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कुछ औरों की , कुछ अपनी ...

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05 May 2010
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मरकस बाबा को याद करते हुए यक्कम - दुइय्यम ,,,,,,,,,,,

मरकस बाबा ! .. चौकिये नहीं  ( उनके लिए जो संशोधनवाद को गरियाते हुए नाक-भौं सिकोड़े रहते हैं और मार्क्सवाद को छुई-मुई समझकर संशोधनवादियों से बचाने में ही अपने को सबसे बड़ा मार्क्सवादी समझे रहते हैं ) ! .. यह मार्क्स को 'मरकस' मैंने नहीं किया ! .. भला
 
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
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अरविन्द जी ! धूनी रमाना तो आपका प्रिय क्रिया-कर्म है , इसे आप बखूबी कर रहे हैं , सो आपको मुबारक ! हाँ , हम अब आपके ब्लॉग पर नहीं आयेंगे !

मित्रों , यूँ तो ऐसी पोस्टें बनाना मेरी रूचि का हिस्सा नहीं हैं पर कहा क्या जाय .. जो कहना चाह रहा हूँ , उसे कहने का यही तरीका दिखा .. मैंने टीप को पोस्टों से कम महत्व का कभी नहीं समझा .. इस लिहाज से टीपों को भी निस्पृह /उन्मुक्त भाव से
 
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
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एकालाप ,,,,,,,,,,,,,

आज बस लिखना है .. संतोष के खातिर .. कभी कभी अपने को लिखना है , चिटके सपने को लिखना है .. आज पहली बार इतनी शिद्दत से महसूस कर रहा हूँ कि ब्लॉग अपना घर होता है .. बाहर से थके हारे आते हैं और बाहरी वस्त्र उतार कर तौलिया
 
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
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'' खिला गुलाब हँसाता है तेरी यादों को / हँसी के जिस्म में अफ़सोस ढल गया , जानां ! '' ......

फोन-कॉल पे/से  क्या कोई जगता है ! कौन जगता है ! .. बस एक बच्चा 'बौखियाता' है ..!..मैं तो बौखियाया ही .. लीजिये आप भी बौखियप्पन को देखिये
 
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
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....... शब्द - प्रयोग पर आपकी क्या राय है , अनुरोध है कि बताएं ---

आज पोस्ट के रूप में मैं एक टिप्पणी को रख रहा हूँ , जिसे अभी-अभी श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की 'मानसिक-हलचल' पर करके आ रहा हूँ ...          बात शब्द-प्रयोग को लेकर है , आप लोगों की राय अपेक्षित है ---पूरी टिप्पणी यूँ है
 
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
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आचार्य रामचंद्र शुक्ल की ' अंतिम आकांक्षा ' ..

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ( १८८४-१९४१ ) :                 आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है | आज हम हिन्दी साहित्य के इतिहास को आचार्यवर से अलग करके नहीं देख सकते | हिंदी साहित्य के इति
 
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
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कविता : कब्र में दाखिल होता आदमी ...

साथियों !           आज हम इतने अजीब वक़्त के हमसफ़र बने हुए हैं , जहाँ हमारे अहसास  दिनों-दिन मर रहे हैं | मुझे समझ में नहीं आता कि हम ही अजीब हैं या वक़्त | पर  सच्चाई तो यही  है  | जबकि आज हम द
 
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
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हरि अनंत हरि कथा अनंता ...

हरि अनंत हरि कथा अनंता .. .           0   पहला वाक्य लिखना बहुत कठिन होता है ; मेरे जैसे व्यक्ति के लिए  और भी जो एक नुक्ता भी विश्वस्त होकर नहीं रख पता | सरकार ! इस तरह पहला वाक्य तो पूरा हो गया , अब
 
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
Nov 27 2009 03:10 AM
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चाँद और कुछ शेर ...

साथियों !                                   बहुत दिनों  से मेरा यह ब्लॉग सूना चल रहा है , मैंने सोचा आज यह क्रम टूट         
 
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी