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17 Jun 2010
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तन्हाई भी एक आईना है

कई दिनों तक  वायरल बुखार का शिकार था। तन्हाई में था। तन्हाई भी एक  आईना है- हम ऐसी चीजें देख पाते हैं, जो भीड़भाड़ में नहीं दिखाई देतीं। सो, पाकिस्तानी कवयित्री परवीन शाकिर की  चार टुकड़ों में लिखी यह बहुत ही प्यारी कविता
 
अरविन्द चतुर्वेद
Jun 17 2010 09:56 PM
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कवि को हक है थोड़ा खेले भी !

हर कवि को यह हक है कि वह भाषा में और अपनी कविता में थोड़ा खेले भी। बशर्ते वह खिलवाड़ न हो, बल्कि कविता में कुछ गहरे अर्थ और आशय वह उपस्थित कर सके। तभी कवि के खेलने की सार्थकता है। उदाहरण के लिए कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी की यह कविता। इसके लिखे जाने का वर्ष ही
 
अरविन्द चतुर्वेद
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देर हो जाने की नियति या दुख!

आज फिर अशोक वाजपेयी की ही कविता। साल 1994 की। देर हो जाने की नियति या देर हो जाने के दुख के साथ। पढ़नेवाले को संजीदा कर देती है यह कविता।० देर हो जाएगी/अशोक वाजपेयी ०  देर हो जाएगी-बंद हो जाएगी समय से कुछ मिनिट पहले हीउम्मीद की खिड़कीयह कहकर कि गाड़ी
 
अरविन्द चतुर्वेद
May 31 2010 09:53 PM
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अशोक वाजपेयी की एक और प्यारी कविता

अशोक वाजपेयी की कविता के कई रंग हैं। उनके पास अपनी काव्यभाषा और अपना मुहावरा है। उनमें मूर्तन-अमूर्तन की लुकाछिपी, सूक्ष्म को स्थूल-स्थूल को सूक्ष्म तथा प्रत्यक्ष को अप्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष बनाकर कविता में उपस्थित करने की असाधारण योग्यता
 
अरविन्द चतुर्वेद
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अशोक वाजपेयी की कविता

हिन्दी के सुपरिचित कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी की लगभग तीस बरस पुरानी यानी 1990 में लिखी यह कविता जीवन में जिन जरूरी चीजों को सहेजने की बात करती है, उससे भला कौन सहमत नहीं होगा? यहां जीवन को अपनी तरह से जीने और बरतने का भी मामला है। पढि.ए कविता-:: एक बार जो
 
अरविन्द चतुर्वेद
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यह गरमी तो...!

अरविंद चतुर्वेद----------------यह गरमी तो पिघला देगी!हमें-आपको पिघला देगी।झुलस रहे जो फुटपाथों परवे क्यों भला बजाएं तालीनेताजी की आग उगलती बातों पर!झटके पर झटका खाते हैंवे बेचारे, सरकार और मौसम कीसारी उलटी-सीधी घातों पर।लोकतंत्र में लोक कहां हैहमें-आपको
 
अरविन्द चतुर्वेद
May 24 2010 08:23 PM
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जनता का गाना

अरविंद चतुर्वेद :बोलो यारो, अब भी क्या कुछ बाकी रहा जमाने मेंकटे जिंदगी अपनी ऐसे, जैसे जेहलखाने में!बोझा ढोओ मत सुस्ताओहंसकर कहो कहानी,बीते जुग की बात नहीं हैराजा भी हैं, रानीउनके घोड़े-हाथी भी हैं सबकुछ है तहखाने मेंकटे जिंदगी अपनी ऐसे, जैसे जेहलखाने
 
अरविन्द चतुर्वेद
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लीप-पोतकर किया बराबर

(उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार के तीन साल पूरे होने पर)अरविंद चतुर्वेद-----------------लीप-पोतकर किया बराबर!पहन-पहन कर नोट की मालाबैठ गइं यूपी की खालाहुआ खजाना खाली,दरबार सजाकर आलीशानचाटुकार करते गुणगानचलो, बजाओ ताली,पूरब से पच्छिम तक देखो सजी हुई सरकार
 
