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10 Jun 2010
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अब तो साफ हो, कौन थे अर्जुन के 'कृष्ण' ?

अब कांग्रेस डैमेज कंट्रोल में जुट गई। अभी तो जितने नेता, उतनी बातें। पर दस जनपथ से एक मास्टर स्ट्रोक आएगा। फिर भोपाल गैस त्रासदी पर भी कांग्रेस गंगा नहा लेगी। कांग्रेस में हमेशा यही होता। आप इतिहास उठाकर देख लो। पीएम की कुर्सी का त्याग हो या लाभ के पद के
 
santosh.indiagatese
टैग: bhopal-genocide
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तो अपने 'नीरो' भी बसाएंगे भोपाल!

आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में नीरो वाली कहावत आपने कई दफा सुनी होगी। कहते हैं, जब रोम जल रहा था, तब नीरो बंसी बजा रहा था। अब संयोग कहें या कुछ और, आज के दिन ही 68 ईसवी में नीरो ने आत्महत्या की थी। आत्महत्या प्रायश्चित के लिए की या कोई और वजह, इसके लिए
 
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विधुर व्यवस्था का यह कैसा विधवा विलाप?

हिरोशिमा-नागासाकी पर एटम बम गिराने से पहले जब मित्र राष्ट्रों पर धुरी राष्ट्र हावी थे। तब विंस्टन चर्चिल ने न्याय व्यवस्था से जुड़े एक अधिकारी से पूछा था, अपनी न्याय व्यवस्था कैसी चल रही? पर वह अधिकारी द्वितीय विश्व युद्ध को लेकर ब्रिटेन की जनता की चिंता
 
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'राम' की छाया पड़ते ही बीजेपी में बवंडर

तो बीजेपी के सुराज की शुरुआत राम जेठमलानी के साथ हुई। कभी बीजेपी अटल बिहारी की पार्टी थी, अब गगनविहारी नेताओं का कब्जा हो चुका। सो वाजपेयी के अस्वस्थ होने का खूब फायदा उठा रहे। चाल, चरित्र, चेहरे की बलि तो बीजेपी पहले ही चढ़ा चुकी। अब विचारधारा और विजन
 
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तो गोलमाल है, भाई सब गोलमाल है

आखिर शरद पवार भी घेरे में आ गए। वैसे अब तक रक्षा सौदों को कोयला खदान माना गया। जहां कितना भी बेदाग छवि का चेहरा क्यों न बिठा दो, कालिख लग ही जाती। पर अब क्रिकेट में भी कोयले जैसी कहानी। आईपीएल का विवाद जबसे शुरू हुआ, तबसे अब तक काली कमाई के काले खेल का
 
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अभिव्यक्ति की 'तेरी-मेरी', तो मौलिक हक कहां?

यों तो साहित्य समाज का दर्पण माना जाता। पर जबसे साहित्य में नेताओं की घुसपैठ हो गई। तबसे सिर्फ हल्ला ही मच रहा। कहीं कोरी कल्पना, तो कहीं कल्पना-हकीकत का तडक़ा मार घालमेल। फिर वोट के हिसाब से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जुमला। अब ताजा विवाद सोनिया गांधी
 
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अब जनता ने दिखाया लेफ्टियों को 'पाछा'

अब बंगाल ममता की छांव में आने को बेताब। लोकसभा चुनाव लीग मैच था, तो निकाय चुनाव सेमीफाइनल। ममता बनर्जी ने अबके न सिर्फ लेफ्ट, अलबत्ता कांग्रेस को भी औकात बता दी। कांग्रेस ममता बिन चुनाव में उतरी। पर अबके दांव उल्टा पड़ गया। कांग्रेसी गढ़ में भी ममता का
 
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बहाली एनएसी की, बयां कर रही हाल सरकार का

मेंगलोर हादसे के 11वें दिन सरकार ने रपट जारी करके ही दम लिया। पर रिपोर्ट टू द पीपुल से पहले बात झारखंड की। झारखंड में राष्ट्रपति राज लग गया। गवर्नर ने अपनी रपट केंद्र को भेज दी थी। सो मंगलवार को केबिनेट ने सिफारिश मंजूर कर राष्ट्रपति को भेज दी। पर महीने
 
