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मिर्ज़ा ग़ालिब

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16 Jun 2010
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वह आये घर में हमारे, ख़ुदा की क़ुदरत है !

है ग़ैब ग़ैब जिसको समझते हैं हम शुहूद,हैं ख़्वाब में हनोज़, जो जागे हैं ख़्वाब में ।शुहूद वह अवस्था होती है जब साधक को सभी वस्तुओं में ईश्वर ही ईश्वर दिखाई पड़ता है । ग़ैब ग़ैब का मतलब गैबुलग़ैब या परोक्ष का परोक्ष है । कहते हैं, जिसे हम सर्वत्र उपस्थित
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब कहते हैं जन्नत का लोभ हेय है !

उन्होंने खूब कहा है कि उपासना के पीछे शराब और शहद का लालच ना रह जाए इसलिए कोई स्वर्ग को उठाकर नरक में डाल दो । (इस्लाम में माना गया है कि परहेज़गारी और इबादत की ज़िन्दगी बिताने वालों को स्वर्ग मिलता है । जिसमें हूरें ख़िदमत को मिलती हैं और शराब व शहद
 
अनिल कान्त :
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मिर्ज़ा ग़ालिब के चन्द शेर

है तेवरी चढ़ी हुई, अन्दर निकाब के,है इक शिकन पड़ी हुई, तर्फ़े निकाब में ।अर्थात् "जब उनके सामने ऐसा ज़िक्र आ जाता है कि कोई भेद खुल रहा हो, या कोई अनचाही बात निकल पड़ी हो तो बोलती नहीं हैं पर घूँघट भी उनके तेवरी चढाने और कटाक्ष को छुपा नहीं पाता । कहते हैं,
 
अनिल कान्त :
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चन्द शेर : मिर्ज़ा ग़ालिब

तमाशा कि ऐ महवे-आईन:दारीतुझे किस तमन्ना से हम देखते हैं ।अर्थात् " ओ दर्पण में अपने को देखने में तल्लीन ! ज़रा इधर भी तो देख कि हम किस तमन्ना के साथ तुझे देख रहे हैं !"आज हम अपनी परीशानिए ख़ातिर उनसेकहने जाते तो हैं, पर देखिये क्या कहते हैं ।अर्थात् "आज
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब तृप्ति के नहीं, तृष्णा के कवि

जब ग़ालिब युवा थे तब उनके उस्ताद ने उनसे कहा था, "शकर का मज़ा चख लेना मगर मक्खी बनकर शहद पर कभी न बैठना, नहीं तो उड़ने की शक्ति बाकी नहीं रहेगी ।" यह बात ग़ालिब के ह्रदय में पैठ कर गयी । यही उनके जीवन की रीड की हड्डी है । उन्होंने एक ही जगह बैठकर पीना, एक
 
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ग़ालिब तृप्ति के नहीं, तृष्णा के कवि

जब ग़ालिब युवा थे तब उनके उस्ताद ने उनसे कहा था, "शकर का मज़ा चख लेना मगर मक्खी बनकर शहद पर कभी न बैठना, नहीं तो उड़ने की शक्ति बाकी नहीं रहेगी ।" यह बात ग़ालिब के ह्रदय में पैठ कर गयी । यही उनके जीवन की रीड की हड्डी है । उन्होंने एक ही जगह बैठकर पीना, एक
 
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इंतज़ार, शोखी, प्रेम और गुस्सा (मिर्ज़ा ग़ालिब)

ता फिर न इंतज़ार में, नींद आये उम्र भर,आने का अहद् कर गये, आये जो ख़्वाब में ।अर्थात् "प्रियतम की छेड़ और शोखी देखिए । प्रेमी प्रतीक्षा करते-करते सो गया है । यह सोना भी उनको गवारा नहीं । वह स्वप्न में आये भी तो फिर आने का वादा करके चले गये कि फिर उनकी
 
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शेर : मिर्ज़ा ग़ालिब

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क, जीने और मरने का,उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफ़िर पर दम निकले ।अर्थात "प्रेम में जीवन और मरण में कोई अंतर नहीं है क्योंकि जिस काफ़िर पर मरते हैं, जिस पर दम निकलता है, उसी को देखकर जीते हैं ।"वह शोख़ अपने हुस्न प मगरूर है
 