अरविन्द चतुर्वेद
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निरुपमाओं के लिए निर्मम खाप फरमानों के इस दौर में

यह बेहद क्रूर और कठिन दौर है कोमल-तरल सम्बंधों के लिए। खूबसूरती के खिलाफ बदसूरत और सुगंध के खिलाफ दुर्गन्ध भरा दौर। निरूपमाओं के लिए निर्मम खाप फरमानों के इस दौर में पढि.ए नीलेश रघुवंशी की एक बेहद मार्मिक कविता। हिन्दी कविता की दुनिया में नीलेश रघुवंशी
 
अरविन्द चतुर्वेद
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॥ आकाश में आगामारी पंछी॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : सोलह)देखो जरा, आकाश में आगामारी पंछीकैसे उड़ रहे हैं कतार मेंउनके डैनों के छोर परगोया चमचमा रही हैं चांदी की झालरें।और देखो, वर्षा को निमंत्रण देनेवालेचील और हेडे पंछी भीकैसे उलट-पुलट कर उड़ रहे हैंजिनके गले में सुशोभित है
 
अरविन्द चतुर्वेद
May 03 2010 08:35 PM
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॥ डरपोक और डिगने वाले नहीं॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : पंद्रह)डूराडीह गांव का कुंदन मुंडानहीं है डरपोक,रामगढ़ का रतन मुंडा डिगने वाला नहीं है।धौंस-पटूटी जमाने वालों औरदारोगा-सिपाहियों सेनहीं डरने वाला वह,छैल चिकनिया बाबुओं केझांसे में नहीं आनेवालानहीं है डिगने वाला वह,चटूटान
 
अरविन्द चतुर्वेद
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॥ हे मैना पाखी॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : चौदह)हे मैना पाखी!देखो, सिसई का चारागाहजलने लगा हैतुम कहां चुगने जाओगी?देखो मैना,तुम्हारा तेलई का मैदान भीझुलसने लगा हैकहां से तुम चुनोगी तिनका?देखो, आधा चारागाह जल रहा हैतो आधे में चुगोझुलसते मैदान के बचे हुएहिस्से में
 
अरविन्द चतुर्वेद
Apr 29 2010 01:33 PM
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॥ अगर भौजाई लाओ॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : तेरह)हे भइया, अगर भौजाई लाओतो खाते-पीते घर से ही लानाजहां शुद्ध हंड़िया पी जाती होआचार-विचार अच्छे होंमान-मर्यादा अच्छी हो।यह कैसे मुमकिन है भाई,हम तो बिन मां के- अनाथ हैंकैसे मिलेगा ऐसा घरहमारे पिता भी नहीं- अनाथ हैं!
 
अरविन्द चतुर्वेद
Apr 28 2010 08:25 PM
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॥ सजाया है खोंपा॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : बारह)हे मां, यह किस चीज सेसजाया है खोंपा,चकचक कर रहा है!हे मां, यह किस सूत सेबनी है साड़ी,धारीदार दिख रही है!हे बिटिया, यह सरसों तेल मेंचुपड़ा खोंपा है,चकचक कर रहा हैबिटिया, बड़ी जात वाली कपास कासूत है यहजो धारीदार दिख रहा है।
 
अरविन्द चतुर्वेद
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॥ कंदमूल और मछलियां॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : ग्यारह)भेलवा और कुसुम के पेड़ों वाली ढलान परदेखो, लहलहा रहे हैं कंदमूलझाड़ियों से ढंके नाले औरलताओं से पटी तराई के पानी मेंमछलियां खेल रही हैं आंखमिचौनीलहलहाते कंदमूल को खोद लाओ दोस्तआंखमिचौनी खेलती मछलियां पकड़ लाओ!अरे दोस्त,
 
अरविन्द चतुर्वेद
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॥ एक पलड़े के तराजू वाले॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : दस)पहाड़ों की ढलान से उतरने वालेऔर तराई के रास्तों पर चलने वालेये व्यापारी गण।झूमते-झामते उतरने वाले औरआहिस्ता-आहिस्ता बढ़ने वालेये व्यापारी गण।इमली के वृक्ष तले सुस्ताने वालेअमराई में डेरा डालने वालेये व्यापारी गण।अरे भाई,
 
