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मेरे विचार, मेरी कवितायें

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13 Jun 2010
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आसमान के पेशेवर होने से बस थोड़ा सा पहले…

लोकेशन – कोयमबटूर… साल २००७ के जुलाई महीने का पहला हफ़्ता… दो महीने चली एक रिगरस ट्रेनिंग के बाद आने वाले ४-५ दिनों में हमें अपनी अपनी ब्रांच लोकेशन्स में रिपोर्ट करना था… फ़ोटो खिंचाई अभियान जोरों शोरों पर था और स्लैम बुक भरवाई कार्यक्रम भी… दो
 
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वो लोग जो पहाड़ हैं…

वो हमारी कम्पनी का फ़ेस है… कम्पनी का मेन गेट खोलिये और दीवार पर लगे कम्पनी के एक बड़े लोगो(Logo) के साथ साथ, कानों में हेडसेट लगाये हुये उसकी मुस्कुराहट आपका स्वागत करती है। हमारी कम्पनी की सारी इनकमिंग और आउटगोइंग कॉल्स भी बिना उसकी इजाजत के कहीं कनेक्ट
 
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राजनीति – मेरी नज़र से

किसी फ्लॉप मूवी का एक डायलाग था कि यूपी-बिहार में हर घर में एक आईएएस, एक नेता और एक गुंडा होता है… मुझे ये कथन बड़ा जमीनी लगता है। मेरे बाबा एक स्वंत्रता सेनानी थे और एक कट्टर कांग्रेसी। मुझे याद है बचपन मे वो मुझे आजादी की लड़ाई के किस्से सुनाया करते थे
 
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आधी अधूरी ज़िन्दगी…

- सर, मिनरल वाटर ओर प्लेन वन? - ६० रूपीज फ़ोर अ वाटर बोट्ल? आप लोग एक्वागार्ड यूज करते है न अपने रेस्तरां में? - यस सर… - गुड, देन ब्रिंग प्लेन वाटर प्लीज़… - तुम्हे प्लेन वाटर चलेगा न? - या या… श्योर……   दोनो की वो पहली मुलाकात थी… दोनो को एक दूसरे
 
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हे आधुनिक कवि!!

हे आधुनिक कवि!  जिस पल तुम परेशान होकर ’क्या कविता लिखूँ’ कि उधेड़बुन में अपनी शर्ट की सिवन के साथ खेलते रहते हो… उस एक पल ही, न जाने कितनी कविताओं के पोशाकों की सिवन उधेड़ी जा रही होती है… उस एक पल ही, किसी दुनिया में कविताओं पर थोपी जा रही होती है
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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इक अकेली शाम…

वो  शाम  को  एक  दूध  की  बाल्टी  लेकर  दूध लेने निकल  जाता  है  और  उस  अकेली  शाम  उस  अकेले  घर  में  एक  अकेली  माँ,  दूध  लाने 
 
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मेरी नज़र से एक शख्सियत - संकल्प शर्मा

गुलज़ार  को  चाहने  वाले  कहते  हैं  कि  गुलज़ारियत  एक  धर्म  है। गुलज़ारियत को फ़ालो करने वाले  बडी आसानी से एक दूसरे को समझ लेते है जैसे दोनो ने ही आईने पहन रखे हो। गुलज़ारियन्स के  पास 
 
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अधूरी बातें…

- पता है, छोले बना रही हूँ! - हम्म....एक दिन वो तुम्हे बनायेंगे - तुम पागल हो चुके हो... - दुनिया भी यही समझती है - तो क्या मुझे इस दुनिया से परे मानते हो? - कुछ मान ही तो नहीं पाता - तुम्हारी आँखें कुछ ढूंढ रही है...? - हडप्पा… मोहनजोदडो… - वो क्या हैं?
 
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क्या लिख दूँ कि तुम लौट आओ

किताबें ही किताबें हैं.. टेबल पर उनका एक ढेर बनता जा रहा है… एक मीनार सी बन गयी है… झुकी हुई… कुछ कुछ पीसा की मीनार के जैसी… बस एक दिन गिरेगी धड़धडाकर और उसमे दबे दबे मैं भी किताबों के कीड़ो की मौत मर जाऊँगा… ये सोंचते हुए घंटो उन किताबो को देखता रहता
 
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भर्त्सना हो या जय जयकार, कोई मुझतक नहीं पहुचेगी…

छोड़ जाऊँगा कुछ कविता, कुछ कहानियाँ, कुछ विचार जिनमें होंगे कुछ प्यार के फूल कुछ तुम्हारे उसके दर्द की कथाएं कुछ समय – चिंताएं मेरे जाने के बाद ये मेरे नहीं होंगे मै कहाँ जाऊँगा, किधर जाऊँगा लौटकर आऊँगा कि नहीं कुछ पता नहीं लौटकर आया भी तो न मै इन्हे
 
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ब्वायेज विल बी ब्वायेज..

