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17 Jun 2010
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मैंने घर को जंगल बना रखा है !

इधर या उधर आगे या पीछेनीचे और उपर(!) जिधर से शुरू करूँपेड़ ही पेड़ हैं(झाड़ियों को भी यही समझता हूँ मैंजैसे ब्लॉग और माइक्रो ब्लॉग एक ही समझे जाते हैं)बाँस, पीले फूलों वाला केलकटहल, गूलर, गुच्छों और विरल फूलों वाला लाल कनेरअशोक, बोगनबेलिया लाल, गुलाबी,
 
डॉ. राजेश नीरव
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मैंने तो बस पेड़ लगा रखे हैं

मौसम चितरता रहता है ,मैंने तो बस पेड़ लगा रखे हैंलोग कहते हैं घर के चारों ओर, कैनवास सजा रखे हैंरंग, रूप, आकृति, गंध और छाया क्या नहींकुदरत ने मेरे घर के चारों ओर,जादू बिछा रखे हैंठंड में कुनकुना और भर गर्मी में शीतल है मेरा घरभरम है तुमको, मैंने एसी और
 
डॉ. राजेश नीरव
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मैं तो मायूस लौटा हूँ

जरूरी नहीं कि चीजें सुलझती है अक्ल के हवाले सेमैंने तो अक्सर सुलझते देखा है इन्हें हीले-हवाले सेगर तेज हो हवा तो गुल हो जाती है शमाकुछ दिए जब भी जलते रहते हैं तूफान में मतवाले सेमौत अजीब शै है, दूर कर देती है शक्लो सूरतयाद कहाँ छीन पाता है कोई माशूक की
 
डॉ. राजेश नीरव
Jun 15 2010 09:22 AM
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वह अनजानी जगह

दूर बॉटल बुरूसशीशम, अमलतास और गुलमोहरनिगाहें लौट आती हैंइनकी खुशबूऔर आकर्षण सेसराबोर होकरमैंयहाँ दूर बैठा हूँक्या सचमुचहाँ भी, नहीं भीतो फिर?अनजानीअनपहचानीधुँधलाई-सी एकगुफा-सी मेंअरे! यह तो मन है किसी काकिसका?खोज रहा हूँ, उसी कोअथक, अनवरत ........
 
डॉ. राजेश नीरव
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संतति का सच

वह तेज हवा थीतोड़ गईआखिरी पत्ता दरख़्त काशाख ने कहा-अस्फुट से- झुँझलाए स्वर मेंयह क्योंमुझसे क्या बैर तेराधीरे से मुस्काई हवाकहा सुरीले स्वर मेंसुन, इसलिए किकोंपले फूटे दोबाराबहारें आए फिर सेतुझे मोह छो़ड़ना ही होगाजीवन मोह से शुरू होता हैमोह-भंग पर अंत
 
डॉ. राजेश नीरव
Jun 13 2010 10:20 AM
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स्वाति बूँद

पीयूषवर्णी मेघ नेद्रवित होएक बूँद टपकाई सहसाकदली, सीप और भुजंग नेतुरंत अपनामुँह खोलालेकिनबूँद की कोई और मर्जीवह गिरीसाँवली गोरी केउत्तुंग वक्ष पर-गोरी सिहर कर लरज गई,गंध कपूर कीमोती की शुभ्रताऔर जहर-सी तीव्रता, तीक्ष्णताउस बूँद ने पाईऔर हो गई
 
डॉ. राजेश नीरव
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चिरमिलन हो चिरंतन

अधरों से अधरधड़कता वक्ष सीने सेकपोल कपोलों सेमिले,.....।भर गई नासापुटों में, साँसों की गरमाई,आँखों से लाज के हरसिंगार झरे....।कान तक कपोलहो गए रतनार.....।श्यामवर्णी केशों में घूमतीऊँगलियों नेस्वाद जानाप्यार का....।शरबती आँखों सेछलक गईढेर सारी शराबतृप्त
 
डॉ. राजेश नीरव
Jun 11 2010 09:18 AM
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एक सीमाहीन वृत्त

एक धुँधले से आलोक मेंमैंने चाहाउसे घेर लूँएक वृत्त बनकरमैंने यत्न कियाकभी चित्रकारकभी मूर्तिकारकभी कवि बनामेरे सब प्रयासनिष्फल हुएऔर स्वप्न के एक जागरण मेंमैंने देखावह मुझे घेरे हुए हैक्योंकि वह स्वयं एक सीमाहीन वृत्त था
 
