा नीं थानै सुण्‍यो कै नीं सुण्‍योम्‍हैं साफ कैयो है कैफरक क्‍यूं नी पड़ै , पड़ै सामिनख नीं होंवतो तोकठै सूं होंवता नित नुंवा प्रयोगआभै नै नापण री सगतिचांद माथै घर बसावण री ताकतपांणी नै भेदण री
 
दुलाराम सहारण
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यह क्‍या हो रहा है ?

राजस्‍थान विधानसभा का बजट सत्र हंगामें के भेंट चढ़ रहा है। नुमाइंदें बेबुनियादी बहस में उलझ रहे हैं। आरोप-प्रत्‍यारोप का दौर चल पड़ा है। मूल मुद्दे इन सबके बीच कहीं गुम हो गए हैं और बजट की अनुदान मांगें बिना बहस के एक-एक करके पारित होती जा रही हैं। वहीं
 
दुलाराम सहारण
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मन के सुकुन के लिए काम करता चित्रकार

इस पुस्‍तक के आवरण चित्र की तरह लगभग एक हजार पुस्‍तकों के आवरण राजस्‍थान के इस सपूत ने तैयार किए है। कूची की करामात लिए ज्‍यादा और तकनीक के सहयोग से कम। यही नहीं अब तक अनेक चित्र प्रदर्शनियों के माध्‍यम से सराहना पा चुकी यह प्रतिभा निरंतर उसी गति से
 
दुलाराम सहारण
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साहित्‍य प्रेमियों को निराशा हुई है

राजस्‍थान के वित मंत्री श्री अशोक गहलोत ने राज्‍य का सालाना बजट (2010-11) आज राज्‍य विधानसभा में प्रस्‍तुत किया। चूंकि श्री अशोक गहलोत राज्‍य के मुख्‍यमंत्री भी हैं अतएव यह बजट काफी मायने रखता है।बजट में नई सौर ऊर्जा नीति लागू करने की कवायद, जल नीति को
 
दुलाराम सहारण
टैग: बजट
Mar 09 2010 04:57 PM
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पाती-दर-पाती

मेरे द्वारा लिखी पिछली पोस्‍ट 'एक पाती यह भी' पर एंटीवायरस के संपादक-साहित्‍यकार श्री नीरज दइया ने अपने विचारों भरी पाती 'विरोध के लिए विरोध नहीं' लिखी।इसमें उठे सवालों का जवाब मेरे द्वारा दिया गया वहीं उन्‍हीं का प्रत्‍युत्‍तर भाई नीरज ने अपनी पोस्‍ट
 
दुलाराम सहारण
Mar 07 2010 08:21 PM
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एक दैनिक का मातृभाषा के नाम समर्पण

राजस्‍थान के जयपुर शहर से निकलने वाला दैनिक अख़बार 'डेली न्‍यूज़' रविवार को 'हम लोग' नाम से परिशिष्‍ट निकालता है।गत रविवार अर्थात् 21 फरवरी को अख़बार ने मातृभाषा दिवस को परिशिष्‍ट समर्पित किया। अख़बार का यह प्रयास सराहनीय है। खासकर धन्‍यवाद के पात्र है
 
दुलाराम सहारण
Mar 03 2010 06:48 AM
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एक पाती यह भी

मैंने नहीं सोचा था कि ऐसे किसी विषय पर मुझसे लिखना हो जायेगा।किसी काम को गलत होते देखते हैं तो दो ढंग की प्रतिक्रियाएं होती हैं। पहली, उसकी निंदा करना और दूसरी, उन गलतियों या कमियों से कुछ सीखते हुए स्‍वयं बेहतर करना। मैं देखने का दूसरा ढंग काम में लेने
 
दुलाराम सहारण
Feb 27 2010 07:19 AM
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बाल साहित्‍य की सुध ली साहित्‍य अकादेमी ने

किसी भी भाषा का विस्‍तार तीव्र गति से तभी हो सकता है जब वह भाषा प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी हो। स्‍कूल में बच्‍चा पहुंचते ही घर में अपनी मां से सीखी भाषा को न छोड़े और उसी में पढ़ते हुए आगे बढ़े तो ठाठ ही निराले होते हैं। लेकिन यह खुशकिस्‍मती कुछ भाषाओं तक
 
दुलाराम सहारण
Feb 26 2010 04:25 PM
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संपर्क

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दुलाराम सहारण
Feb 25 2010 08:18 PM
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साहित्यिक मेला

