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दृष्टिकोण

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11 Jun 2010
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क्या ये जनद्रोही नहीं हैं ??????????

घड़ियाली आँसूकौन लेकर रहेगा इंसाफ ?26 साल पहले ये सब कहाँथे जब भोपाल के चंद कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, समाजसेवियों ने गैस पीड़ितों के कंधे से कंधा मिलाकर उनके लिए संघर्ष किया, पुलिस प्रशासन का अत्याचार सहा, लाठियाँ खाई, जेल तक गए। तब ये सारे घड़ियाली आँसू
 
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ये हैं नाइंसाफी के जवाबदेह

भोपाल के गैस पीड़ितों ने उनके साथ हुई नाइन्साफी के लिए इन लोगों को जिम्मेदार ठहराया है (फोटो दैनिक भास्कर से साभार) क्या क्या हुआः--घनी आबादी के बीच में अमानक स्तर का कारखाना चलाने देने, और खतरनाक, पाबंदी वाले उत्पादनों का कारोबार बेराकटोक चलते रहने देने
 
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भोपाल गैस त्रासदी-कानून का रास्ता पकड़ने वाले जन आंदोलनों के लिए महत्वपूर्ण सबक

26 साल के लम्बे इन्तज़ार के बाद आखिर भोपाल गैस त्रासदी के अपराधियों पर चल रहे मुकदमें का अपेक्षित फैसला आ गया। जिस गंभीर आपराधिक मामले में राज्य और केन्द्र सरकार की एजेंसियाँ शुरु से ही अपने पूँजीवादी वर्ग चरित्र के अनुरूप अपने साम्राज्यवादी आंकाओं को
 
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आखिर कब हम इस देश के एक अभिन्न अंग के रूप में देश के रिसते घावों को महसूस करेंगे।

    14 अप्रैल की दृष्टिकोण की पोस्ट ‘‘मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी सांड लाल रंग देखकर इतना भड़कते क्यों हैं !’’ कुछ महानुभावों को इस कदर नागवार गुज़री कि उन्होंने हमारे ब्लॉग पर लम्बी लम्बी टिप्पणियों की बौछार के ज़रिए दृष्टिकोण को पूरी तौर पर
 
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मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी सांड लाल रंग देखकर इतना भड़कते क्यों हैं!

    जबसे दंतेवाड़ा में नक्सलवादियों ने अब तक का सबसे बड़ा हमला करके अपनी ताकत का एहसास कराया है तब से तमाम मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों में नक्सलवादियों के खिलाफ अनोखा आक्रोश फूटा पड़ रहा है। यह कर डालों, वह कर डालों, ईंट से ईट बजा दो,
 
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नक्सलवाद-खून किसी का भी बहे नुकसान देश का ही है

देश में पूँजीवादी शोषण, राजनैतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार, धर्माध साम्प्रदायिकता, जातिवाद, गरीबी, बेरोजगारी और इससे उपजी अनैतिकता, लोभ-स्वार्थ जनित असामाजिक गतिविधियाँ, और भी ऐसे कई मुद्दों को दरकिनार करते हुए अभी कल ही चिदम्बरम ने नक्सलवाद को देश का सबसे
 
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हवा में उड़ने वाले वानर देवता का जन्मदिन-अंध विश्वास इसी को कहते हैं

    आज हनुमान जयंती है। हनुमान जी एक ऐसे वानर देवता के रूप में जाने जाते हैं जो ना केवल हवा में उड़ लेते हैं बल्कि एक समूचा पहाड़ भी अपनी हथेली पर साध लेते हैं। वे ना केवल मनुष्यों की तरह बोलते हैं बल्कि गुस्से में आकर सूर्य नारायण तक को निगल
 
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बलात्कार.........बलात्कार..............बलात्कार

भोपाल में पाँच साल की बच्ची के साथ बलात्कार और फिर उसका कत्ल। दिन पर दिन बढ़ती जा रही इस दरिंदगी पर समाज के प्रबुद्ध वर्ग को तुरंत आगे आकर इसके विरुद्ध कोई ठोस कदम उठाना चाहिए। ब्लॉग जगत, पत्र-पत्रिकाओं, मीड़िया, और विभिन्न सामाजिक मंचों को अपने अपने स्तर
 
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शहीदे आज़म भगतसिंह की याद में (भाग-3)-एक इंकलाब की भारी ज़रूरत है।

भाग-१ के लिए यहाँ क्लिक करें।भाग-२ के लिए यहाँ क्लिक करें।क्या इसी हिन्दुस्तान का चित्र आँखों में लिए हुए भगतसिंह फाँसी पर चढे थे? क्या उनकी कल्पना का हिन्दुस्तान ऐसा ही था? नहीं, बात ऐसी नहीं, भगतसिंह तो बहुत दूर की बात, हिन्दुस्तानी आज़ादी आन्दोलन में
 
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शहीदे आज़म भगतसिंह की याद में (भाग-2)-जिसके लिए असंख्य कुरबानियाँ दी गई वह आज़ादी कैसी है.........