डॉ. राजेश नीरव
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गम में लिखे मैंने गीत

उछला-कूदा खुशी में –हरदम-गम में लिखे मैंने गीतपा जगत का प्यार एक दिनमन था फूला न समायामैं मदमाता फिर रहा था तू अचानक पास आयाछूने को बढ़े जब हाथ मेरेतू तोड़ चला मेरी भावुक प्रीतउछला-कूदा खुशी में –हरदम-गम में लिखे मैंने गीतमधु- मौसम था मन में
 
डॉ. राजेश नीरव
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तुमको रास मौन की भाषा

मैं मुखरित हर क्षण हर पलतुमको रास मौन की भाषाचाहे सदा ये मन मेरासजा कर स्वर की रंगोली युगल स्वर में लगाएनेह के गीतों की बोलीमैं ललक कर जब पास आता मौन के समक्ष दब जाती पिपासामैं मुखरित हर क्षण हर पलतुमको रास मौन की भाषाइंद्रधनुष से ढेर सारे रंगों को मैं
 
डॉ. राजेश नीरव
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अभिनय किए जा रहा हूँ क्यों ?

क्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?जीवन पथ की इन राहों मेंहैं कितने कंटक और प्रस्तरघिसट-घिसट अपनी देह कोअनजानी मंजिल लिए जा रहा हूँ क्योंक्यों जिए जा रहा हूँ मैं – क्यों?है अंतरमन में छटपटाहटमुख पर छद्म स्मित लिएजीवन के इस रंगमंच परअभिनय किए जा रहा हूँ
 
डॉ. राजेश नीरव
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मेरी पीड़ा और एकाकी मन

अकेलेपन की छाया सघनमेरी पीड़ा और एकाकी मनअपने से ही बात करूँअपने सुख-दुख का हाल कहूँअपने घावों को खुद सहलाऊँखुद अपनी पीड़ा को गाऊँअकेलेपन की छाया सघनमेरी पीड़ा और एकाकी मनसत्य के क्षितिज पर पहुँच करअंतिम सत्य शून्य ही पातायह नहीं अंतिम सत्यक्यों बार-बार
 
डॉ. राजेश नीरव
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क्यों लिखूँ गीत वेदना के

क्यों लिखूँ गीत वेदना केक्यों स्वर को कटुतर बनाऊँतू मेरे गीतों को पढ़, मेरीभावुकता पर तरस खाएऔर स्वयं की जीत परमंद-मंद मुस्कुराएक्यों लिखूँ गीत वेदना केक्यों स्वर को कटुतर बनाऊँमैं अपनी भावुकता को तजअपनी राह बनाऊँगाजो तेरे दर तक पहुँचाएउस राह कभी ना
 
डॉ. राजेश नीरव
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बरखा गीत

दूत बनाकर बादलों कोमैं लिखूँ पाती कोईमेघमय आकाश साराआच्छन्न है हरीतिमा परहौले से आकर गालों परटकराती है बूँद कोईतनमन सिहर सा जातामन कहता है स्वयं सेदूत बनाकर बादलों को मैं लिखूँ पाती कोईरोम-रोम पुलक उठतामात्र जिसके स्मरण सेबह चली है मधुर गति सेअल्हड़-सी
 
डॉ. राजेश नीरव
May 30 2010 11:12 AM
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सुंदरता को अपूर्ण ही होना चाहिए

रिमझिम झरती बूँदों कोबेधकर जब निकलीरवि-रश्मितो नीले आकाश परतन गयाइकहरा इंद्रधनुरे धनुतू भी है अभागासचमुच मेरी तरहजो सुंदर है किंतुसंपूर्ण नहींअपूर्ण हैक्योंकि तीर नहींसुंदर हैक्योंकि तीर नहींतीर का होनासंधान का होना हैऔर संधाननष्ट करता हैमिटाता है,
 
डॉ. राजेश नीरव
May 29 2010 08:40 AM
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ताकि तराश सकूँ....

लिखता रहाताकि मर ना जाएउन क्षणों की अनुभूतियाँजिन्हें मैंने जियाजिंदा रहे वह मधुरसऔर हलाहलअपनी खुशी सेवक्त के हाथोंजिसे मैंने पियालिखता रहाताकि बने रहेउन ज़ख़्मों के निशांजिन्हें अपने ही हाथोंअकेले में मैंने सियालिखता रहाताकि फूटती रहे कोंपलें[दर्द के
 
डॉ. राजेश नीरव
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पुरवाई बहार की !

