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गीत...............

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10 Jun 2010
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सच बताना गांधारी !

हे गांधारी !तुम्हारे विषय में बड़ी जिज्ञासा है उत्तर  पाने की तुमसे आशा है जानना चाहती हूँ  तुमसे कुछ तथ्य क्या बता पाओगी पूर्ण सत्य ?पूछ ही लेती हूँ तुमसे आज लोगों को बड़ा है तुम पर नाज़ ...कहते हैं सब कि गांधारी पतिव्रता
 
संगीता स्वरुप ( गीत )
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यथार्थ का धरातल

आज  मैं अपनी  बहुत पुरानी रचना  आप सबके साथ बाँटना चाहती हूँ....ये तब लिखी गयी थी जब मैंने कुछ यूँ ही लिखना शुरू किया था...कॉलेज  के अंतिम वर्ष में थी....१९७४  की लिखी ये रचना आज भी शायद कमोवेश वही कह रही
 
संगीता स्वरुप ( गीत )
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बीज ख्वाब के

मन की बंजर धरती पर कुछ ख्वाब बो दिए थे अश्कों के दरिया से सींचा पर पल्लवित न  हुआ एक भी ख्वाब फिर उतर आई  एक उदासी की  घटा कि  अचानक तेरी  मुस्कान
 
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हे कृष्ण - आओ तुम एक बार

हे  कृष्ण - आओ  तुम एक बार  लेकर  कल्की  अवतार  पापों का नाश कर  तुमने  पापियों को मुक्ति  दी  आज पापों के बोझ से  अवनि  है धंस रही  फ़ैल  रहा दसों दिशाओं में  अपरिमित
 
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सर्द मुस्कान

एक   साझा  नज़्म....कभी कभी कुछ रचनाएँ मुक्कमल होती हैं जुगलबंदी से.....आज की  यह नज़्म भी एक ऐसी ही जुगलबंदी है...मैंने नज़्म ड्राफ्ट की ही थी कि शिखा (वार्ष्णेय ) Online दिखाई  दे गयी...बस मैंने यह नज़्म उसको भेज
 
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मुआवज़ा ......एक ख्वाहिश ऐसी भी ..... ( लघु कथा )

रेलवे  स्टेशन  पर  अचानक हुई भगदड़  से लोग एक दूसरे पर गिर रहे थे ...जो गिर गए थे लोग उनके ऊपर से ही उन्हें कुचलते  भागे जा रहे थे....किसी को कुछ जैसे होश नहीं था... सबको बस अपनी फ़िक्र थी.....बहुत मुश्किल से भीड़ पर काबू पाया
 
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आह.. चाँद ......!

ख्व्वाबों केतारों केबीचएकतम्मना साचमकता चाँद..तारों कीकटोरियोंके बीचरोटी सारखा चाँद..अरसे बादतेरा आनाऔर यूँमुस्कुरानाजैसेदिखा होईदका चाँद ...खुलेआसमान के तलेपथरीलीधरती पर पड़ेछोटे सेघर कीछत सादिखा चाँद ..आँखें बंद करजब तुझेमहसूस कियाचांदनी साशीतलथा
 
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लेखनी को चाहिए अब अंगार

मच   रहा  है चहुँ ओर हाहाकार लेखनी को चाहिए अब  अंगार एक धमाके से कितनी ही जाने हो  रहीं  निसार और कान में तेल दिए बैठी  है सरकार अपने ही कर रहे पीठ  पीछे
 
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महिला ब्लॉगर्स का सन्देश जलजला जी के नाम

कोई मिस्टर जलजला एकाध दिन से स्वयम्भू चुनावाधिकारी बनकर.श्रेष्ठ महिला ब्लोगर के लिए, कुछ महिलाओं के नाम प्रस्तावित कर रहें हैं. (उनके द्वारा दिया गया शब्द, उच्चारित करना भी हमें स्वीकार्य नहीं है) पर ये मिस्टर जलजला एक बरसाती बुलबुला से ज्यादा कुछ नहीं
 
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रचयिता सृष्टि की

माँ के गर्भ में साँस लेते हुए मैं खुश हूँ बहुतमेरा आस्तित्व आ चुका है बस प्रादुर्भाव होना बाकी है। मैं माँ की कोख से ही इस दुनिया को देख पाती हूँ पर माँ - बाबा की बातें समझ नही पाती हूँ माँ मेरी सहमी रहती हैं और बाबा मेरे खामोशबस एक ही प्रश्न उठता है
 
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स्वयं सिद्धा बन जाओ

नारी - तुम कब खुद को जानोगी कब खुद को पहचानोगी ?  कुंठाओं से ग्रसित हमेशा खुद को शोषित करती हो अपने ही हाथों से खुद की  गरिमा भंगित करती हो  पुरुषों को ही लांछित कर खुद को ही भरमाती हो पर मन के विषधर
 
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है चेतावनी !......