अंतरराष्‍ट्रीय मातृ भाषा दिवस 21 फरवरी (2010) के दिन राजस्‍थान के फतेहपुर-शेखावाटी में राजस्‍थानी भाषा के साहित्‍यकारों का एक मेला भरा। अवसर था- धानुका सेवा ट्रस्‍ट, फतेहपुर-शेखावाटी द्वारा पुरस्‍कार वितरण समारोह।ट्रस्‍ट के मुख्‍य ट्रस्‍टी और व्‍यवसायी,
 
दुलाराम सहारण
Feb 22 2010 08:18 PM
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एक अध्‍याय का अंत होना

(फोटो : विधायक श्री जयदेवप्रसाद इंदौरिया, दुलाराम सहारण(मैं), विधायक श्री चंदनमल बैद, 1997)अभी-अभी समाचार मिला कि राजस्‍थान के वरिष्‍ठ कांग्रेसी नेता श्री चंदनमलजी बैद नहीं रहे।यह ख़बर हालांकि सर्व स्‍वरूपा दु:खद नहीं है क्‍योंकि श्री बैद 88 वर्षीय थे और
 
दुलाराम सहारण
Feb 20 2010 08:50 PM
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कभी आपका ऐसी जगह से वास्‍ता पड़ा है ?

इन दृश्‍यों को आप ध्‍यान से देखिए। मुझे आज सुबह-सुबह इन सबसे रू-ब-रू होने का अवसर मिला।आप सोच रहे हैं कि इन में ऐसी क्‍या खास बात है ? आम गृहस्‍थ के यहां ऐसे दृश्‍य मौजूद रहते हैं, यही ना।जी हां, यह सही है कि इस आर्थिक युग की आपाधापी के बीच आम गृहस्‍थ
 
दुलाराम सहारण
Feb 20 2010 05:39 PM
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माय नेम इज़ ख़ान

त्‍वरित टिप्‍पणीकिसी मित्र का संदेश मिला कि फिल्‍म 'माय नेम इज़ ख़ान' बेहतर फिल्‍म है, आप देखना न भूलें। अकसर मैं फिल्‍मों से दूर रहने वाला इंसान हूं, फिल्‍मी की नाटकीयता मुझे कम ही पचती है। यथार्थ फिल्‍मों का युग नहीं रहा और कलात्‍मक फिल्‍मों की संख्‍या
 
दुलाराम सहारण
Feb 16 2010 06:28 PM
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कवि विजेन्‍द्र का आभार

कल ही 'बदळती सरगम' (राजस्‍थानी कहानी संग्रह-नंद भारद्वाज) पूरी की। नया ज्ञानोदय और कथादेश के अंकों की पठनीय सामग्री को पढ़ने के क्रम से भी मुक्‍त हुआ।'बदळती सरगम' निश्चित रूप से नंद भारद्वाज की बेहतरीन कहानियों का संग्रह है। बात को संक्षिप्‍त में न समेटा
 
दुलाराम सहारण
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साहित्‍य नगरी बीकानेर : अन्‍नाराम सुदामा की छाया

कब क्‍या संयोग बन पड़े, व्‍यक्ति नहीं जान पाता। पिछली पोस्‍ट में कुछ पढ़ने का संकल्‍प किया था, यकायक निजी काम आ बना और बीकानेर जाना पड़ा। जी हां, वही बीकानेर जिसे राजस्‍थान में 'साहित्‍य नगरी' के रूप में जाना जाता है।अब साहित्‍य नगरी में गये तो कुछ
 
दुलाराम सहारण
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इन दिनों की खुराक तैयार

अभी आज ही डाक से मेरे पास दो पत्रिकाएं पहुंची हैं। पहली है भारतीय ज्ञानपीठ से श्री रवीन्‍द्र कालिया के संपादन में निकले वाली मासिक 'नया ज्ञानोदय' और दूसरी है सहयात्रा प्रकाशन प्रा.लि. की श्री हरिनारायण के संपादकत्‍व वाली मासिक 'कथादेश'। दोनों ही
 
दुलाराम सहारण
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हंस के बहाने निराशा बकलम प्रभा खेतान

मासिक 'हंस' हिन्‍दी की बेहतरीन पत्रिकाओं में से एक है। जाने-माने कथाकार राजेन्‍द्र यादव का एक अद्भुत प्रयोग। समकालीन विमर्शों और विवादों का 'हंस' सदैव केंद्र बिंदु रही है। हंस के बहाने श्री यादव अपने विचारों को हवा देते रहे हैं और हंस को भी इससे लाभ
 