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ग़ालिब की शोख़ी

पकड़े जाते हैं फ़रिश्तों के लिखे पर नाहक़,आदमी कोई हमारा दमे-तहरीर भी था ।अर्थात "फ़रिश्तों के लिखने पर हम नाहक पकड़े जाते हैं । उनके रिपोर्ट लिखते वक़्त कोई हमारा भी आदमी उपस्थित था ? बेहवाही की तहरीर पर पकड़ना भी कोई न्याय है । "ग़ालिब गर इस सफ़र में
 
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कुछ शेर (मिर्ज़ा ग़ालिब)

रुख़े-निगार से, है सोज़े-ज़ाविदानिए-शमअ,हुई है आतशे-गुल आबे-ज़िन्दगानिऐ-शमअ ।"अर्थात् प्रियतमा के मुख (के सौंदर्य ) से ही शमअ को यह जलन की अमरता प्राप्त हुई है(उनके मुख को देखकर शमअ ईर्ष्या से जल रही है ) । उस फूल की आग शमअ के लिये अमृत बनी हुई है ।"*
 
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ग़ालिब : रोज़ा कैसे रखें ?

एक बार की बात है कि जब रमज़ान गुज़र गया और मिर्ज़ा ग़ालिब किले में गये तो बादशाह ने पूँछा "मिर्ज़ा ! तुमने कितने रोज़े रखे ?" मिर्ज़ा ग़ालिब ने अर्ज़ किया, "पीरो मुर्शिद ! एक नहीं रखा !" फिर एक कि़ता पढ़ा :इफ़्तारे-सूम की कुछ अगर दस्तगाह हो ।इस शख़्स को ज़रूर है
 
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Feb 24 2010 09:07 AM
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ग़ालिब का निवास

ग़ालिब का यूँ तो असल वतन आगरा था लेकिन किशोरावस्था में ही वे दिल्ली आ गये थे । कुछ दिन वे ससुराल में रहे फिर अलग रहने लगे । चाहे ससुराल में या अलग, उनकी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा दिल्ली की 'गली क़ासिमजान' में बीता । सच पूंछें तो इस गली के चप्पे-चप्पे से
 
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ग़ालिब का प्रोफ़ेसरी से इनकार

1842 ई. में सरकार ने दिल्ली कॉलेज का नूतन संगठन और प्रबंध किया । उस समय मि. टामसन भारत सरकार के सेक्रेटरी थे । यही बाद में पश्चिमोत्तर प्रदेश के लेफ्टिनेंट गवर्नर हो गये थे और ग़ालिब के हितैषी थे । वह कॉलेज के प्रोफ़ेसरों के चुनाव के लिये दिल्ली आये । वहाँ
 
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आपसे बढ़कर भी बला है ! (ग़ालिब)

एक बार की बात है कि जिस मकान में ग़ालिब रहते थे , उसमें कई सारी समस्याएं थीं इसीलिए तकलीफ़ थी । वे इसीलिए मकान बदलना चाहते थे । एक दिन वे खुद एक मकान देखकर आये । उसका बैठकखाना तो पसंद आ गया पर जल्दी में अन्तःपुरवाला हिस्सा न देख सके । फिर उन्होंने यह भी
 
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ग़ालिब और उनकी बीवी उमराव का सम्बन्ध

1799 में दिल्ली के एक प्रतिष्ठित घराने में उमराव का जन्म हुआ था जो बाद में ग़ालिब की धर्मपत्नी बनीं । उमराव के पिता नवाब इलाहीबख्श का जीवन वैभव एवं सुख शान्ति से परिपूर्ण था । वह 'शहज़ादए-गुलफ़ाम' के नाम से प्रसिद्द थे । इससे कल्पना की जा सकती है कि उमराव
 
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मिर्ज़ा ग़ालिब जी के कुछ शेर

मशहदे-आशिक़ से कोसों तक जो उगती है हिना, किस क़दर यारब ! हलाके-हसरते-पाबोस था । * मशहदे-आशिक़ = प्रेमी की बलिवेदी, हलाके-हसरते-पाबोस = पाँव चूमने की कामना का मारा हुआ अर्थात "जिस जगह प्रेमी का रक्त बहा वहाँ कोसों तक मेहँदी उगती है । क्यों ? इसलिए कि ज
 
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ग़ालिब को दूसरी औरत का आकर्षण

जब इंसान को घर में प्रेम प्राप्त न हो, दिल की छाया प्राप्त न हो, जब खुद की पत्नी जीवन के आशीर्वाद की जगह जीवन का बोझ बन जाए, उसके मुख से प्रेम और मृदुलता के आश्वासन के स्थान पर कटु वाणी के वाँ झरने लगें तब पुरुष घर से बाहर भागता है । ग़ालिब पर तो बचपन
 
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ग़ालिब और मीर के मानसिक निर्माण में अंतर

ग़ालिब ने इश्क़ किया, गृहस्थी बनायी, दोस्ती की, मन की गहराइयों में पैठा लेकिन ऐसा कभी न हुआ कि एक बिंदु पर पहुँच कर रुक गया हो, एक तत्त्व या तथ्य में केन्द्रित होकर रह गया हो । अंतर एवं बाह्य दोनों उसके जीवनानन्द के साधन हैं । 'मीर' में यही न था । वह
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब पर मीर का प्रभाव

ग़ालिब मीर से काफी प्रभावित थे । अनेक स्थाओं पर भाव क्या शब्द तक टकरा गये हैं । खुद ही देख लीजिए : मीर: होता है याँ जहाँ मैं हर रोज़ोशब तमाशा, देखो जो ख़ूब तो है दुनिया अजब तमाशा । ग़ालिब : बाज़ीचए इत्फाल है दुनिया मेरे आगे, होता है शबोरोज़ तमाशा मेरे
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब ने कहा "मुसलमान हूँ पर आधा"

उन दिनों जब अंग्रेजों का दिल्ली पर दोबारा अधिकार हो गया था । उससे कुछ दिन पहले पटियाला के सिपाही आस पास के मकानों की रक्षा में तैनात थे और एक दीवार बना दी गयी थी पर 5 अक्टूबर को कुछ गोरे, सिपाहियों के मना करने के बावजूद दीवार फाँदकर मिर्ज़ा के मोहल्ले
 
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शेर हैं कुछ ग़ालिब के

कोई वीरानी-सी वीरानी है, दश्त को देख के घर याद आया । इसमें दो प्रकार के अर्थ छुपे हैं । यह वीरानी अप्रतिम है । जंगल को देखकर, उसकी वीरानी को देखकर घर की याद आ गयी । दूसरा अर्थ यह है कि जंगल को देखा तो वीरान घर याद आ गया । बिजली सी कौंद गयी आँखों के आ
 
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ग़ालिब : ईरान का गुल है, भारत का कमल नहीं

उर्दू पली हिन्दुस्तान की धरती पर किन्तु उसमें दिल की क़लम लगी ईरान की । ज़्यादातर कवि वहाँ से आये थे या उनकी सन्तति थे । जो वहाँ से आये या जिन पर वहाँ के सपने और नशे हिन्दुस्तान में भी छाये हुए थे । कुछ लोगों ने पुराने वक्तों में और एक अच्छी तादाद ने
 
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ग़ालिब और उनकी हाज़िरजवाबी

ग़ालिब को आम निहायत पसंद थे । एक रोज़ की बात है कि बादशाह बहादुरशाह, आमों के मौसम में, महताब बाग़ में टहल रहे थे । उस वक्त अन्य मुसाहिबों के आलावा मिर्ज़ा भी मौजूद थे । आम के पेड़ रंग-बिरंग ले ख़ूबसूरत आमों से लद रहे थे । यहाँ के आम बादशाह, राजकुमारों
 
अनिल कान्त :
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मिर्ज़ा ग़ालिब जी के कुछ शेर

सताइशगर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़े-रिज्वाँ का, वह इक गुल्दस्त: है हम बेखु़दों के ताक़े-निसियाँ का । ग़ालिब ने बार बार स्वर्ग एवं स्वर्ग में प्राप्त चीजों की हँसी उड़ाई है । यहाँ भी वे कहते हैं कि ज़ाहिद (परहेज़गार, संयमी) जिस स्वर्गोद्यान की इतनी प्रशं
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब की शिष्टता एवं मित्रपरायाणता

ग़ालिब के बारे में पहली बात तो यह है कि वे अत्यन्त शिष्ट एवं मित्र परायण थे । ग़ालिब सदैव खुले दिल से मिलते थे । जो कोई उनसे एक बार मिल लेता था, वो उनसे बार बार मिलना चाहता था । वे मित्रों के प्रति अत्यन्त वफादार थे, उनकी खुशी में खुश उनके दुःख में दुख
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब के जीवन-काल में मुग़ल साम्राज्य की कहानी ख़त्म हो गयी

ग़ालिब के जीवन-काल (1797-1869 ई.) में मुग़ल-साम्राज्य का अंत हो गया । उनके समय में अन्तिम तीन मुग़ल सम्राट हुए : 1. शाह आलम द्वितीय (1759-1806), 2. अकबर द्वितीय (1806-1837) तथा 3. बहादुरशाह (ज़फर) द्वितीय (1837-1857) । मतलब यह कि ग़ालिब का बचपन शाह आलम द्
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब : रदीफ़ नून

वह फुराक़ और वह विशाल कहाँ, वह शबोरोज़ो-माहोसाल कहाँ ? दिल तो दिल, बस दिमाग भी न रहा, शौरे-सौदाए-ख़त्तो-ख़ाल कहाँ ? थी वह इक शख़्स के तसव्वुर से अब वह रा'नाइए ख़याल कहाँ ? * शौरे-सौदाए-ख़त्तो-ख़ाल कहाँ ? = वह रूप के प्रति उन्माद की धूप अब कहाँ है ? रा'ना
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब की कलम से शेर

है कहाँ तमन्ना का दूसरा क़दम यारब ! हमने दश्ते-इम्काँ को एक नक़्शेपा पाया । कहते हैं - हे ईश्वर ! संभावनों का जंगल तो उसका (कामना) एक चरण चिन्ह है, तब तमन्ना (कामना) का दूसरा चरण कहाँ है ? एक ही चरण में संभावनों की समस्त भूमि, वामन भगवान की भाँति उसन
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब के शेर

कहते हो 'न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया' दिल कहाँ कि गुम कीजे, हमने मुद्दआ पाया । "तुम कह रहे हो कि अगर तुम्हारा दिल हमें कहीं पड़ा मिल गया तो हम न देंगे । पर वह है कहाँ ? हमारे पास तो है नहीं कि खोने का डर हो । हाँ तुम्हारी बात से मैं तुम्हारा मतलब समझ
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब : मृत्यु की आकांक्षा

मानसिक उलझनों, शारीरिक कष्टों और आर्थिक चिंताओं के कारण जीवन के अन्तिम वर्षों में ग़ालिब प्रायः मृत्यु की आकांक्षा किया करते थे । हर साल अपनी मृत्यु तिथि निकालते । पर विनोद वृत्ति अंत तक बनी रही । एक बार जब मृत्यु तिथि का ज़िक्र एक शिष्य से किया तो उसन
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब की जटिलता

मीर और ग़ालिब की तुलना की जाए तो हम देखते हैं किमीर सरल, दिल से सीधे ज़बान पर आने वाली भाषा का प्रयोग करते हैं; ग़ालिब बातों को घुमा-फिराकर उसमें जद्दत पैदा करने की कोशिश करते हैं । दिमाग खुरचना पड़ता है तब उनका मतलब समझ में आता है । ग़ालिब के पूर्वार्द्ध
 
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ग़ालिब की ज़बान

ग़ालिब की ज़बान के बारे में लोगों के परस्पर विरोधी मत हैं । कुछ ने उसकी अत्यधिक प्रशंसा की है; कुछ इस क्षेत्र में मीर और सौदा को उनसे बहुत ऊपर मानते हैं । सत्य इन दोनों के मध्य है । इसमें कोई संदेश नहीं कि मीर की भाषा की घुलावट और सादगी तथा सौदा का शब्
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब : आत्माभिमान