घूँट-- दर घूँट पीकर दर्द तेरे इंतजार कारफ्ता-रफ्ता देख यूँ ही उम्र गुज़ार दीखुद की हार का ग़म, या तेरी जीत की खुशीहर शाम जिंदगी की मगर, यूँ ही निसार कीकोई आकर पूछेगा तो इतना ही कहेंगे नीरवअबके ये बाज़ी बिना खेले ही हार दीकोई एक ज़ख्म हो तो बताए दिल
 
डॉ. राजेश नीरव
May 27 2010 10:14 AM
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कितनी क्षुद्र लेखनी मेरी

गिनती के गीत जुटा पायाअपनी आँहों को उर में भरतप कर, जलकर जीवन भर संसृति सागर से गगरी मेंदो-चार बूँद ही भर पायागिनती के गीत जुटा पायाअलबेली मंजिल के दुष्कर पथ परकुछ फूल खिले कुछ काँटे थेइनकी ही गंध चुभन कोअपनी साँसों में भर लायागिनती के गीत सुना
 
डॉ. राजेश नीरव
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कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँ

जिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँझूठे वादे करूँ कब तककब तक प्यार की कसमें खाऊँरस्में दकियानूसी निभाऊँ कब तक कब तक झूठी बात करूँजिंदगी कब तक तुझसे फ्लर्ट करूँजानता हूँ तू नहीं महबूबा मेरीछोड़ कर साथ एक दिन जाएगीतो फिर आज ही क्यों न कहूँलिव मी अलोन, क्यों बोझ
 
डॉ. राजेश नीरव
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विलंबित खुशियाँ

क्या इनको लेकर करूँगा, असमय जो तूने दी सौगातेंक्या इनको लेकर करूँगा।।जब इनकी कुछ चाह मुझे थी.जब इनकी परवाह मुझे थी,उस समय तूने की बेपरवाही अबक्या इनको लेकर करूँगा।।खुशियों को गम में बदलकर,ग़म को भी भोगा तनहा,अब यदि नीरव नीर बहाएँ,क्या इनको लेकर
 
डॉ. राजेश नीरव
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छोड़ दी मैंने तल्खियाँ

कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आयातेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आयाकितना पहरे बैठाए थे तूनेखुद पर खुद की आरजुओं परये गज़ब कैसे हुआ मगरतुझ पर तेरा ही न बस चल पायाकल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आयातेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आयाउसके आने की न मुझको खबर हुईन
 
डॉ. राजेश नीरव
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कोई कैसे कहेगा, जिंदा है अब हम

तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हमकोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हमअब न उदास धड़कनें हैं न प्यास हैन तुम, न तुम्हारी याद, न खुशी, न ग़मन मचलते अरमाँ है, न बदहवासी का आलमअब तो हमारी तनहाई है और है हमतोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हमकोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हमन
 
डॉ. राजेश नीरव
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न गेसूओं को तुम हटाओ

यूँ ही छाई रहने दो काली घटाएँन गेसूओं को तुम हटाओमहकने दो साँसों में शबाबखिलने दो गालों में गुलाबछलकने दो आँखों से मधुहोंठो से बरसने दो शराबयूँ ही छाई रहने दो ख़ुमारीमदहोश हूँ न होश में मुझको लाओयूँ ही छाई रहने दो काली घटाएँन गेसूओं को तुम हटाओटिका रहने
 
डॉ. राजेश नीरव
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.....और गज़ल कहे कोई

दिल गमों से चूर होऔर गज़ल कहे कोईदर्द को छिपा ले कलेजे मेंऔर गज़ल कहे कोईसौ तल्खियाँ हो चेहरे पेऔर गज़ल कहे कोईख़लिश न मिटती हो दिल कीऔर गज़ल कहे कोईलरज़ते ज़ख्म हो दिल केऔर गज़ल कहे कोईटूटते लफ़्ज हो जुबाँ पर और गज़ल कहे कोईबहुत कहने को हो अरमाँऔर गज़ल
 
डॉ. राजेश नीरव
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मुझसे सहा जाता नहीं...