 भाग-१ के लिए यहाँ क्लिक करें।यह बात आज सच साबित हो रही है । आज के हिन्दुस्तान की सामाजिक परिस्थिति देखने से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। 1 अरब से भी ज़्यादा आबादी में 95 प्रतिशत जनता बुरी तरह से 5 प्रतिशत शोषकों की शोषण की चक्की में पिस रहे हैं। चाहे
 
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शहीदे आज़म भगतसिंह की याद में (भाग-1)-ये आज़ादी-ब्रिटिश साम्राज्यवाद और हिन्दुस्तानी पूँजीपति वर्ग के साथ महज़ एक समझौता।

फिर वह काला दिन आ गया है जिस दिन हिन्दुस्तानी आज़ादी आन्दोलन की क्रांतिकारी धारा के प्रमुख प्रतिनिधि योद्धा शहीदेआज़म भगतसिंह को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के क्रूर पंजों ने हमसे छीन लिया था। यूँ तो ब्रिटिश शोषण-शासन के शिकार हिन्दुस्तान के हज़ारों नौजवान
 
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इन्हें तो बस थोड़ा सा खाना चाहिए ताकि ये जिन्दा रह सकें .........

रोजाना जो खाना खाते हो वो पसंद नहीं आता ? उकता गये ?   थोड़ा पिज्जा कैसा रहेगा ?  नहीं ??? ओके ......... पास्ता ?  नहीं ?? .. इसके बारे में क्या सोचते हैं ? आज ये खाने का भी मन नहीं ? ... ओके .. क्या
 
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हम ही हैं वो लोग- साहिर लुधियानवी को समर्पित सत्या शिवरमन की कविता

हम ही हैं वो लोगहम ही है वो लोग जिनका हमें था इन्तज़ार हम ही है वो ख़्वाब जो हमने देखा था।वो सुबह जो कभी आई नहीं उसका क्या ग़महमारे हाथों से जो बरसती हैं रोशनीहमारे कदमों की तेजी से उठा है उजालाहमारी ही मेहनत से जलते हैं चिरागऔर ये सब किसी सूरज से कम तो
 
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Mar 03 2010 10:51 AM
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बी.टी. बैगन - नीयत में अगर मुनाफा हो तो इंसानियत की उम्मीद कैसे करें...................

http://digitalimages.bhaskar.com/dainikmp/EpaperPdf/05022010/4bpl-pg17-0.pdfबी.टी. बैगन पर लम्बे समय से बहस चल रही है। दैनिक भास्कर भोपाल ने आज के संस्करण में बी.टी. बैगन पर आम जनता को समझ में आने वाली एक नॉलेज रिपोर्ट प्रकाशित की है इससे बहुत सारी बातें
 
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अनुसूचित जाति के ताकतवर लोगों पर विशेष नज़र रखने की ज़रूरत है

यह सच है कि अनुसूचित जातियों-जनजातियों के अधिकारों की रक्षा के लिये सरकारी स्तरों पर कड़े कानून होने के बावजूद देश भर में उनपर अगड़ी जाति के प्रभावशाली लोगों के अत्याचार बदस्तूर जारी हैं, लेकिन पिछले कई दशकों से देश में इन जातियों के लिये उपलब्ध आरक्षण की
 
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मैं सुभाषचन्द्र बोस बोल रहा हूँ...............

सुभाषचन्द्र बोस उवाच- सुभाषचन्द्र बोस जयन्ती 23 जनवरी पर...............‘‘मैं अपने बचपन में अंग्रेज़ों को देश से भगाना ही सबसे बड़ा कर्तव्य समझता था। बाद में गंभीर चिंतन के बाद इस नतीजे पर पहुचा कि सिर्फ अंग्रेज़ों को भगाने से ही मेरा फर्ज़ पूरा नहीं होगा।
 
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उद्योगपतियों को ज्योतिबसु के प्रति शोक प्रकट करने की ज़रूरत क्या है ?