ग़ालिब बहुत उदार ह्रदय के थे किंतु आत्माभिमानी भी थे - 'मीर' जैसे तो नहीं, जिन्होंने दुनिया की हर नामत अपने सम्मान के लिए ठुकरायी फिर भी अपनी इज्ज़त-आबरू का बड़ा ख़याल रखते थे । शहर के अनेक सभ्रांत लोगों से परिचय था पर जो इनके यहाँ न आता, उसके यहाँ न ज
 
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ग़ालिब : दरिया और क़तरा

क़तरा और दरिया की उपमा एवं रूपक द्वारा जीव एवं ब्रह्म के ऐक्य की बात फ़ारसी एवं उर्दू में न जाने कब से कहते आ रहे हैं. दरिया में मिलते ही क़तरा खो जाता है, उसका निजत्व विलीन हो जाता है. क़तरा स्वंय दरिया हो जाता है. पर यह भी तो है कि दरिया भी कतरे मे
 
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उर्दू का जन्म

अंतिम मुग़लों के ज़माने में सांस्कृतिक तल पर कुछ बातें हुईं. इनमें पहली बात है उर्दू का अभ्युदय. तुर्कों, ईरानियों एवं भारतीयों के संसर्ग से एक नयी ज़बान का जन्म हुआ. हिंद की ज़बान होने के कारण यह हिंदवी कहलायी. वली ने इसे बचपन में संभाला; हातिम, अबर
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब : जिज्ञासा

जिज्ञासा ज्ञान रथ का पहिया है. ग़ालिब ने जब खुली आँखों से दुनिया को देखा, तो दुनिया के विविध परिवर्तनों के बीच उसके पीछे छिपी सत्ता का सौंदर्य सर्वत्र मचलता दीख पड़ा. उनमें जिज्ञासा प्रबल हुई. वह संसार में बिखरे सौंदर्य को देखते हैं. ये दिल मोहनेवाली
 
अनिल कान्त :
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पारिवारिक सुख के लिए तड़पते ही रहे ग़ालिब

ग़ालिब के सात बच्चे हुए पर कोई भी पंद्रह महीने से ज्यादा जीवित न रहा. पत्नी से भी वह हार्दिक सौख्य न मिला जो जीवन में मिलने वाली तमाम परेशानियों में एक बल प्रदान करे. इनकी पत्नी उमराव बेगम नवाब इलाहीबख्शखाँ 'मारुफ़; की छोटी बेटी थीं. ग़ालिब की पत्नी की
 
अनिल कान्त :
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ग़ालिब के कुछ शेर

थी ख़बर गर्म उनके आने की, आज ही घर में बोरिया न हुआ । * बोरिया = (ख़जूर की) चटाई 2. क्यों जल गया न ताबे-रुख़े-यार देखकर, जलता हूँ अपनी ताक़ते-दीदार देखकर । 3. हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी, कुछ हमारी ख़बर नहीं आती । 4. इशरते-क़तरा है दरिया में फ़ना हो
 
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ग़ालिब : कुछ दिलचस्प किस्से

जाड़े का मौसम था । तोते का पिंजरा सामने रखा था । सर्द हवा चल रही थी । तोता सर्दी के कारण परों में मुँह छिपाए बैठा था । मिर्ज़ा ने देखा और उनकी अन्दर की जलन बाहर निकली । बोले- "मियाँ मिट्ठू! न तुम्हारे जोरू, न बच्चे । तुम किस फ़िक्र में यों सर झुकाए बै
 
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ग़ालिब : क़र्ज़ की शराब

किसी दुकानदार ने उधार ली गयी शराब के दाम वसूल न होने पर मुक़दमा चला दिया. मुक़दमे की सुनवाई मुफ़्ती सदरउद्दीन की अदालत में हुई. आरोप सुनाया गया. इनको उज्रदारी में क्या कहना था, शराब तो उधार मँगवायी ही थी और दाम भी चुकते न कर पाए थे. इसलिए कहते क्या ? उ
 
अनिल कान्त :