बार-बार तुम्हारे नयनों में नीर का छलछलाना साथी मुझसे सहा जाता नहींअंर्तमन में है पीड़ा सभी कोबिन पीड़ा जीवन कोई पाता नहींकैसे कहूँ, डाल लो आदत सहने कीआशावादी यह कह पाता नहींबार-बार तुम्हारे नयनों में नीर का छलछलानासाथी मुझसे सहा जाता नहींमाना तुम्हारी
 
डॉ. राजेश नीरव
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तब हुई कोई कविता

विरही के यादों के मौसम मेंरिमझिम बरसते सावन मेंदो बूँद मिली हो अश्रु कीऐसा संगम जब-जब हुआतब हुई कोई कविताहिरण-से इस चंचल मन नेस्मृति वन में दौड़ लगाईकहीं ठहर दो लम्हे काटेऐसी जब कोई ठौर मिलीतब हुई कोई कवितातनहाई के सूने क्षण मेंबेचैन के दर्द भरे आलम
 
डॉ. राजेश नीरव
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मैं दागदार चाँद हूँ गगन का

रे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती हैइस तरह से प्रणय हुआ संभव कहीं हैसंस्कार मुझसे छूटने वाले नहीऔर तू नहीं लाज तजना चाहती हैरे मीत, प्राण की यह बीन बजना चाहती हैइस तरह आराधन भी अच्छा नहीं हैमैं निरा-निपट पाषाण औरतू देव मूरत गढ़ना चाहती हैरे मीत,
 
डॉ. राजेश नीरव
May 15 2010 06:38 PM
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भूल गया हूँ, तब से खुदा को

रोको चाहे मुझको जीने सेमत रोको यारों पीने सेगम बढ़ता है जीने सेखलिश मिटती है पीने सेपीकर एक लम्हा जीना है अच्छाबिन पिए बरसों जीने सेकैसे रिंद हो जो डरते होनशीली नजरों से पीने सेकाफिर मुझको कहते हैं, लोगबंदगी मेरी, तेरे हाथों पीने सेभूल गया हूँ, तब से
 
डॉ. राजेश नीरव
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तब तलक गम को सहेजूँ

दर्द को समेटू कहाँ तक कब तलक गम को सहेजूँजार-जार रोता है दिलरक्तिम है हर कोनाकोई मरहम, मैं पाऊँगामुश्किल लगता ऐसा होनादर्द को समेटू कहाँ तक कब तलक गम को सहेजूँतज इसे सकता नहीं मैंसाथ निभ सकता नहींमजबूर है हालात इतनेखुल कर रो भी सकता नहींदर्द को समेटू
 
डॉ. राजेश नीरव
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मधु ऋतु

दूर कहीं कोयल बोलीवीरान पड़ा था कब से गुलशनतितली, भँवरे, माली थे चुपतनहा-तनहा लगता मौसमऐसे में यह मधुबोलीदूर कहीं कोयल बोलीकलियाँ मुस्काएँगी अबबहारें आएँगी गुलशन मेंभँवरे फूलों पर मँडराएँगेंहोगी फूलों संग आँख-मिचौलीदूर कहीं कोयल बोलीखुशनुमा होगा हर
 
डॉ. राजेश नीरव
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मिलन यामिनी का सुख-सार भूला

मैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूलामादकता भूला साकी नयनों कीमधु की मदहोशी भूलाप्यालों की खनक पायल झंकारमधुबाला की डपट-दुलार भूलामैं मिलन यामिनी का सुख-सार भूलाकंचन देह की द्य़ुति भूलासाँसों में महकता कचनार भूलाचपलता भूला मृग नयनों कीओंठो से हुआ अभिसार भूलामैं
 
डॉ. राजेश नीरव
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अभिसारिका बिन कैसा मिलन

अभिसारिका बिन कैसा मिलनकैसी मिलन की यामिनीकब तक रचूँ शब्द देहकब तक कल्पित अभिसार करूँकब तक रचूँ मूर्ति कल्पना कीकब तक रचूँ कंचन कामिनीअभिसारिका बिन कैसा मिलनकैसी मिलन की यामिनीकैसी सुहानी रात है यहकैसी धवल है चाँदनीमन वीणा के तार कह रहेछेड़े कोई आकर रति
 
डॉ. राजेश नीरव
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कली चटकी कहीं, फूल खिला कोई

