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15 Jun 2010
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प्रेम क्या है?

प्रेम क्या है?धोखा, फरेब या वफ़ा है,या किसी की रगों में बहतानशा है!
 
nilesh mathur
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मैं कौन हूँ?

एक प्रश्न अक्सर मैं करता हूँ खुद से  कि मैं कौन हूँ? अपने अस्तित्व की तलाश मेंखुद अपने आप से अपरिचितहैरान होता हूँ मैंखुद के मैं पर, जीने के बहाने ढूंढ़ते हुए भीमेरा मैंअस्तित्वहीन सा
 
nilesh mathur
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मेरी रचनाओं को सराहो मत

कोई उठाता है उँगलियाँ  मेरी रचनाओं पर तब दिल तो जलता हैपर मेरा हौसलाऔर भी बुलंद हो जाता है, इसलिए लोगों मेरी रचनाओं को सराहो मतउनका पोस्टमार्टम करोशायद मरने का कारणतुम्हे पता चल जाए, और जब तुम्हें पता चल जाए तो मुझे ज़रूर बतानामैं
 
nilesh mathur
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अतीत के आसमान से

आज बरसों बाद  छत पर लेटकर तारों को देखा  और चाँद को  निहारता रहा देर तक,  अतीत के आसमान में  आज फिर से  सपनों का चाँद  बादलों की ओट से झांकता नज़र आया, चाँद मुझ से शर्मा रहा था  या मैं चाँद से  कहना कठिन
 
nilesh mathur
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कोई बचा लो मुझको मर रहा हूँ मैं

दीपक 'मशाल' जी के सुझाव पर अपनी इस रचना में कुछ पंक्तियाँ और जोड़ कर प्रस्तुत कर रहा हूँ..... कोई बचा लो मुझकोमर रहा हूँ मैंएक बार में मरता तो अलग बात थी किस्तों में मर रहा हूँ मैं, पहले ज़मीर मराफिर इंसानियतअब तिल तिल कर मर रही है मेरी
 
nilesh mathur
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कोई बचा लो मुझको मर रहा हूँ मैं

कोई बचा लो मुझको मर रहा हूँ मैं एक बार में मरता तो अलग बात थी  किस्तों में मर रहा हूँ मैं, पहले ज़मीर मरा फिर इंसानियत अब तिल तिल कर  मर रही है मेरी संवेदनाएं, कोई दे दे मुझको दवा  या दारु ही सही नशे में ही जान निकले  तो अच्छा,
 
nilesh mathur
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अंग्रेजों भारत छोड़ो

दीपक 'मशाल' जी कि लघु कथाओं से प्रेरित हो कर मैंने भी एक प्रयास किया है..........................  वो आज तक पागलों कि तरह चिल्लाता था कि अंग्रेजों भारत छोड़ो हमें आज़ादी चाहिए, आज़ादी हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, कोई ६४-६५ साल पुराना
 
nilesh mathur
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औरत अब प्रश्न करने लगी है ज़िन्दगी से!

दुखों को  निशब्द पीते हुए घुट घुट कर  जीते हुए  औरत अब प्रश्न करने लगी है ज़िन्दगी से................ क्या इसी का नाम ज़िन्दगी है? अगर हाँ  तो मौत क्या है? ये प्रश्न सुन  ज़िन्दगी निशब्द हो जाती है और समाज के माथे पर सलवटें उभर
 
nilesh mathur
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क्या मर चुके हैं शब्द?

सिर्फ फुसफुसाहट है यहाँ निशब्द घोर सन्नाटा क्या मर चुके हैं शब्द या जुबां कट चुकी है क्यों है मौन पसरा हुआ क्या मर चुका है विरोध या संवेदनाओं ने  दम तोड़ दिया?
 
nilesh mathur
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फिर शब्दों के सिर कटते हैं

कभी कभी सोचता हूँ की लिखना कितना आसान होता है, गरीबी पर, अनपढ़ गरीब बच्चो पर, भूखे बच्चों पर, प्रताड़ित औरत पर, प्रेम पर, संवेदना पर, जुदाई पर, रिश्तों पर,  ईमानदारी पर, आत्मसम्मान पर, ,माँ पर, आज़ादी पर या और भी बहुत कुछ है जिस पर हम बहुत
 
nilesh mathur
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यहाँ शब्द बिकते हैं!