दुलाराम सहारण
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चामत्‍कारिक साधना : गोविन्‍द अग्रवाल का कमाल

राजस्‍थान को इतिहासकारों की आधारभूमि कहा जाए तो कोई अतिशयो‍क्ति नहीं होगी। यहां के वीर योद्धाओं ने नित नवीन इतिहास पेश किया। उन्‍होंने इतिहास को अपनी मर्जी से रचा। यही वजह रही कि मराठों के बाद गर्वीले इतिहास की झांकी राजस्‍थान में ही मिलती है। राजस्‍थान
 
दुलाराम सहारण
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एक दलित की आत्‍मकथा : सच को उघाड़ने की प्रमुखता

पुस्‍तक : अपने अपने पिंजरे, दो भागलेखक : मोहनदास नैमिशरायविधा : आत्‍मकथाप्रकाशक : वाणी प्रकाशन21-ए, दरियागंज, नयी दिल्‍ली-110002प्रथम संस्‍करण : 1995तृतीय संस्‍करण : 2006मूल्‍य : 60 रूपये प्रति भाग, पेपरबैंकफोन 011-23273167, 23275710e-mail :
 
दुलाराम सहारण
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सरिता के स्‍वरों के बीच डूबकी

'वीणा' कैसेट का राजस्‍थानी लोक संगीत के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय काम है। गत वर्षों में श्री के.सी.मालू के निर्देशन में वीणा ने अनेक कैसेट बाज़ार में उतारे और अप्रत्‍याशित सफलता अर्जित की। पाश्‍चात्‍य प्रभाव के कारण परंपरागत लोक गीत और लोक संगीत के प्रति
 
दुलाराम सहारण
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कविता के माध्‍यम से कवि का संबोधन

राजस्‍थान की हिन्‍दी पत्रकारिता काफी सुदृढ़ रही है। आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद में काल विभाजन कर इसका मूल्‍यांकन समय-समय पर होता रहा है। आजादी के बाद के काल का मूल्‍यांकन किया जाए तो राजस्‍थान की पत्रिकाओं 'संबोधन' का बड़ा स्‍थान है। 'संबोधन' को
 
दुलाराम सहारण
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युग दर्शन : कलि कथा के बहाने

पुस्‍तक : कलि कथा - वाया बाइपासलेखिका : अलका सरावगीप्रकाशक : आधार प्रकाशन प्रा.लि.एस.सी.एफ. 267, सेक्‍टर-16,पंचकूला-134113 हरियाणाaadhar@sancharnet.inप्रकाशन वर्ष : 1998पृष्‍ठ : 216मूल्‍य : 150 रूपयेISBN : 81-7675-069-7
 
दुलाराम सहारण
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दलित का बयान

हिन्‍दी साहित्‍य में वाद और विमर्शों का दौर सदैव से ही रहा है। प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, छायावाद और भी न जाने क्‍या-क्‍या। यही हाल उत्‍तर आधुनिक युग के साहित्‍य का है। यहां नारी विमर्श और दलित विमर्श की धूम है। जल विमर्श तीसरा मोटा विमर्श है। भूमण्‍डलीकरण और
 
दुलाराम सहारण
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राजस्‍थानी संस्‍कृति और राजस्‍थान से परिचय : रतन जी जैन का कमाल

राजस्‍थान या इससे छूते अंचल से कोई व्‍यक्ति बाहर जाता है तो उसे पहचान मिलती है- मारवाड़ी। उसे मिलने वाला यह संबोधन बरसों पुरानी पहचान को दर्शाता है। एक लम्‍बे संघर्ष को याद करने के प्रति विवश करता है। वह संघर्ष जो राजस्‍थान की अकाल ग्रस्‍ता भूमि में
 
दुलाराम सहारण
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जुगलजी का जागरण : सेठियाजी का स्‍मरण

राजस्‍थानी भाषा में नियमित निकलने वाली मासिक पत्रिका कोई है तो वह है- माणक।माणक का यह 29वां वर्ष है। पत्रिका के संपादक-स्‍वामी श्री पदम मेहता हैं, जबकि सहायक संपादक हैं श्री जुगल परिहार। श्री जुगल परिहार राजस्‍थानी के स्‍थापित रचनाकार हैं और वर्षों से
 
दुलाराम सहारण