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तो हारे हुए 'सिपाही' अब 'जनरल' को सिखाएंगे पाठ

जूते और प्याज खाने वाली कहावत चरितार्थ कर भी बीजेपी झारखंड की कुर्सी का मोह नहीं छोड़ पा रही। यों पिता तुल्य आडवाणी ने अबके खम ठोक दिया। अब तक की फजीहत देख सरकार बनाने की पहल को हरी झंडी नहीं दे रहे। सो छुट्टी मनाकर लौटे गडकरी की मुसीबत बढ़ गई। अब तो
 
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नक्सली बढ़ते जा रहे, सरकार भाग रही!

क्या नक्सलवाद पर सख्ती के लिए भी किसी 26/11 का इंतजार? आतंकवाद पर ईमानदार राजनीतिक एकता तो सिर्फ तभी दिखी थी। आनन-फानन में सरकार पोटा के रद्द कुछ प्रावधान यूएपीए कानून में वापस लाई। समूचे खुफिया तंत्र की सर्जरी हुई। एनआईए-मैक बना, अधिकारियों की
 
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तो अकेला चना भी फोड़ सकता है भाड़

यों तो आईआईटी के नतीजे हर साल घोषित होते। लाखों छात्र-छात्राएं इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते। पर सफलता महज कुछ को मिल पाती। सो कुछ का मायूस होना और कुछ का खुश होना लाजिमी। पर सुपर-30 के सभी छात्र आईआईटी में अबके भी सफल रहे। लगातार तीसरी बार सुपर-30 के
 
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तो क्या ऐसे बहाल होगा भारत-पाक में विश्वास?

मंगलवार फैसलों का दिन रहा। एक फैसला अपनी अदालत से, जहां एसपीएस राठौड़ को हवालात जाना पड़ा। दूसरा फैसला पाक से आया, जहां हाफिज सईद छूट गया। पर राठौड़ का केस अभी बंद नहीं। सो बात पाक की। पाक के लिए यह कहावत मौजूं- जाको राखे आईएसआई, बाल न बांका होय। आखिर
 
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बोले तो बहुत, पर कहा क्या?

बोले तो बहुत, पर कहा क्या? सातवें साल में पहुंचे पीएम मनमोहन सिंह ने सभी मसलों को छुआ। पर पीएम की बात करें, पहले जरा जिम्मेदार विपक्ष की जिम्मेदारी देखिए। आखिरकार सत्ताईसवें दिन बीजेपी ने शिबू से समर्थन खींच लिया। सो पहली मई को यहीं पर लिखी कहावत याद
 
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'हादसे' से हादसे तक का सफर....

 जब 2009 में लोकसभा चुनाव के नतीजे आए, तो खुद कांग्रेस भी भौंचक रह गई थी। भाजपा का भौंचक होना तो लाजिमी ही था, क्योंकि नतीजों से पहले पार्टी ने सपनों का बुर्ज खलीफा तैयार कर लिया था। तब दोनों पक्षों में चुस्की लेने वाले नेताओं ने यह कहते हुए मजाक
 
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तो मजबूत होकर और भी मजबूर हुए मनमोहन

शनिवार को यूपीए की दूसरी पारी की पहली सालगिरह। सो सरकारी खेमा सजधज कर तैयार हो गया। पीएम के घर भोज की तैयारी। फिर सोमवार को उपलब्धियों के पिटारे के साथ मनमोहन मीडिया से रू-ब-रू होंगे। यानी पहले पेट, फिर जनता से भेंट। पर समूची कांग्रेस हफ्ते भर से फील गुड
 
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तो राजनीति के आगे नहीं जोर किसी का

नक्सलवाद हो या बाबरी विध्वंस या झारखंड का झंझट। हर रोज नए पहलू जुड़ते जा रहे। गुरुवार को नक्सलवाद पर शुरुआत नरेंद्र मोदी से हुई। मोदी अलीगढ़ की मंगलायतन यूनिवर्सिटी में थे। छात्रों से सवाल-जवाब हुए। एक सवाल आया- राह से भटके नौजवानों के लिए क्या मैसेज। तो
 