बाबु जी यहाँ शब्द बिकते हैं ये शब्दों का मेला है, मैंने भी दुकान सजा रक्खी है  मेरे भी शब्द देखो  ज़रा रूककर  प्रेम संवेदना सब कुछ है इनमे, देखो तो ज़रा रूककर किस खूबसूरती से मैंने शब्दों को सजा रक्खा है और फिर दाम भी तो ज्यादा नहीं
 
nilesh mathur
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विभाजन की त्रासदी

एक मुल्क के सीने पर जब तलवार चल रही थी तब आसमाँ रो रहा था और ज़मी चीख रही थी, चीर कर सीने को खून की एक लकीर उभर आई थी उसे ही कुछ लोगों ने सरहद मान लिया था, उस लकीर के एक तरफ जिस्म और दूसरी तरफ रूह थी, पर कुछ इंसान जिन्होंने जिस्म से रूह को जुदा किया
 
nilesh mathur
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बांग्लादेश का दोस्ताना कदम

हमारा पडौसी बंगलादेश जिसे हम अच्छी नज़रों से नहीं देखते अगर हमारे देश के लिए कुछ अच्छा या सकारात्मक कार्य कर रहा है तो उसके लिए उसकी प्रशंशा करनी भी ज़रूरी है! बांग्लादेश रायफल्स ने बीती एक मई को आतंकवादी संगठन एन.डी.ऍफ़.बी. के मुखिया रंजन दैमारी जो
 
nilesh mathur
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आवारा बादल !

आज कुछ पंक्तियाँ लिखते लिखते अपने ब्लॉग का नाम भी बदल दिया कैसा लगा बताइयेगा ज़रूर ! आवारा बादल हूँ जब चाहूँ आसमान में छा जाऊ, बस इक चाहत है अपनी आवारगी बंजर भूमि पर दिखलाऊ !
 
nilesh mathur
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मजदूर दिवस पर!

एक मजदूर सपने भी शर्माते हैं उसकी आँखों में आने से, आ भी जाते हैं कभी भूले भटके तो बह जाते हैं उसके पसीने में और कभी बूंदें बनकर टपकते हैं उसकी आँखों से, छोटे छोटे ही तो होते हैं सपने उसके बीमार माँ कि दवा के सपने चूल्हे में लकड़ी के सपने बेटे कि पढाई के
 
nilesh mathur
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दम तोड़ते वृक्ष !

वो देखो गंजे पहाड़ों पर वृक्ष दम तोड़ रहे हैं,  और हमें शीशम के पलंग पर सोना है !
 
nilesh mathur
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ब्लॉग और पुस्तकें !

मेरी सेल्फ में बंद पुस्तकों ने आन्दोलन करने की ठानी है मैं आजकल ब्लॉग जगत में विचरता हूँ उन्हें परेशानी है, मैं भी असमंजस में हूँ कि इन पुस्तकों को पढू या ब्लॉग जगत में ही विचरता फिरू, इस छोटे से जीवन में मैं क्या क्या करू ! पुस्तकें अक्सर नाराज
 
nilesh mathur
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मेरे मरने पर !

मेरे मरने पर  याद करना मुझको तुम  ग्यारह दिन, बारहवें पर  गुलाब जामुन खाना और मौज उडाना, तस्वीर मेरी  बरामदे में जरुर लगाना बारहवें पर फूल चढ़ाना  फिर बारह महीने तक भूल जाना, अगले साल  बरसी पर ही  नए फूल लाना और अगले
 
nilesh mathur
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सपने !

सोचा की आप लोग बोरियत महसूस करने लगे होंगे मेरी कमीज, पतलून, जूता और ट्रांजिस्टर से इसलिए कुछ अलग लिखने की कोशिश की है! हर इंसान सपने देखता है, हर सपना पूरा हो ज़रूरी नहीं है, अक्सर कई सपने टूट जाते है और टूटकर बिखर जाते है, पर हम फिर भी बाज नहीं आते
 
nilesh mathur
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मेरा ट्रांजिस्टर !

मेरी कमीज, मेरी पतलून, मेरा जूता के बाद मेरा ट्रांजिस्टर.......शायद आपको पसंद आएगा ! आज फिर से  मेरा ट्रांजिस्टर याचना सी कर रहा है मुझसे अपनी मरम्मत के लिए, एक समय था  जब बहुत ही सुरीली तान में  वो बजता था और मैं भी उसके साथ
 
nilesh mathur
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मेरा जूता !

