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दस्तावेज

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01 May 2010
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वो जो उदास है ...........

आजकल वो एक उदास हैजिसके सपनो के दरवाजे /कई तालों में बंद हैंऔर उन दरवाजों के आगे/ कोई राक्षस पहरा दे रहा हैन तो ताला खुलता है न ही राक्षस को नींद आती हैहाँ, ये जरुर है कि इस उदासी के बीच भीउसके होठों का कम्पनमेरी आँखों के चौराहे से होकर गुजरता है |और मै
 
आवेश
May 01 2010 09:36 PM
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उसकी कविता से गुजरते हुए

तुम्हारी कविता पढता हुआ जब मै खुद को महसूस करने की कोशिश करता हूँ कविता गुजर जाती है जैसे /उस एक वक़्त/ मै तुम्हे महसूस करने की कोशिश कर रहा था मगर वक़्त/ पैबंद लगाये गुजर गया था तुम्हारी कविता का बैलौस आखें बचा कर गुजरना मुझे कभी पसंद नहीं आया हाँ ,ये
 
आवेश
Mar 06 2010 06:26 PM
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शहर की लड़की

शहर की लड़की के लिए कविता नहीं होतीकहकहे होते हैंजिसे वो अपने लोगों के साथ तब बांटती हैजब शहर से दूर खड़ा कोई ,शहर में आ जाता हैउसके घर की खिड़कियाँ अक्सर बंद होती हैंकम रोशनी में उसे अपना चेहराज्यादा खुबसूरत लगता हैऔर वो बच जाती है ,अनचाहे चेहरों को देखने
 
आवेश
Feb 25 2010 06:12 PM
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आग,पानी और कविता

क्यूँ लिखूं में कोई कविता या कोई गीत ?चलो मै आग लिखता हूँ मेरे दोस्त तुम जलावन बटोरोबहुत दिनों से नहीं सुलगी ये अंगीठीबहुत दिनों से नहीं महसूस की हमने आंचबहुत दिनों हुए हथेलियों को घुटनों में छिपाएबहुत दिन से किसी ने माथे को नहीं चूमावो एक राख जो तुममे
 
आवेश
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धूप की बस्ती

तुम्हारे शहर में कोहरे का घना साया है ,मेरे चेहरे पर भी धुंध उतर आई है,चलो अब धूप की बस्ती को ढूंढने निकलें |तुम्हारे पास लफ्जों की लिहाफ तो होगीहमने भी एक उम्र से आंच बचा रखी हैचलो निकले,बस अब इस रास्ते से निकलें |गली के मोड़ पर सूरज का रास्ता
 
आवेश
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फिर भी नया साल है !

थालियाँ छनक रही ,कटोरियाँ भड़क रहीं रोटी है न दाल है ,कमाल है ,कमाल है फिर भी नया साल है | भूख के सवाल पर ,हाल बेहाल पर सुर्ख रंग लाल है ,लाल लाल लाल है फिर भी नया साल है |हर तरफ बवाल है,बवाल पर बवाल हैजिससे जूझता हुआ हर आदमी हलाल हैफिर भी नया साल है
 
आवेश
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पल्लू में चांदनी

कल रात देर तक /सितारों के ठहाके गूंजते रहे चांदनी ,जो तुमने अपने पल्लू में बाँध रखी थी मेरे पैरो पर सर रखी तुम /ये सच जानती थी मगर मैं नावाफिक था ! मुझे पागल बना देने वाली तुम्हारी हंसी तुम्हारे हाथों की आइसक्रीम की तरह पिघल रही थी और मैं ठिठुर रहा थ
 
आवेश
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लव इन ऑरकुट

यहाँ बात तुम्हारे प्रेम में डूबे ई -मेल्स के पुलिन्दे की नहीं है जो सुरक्षित हैं कंप्यूटर के साथ साथ मेरी स्मृतियों में न ही शहद जैसी तुम्हारी बातों और फुर्सत में तैयार किये गए सपनो और समझौतों के लम्बी चौडी फेहरिस्त की है जो अक्सर मेरे स्क्रैप बुक पर
 
आवेश
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कम लेंगे

कोई क्या देगा गम उनको जो खुद गैरों का गम लेंगे जहाँ सब भागते होंगे वहीँ कुछ लोग थम लेंगे जहाँ सब हाँथ सेकेंगे वहीँ कुछ जल रहे होंगे कोई क्या उनको कम देगा जो अपने आप कम लेंगे
 
आवेश
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सुन रही हो तुम ?