अरविन्द चतुर्वेद
Apr 24 2010 08:05 PM
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॥ ऐ लड़की॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : नौ)ऐ लड़की, तेरी मां और चाचियांसरहुल के त्यौहार पर हास-परिहास में लगी हैंपर तू तो घर के पिछवाड़ेगुमसुम खड़ी हैतेरे पिता और चाचा लोग गए हैं अनुष्ठान मेंपर तू तो बाहर, खाई के पास दुबकी पड़ी है।पिछवाड़े खड़ी होऔर छप्पर का पानी तुम
 
अरविन्द चतुर्वेद
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॥ हे दुनिया वालो॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : आठ)साल वृक्ष की कोंपलों पर बैठेक्यों मिरू पाखी, तुम ही रोया करोगे?गोरार लताओं की झाड़ी मेंकारे पाखी, तुम्हारी छाती की धड़कन हीक्यों सुनाई देती है?हे दुनिया वालो, मैं ही रोता हूंक्योंकि साल वृक्ष की डाल टूट गई हैहे भाई, मेरी
 
अरविन्द चतुर्वेद
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॥ हे बिटिया॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : सात)हे बिटिया,जब तुम्हारा जन्म हुआबुंडू शहर जंगल से घिरा हुआ थातुम जब बच्ची थीलबालब पानी भरा था चुआं में।हे बिटिया,जबतक तू चंचल किशोरी हुईबुंडू का जंगल उजड़ गयाजबतक तू हुई जवानचुआं का पानी सूख गया।
 
अरविन्द चतुर्वेद
Apr 16 2010 09:14 PM
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॥ आगे नहीं, पीछे नहीं॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : छह)हे सखी, अगर जंगल में लकड़ी लाने जानातो कभी आगे मत रहना!हे बहन, अगर जंगल में पत्ते चुनने जानातो कभी पीछे नहीं रहना!इस जमाने मेंबदसूरत कुल्हाड़ी ही शेर बन गई है,कभी आगे नहीं रहना!मुडे. हुए पत्ते हीआजकल सांप बन गए हैं,कभी
 
अरविन्द चतुर्वेद
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॥ रोज रोज की गरीबी॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : पांच)रोज रोज की गरीबी कहो या नींद का मरणमैं कबतक और कितनी इसकी चिंता में रहूं!रोज रोज की झंझट कहो या जी का जंजालकितनी बार ओझा के दरवाजे दौड़ लगाऊं।ओह, कबतक इन सबकी चिंता में जलूं?घर की सारी भेड़-बकरियांबेच-खाकर खत्म हो गईं
 
अरविन्द चतुर्वेद
Apr 14 2010 09:39 PM
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॥ अयोध्या सुलग रही है॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : चार)हे राम-लक्ष्मणदेखिए, लंका जल रही है!हे सीता ठकुरानीदेखिए, अयोध्या सुलग रही है!किसने आग लगाईलंका धधक रही है?किसने फेंकी चिनगारीअयोध्या सुलग रही है?धांगर ने लगाई आगलंका धधक रही हैमायावी की चिनगारी सेदेखो, अयोध्या सुलग रही
 
अरविन्द चतुर्वेद
Apr 13 2010 09:04 PM
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॥ बित्ता भर पेट के लिए॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : तीन)टूटी-फूटी झोपड़ी का यह हालकि हर तरफ चू रहा है बरसात का पानीखपरैल वाले घर की ऐसी हालतकि जहां-तहां से घुस रहा है बरसात का पानीक्यों छाजन के लिए पहाड़ परनहीं है साउड़ी घासजो हर तरफ चूने लगा है पानी?नदियों में क्या नहीं है
 
अरविन्द चतुर्वेद
Apr 12 2010 09:26 PM
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॥ दिनचर्या॥

(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : दो)उठ बिहान मैं खेत गई थी धान रोपनेदुपहरिया तक पूरी हुई रोपाईरस्ते की चढ़ान और उतराईदौड़ी-दौड़ी घर आईघर से फिर पड़ोस के गांव जोजोहातू गईवहां किया बनिहारीलौटी घरउसको कूट-पीस करपकाया साग-भाततब तक शाम घिर आई,आने लगी अखाड़े परअब
 
अरविन्द चतुर्वेद
Apr 11 2010 08:20 PM
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यहां से देखिए झारखंड को

अरविंद चतुर्वेद :अपने जन्मकाल से ही अस्थिरता, उथलपुथल और राजनीतिक-प्रशासनिक भ्रष्टाचार का शिकार होते आ रहे झारखंड को सिर्फ माओवादियों या शिबू सोरेन की सरकार के चश्मे से देखने से जनजीवन का मर्म नहीं समझा जा सकता। आइए, आज से आपको मुंडारी भाषा के कुछ
 
अरविन्द चतुर्वेद
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मृत्यु विह्वल कर ही देती है!