मेरे पैर का अंगूठा  अक्सर मेरे फटे हुए जूते में से मुह निकाल कर झांकता है और कहता है... कम से कम अब तो रहम करो इस जूते पर और मुझ पर जब भी कोई पत्थर देखता हूँ तो सहम उठता हूँ , इतने भी बेरहम मत
 
nilesh mathur
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कठिन समय 2

आप भी सोचेंगे की ये क्या कमीज, पतलून, पर लिखने लगा, लेकिन एक समय था जब मेरी आर्थिक स्तिथि बहुत खराब थी और मुझे कपडे वगैरा भी खरीदने के लिए सोचना पड़ता था, लिखने का शौक तो सदा से था सो उस कठिन समय में कमीज, पतलून, जूता, चूल्हा, ट्रांजिस्टर जहाँ भी नज़र
 
nilesh mathur
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मेरी कमीज !

मेरी कमीज  जिसकी जेब  अक्सर खाली रहती है और मेरी कंगाली पर  हंसती है, मैं रोज सुबह  उसे पहनता हूँ रात को पीट पीट कर  धोता हूँ  और निचोड़कर सुखा देता हूँ शायद उसे  हंसने की सजा देता हूँ !
 
nilesh mathur
Apr 19 2010 10:49 PM
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फूलदान ! (FLOWER POT)

मेरे घर का फूलदान जिसे मैंने  नकली फूलों से सजाया है, अक्सर मुझे  तिरछी नज़रों से देखता है, मानो कह रहा हो.... कि तुम भी  इन्ही फूलों जैसे हो जो ना तो खुश्बू देते है  और ना ही  जिनकी जड़ें होती है !
 
nilesh mathur
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महानगर का घर !

मेरे घर में  हवा के झोंकों  और  सूर्य कि किरणों का आना  सख्त मना है, क्योंकि मेरा घर  पूर्णतया वातानुकूलित है,  मेरे घर के ऊपर  ना छत है  ना पैरों तले ज़मीन , मैं महानगर की  एक बहुमंजिला इमारत में रहता
 
nilesh mathur
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धुंधला चुके चित्र !

मेरा एक बहुत पुराना देहाती मित्र मुझे लगभग २० साल बाद बहुत ही खस्ता हाल में मिला, उसे मुझ से मिलकर बहुत खुशी हुई,  पर ना जाने क्यों मैं उसे देख कर शर्म महसूस करने लगा, बाद में इस पर चिंतन करते हुए कुछ पंक्तियाँ लिखी, प्रस्तुत है ...... माना कि
 
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कुछ लोग !

कुछ लोग जो इंसान कहलाते हैं उनसे गुज़ारिश है मेरी कि मुझे इंसानियत का पाठ पढाएं, मुझे भी इंसान बनना है!
 
nilesh mathur
Apr 07 2010 11:13 AM
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यादें !

आज फिर तुम्हारी याद आई आँखें कुछ नाम हुई और विगत स्मृतियों ने बहुत रुलाया, ख्यालों ही ख्यालों में सोचता हूँ कि तुमसे जब मुलाकात होगी तो बहुत सी बातें कहूँगा कुछ शिकवे कुछ शिकायत करूँगा, तुम्हारे अंतर कि वेदना को यूँ बातों ही बातों में मिटा दूंगा और
 
nilesh mathur
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माँ !

माँ सपने देखती है कई बार टूटते हैं  बिखरते हैं सपने पर माँ कि आदत है सपने देखना, बिखरे हुए सपनो को समेटना  टूटे हुए सपनो को जोड़ना, माँ सपने बुनती है सपनो को ओढ़कर सोती है छोटे छोटे सपनो में  सिमटी है उसकी दुनिया, मोम का ह्रदय  रखती
 
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क्षणिकाएँ !

(१) व्यापारी हूँ  खरीदता हूँ बेचता हूँ  ईमान धरम जो मिल जाए,  कौड़ियों के दाम मिलता है ये बिकता है अच्छे भाव!  (२) उनके पसीने कि कमाई हम खाते हैं वो बहाते हैं  हम पी जाते हैं! (३) फूल ने कहा  मत तोड़ो मुझे  महका दूंगा
 
nilesh mathur
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आज सन्डे !