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नक्सल हो या आतंकवाद, राजनीति की बहस अनंता

नक्सलियों का तांडव जारी। पर राजनीति और अपनी व्यवस्था बहस में ही उलझी। बुधवार को छत्तीसगढ़ के सीएम रमन सिंह ने नक्सलियों को आतंकी करार दिया। लश्कर से संबंध की आशंका जताई। वायुसेना के इस्तेमाल पर जोर दिया। तो कांग्रेस ने भी लक्ष्मण रेखा के पार न जाने का
 
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चिदंबरम और गडकरी का गांडीव समर्पण

तो सफेद खून वालों का इलाज कैसे होगा। नक्सलवादी अब आमजन का भी खून बहाने लगे। कभी दंतेवाड़ा, कभी जगदलपुर, कभी लालगढ़ और न जाने करीब 12 राज्यों के 200 जिलों में कब जमीन रक्तरंजित हो जाए, पता नहीं। पर राजनीति से रंजित दिग्विजय सिंह जैसों का हाथ अभी भी
 
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कुम्हलाने लगा विकल्प, पर दोष जनता के सिर

अब कसाब के बहाने अफजल पर नूराकुश्ती शुरू हो गई। कसाब को सजा से पहले ही होम मिनिस्ट्री ने अफजल की फाइल ढूंढनी शुरू की। तो दिल्ली की शीला सरकार को चिट्ठी गई। पूछा गया, कई बार याद दिलाया जा चुका है। पर सरकार का जवाब नहीं आया। सो सरकार अपनी राय जल्द केंद्र
 
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तो सोनिया का मुखौटा साबित हुए दिग्विजय

तो अब राज न पूछो नीति का। राजनीतिक दलों की नीतियां सत्ता और वोट के हिसाब से तय होने लगें। तो लोकतंत्र सिर्फ अध्यात्म का विषय भर रह जाएगा। झारखंड का झंझट सत्रहवें दिन भी नहीं सुलझा। तो गुरुजी का धैर्य जवाब दे गया। गुरुजी ने बहुत गुरुअई की, पर तू डाल-डाल
 
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अब तो नेता खुद ही एक-दूसरे को जानवर मानने लगे

अपने शहरी विकास मंत्रालय ने सोमवार को साफ-सुथरे शहरों की रपट जारी की थी। तो चंडीगढ़ अव्वल आया। तब किसी ने सोचा भी न होगा, एक दिन बाद ही चंडीगढ़ राजनीतिक गंदगी के लिए सुर्खियों में आएगा। पर संयोग कहें या कुछ और, बुधवार को बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने
 
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तो कांग्रेस खेल रही दूरी बनाने-मिटाने का खेल

यों कहने को प्यार, जंग और राजनीति में सब जायज। पर जब प्यार पर पहरा लगा, तो राजनेता या तो पहरेदारों के साथ हो लिए। या फिर चुप्पी साधकर बैठ गए। सो बदलते वक्त के साथ पहरेदार अब समाज के ठेकेदार हो चुके। पर करनाल की सैशन कोर्ट ने जब तीस मार्च को मनोज-बबली
 
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दिल मिलें, न मिलें, मिलते रहेंगे भारत-पाक के हाथ

अमेरिका को भले पाक पर एतबार न हो। हिलेरी क्लिंटन तक को कहना पड़ गया- पाक को मालूम, कहां छुपा है लादेन। पर पाक के अधिकारी सही जानकारी नहीं दे रहे। अब भले मंगलवार को अमेरिकी प्रवक्ता ने पाक पर लगाए इल्जाम को नरम करने की कोशिश की। पर सच तो हिलेरी की जुबां
 
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पहले अमेरिका, अब चीन की पैरवी का क्या मतलब?

पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन की वजहों में चीन से हार का सदमा भी माना जाता। हाल ही में चीनी अतिक्रमण बढ़ा था। तो संसद और संसद के बाहर विपक्ष ने यही वजह गिना कांग्रेस को झकझोरने की खूब कोशिश की। वाकई नेहरू ने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा दिया था। पर चीन ने
 
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तो पक्ष-विपक्ष फील गुड में, ठगा सा आम आदमी

अब जाति पूछो साधु की। तो राजनीतिक दबाव में कबीरवाणी पलटेगी। बजट सत्र के आखिरी दिन विपक्षी दबाव असर दिखा गया। जनगणना में जाति शामिल करने की मांग पर पी. चिदंबरम ने टालू रवैया अपनाया। तो हंगामा मच गया। आखिर सोनिया-प्रणव ने लालू-शरद-मुलायम से गुफ्तगू की। फिर
 
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26/11 से 06/05 ... पर मंजिल अभी दूर

पाक रे पाक, तेरा इरादा कितना नापाक। जुर्म करो इंडिया में, सजा मिले पाक में। क्या तभी होगा न्याय? अपनी स्पेशल कोर्ट ने कसाब को फांसी की सजा दी। तो फरीदकोट में रहने वाले कसाब के शुभचिंतकों ने जतला दिया, पाक हुक्मरान का अगला कदम क्या होगा। कसाबवादी
 
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अट्ठाईस मिनट ही मर्यादा में रह पाए अपने सांसद

अपनी संसद को सचमुच ग्रहण लग चुका। एक विवाद सुलटता नहीं, दूसरा गले पड़ जाता। दोनों सदनों में बुधवार का दिन माफीनामे का रहा। दिल से कांग्रेसी मणिशंकर अय्यर हाल-फिलहाल राष्ट्रपति कोटे से राज्यसभा में मनोनीत हुए। सोमवार को उन ने विपक्ष के नेता अरुण जेतली को
 
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तो संसद में हंगामे का स्तर बढ़ा, बहस का नहीं

मुंबई की लोकल ट्रेनें क्या ठहरीं, अपनी संसद भी ठहर गई। खुद सीएम अशोक चव्हाण ने आंकड़े बताए। तो माना, मोटरमैन की हड़ताल से समूची मुंबई को लकवा मार गया। वाकई लोग काम पर नहीं पहुंच पाए। और जैसे-तैसे कर जो पहुंचे भी, वो काम नहीं कर पाए। सो संसद में जमकर बलवा
 
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तो शिबू-बीजेपी में अब गुरिल्ला युद्ध

आखिर कसाब पर फैसला आ गया। सभी 86 मामलों में गुनहगार साबित हुआ। सो सजा में अब किसी को कोई शक नहीं। शक है, तो सिर्फ इस बात का। क्या सचमुच सजा के फैसले पर अमल होगा? या अफजल की तरह ही कतार में, यह तो वक्त बताएगा। पर फिलहाल सबकी निगाह मंगलवार के इंतजार में।
 
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दो दिन की फजीहत, फिर मौजां ही मौजां

एक मशहूर कहावत है- भानुमती ने खसम किया, बुरा किया। करके छोड़ा, उससे बुरा किया। छोडक़र फिर पकड़ा, ये तो कमाल ही किया। अब बीजेपी बुरा न माने, पर झारखंड में बीजेपी-झामुमो का रिश्ता कुछ ऐसा ही हो गया। जब शिबू संग दिसंबर में बीजेपी ने गलबहियां कीं। तो राजीव
 
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कभी बीजेपी भी चाल, चरित्र, चेहरे वाली पार्टी थी!

आखिर वही हुआ, जो बीजेपी की कहानी में हमेशा होता आया। बीजेपी ने फिर साबित कर दिया, सत्ता के आगे नीति, नैतिकता, सिद्धांत कुछ भी नहीं। कर्नाटक में जो एच. डी. देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी ने अक्टूबर 2007 में किया। अब शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन कर रहे। सो
 
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यही होगा, जब अटल बिहारी की बीजेपी में हों गगन विहारी

तो वाजपेयी को दिया बर्थ-डे गिफ्ट बीजेपी ने वापस ले लिया। चार महीने पहले 25 दिसंबर को ही बीजेपी-झामुमो गठबंधन का एलान हुआ था। तो सत्ता की खातिर हुए समझौते को बीजेपी ने वाजपेयी को तोहफा बताया। पर हनीमून पीरियड में ही तलाक हो गया। बीजेपी सचमुच कटी पतंग हो
 
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'तो जो सरकार निकम्मी है, वो सरकार बचानी है'