पुरुष ! तुम सावधान रहना , बस है चेतावनी कि तुम अब ! सावधान रहना . पूजनीय कह नारी को महिमा- मंडित करते हो उसके मान का हनन कर प्रतिमा खंडित करते हो . वन्दनीय कह कर उसके सारे अधिकारों को छीन लिया प्रेममयी ,वात्सल्यमयी कह तुमने उसको दीन किया .पर भूल गए कि
 
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मात्र एक डोर

कल्पना की पतंग सोच की डोर  से बाँधउड़ा  दी थी  मैंनेअनंत में | पर  तुम्हारीसोच के मांझे नेकाट दी थीमेरी डोरधराशायी  होते हुएपतंग मेरीअटक गयी थीसमाज रुपीबिजली के तारों में              
 
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घरौंदा

गम की तपिश होया सोचों का बवंडर होशोला हो मन काया आंखों का समंदर हो ,डूब जाता है जैसे सबजब तैरना भी आता होमंझदार नही मिलतीकिनारे पर चला आता हो ।डूबना भी क्या डूबनाजो गहरे पानी में डूबा होडूबो तो वहां जा करजहाँ पानी का निशां न हो ।ये सोचता है मन मेरा किहर
 
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कैसे मन मुस्काए

रोटी समझ चाँद को बच्चा मन ही मन ललचाएआशा भरकर वो यह देखेमाँ कब रोटी लाएदशा देखकर उस बच्चे कीकैसे मन मुस्काए | घर के बाहरचलना दूभरसाँस सभी कीनीचे ऊपरकाँप रहाउसका दिल थर-थरमन बेहद घबरायेऐसे आतंकी साये मेंकैसे मन मुस्काए | हुआ धमाकाबम का
 
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एक नया अंदाज़

बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं जा रहा....बस  लगता है कि कुछ लिख ही नहीं पाउंगी...मन में आये भावों को कुछ टूटे शब्द दिए हैं....शायद फिर से कुछ लिख पाऊं ....मन की बेचैनियों ने क़तर दिए हैं पंख मेरी कल्पना के उड़ने की सारी कोशिशें नाकाम हो रही हैं दिखता है
 
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तपती रेत

दर्द  को पढ़ना अच्छा लगता है दर्द  को सोचना  अच्छा लगता है दर्द को मैं लिख नहीं पाती दर्द को जीना  अच्छा लगता है सोचती है दुनिया कि -जब तक अश्क ना बहें  तो दर्द नहीं होता है तड़पने  वाला सदा
 
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आभासी दुनिया के वास्तविक रिश्ते

जी हाँ , आभासी दुनिया ..यानी कि काल्पनिक ...लेकिन काल्पनिक  जो पूरी तरह से काल्पनिक नहीं होती ..आज  मैं बात कर रही हूँ इस अंतरजाल पर बने रिश्तों की ..आज बात करना चाह रही हूँ शिखा  वार्ष्णेय  की .शिखा से लेखन के ज़रिये सबसे पहली
 
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आज की ताज़ा खबर

चिलचिलाती धूप में चीथड़े पहने हुए चौराहे पर खड़ा चौदह बरस का बालक चिल्ला रहा था --" आज की ताज़ा खबर आज की ताज़ा खबर -चौदह साल तक के बच्चों को शिक्षा का अधिकार इसके लिए प्रतिबद्ध है हमारी सरकार "लाल बत्ती होते ही हर कार की खिड़की से झाँक कर कह उठता -बाबू जी
 
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थाने से बोल रहा हूँ .....