पत्रिका समाचार पत्र में दिनांक 19.01.2010 को प्रकाशित समाचारउद्योगपतियों को ज्योतिबसु के प्रति शोक प्रकट करने की ज़रूरत क्या है ? लेनिन, स्टालिन, माओत्सेतुंग के सम्मान में तो ये कभी एक शब्द नहीं कहते। जाहिर है ज्योति बसु का मार्क्सवाद पूँजीपतियों के लिए
 
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कामरेड बसु केसरिया सलाम

हालाँकि यह उपयुक्त मौका नहीं है कि किसी दिवंगत व्यक्ति की आलोचना की जाए परन्तु जब देखा जाता है कि सारी पार्टियाँ, पूँजीवादी अखबार और तमाम ब्लॉगर बुद्धिजीवी तक एक स्वर में कह रहे हैं कि ‘‘साम्यवाद का स्तंभ ढह गया’’ तब मजबूर होकर इस मामले में अपनी राय
 
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सर्वशक्तिमान ईश्वर की झूठी अवधारणा को ध्वस्त करने के लिए खगोलशास्त्र एवं खगोलीय घटनाओं का वैज्ञानिक विष्लेषण आज की महती आवश्यकता है

सहस्त्राब्दि का सबसे लम्बा सूर्यग्रहण सम्पन्न हुआ । एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना के हम प्रत्यक्षदर्शी बने मगर इसके साथ ही साथ बड़े पैमाने पर तर्कविहीन, रूढ़ीवादी, अवैज्ञानिक अंधविश्वास जनित कार्यव्यापार के भी मूक दर्शक बने, जैसे कि हमेशा ही ऐसी घटनाओं के समय
 
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धर्म का काम सामाजिक नियमों का निर्माण करना नहीं है- विवेकानंद

विवेकानन्द उवाच-विवेकानंद जयन्ती 12 जनवरी पर...............‘‘धर्म का काम सामाजिक नियमों का निर्माण करना नहीं है। सामाजिक नियम आर्थिक परिस्थितियों से उत्पन्न हुए हैं। धर्म की यह भयानक भूल थी कि उसने सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप किया । यह सत्य है कि हम
 
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जब ‘चोरों’ में ही चुनाव की अनिवार्यता हो तो आखिर शत-प्रतिशत मतदान से इस देश का भाग्य कैसे बदलेगा !

गुजरात में चुनाव में मतदान अनिवार्य किया गया है। यह सच है कि मौजूदा सरकारों के नकारा और जनविरोधी रवैये और मतदान में आने वाली कई अड़चनों परेशानियों के कारण कई सारे लोग वोट डालने में रुचि नहीं लेते है और अंततः तीस-चालीस प्रतिशत राजनैतिक रूप से मोटीवेटेड
 
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क्रिसमस प्रसंग-धर्म को कूडे़दान में डाल दो.......

दुनिया भर में धार्मिक कपोल कल्पनाओं का कोई अन्त नहीं है। उन्हीं में से एक है ईसा मसीह का जन्म। आज 25 दिसम्बर को सारी दुनिया के ईसाई लोग मध्ययुग के एक तथाकथित ईश्वर-अवतार ईसा मसीह का जन्मदिन बड़ी धूम-धाम से मनाते हैं, जिनका जन्म स्त्री-पुरुष के दैहिक स
 
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इस सेन्टा के कपड़े कौन ले भागा ?

कहीं यह संघ के स्वयंसेवकों की हरकत तो नहीं ?
 
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कोपेनहेगन सम्मेलन‍ - आम जन साधारण के स्वार्थ की बलि

जोर-शोर से शुरु हुआ कोपेनहेगन सम्मेलन, जैसा कि अंदेशा था पूँजीवादी स्वार्थों की भेंट चढ़कर बेनतीजा खत्म होने की कगार पर आ पहुँचा है। दुनियाभर के देशों के जमावड़े के बीच इक्का-दुक्का मुल्क ही ऐसे दिखाई दिए जिनकी चिंताएँ वास्तव में उनके देश के जन-साधार
 
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पूर्वजन्म की यादों के बहाने अंधविश्वास कि बकवास

आजकल टी.वी पर एक धारावाहिक के ज़रिए देश के एक सदियों पुराने अंधविश्वास को भुनाकर पैसा कमाने की जुगत चल रही है। पूर्वजन्म की यादों को वापस लाने के निहायत अवैज्ञानिक, झूठे और आडंबरपूर्ण प्रदर्शन के ज़रिए लोगों में इस बचकाने अंधविश्वास को और गहरे तक पैठान
 
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सृष्टी के सर्वनाश को कतई नहीं रोका जा सकता, यदि