बेतरतीब से दिन , चिंदी चिंदी हो चुकी रातों के बीच कोई वक़्त तो होगा ? जब तुम हमारे साथ होते होगे रगड़ रहे होगे अपनी मुट्ठियों में मेरी अँगुलियों को कुछ लिखा मिटाने को , कुछ अलिखा बनाने को बंद कर ली होंगी अपनी आँखों में मेरी आँखें तुमने बिस्तर में - ख
 
आवेश
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दिन और रात के बीच

बेतरतीब से दिन ,चिंदी चिंदी हो चुकी रातों के बीच कोई वक़्त तो होगा? जब तुम हमारे साथ होते होगे रगड़ रहे होगे अपनी मुट्ठियों में मेरी अँगुलियों को कुछ लिखा मिटाने को ,कुछ अलिखा बनाने को बंद कर ली होंगी अपनी आँखों में मेरी आँखें तुमने बिस्तर में - खुद
 
आवेश
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सोनू तिवारी से मुलाक़ात !

अगर आप खंड खंड टूट रहे हैं या पोर- पोर जुड़ना चाहते हैं तो सोनू तिवारी से मिलें हम भी मिले थे कभी /किसी रात हम जब मिले चुप्पी के साथ मिले सारी अकुलाहट नींद के पहियों के साथ डगमग डोलती मेरी साँसों में सवाल बनकर उग आई थी वही दूसरे छोर पर बैठी सोनू इस म
 
आवेश
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भोपाल मेरी जान !

मेरे भोपाल बस एक बार मुझको कह दे तू वो एक रात भला कब तक तुझ पर बीतेगी ? कब तलक आँख के आंसू तुझे भिगोएँगे कब तलक तख्तियों पर रंज कहे जायेंगे कब तलक दिल्ली की बेदिली सहेगा तू कब तलक शाम के धुंधलके तुझे डरायेंगे सुन ए भोपाल , मेरी जान ,मेरे साथी सुन क्य
 
आवेश
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तुमसे मिलने के बाद

तुमसे मिलना कई अनबुझे सवालों का जवाब था तुमसे मिलने के बाद मैंने जाना आँख के आंसू कैसे सपनो में बदलते हैं ? कैसे संभव हो पाता है /चुप रहकर सब कुछ कहना ? और कैसे /सब कुछ कह कर मौन हो जाता है आदमी | तुमसे मिलने के बाद मैंने जाना सड़कों की खामोशी ,और रा
 
आवेश
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हम जब दुबारा मिले !

५ वर्ष पूर्व डायरी में लिखी गई ये कविता मैंने बिसरा दी थी ) हम एक बार फिर उससे मिले इन सर्दियों में तमाम बारिश मै अपने शहर छोड़ आया था बेहिसाब धुंधलके उसने अपने दरवाजे पर टांग रखे थे धुंधलके को धोखा देकर अन्दर झाँक रही मेरी आँखें जब तक पिघलती उसने तपा
 
आवेश
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मैं लौट आया हूँ फूलों के साथ

मैं लौट आया हूँ तुम्हारे पास न थका हूँ न उदास वैसे तो कोई भी नहीं बच सकता मन के अवसाद और तन की थकान से उम्र की ढलान हो या पहाड़ की ढलान मैं कठिन यात्रा से वापस लौटा हूँ -सकुशल तुम मेरी तरफ देखो मैंने दोनों हाथों से एक गुच्छा फूल उठा रखा है ,इन्हें भी
 
आवेश
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मेरी कविता सो रही है

उसे ग़जलें लिखना पसंद है या तस्वीरें खिंचाना उसकी तस्वीर उसकी ग़जल जैसी है और उसकी ग़जल उसकी तस्वीर जैसी जैसे मुझे भी बार बार उसके जैसा ही बन जाना पड़ता है वो बात करते करते अचानक मौन हो सकती है जैसे थक हार कर इस वक़्त मेरी कविता सो रही है या फिर उसकी
 
आवेश
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कभी -कभी याद !

मै तुम्हे कभी कभी याद करता हूँ इसलिए नहीं कि मै सम्मोहित हूँ तुमसे बल्कि इसलिए कि तुम्हे याद करना और रोटी कमाना जिंदगी की जरुरत है | जब कभी मै तुम्हे याद करता हूँ तुम वहां होते हो /जहाँ तुम कभी नहीं आये वो जगह मेरे कुर्सी के पीछे भी हो सकती है जहाँ त
 
आवेश