भई आज कल बाजारवाद इतना बढ़ गया है कि हर दुकानदार अपने ग्राहकों को विशेष सुविधा प्रदान करता है .इसी वजह से आज कल प्रचलित है free home delivery की सुविधा. घर का कुछ भी सामान लाना है तो बस लिस्ट लिखा दीजिये और सामान आपके घर पर पहुंचा दिया जायेगा...तो भई हम
 
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शंखनाद

अंतर द्वन्द कर बैठा मन पर चोट उस अन्तर नाद का शोर किसी ने नहीं सुना रख लिए हैं मैंने कानों पर दोनों हाथ लगा की घुल गया है सीसा जैसे पिघला हुआ .तन्हा हूँ मैं भरी महफ़िल में और भीड़ में भी हूँ अकेली छिटकी सी हुई कर लेती हूँ खुद को खुद में ही बंद सबकी नज़रों
 
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एक मुलाक़ात ...शहीद की आत्मा से

कल रात एक विचित्र बात हो गयी स्वप्न में भगत सिंह की आत्मा से मेरी मुलाकात हो गयीज़र- ज़र थी बहुतपीड़ित थी वेदना सेलहू लुहान थी वोअपनों की प्रताड़ना सेविस्मित सी बस मैंदेखे जा रही थीविस्मित सी बस मैं देखे जा रही थी उस आत्मा ने मुझ पर जैसे दृष्टि जमा दी थी
 
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बाज़ी दर बाज़ी

जिंदगी की बिसात पर रिश्तों की बाज़ी लगी होती है हर रिश्ता अपनी अहमियत लिए होता है खड़ा आमने सामने .कोई प्यादा तो कोई वजीर सब चलते रहते हैं अपनी चालें आड़ी - तिरछी एक दूसरे को शह और मात देने की होड़ में और जब मिल जाती है किसी रिश्ते को मात तो मन भर जाता है
 
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भ्रामक सच..

सच है किसर्द रातों में गुदगुदे बिस्तर पर लिहाफ़ की गर्मी में बहुत सुकून भरी
 
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खामोशियाँ

खामोशियाँ जब बोलती हैं ज़ेहन का बर्क - दर- बर्क खोलती हैं होठ हिलते नहीं हैं मगर मन ही मन ना जाने कितने राज़ खोलती हैं आँखों में उतर आते हैं कितने ही सैलाब जब खामोश लबबोलते हैंलफ्ज़ जुबां सेनिकलते नहींफिर भीतास्सुरातचेहरे केबोलते हैं .आज मेरे
 
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महिला दिवस पर एक दृष्टिकोण ये भी....

ये  रचना मेरी छोटी बहन  मुदिता  ने आज महिला दिवस पर मुझे भेजी थी ...इसे मैं आप सभी के साथ बाँटना चाहती  हूँ....नारी दिवस के परिपेक्ष्य में अक्सर अभिव्यक्ति की अतिवादी विचारधारा देखने को मिलती है ..नारी को हमेशा एक सहज मानुष
 
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अवचेतन मन की चेतना

मन के अवचेतन में कुछ चेतन सा चलता रहता है एक आग लगी हो सीने में और मन धधकता रहता है सोचों से परे कोई चिंगारी भड़कती रहती है खुद के वजूद की तलाश में एक आग सुलगती रहती है टूट टूट कर बिखर गयी और हर कणकण में समा गया फिर भी कोई मुझ पर बेगैरत की तोहमत लगा गया
 
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आखिर बुरा क्या है ?

मन के दरख्त पर जमा ली हैं ख्वाहिशों ने अपनी जड़ें और जा रही हैं फलती फूलती अमर बेल की तरह उत्तरोत्तर .रसविहीन दरख्त मौन है बना हुआ पंगु सा जब होगा एहसास हकीकत का तो हो जाएँगी सारी बेलें धूल धूसरित .मन ने सोचा किख्वाहिशों की ख्वाहिश पलने दो अंत में तो
 
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टुकड़े टुकड़े ख्वाब

गर्भ -गृह से आँखों की खिड़की खोल पलकों की ओट से मेरे ख़्वाबों ने धीरे से बाहर झाँका कोहरे की गहन चादर से सब कुछ ढका हुआ था .धीरे धीरे हकीक़त के ताप ने कम कर दी गहनता कोहरे की और ख़्वाबों ने डर के मारे बंद कर लीं अपनी आँखे .क्यों कि -उन्हें दिखाई दे गयीं थी
 
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Feb 22 2010 05:57 PM
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कलम आपकी या आपका

आज आपके सामने एक संशय ले कर हाज़िर हुई हूँ...कि कलम शब्द पुल्लिंग है या स्त्रीलिंग...?दरअसल बात है जब मैं किसी एक साईट पर गतिका के नाम से लिखती थी...किसी ने मुझसे पूछा कि गतिका नाम क्यों लगाया है आपने अपने नाम के साथ? मैंने कहा कि बस ये एहसास रहे कि मेरी
 
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Feb 20 2010 08:33 AM
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चरैवेति - चरैवेति ( निरंतर चलना )

मैं जलधिमरुस्थल का खारेपन के साथ मुझमे रेत भी शामिल है उड़ चलूँ मैं आँधियों के साथ ये फन मुझे हासिल है .मुट्ठी में बंद कर बांधने की करो कोशिश तो रेत की तरह ही मुट्ठी से फिसल जाती हूँ अतृप्त सी हैं इच्छाएं और है गरल कंठ में तृप्त होने के भाव का स्वांग सा
 
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आख़िर किसे?

