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15 Jun 2010
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महेश्वर यात्रा

छुट्टियों में कही जाने का कार्यक्रम नहीं बन पाया तो सोचा चलो एक दो दिन के लिए महेश्वर ही हो आया जाये.वैसे मालवा की गर्मी छोड़ कर निमाड़ की गर्मी में जाना कोई बुध्धिमात्तापूर्ण फैसला तो नहीं कहा जायेगा,पर और कही जाने के लिए सफ़र के लिए ही कम-से-कम २४ घंटे
 
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न्याय........

३ दिसम्बर १९८४ शाम को ५ बजे मम्मी और पास में रहने वाली वैध आंटी के साथ घूमने निकली। सूरज पश्चिम में डूबने को था.आसमान में सुर्ख लाल रंग बिखेर कर आगाह कर रहा था की,पंछियों घर जाओ मुझे जाना है। पंछी भी जैसे सूरज की चेतावनी को समझ कर अपने साथिओं को आवाज़े
 
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बोलिए....ये हमारे सरोकार हैं ..........

कितना पानी ढोलते है,मकान मालिक को तो पता ही नहीं,रोज़ रोज़ पाइप लगा कर नहाते है ,किससे कहे ,कैसे कहे? ये रोज़ ही महिला मंडली की चर्चा का विषय होता था.नयी बसी कालोनी में नित नए मकान बनते थे,जहा सामान की रखवाली के लिए चौकीदार होते थे,उन्हें टूबवेल चलने की
 
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समय

शादी के चार ही महीने बाद अपनी गृहस्थी ले कर गाँव में जाना पड़ा नेहा को । पति की पहली पोस्टिंग ,हेड ऑफिस पर रहना जरूरी था । छोटा सा गाँव उस पर साहब का तमगा,गाँव की राजनीती,किसी के घर आना जाना नहीं होता था.घर में पड़े पड़े उकता जाती थी नेहा। तभी गाँव के
 
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यशी

स्कूल में मेरी छवि एक सख्त टीचर की है,उस पर विषय भी गणित ,तो विषय की मांग है विद्याथियों की एकाग्रता ,जो इस छवि में और भी सितारे जोड़ देती है.वैसे भी इतना कुछ होता है विद्यार्थियों को बताने के लिए की फालतू बातों के लिए समय भी नहीं होता, और यहाँ वहां की
 
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करें गर्मी का सामना

गर्मी की शुरुआत होते ही कूलर ,पंखे,एसी,उसका सामना करने जुट जाते है,लेकिन गर्मी की मार से बचाना आसान नहीं है. उस पर बिजली और पानी की कमी बचे हुए हौसले भी तोड़ देती है। यहाँ गर्मी से लड़ने के कुछ आसान और आजमाए हुए तरीके है ,इन्हें आप भी आजमाइए।(१० किलो बिना
 
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नियमो में कैद बचपन

मार्च आ गया इसी के साथ शुरू हो गया नया सत्र। नए सत्र के साथ ही नयी युनिफर्म्स,नए बैग ,नए शैक्षणिक कार्यक्रम के साथ ,कुछ नए और कुछ पुराने नियम । ये नियम बच्चों को कितना अनुशाषित करते है ये तो नहीं पता,पर कई नियम तो बच्चों पर लादे गए से लगते है । इनमे से
 
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होली

आज ईद है पर हमारे स्कूल में छुट्टी नहीं थी.सभी को गुस्सा आ रहा था.वैसे भी आज स्कूल का आखरी दिन था.२ मार्च से परीक्षाएं हैं । बच्चे भी पढ़ने के मूड में नहीं रहते। सभी सोच रहे थे की आज छुट्टी होती तो कितना अच्छा होता। कल घर जाते हुए सभी के मुह पर एक ही बात
 
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Feb 27 2010 05:20 PM
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स्त्री मूल्य

स्कूल से घर आते समय रास्ते पर भीड़ देखी,तो रुक कर लोगो से पूछा ,क्या हुआ?पता चला पास ही रहने वाले आदिवासी परिवार की एक लड़की को किसी लडके ने मोबाइल पर फोन किया और मिलने के लिए बुलाया.उस लडके को लड़की के घरवालों ने पकड़ लिया और अब उसकी धुलाई हो रही है। वह
 
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Feb 17 2010 09:16 PM
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दूध और मलाई

बचपन की जब यादे आती है तो याद आती है वे छोटी मोती शरारतें ,लड़ना झगड़ना,और छोटी मोटी गुस्ताखियाँ,जो उस समय निच्छल मन से की गयी हरकतें थी.बात जब की है जब हम रतलाम में रहते थे.न्यू रोड पर एक बड़ी सी बिल्डिंग जिसमे कई सारे किरायेदार रहते थे.उनका
 
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ड्यूटी

कल शाम घर लौटते हुए चौराहे पर लाल बत्ती होने से रुकना पड़ा.ग्रीन सिग्नल होने पर भी जब गाड़ियाँ रुकी रही तो कौतुहल हुआ की क्या कारण है?तभी यातायात पोलिसे का जवान एक ठेले वाले (जिसके ठेले पर लोहे के सरिये भरे थे ) के साथ-साथ उसे चौराहा पार करवाता हुआ निकला
 
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चिठ्ठियाँ .........६

शादी के बाद भी पत्रों का सिलसिला चलता रहा.सहेलियों के साथ,ननदों के साथ,और मायके जाने पर उनके साथ.अब हर पत्र एक अलग रंग का होता था.अब तो मम्मी के भी पत्र आते थे,जिसमे प्यार के साथ कई सीख भी होती थी,तो ससुरजी के पत्र भी जिसमे हमारे अकेले होने की चिंता के
 
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चिठ्ठियाँ ........५

खैर अब धड़कते दिल से चिठ्ठी लिखी, सहेलियों से भी सलाह ली गयी,जिन सहेलियों ने कभी कोई चिठ्ठी नहीं लिखी थी उन्होंने भी पूरे मनोयोग से बताया की क्या लिखना चाहिए और क्या बिलकुल नहीं लिखना चाहिए।पर इन सबके बावजूद उस एक बात का तो जवाब दिया ही नहीं की मम्मी-पापा
 
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प्रबुद्ध भारत के प्रति

स्कूल की प्रार्थनासभा के लिए स्वामी विवेकानंदजी पर सामग्री तलाश करते हुए उनकी लिखी एक कविता हाथ आयी,जो उन्होंने सन १८९८ में प्रबुद्ध भारत पत्रिका के मद्रास से स्वामीजी द्वारा स्थापित भ्रात्रमंडल के हाथों में अलमोधा को स्थान्तरित होने के अवसर पर लिखी थी।
 
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Jan 11 2010 04:15 PM
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चिठ्ठियाँ.....४

बस इसी तरह ठीक इसी तरह चिठ्ठियाँ लिखने का सिलसिला टूट जाया करता था सहेलियों के साथ भी, तब बहुत सारे शिकवे शिकायतों के साथ कभी बहुत बड़ा सा ख़त या कभी बहुत छोटा सा पत्र अपनी नाराजगी बताने के लिए लिखा जाता था.बैतूल में मेरी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी
 
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चिठ्ठियाँ .............3

खंडवा से जब हम बैतूल आये तब मन न जाने कैसा -कैसा हो गया.ऐसा लगा जैसे दिल को किसी ने मुठ्ठी में भींच दिया हो.युवावय की प्यारी सहेलियां जिनसे हर बात ,हर भावना साझा की जाती थी उन्हें छोड़ कर जाना ऐसा था जैसे अपने प्राण छोड़ कर शरीर कही और ले जाना। पर उस समय
 
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चिठ्ठियाँ.......2

अरे हाँ याद आया इंदौर में भी एक सहेली थी मेरे पड़ोस में ही रहती थी,हमारी शामें साथ ही गुजरती थी । रोज़ शाम को छत पर बैठ कर अपने-अपने स्कूल की बाते करना, ढेर सारे गाने गाना,और जो भी कोई फिल्म देख कर आता उसकी स्टोरी दूसरे को सुनना। एक बार उससे झगडा भी हुआ
 
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चिठ्ठियाँ

आज एक ब्लॉग पढ़ा जिसमे चिठ्ठियों का जिक्र था, पढ़ कर कई सारी पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं। मैं जब कक्षा ४ में थी तब हम लोग रतलाम से झाबुआ जिले के एक छोटे से गांव रानापुर में ट्रान्सफर हो कर गए थे । वह अपनी सहेलियों से बिछड़ने का पहला मौका था। आंसू भरी आँखों
 
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"परेंटिंग स्किल"

घर के पास ही एक आदिवासी परिवार रहता है.पति-पत्नी और उनके ५ बच्चे.सारा दिन गाय-बकरियां चराते हुए यहाँ-वहां घूमते रहते है। मां-बाप सुबह से ही काम पर निकल जातेऔर बच्चे अपने काम पर,घर का दरवाजा ऐसे ही अटका दिया जाता.जब भी कोई बच्चा वहां से निकालता एक नज़र
 
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पोल सर ; एक विनम्र श्रधांजलि,

कल पुराने पपेर्स इकठ्ठा करते हुए कोने में छपी एक छोटी सी खबर पर नज़र गयी."गणित को सरल बनाने वाले "सर"। पड़ते ही जेहन में पोल सर का नाम कौंधा.गणित को सरल बनाने वाले उसे दिलचस्प बनाने वाले,हमारे अपने श्री विश्वनाथ मार्तंड पोल सर। उनका निधन १६ दिसंबर को च
 
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क्यूँ छीना मेरा चीर

मेरे पिता ने बड़े नाजों से पला मुझे ,सदा सजा संवार कर रखा ,मुझे हरी नीली ओढ़नी पहराई उस पर अनगिनत रंगबिरंगे फूल सजाये ।मेरी चोटी में बर्फ से सफ़ेद फूलोंकी माला गुथी । में बहुत खुश थी इठलाती फिरती थी लहरों के साथ उछलती रहती थी दिन रत अपनी नीली ओधनी को
 
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ममता

रोज़ की तरह सुबह घर से स्कूल जाते हुए रस्ते में बनने वाले एक घर को देखती। वहां देखभाल कराने वाले चौकीदार के परिवार में दो छोटे -छोटे बच्चे भी हैं जो सड़क पर खेलते रहते हैं .जब भी कोई गाड़ी निकलती उनकी माँ उन बच्चों को किनारे कर लेती .वहां से गुजरते हुए
 
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विरासत

गर्मियों की एक दोपहर गर्म हवाओं के थपेड़ों को घर में घुसने से रोकने के लिए दरवाजे खिड़की बंद कर बैठी थी ,कि दरवाजों कि संध को रास्ता बना कर एक आवाज़ भीतर तक घुस आयी ,घी लिलो-घी लेलो.अलसाई दुपहरी में ये कौन आ गया ,बुदबुदाते हुए थोड़ी सी खिड़की खोल कर ब
 
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छुट्टी

अल टी सी लेने का समय दिसम्बर तक ही है.अभी कही नही गए तो निरस्त हो जायेगी,पति ने कहा तो वो सोच में में पड़ गयी.पिछले तीन सालों से कहीं घुमाने नही जा पाए,क्या करे क्या न करे.जाने में घर की व्यवस्था करने में कोई दिक्कत नही है पर छुट्टी लेना बहुत मुश्किल
 
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Nov 26 2009 05:22 PM
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तसल्ली

अरे बेटा यहा आ भैया को चोट लग जायेगी. कहते हुए माजी ने मिनी को अपनी गोद मे खीच लिया. मम्मी के पास भैया है ना ,थोडे दिनो मे वो मिनी के पास आ जायेगा,उसके साथ खेलेगा, मिनी उसे राखी बान्धेगी . माजी के स्वर मे पोते के आने की आस छ्लक रही थी.नेहा को भी बस उ
 