- समुद्र कितना इन्ट्रोवर्ट होता है न? - ह्म्म??? - भीतर कितना कुछ छुपाये रहता है और ऊपर से एकदम शांत… कमबख्त कभी किसी से मिलने कहीं जाता भी नहीं… जब देखो गधे लड़कों की तरह़ यहीं  पड़ा रहता है… मूडी भी है… - ह्म्म??? - कभी एकदम शांत और गंभीर, तो कभी
 
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थोड़ी गोसिप…

- हेलो  सर! मैं ___ बोल  रही  हूँ ___ बैंक से  - हम्म… - सर, आपको  पर्सनल  लोन  की  रिक्वायरमेंट है?  - नहीं।  - सर , कोई  रेफेरेंस ? (रेफेरेंस?? मैं  जानता  ही  किसे  हूँ… 
 
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क्या हम एक मूर्ख समाज है??

We are individually smart but collectively foolish as a society. कुछ दिन पहले रजनीश ने वी. रघुनाथन की किताब की इस पंक्ति का जिक्र किया तो मै घंटो इसके बारे मे सोचता रह गया… कितना कडवा है लेकिन ये एक सच है… हम बुद्धिजीवियो से भरे हुये लेकिन एक मूर्ख समाज
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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एक सडी हुयी पोस्ट…

हवा मे एक खामोशी है और मन मे एक कोलाहल… सुबह के ९ बज रहे हैं और सारे रूममेट अभी सो रहे हैं… आज न जाने कैसे सुबह ५ बजे ही मेरी आँख खुल गयी है और लग रहा है कि सुबह कुछ जल्दी हो गयी है… सोचा था घर की थोड़ी सफ़ाई करूँगा… कपडे भी भिगोने थे… खैर… सवेरे सवेरे ही
 
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अहसान फरामोश सा एक दिन..

दिन कभी कभी कितनी बेतरतीब तरीके से शुरू होता है जैसे उसे भी मेरे साथ ही ऑफिस जाना है... मैं तो लेटलतीफ हूँ लेकिन उस कमीने को मुझसे भी जल्दी रहती है... कहने को तो वो मुझसे हमेशा ही पहले उठता है लेकिन हमेशा ही उस एक वाश बेसिन के लिए हम दोनों फाइट करते
 
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सबसे बडा टिकट..

कहते है एक तस्वीर कई हज़ार शब्दो के बराबर होती है… :)     बहुत खुश हू और बहुत एक्साईटेड भी… दिमाग मे तरह तरह के विचार भी आ रहे है.. जैसे बैनर पर क्या लिखू.. क्या पहनकर जाऊ.. इत्यादि… इत्यादि… :)   वैसे काफ़ी तमन्नाये ऐसी भी है जिनका पूरा
 
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तुरई पुराण…

४ दिन पहले तुरई/तरोई खाने का बहुत मन कर रहा था… बनाये भी, खाये भी और साथ मे बज़ पर बजबजाये भी… ससुर (अजदक बाबा का फ़ेव शब्द) अब तक कोई न कोई उसपर टुनटुनाये जा रहा है…   आप भी इस तुरई पुराण का लुत्फ़ उठाईये, टुनटुनाईये/बज़बज़ाईये और देखिये की छोटी छोटी
 
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ख्वाहिशो की स्टेटस रिपोर्ट

आसमान तब भी उतना ही बड़ा था… बारिशें तब भी पूरा ही भिगोतीं थीं… वो पानी के बताशे तब भी लार गिरवाते थे… और वो आइसक्रीम तो उफ़्फ़… अस्थमा मरीज होने के कारण ठंडी चीज़ें खाना मना था… मतलब घर वालो के सामने खाना मना था… बाहर तो बस कुल्फियों के दौर चलते थे… तबियत
 
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दोस्ती की कॉकटेल!!

दोस्ती एक ऐसा रिश्ता होता है जो रेडीमेड नही आता… इस दुनिया मे कदम रखते ही हमे कुछ रिश्ते बनेबनाये मिल जाते है लेकिन हमे दोस्ती के रंग और साईज़ खुद ढूढने होते है…  यहाँ तक कि हमसफ़र भी ज्यादातर घर वाले ही तय करते है, पर दोस्त… दोस्त तो हमे खुद ही ढूढने
 
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चंद मुलाकातों की है दिल कि कहानी!!