किसी भी आत्मीय की मृत्यु विह्वल कर देती है। और फिर पुत्रशोक की विह्वलता के बारे में तो कहना ही क्या। इस संदर्भ में कवि श्रीकांत वर्मा की यह कविता पढ़ने के पूर्व इतना याद रखिए कि परिस्थितिवश काशी में श्मशान के डोम का काम करने वाले राजा हरिश्चंद्र के पुत्र
 
अरविन्द चतुर्वेद
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अपने अपने राम

अरविन्द चतुर्वेद :समर-भूमि में जब राम और रावण आमने-सामने हुए, तब दोनों किस हालत में थे? राम पैदल थे और रावण रथ पर सवार था। गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं-रावण रथी विरथ रघुवीरा। यानी रावण रथयात्री था और राम पदयात्री। राम-रावण युद्ध रथयात्री और पदयात्री के
 
अरविन्द चतुर्वेद
Mar 25 2010 09:57 PM
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काशी में मणिकर्णिका

काशी यानी बनारस में गंगातट पर पुराण प्रसिद्ध श्मशान मणिकर्णिका घाट। कहते हैं कि जब भगवान शिव सती का शव कांधे पर लिए बेचैन भटक रहे थे तो उनके कान की मणि यहीं गिरी थी। सो मणिकर्णिका। इस श्मशान में कभी चिता की आग नहीं बुझती- शवों का तांता लगा रहता है
 
अरविन्द चतुर्वेद
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जो बचेगा कैसे रचेगा!

रचने को यानी सृजन को इस तरह भी देख सकते हैं कि अपना "सबकुछ" देकर ही कुछ रचा या सिरजा जा सकता है। कवि त्रिलोचन कहा करते थे कि कविता समूची जिंदगी मांगती है। वैसे भी प्रकृति को देखिए तो पाएंगे कि पतझर में अपना सर्वस्व दे चुकने के बाद वृक्ष हरियाली का नया
 
अरविन्द चतुर्वेद
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श्रीकांत वर्मा की तरह पूछिए सवाल

कवि श्रीकांत वर्मा के दो कविता संग्रहों से एक-एक कविता आपसे साझा करने को जी चाहता है। पहली कविता उनके बाद के यानी अंतिम कविता पुस्तक मगध से ली गई है और दूसरी कविता मगध से पहले वाले संग्रह जलसाघर से ली गई है। जलसाघर 1973 में छपा था, जबकि मगध इसके ग्यारह
 
अरविन्द चतुर्वेद
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बजी कहीं शहनाई सारी रात : बिस्मिल्ला खां का जन्मदिन

अरविंद चतुर्वेद :प्रगाढ़ प्रेम की बेचैनी भरा कवि रमानाथ अवस्थी का एक गीत है- सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात।और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात...।क्या पता आज किसी के मन में जल तरंग बजता है या नहीं, या फिर किसी की याद में वायलिन की उदास धुन बेचैन करती
 
अरविन्द चतुर्वेद
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देश की दिशा बकौल रघुवीर सहाय

1970 से 1975 तक की रघुवीर जी की कविताएं उनके कविता संग्रह हंसो हंसो जल्दी हंसो में संग्रहीत हैं। इसी संग्रह में है यह विडम्बना व्यक्त करती व्यंग्य कविता-अतुकांत चंद्रकांतचंद्रकांत बावन में प्रेम में डूबा थासत्तावन में चुनाव उसको अजूबा थाबासठ में चिंतित
 
अरविन्द चतुर्वेद
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रघुवीर सहाय की तीन कविताएं