तो मंगलवार का दिन सरकार के लिए मंगलमय हो गया। सिख विरोधी दंगे में सीबीआई ने आखिर जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट दिला ही दी। वाकई सीबीआई बड़े काम की चीज। तभी तो लोकसभा में विपक्ष का कट मोशन औंधे मुंह गिरा। महंगाई के मुंह में अब सेक्युलरिज्म घुस गया। सो विपक्षी
 
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कटौती प्रस्ताव पर कटी विपक्षी एकता की पतंग

संसद में शोरगुल थमने का नाम नहीं। पर संसद से पहले राज्यपाल प्रभा राव को अपनी श्रद्धांजलि। सोमवार को दिल का दौरा पडऩे से निधन हो गया। वाकई सहज, सीधी, सरल थीं प्रभा राव। पर कहते हैं, किसी व्यक्ति की खासियत जाननी हो, तो विरोधियों के शब्दों को देखो।
 
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तो राजनीतिक आईपीएल में भी मैच फिक्सिंग!

यों आईपीएल का फाइनल इतवार को हो जाएगा। पर संसद में चल रहा लीग मैच खत्म नहीं हो रहा। सो शुक्रवार को संसद के दोनों सदनों में कामकाज ठप रहा। अबके समूचा विपक्ष जेपीसी की मांग पर अड़ा। तो सरकार के होश फाख्ता हो गए। विवाद में शरद पवार-प्रफुल्ल पटेल का नाम गले
 
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मोदी को हटाने की रस्म भर न रह जाए जांच

क्या ललित मोदी देश और क्रिकेट की जरूरत बन गए हैं? क्या मोदी-आईपीएल के सिवा देश की कोई समस्या ही नहीं? फटाफट क्रिकेट से फटाफट पैसे कइयों ने बनाए। पर जांच सरकारी अंदाज में ही क्यों चल रही? क्या सोमवार या मोदी के हटने तक यही खेल चलता रहेगा? बीसीसीआई के चीफ
 
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Apr 22 2010 09:10 PM
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गडकरी तो पास हुए, पर मनमोहन क्यों फेल?

महंगाई पर रैली की बात करें उससे पहले के.एल. वाल्मीकि को श्रद्धांजिल। बुधवार को लोकसभा से बीजेपी ने वॉकआउट किया। पर राज्यसभा वाल्मीकि को श्रद्धांजलि देकर उठ गई। पिछली सर्दी में ही निमोनिया के शिकार वाल्मीकि का मंगलवार आधी रात करीब साढ़े बारह बजे निधन हो
 
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तो क्या विजन सिर्फ थरूर के लिए, महंगाई पर नहीं?

अपने देश में नेताओं-नौकरशाहों का विजन शायद कहीं गुम हो गया। एक छोटा सा किस्सा बताएं। दिल्ली मैट्रो में आजकल एक इश्तिहार देखने को मिल रहा। भारत सरकार के अधीन एक जनसंख्या नियंत्रण का विभाग है। जिसने अखबारी कतरन के अंदाज में लिखा है- सोमवार, 20 मार्च 2030,
 
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थरूर तो गए, अब थरथरा रहा आईपीएल

न खुदा ही मिला, न विसाल-ए-सनम, न इधर के रहे, न उधर के। आखिर सरकार की थू-थू करा शशि थरूर विदा हो गए। सुनंदा पुष्कर ने भी कोच्चि टीम में अपने शेयर तज दिए। सो सारा एपीसोड देख चंद्रमोहन याद आ गए। चंद्रमोहन यानी भजनलाल के बेटे। बाप को कांग्रेस ने 2004 में
 
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तो आईपीएल का मतलब इंडियन पार्लियामेंट्री लीग

तो आईपीएल आखिर इंडियन पार्लियामेंट्री लीग हो गया। शुक्रवार को दोनों सदनों की पिच पर जोरदार मैच हुआ। सो संसद की कार्यवाही थम गई। पर कांग्रेस फिलहाल इस विवाद में कूदने से परहेज कर रही। सो शशि थरूर को दो-टूक कह दिया, अपना बचाव खुद करिए। विपक्षी एकजुटता ने
 
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