मेरे एक मित्र देबाशीष बेनर्जी जो कि बेलूर मठ के हैं और बहुत अच्छे चित्रकार भी हैं, पेशे से पुलिस के लिए काम करते हैं, उनकी एक बंगाली में लिखी कविता का अनुवाद उनकी अनुमति से पेश कर रहा हूँ !आज सन्डे !हर रोज रफ़्तार से चलती है ज़िन्दगी, आज छुट्टी
 
nilesh mathur
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शब्द !

कभी कभी कलम लाचार सी शब्दों को निहारती है और शब्द निष्ठुर बन जाते हैं, और कभी कभी भावनाएं शब्दों का रूप धर बहती है तब कलम पतवार बन जाती है शब्दों को पार लगाती है , और फिर भीगे हुए शब्द वस्त्र बदल कर सज संवर कर कागज़ पर उतर आते हैं और रचना बन
 
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रिश्ते !

हर रिश्ते को  कोई नाम न दो  कुछ बेनाम रिश्ते भी  जीने का सबब बन जाते हैं, कुछ रिश्ते निभाने पड़ते हैं  न चाहते हुए भी  और कुछ लोग बिन रिश्ते के भी  दिल के करीब होते हैं, रिश्तों के लिए तो जीते हैं सभी पर कुछ
 
nilesh mathur
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ज़िन्दगी कुछ इस तरह

जिंदगी यूँ ही गुज़र जाती है  बातों ही बातों में  फिर क्यों न हम  हर पल को जी भर के जियें, खुशबू को  घर के इक कोने में कैद करें  और रंगों को बिखेर दें  बदरंग सी राहों पर,  अपने चेहरे से  विषाद कि लकीरों को मिटा कर
 
nilesh mathur
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बचपन !

हर एक इंसान के जीवन में बचपन कि यादें रहती हैं, हर बच्चा निष्पाप और निष्कपट होता है, भौतिक जीवन और अपनी लालसाओं के जाल में उलझ कर हम नैतिक अनैतिक में भेद करना भूल जाते हैं, कभी कभी मन होता है फिर से बचपन में लौट जाने का! आओ लौट चलें बचपन में फिर से
 
nilesh mathur
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आज का पुरुष !

पहली बात तो मैं किसी औरत कि भावनाओं को ठेस पहुचना नहीं चाहता, सिर्फ पुरुष का पक्ष रख रहा हूँ, नारी अत्याचार पर पर इन दिनों बहत कुछ लिखा जा रहा है, लेकिन पुरुष के पक्ष में बहुत कम लिखा जा रहा है, एक छोटी सी कोशिश कर रहा हूँ! वो ज़माना गुज़र गया जब औरत
 
nilesh mathur
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क्षणिकाएँ

(१) उधर मत देना मुझे खुशियाँ और सुखमैं पहले ही बहुत कर्जदार हूँ !(२)गंगा में डुबकी लगायी पापों से मुक्ति पायी,फिर नए सिरे से शुरू होंगे अनवरत पाप!(३)पिता जी ने कहा थाबेटा, सत्य के मार्ग पर चलना,मैं चलापरन्तु फिसलन बहुत थी
 
nilesh mathur
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महात्मा गाँधी के नाम एक ख़त !

पूज्य बापू, सादर प्रणाम, आशा ही नहीं हमें पूर्ण विश्वास है कि आप कुशलता से होंगे। हम सब भी यहाँ मजे में हैं। देश और समाज की स्थिति से आपको अवगत करवाने के लिए मैंने ये ख़त लिखना अपना कर्त्तव्य समझा। कुछ बातों के लिए हम आपसे माफ़ी चाहते हैं जैसे कि आपक
 
nilesh mathur
Dec 13 2009 03:36 AM
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आस्था

कुछ लोग मुसीबत में पड़ने पर ही ईश्वर को याद करते हैं उनके लिए .... जब हताश हो उठता है मन तो बेजान पत्थरों में नज़र आती है उम्मीद कि किरण और फिर पूजने लगते हैं पत्थरों को देवता बनाकर!
 
nilesh mathur
Dec 13 2009 03:36 AM
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गंगा स्नान

हरिद्वार में हर कि पौडी पर बैठा था तो कुछ इस तरह के विचार मन में आये थे ! (१) गंगा में डुबकी लगाई पापों से मुक्ति पायी , फिर शुरू होंगे नए सिरे से अनवरत पाप! (२) हर कि पौडी हर लेती हर पाप और हम फिर से तरोताजा और पाप करने को !
 
nilesh mathur
Dec 13 2009 03:36 AM