कली चटकी कहीं, फूल खिला कोईमन उपवन था उजड़ा-सापतझड़ था युगों से आँगन मेंआई बसंत बहार लाया उसे बुला कोईकूक कोयल की, भँवरे का गुँजनतड़प रहा था, कबसे सुनने को मनमन मुराद पूरी हुई, शुभ घड़ी आया कोईगुलाब खिला, मोगरा महकासंदल चहका, मन खुश्बू से बहकामन जैसे
 
डॉ. राजेश नीरव
Apr 28 2010 12:18 PM
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पशु का तन जीता

असमंजस में ही वक्त गँवायायुग बीते कुछ ना लिख पायामन की कल्पना शक्ति ने जब भी कोई ख्बाव बुनाउलझनों से टकरा कर हरदमउसने अपना सिर धुनाकवि के भावुक मन से हायपशु का तन जीताभावों के इस तट पर रहामेरा गागर रीताअसमंजस में ही वक्त गवाँयायुग बीते कुछ ना लिख पायाकई
 
डॉ. राजेश नीरव
Apr 25 2010 08:54 AM
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तृष्णा बनकर आए कोई

कोई आए-सहलाए मेरे घावों कोजर्जर तन था पहले हीउस पर ये असीम प्रहारबना निर्दयी जब जग सारालगता कोई नहीं हमाराकोई आए-सहलाए मेरे घावों कोयुग बीते कुछ न लिख पायाखालीपन जीवन में छायाप्रेरणा बनकर आए कोईभर जाए जो रिक्त भावों कोकोई आए-सहलाए मेरे घावों कोकुछ भी
 
डॉ. राजेश नीरव
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दो बूँद हमें भी दो साकी

रोशनी की मधुशाला सेदो बूँद हमें भी दो साकीमाना उजियारा है तेरे आँगनतेरे आँगन है दीपों की बारातकवि के मन अंबर में लेकिन तिमिर निशा है बाकीरोशनी की मधुशाला सेदो बूँद हमें भी दो साकीहै याद तुझे तेरे आँगनउजियारे की खातिरमन को जलाकर अपनेराह तुझे दिखलाई थीइस
 
डॉ. राजेश नीरव
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प्रीत की प्रत्याशा

रे कवि अब बदल लेअपनी कविता की भाषाजिसके लिए तू जनम भरदर्द को पीता रहाजिनके लिए तू जनम भरअश्क बन जीता रहादेख वो मनमीत तेरेदेख वो हमप्रीत तेरेतेरे घावों पर नमक छिड़कमंद-मंद मुस्कुरा रहे हैंक्या अब भी रखता है तूइनसे प्रीत की अभिलाषाजिनके लिए तू जनम भरकोयल
 
डॉ. राजेश नीरव
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रंग अपना बदलना छोड़ दो

मुझको भाता बहुत है साथ तनहाइयों काहो सके तो मुझे मेरे हाल पे छोड़ दोथा नाजुक मगर मुझसे टूटा नहींकाँच का ये खिलौना अब तुम्हीं तोड़ दोतुम चले राह अपनी मैं अकेला खड़ाइस मुसाफिर को भी अब कोई मोड़ दोकोई भी दो खिलौना बहल जाऊँगामगर यूँ न कहो मचलना छोड़ दोजुर्म
 
डॉ. राजेश नीरव
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किसके लिए, किसके लिए

लिखूँ किसके लिए, किसके लिएजिसे लुभाने की खातिर साक़ी बनमधुमय मधु गीतों को गाता रहाउसने मुझे विषघट समझ करदूर नीरव अधरों से कियारोऊँ किसके लिए, किसके लिएजग जो मुझे संताप देदर्द दे हृदय पर आघात देउनको समझता रहूँ अपनाक्यों अश्रु हँसी में ढाल लूँकरूँ, किसके
 
डॉ. राजेश नीरव
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मन से दूर

खोज कर ला दे कोई उन्हेंजो चले गए हैं मन से दूर उन बिन जीवन ऐसे लगतामानों शरीर बिन प्राणउन बिन जीवन ऐसे लगतामानों नौका बिन सागरखोज कर ला दे कोई उन्हेंजो चले गए हैं मन से दूर कल जहाँ था कोलाहलआज वहाँ नीरवता छाईपायल की झंकार हुई गुमबजता नहीं कोई नूपुरखोज कर
 
डॉ. राजेश नीरव
Apr 18 2010 11:25 AM