आज की कविता ने अपनी राह के लिए जिन पूर्ववर्ती कवियों से रोशनी पाई है, उनमें रघुवीर सहाय बेहद महत्वपूर्ण हैं। यहां उनकी तीन छोटी कविताएं प्रस्तुत हैं-।। मेरी बेटी।।दुबली थकी हारी एक छोकरी काम पर जाती थीदूर से मैंने उसे आते हुए देखापर जितनी देर में मैंने
 
अरविन्द चतुर्वेद
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सिर्फ एक कौवा

अरविंद चतुर्वेदसिर्फ एक कौवाक्रां-क्रां करताकबसे मुंडेर पर बैठाबड़े गुस्से में चोंच से खुरच रहा है धूपबुद्धू कहीं के!छाया में बैठी जीभ चाटती बिल्लीहैरान है- धूप क्या कोई चमकौवा कागज की पन्नीया चांदी की पत्तर हैजो खुरचने से छूट जाएगी?खुद में परेशान
 
अरविन्द चतुर्वेद
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आए दिन बहार के उर्फ पैरोडी-2009

अरविंद चतुर्वेदआए दिन बहार केशेयर बाजार केतेरे-मेरे प्यार के!वाह घोटाला-वाह घोटाला-वाह घोटालासत्यम असत्यम, असत्यम सत्यम जय मधु कोड़ासारी घास खा के निकल गया रेस का घोड़ापाकों में मूर्तियों पर सर्वधन स्वाहाबम विस्फोट, मारकाट, लाठीचार्ज आहाचलो चलो कपडे. उतार
 
अरविन्द चतुर्वेद
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एक कवि की प्रेम कविता जिसे उसके बुढ़ापे में देखा था

विख्यात जनकवि नागार्जुन को मैंने उनके बुढ़ापे में देखा था। कोलकाता में उनसे अच्छी मुलाकातें भी हुईं - कई बार, कई दिनों तक। बहुतेरे दूसरे लोगों की तरह मैं भी उन्हें बाबा’ कहता था। यहां मेरे जन्म से एक साल पहले यानी 1957 में लिखी उनकी एक प्रेम कविता
 
अरविन्द चतुर्वेद
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बौराए हैं आम

अरविन्द चतुर्वेद रह रह छाया कांपती सदा हवा के संग.आँखों से उड़ जात है मौसम का हर रंग..पेड़ तप रहे धूप में रह रह उठती आह.पगडण्डी की पीठ पर बंजारे की राह..हरियाली के नाम पर मन में उठती हूक.परती धरती क्या कहे हुआ कलेजा टूक..गुस्से में सूरज तपे हुई कौन-सी
 
अरविन्द चतुर्वेद
Mar 07 2010 08:26 PM
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बानगी है यह !

देश आजाद हुआ १९४७ में और भारतीय गणतंत्र प्रतिष्ठित हुआ २६ जनवरी १९५० को. लेकिन तभी से सत्तारूढ़ दल की छत्रछाया में भ्रष्टाचार और तस्करी का मर्ज भी पैदा हो चुका था. इसलिए यह नहीं मानना चाहिए कि यह कोई हाल-फिलहाल की बीमारी है. बानगी के तौर पर १९५३ में लिखी
 
अरविन्द चतुर्वेद
Mar 04 2010 09:48 PM
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संगतकार दोस्तों

संगतकार दोस्तोंअब इस ब्लॉग पर अपनी पसंद की दूसरे कवियों की कविताएं पढ़ाने का सिलसिला शुरू कर रहा हूँ. बीच-बीच में अपनी कविताएं भी आपकी सेवा में
 
अरविन्द चतुर्वेद
Mar 02 2010 07:02 PM
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मर्ज हुआ ऐसा हुआ

ऐसी उठापटक है, ऐसा कौवा - कांव.नौका में जल भर गया पानी में है नाव..जर्जर नौका पर चले महगाई की धार.बीच भंवर में काम क्या आएगी पतवार..आपस में चलती रही फूट फूट औ फूट.डाकू- चोर मिले रहे लूट लूट औ लूट ..बिन बरसे बादल गए, गए महीनों- साल.देश तरक्की कर गया अभी
 
अरविन्द चतुर्वेद
Feb 25 2010 09:13 PM