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Nov 26 2009 05:22 PM
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एक सुबह

रविवार की सुबह, हलकी गुलाबी ठण्ड एक बार तो सोचा एक झपकी और ले लूँ .लेकिन रविवार की सुबह जैसी सुकूनदाई सुबह नही होती ये सोच कर सारा आलस रजाई के साथ झटक के दूर फेंका और उठ खड़ी हुई.खिड़की से झाँका तो नव आदित्य को भी कुहासे के लिहाफ को परे खसका कर उठते द
 
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Nov 26 2009 05:22 PM
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मोनू

ऊउउऊ ............ मोनू के रोने की आवाज़ सुन कर सुनीति चौक गयी.क्या हुआ बेटा ?मम्मा दादी ने सोनू को ज्यादा जामुन दी मुझे कम दी .दादी हमेशा ऐसा ही करती है। सोनू को हर चीज ज्यादा देती है। मोनू की आवाज़ में दिल को छलनी कर देने वाली कातरता थी। नही बेटा ऐस
 
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Nov 26 2009 05:22 PM
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भीड़ तंत्र

शायद स्कूली दिनों में मेरी नागरिक शास्त्र की शिक्षिका बहुत अच्छी थी या मैं ही बहुत लगन से पदती थी जो मैं आम भारतीय के मौलिक अधिकारों के बारे में बहुत अच्छे से न सिर्फ़ पढ़ा बल्कि कंठस्थ भी कर लिया। इसीलिए अपने अधिकारों के प्रति सजग रहते हुए ग़लत बात
 
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Nov 26 2009 05:22 PM
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ख़बर

चार साल की मासूम से balatkar khbar देखते ही मन kasaila हो गया.iदीदी दरवाजा लगा लो,बाई ने जाते हुए आवाज़ दी तो टीवी के सामने से उठना ही पड़ा.बहार आते हुए बिटिया के कमरे में नज़र गयी वो अपनी किताबों में सर झुकाए बैठी थी बहर ठंडी हवा के झोंकों ने रोक लिया
 
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Nov 26 2009 05:22 PM
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mamta

रोज़ की तरह सुबह घर से स्कूल जाते हुए रस्ते में बनने वाले एक घर को देखती। वहां देखभाल कराने वाले चौकीदार के परिवार में दो छोटे -छोटे बच्चे भी हैं जो सड़क पर खेलते रहते हैं .जब भी कोई गाड़ी निकलती उनकी माँ उन बच्चों को किनारे कर लेती .वहां से गुजरते हुए
 
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Nov 26 2009 05:22 PM
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"हेलो मर जाओगे"

कहते है इन्दौर दिल वालो का शहर है. यहा कि हवाओ मे अपनेपन की महक है.यहा हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की चिन्ता करता है,उसके लिये फ़िक्रमन्द है.अब ये ही लीजिये ,एक बार मे डाक्तर को दिखाने के लिये समय लेने गयी.समय मेरी सुविधा के अनुसार नही मिल रहा था तो मे ब
 
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kyun nahin koi rakhwala?

pag-pag neer dag-dag roti wale malwa ki halat registan si ho gayee.panchiyon ka basera chhin gaya.hawa bhi patton ke jhunjhunon ko yad kar udas hai uski tapish harhe wale,uski raftar ko tham lene wale khud hi bejan pade hai.hawa ki har sans me tano jahar
 
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Oct 25 2009 04:20 PM
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dukawa kase kahun/

woh uchakati ja rahi thi apane panjon par.lahnga choli par fhati chunari bamushkil sar dhank pa rahi thi hanth bhi to jal rahe honge.ma kei chhaya me chote chote dag bharti,sukh gaye honthon par jibh ferti,ma mujhe godh me utha lo ki ichcha ko sukhe thuk
 
kase kahun?by kavita.
May 10 2009 04:21 PM