दो साल से ज्यादा वक़्त हो गया इस लघु कथा को लिखे....पर जब भी कहीं बम विस्फोट होता है तो अचानक ही ये कथा कौंध जाती है मस्तिष्क में .....आज भी पुणे में बम विस्फोट हुआ..न जाने कितने निर्दोष इसकी चपेट में आए होंगे....और कितने घरों में कोहराम छाया होगा....मन
 
sangeeta swarup
Feb 13 2010 11:57 PM
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फिर कैसे मल्लहार सुनाऊं

अंसुअन की स्याही सूख गयी मैं कलम कहाँ डुबाऊंअपनी मन की व्यथा कथा मैं किन शब्दों में कह जाऊंप्रतिपल घटता जीवन जैसे कैसे मैं ठांव लगाऊंचलता जीवन बहता दरिया , कैसे मैं बाँध बनाऊंसोच भंवर के चलते जाते कैसे मैं पार हो पाऊंतेज़ है धारा कश्ती उलटी ,कैसे पतवार
 
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Feb 12 2010 06:20 PM
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अकुलाहट

आकुल से मन की व्याकुल सी भाषा है छंद लिखूं कोई तो वो भी तो आधा है प्रखर है सोच, पर वेग ज़रा ज्यादा है बह जाता आवेश लिखने में बाधा है अवरुद्ध हुए भाव बस स्वार्थ ही साधा है संतुष्टि मिले कहाँ मन पर बोझ ही लादा है .आकुल से मन की व्याकुल सी भाषा है बह जाता
 
sangeeta swarup
Feb 10 2010 10:34 PM
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सागर किनारे

सागर किनारे मैं जब भी आई हर लहर में दिखी तेरी ही छवि समायी लहरों के स्पर्श से तेरी ही याद आई हर जगह देता है तेरा ही अक्स दिखाई सीली सी रेत पर तेरे नक़्शे- पा दिखते हैं उन पर चल मेरे कदम तुझ तक पहुंचते हैं ख़्वाबों की दुनियाबड़ी हंसीं लगती है ख्याल जैसे मेरे
 
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नर - नारी संवाद ..

नर ---हे प्रिय ,मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँतुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूँ तुम कहो तो चाँद तारों से तुम्हारी झोली भी भर सकता हूँ ।बस तुम मेरी ये प्यास बुझाओ मेरे दग्ध होठों को शीतल कर जाओ मैं तुममे समां जाऊं तुम मुझमें सिमट जाओ।नारी -----------दावा
 
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विडम्बना

अक्सर -सुबह सड़क परनन्हें बच्चों को देखती हूँ ,कुछ सजे - संवरे बस्ता उठायेबस के इंतज़ार मेंमाँ का हाथ थामे हुएस्कूल जाने के लिए उत्साहित से , प्यारे से ,लगता है देश का भविष्य बनने को आतुर हैं ।और कुछ नन्हे बच्चे नंगे पैर , नंगे बदनआंखों में मायूसी लिएचहरे
 
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ज़िंदगी, मात्र कल्पना नही होती है.

ज़िंदगी, मात्र कल्पना नही होती है.मानती हूँ कि-कल्पना की ज़िंदगी से बेहतरकोई ज़िंदगी नही होती है,जहाँ हर पलअपने ख्वाबों के अनुसारढाल लिया जाता हैहर सवाल,जी लेते हैं हर पलअपने ही ढंग सेमन में नही रहताफिर कोई मलालपर फिर भीज़िंदगी,मात्र कल्पना नही होती
 
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जीवन फूल और नारी का

जब - जब नारी की तुलना फूलों से की जाती है तब - तब ये छवि मन में उभर आती है।कि सच ही - नारी फूलों की तरह कोमल है फूलों की तरह मुस्कुराती है लोगों में हर दिन जीने का उत्साह जगाती है एक मुस्कराहट से सबके जीवन में नया उत्साह ले आती है।पर जब फूलों की तुलना
 
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