कोपेनहेगन में पर्यावरण की चिंता को लेकर दुनिया भर के लोग इकट्ठे हुए हैं और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से होने वाले नुकसान और उससे बचाव के रास्ते खोजने की मशक्कत करने वाले हैं। इरादा तो बेहद नेक है मगर इस जमावड़े के गर्भ से कई बातों की एक बात निकलती
 
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मंदिर-मस्ज़िद के बहाने क़त्लेआम का जवाब लो

आज 6 दिसम्बर है, बाबरी मस्ज़िद के ध्वंस की १७ वी वर्षगांठ। आज ही के दिन कुछ धार्मिक उन्मादियों ने अयोध्या में बाबरी मस्ज़िद को ढहाकर देश में हिन्दु-मुस्लिम नफरत के एक और अध्याय की शुरूआत की थी। हिन्दुओं ने पाँच हज़ार वर्ष पूर्व के एक राजघराने के राजा रा
 
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भोपाल गैस त्रासदी-गैस पीड़ितों के साथ विश्वासघात

दिसम्बर 2009 को विश्व के भीषणतम औद्योगिक नरसंहार भोपाल गैस कांड की पच्चीसवी बरसी मनाई जा रही है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि पिछले पच्चीस सालों में गैस पीड़ितों की समस्याएँ जस की तस होने के कारण हर साल की तरह इस साल भी भोपाल के लाखों गैस पीड़ितों के ज़ख्म
 
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क्या इस पोस्ट पर किसी को कुछ नहीं कहना है ?

दृष्टिकोण ने राष्ट्रीयकता बनाम राष्ट्रीयता-ठाकरों का आतंक नाम से एक बेहद महत्वपूर्ण पोस्ट कल से लगा रखी ह। मगर किसी भी महानुभाव का कमेन्ट अब तक नहीं आया है । इतने महत्वपूर्ण मुदृदे पर क्या ब्लाॅग जगत के बुद्धिजीवियों को कुछ नहीं कहना है। कृपया देखें
 
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राष्ट्रीयकता बनाम राष्ट्रीयता-ठाकरों का आतंक

पिछले दिनों महाराष्ट्र विधानसभा में मराठी भाषा में शपथ की ज़िद के बहाने जिस घटनाक्रम को अन्जाम दिया गया उससे भारतीय लोकतंत्र की दुर्दशा का एक संगीन पहलू उभरकर सामने आता है। स्वतंत्रता के पश्चात् बासठ सालों के इतिहासक्रम में भारतीय लोकतंत्र को परिपक्वत
 
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विवाह एक नैतिक बलात्कार

जैसा कि अपेक्षित था वैसा ही हुआ। भोपाल की सड़कों पर ‘ऋषि’ अजय दास की पुस्तक ‘‘विवाह एक नैतिक बलात्कार’’ के, तथाकथित लव गुरू प्रोफेसर मटुकनाथ और उनकी प्रेमिका शिष्या द्वारा विमोचन के होर्डिंग देखकर ही यह समझ लिया गया था कि भारतीय संस्कृति के रक्षकों के
 
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संस्कृति कर्मी की मुख्य चुनौती

कोई समाज एक खास समय में जिस तरह के आचार-विचार, गुणों-लक्षणों, नीति-नैतिकता, मूल्यबोध, संस्कार और रूचियों का प्रकटीकरण करता है वह उस समय की संस्कृति कहलाती है। इसका सीधा संबंध उस समय की सामाजिक व्यवस्था से है । दुर्भाग्य से हर युग में यह होता है कि जो
 
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आज के युग का विज्ञान

आज के युग का विज्ञान, वाह क्या कहने........अगर वैज्ञानिक महोदय खुद कहे कि मैं सारे इश्वरों में विश्वास रखता हूँ तो हो गया बंटाढार । दुनिया में विज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण कार्य ईश्वर की माया से लड़ना है जिसने अनपढ़ आम जनसाधारण से लेकर बड़े-बड़े पढे़-ल
 
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नैतिक पतन और कला-संस्कृति-साहित्य की जिम्मदारियाँ

रोज़ाना ही मासूम बच्चों के साथ दर्दनाक, हृदय विदारक, वीभत्स दैहिक अत्याचार, यौन शोषण का एक ना एक किस्सा अखबारों की सुर्खी में होता है, सोच कर ना केवल शरीर के रोंगटें खड़े हो जाते हैं बल्कि घिन भी आती है। भारतीय समाज नैतिक पतन के गर्त में कितनी गहराई तक
 
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