कई  बार  यूँ  भी  होता  है  कि  ज़िन्दगी  कि  राह  पर  चंद  मुस्कुराहटें  पड़ी  मिल  जाती  हैं... कुछ  कुछ  उस  ५ रूपये के  सिक्के  कि  तरह 
 
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फेंको ये किताबें...

हाँ  हाँ  यादों  में  है  अब  भी, क्या  सुरीला  वो  जहाँ  था, हमारे  हाथों  में  रंगीन  गुब्बारे  थे, और  दिल  में  महकता  समां  था, यारा  हो 
 
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वो कायर है......

उसकी  एक  पर्सनल   डायरी  के  इंट्रो  में  लिखा  है  - 'मैं  कायर  हूँ'.. उसने  ये  सच  गाँधी  जी  की  आटोबायोग्राफी  से  प्रभावित  होकर 
 
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कुछ एं वें ही..

                      Dumb Charades तुमने वो सब कुछ, जो अपनी आँखों से बोला था, ज़िन्दगी आजतलक हमे उनके मायने समझाती है॥   Rebellion मैं रोज़ इस ज़िन्दगी से लडता था, माओ और चे की तरह नही, एक आम आदमी
 
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वो अधेड़ तन्हा आँखें!!

वो एक जोडी तन्हा आँखें, खिड़की की उस जानिब से हर राहगुजर मे कुछ ढूढती रहती हैं…… और उनके पीछे रखी टीवी के चैनल्स बदलते रहते हैं, बेटा टीवी के रिमोट से खेल रहा है, और वो आँखे अपनी यादो के रिमोट से… अधेड़ उम्र है उन आँखो की, किचन मे दूध के साथ कुछ जले हुए
 
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
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स्टेचू….

याद है, तुमने जब मुझे भरी रोड पर ’स्टेचू’ बोला था, वो लम्हा फ़्रीज़ हो गया था, सिर्फ़ तुम्हारे एक ’पास’ के इन्तजार मे..... आज जब ज़िन्दगी भागती है, हर एक लम्हे पर पाव रखकर.... मै मजबूर लम्हो के बीच, खडा सोचता हू, कि तुम आओ और ’स्टेचू’ बोल दो.... और इस बार
Mar 01 2010 11:04 PM
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पिछ्ले पन्नो से कुछ - रेत पे नाम!!

सुना है यादें संजोकर रखी जाती हैं इस गतिमान पर स्थिर ह्रदय में..... मेरी भी कुछ यादें उससे जुड़ी हुई हैं। न जाने हम कब तक समंदर के किनारे बैठे रहते थे, हर एक लहर को अपने पास आते और थोड़ा सा भिगोकर जाते हम साथ बैठे देखा करते। वो रेत पे मेरा नाम लिखती और
Feb 23 2010 06:31 AM
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स्वप्न!!

तुम्हे क्या कहूं ख़ुद ही बताओ, अपने नैनो की भाषा हमें भी समझाओ, शायर की ग़ज़ल कहूं या कहूं 'पंकज' की कविता, आंखों को तेरी कमल कहूं या सूर्योदय मैं सविता । झील सी इन आंखों को हल्के हल्के, उठाने के बाद जैसे ही देखती हो, हल्का सा मुस्कुराकर , जब कुछ कहती हो
Feb 21 2010 11:52 AM
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तन्हाई का फ़ैशन…

आजकल तन्हाई का फ़ैशन है। मेरे हम उम्र दोस्त जिनके तकरीबन १०० से ज्यादा फ़ेसबुक फ़्रेन्ड्स है और तकरीबन उससे ज्यादा कान्टेक्ट्स सेल फ़ोन मे है, तन्हा है..और उन्हे नही पता कि ऎसा क्यू है? कभी कभी मै भी सेन्टियाता हू तो पूरी कान्टेक्ट लिस्ट छान डालता हू, बात
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ज़िन्दगी हमारी रोज़ क्लास लेती है..

कुछ पुराने पन्ने है…जिन पर धूल जमा हो गयी है आजकल कोई इस ज़िन्दगी को नही पढता…आज आफ़िस नही जा पाया तो सोचा चलो थोडी ज़िन्दगी की सफ़ाई हो जाय…… वो ’बान्केलाल ग्रुप’ …एक कन्या ने हमारे ग्रुप को ये नाम दिया था…क्यूकि हम हसते थे और हसाते थे :) मै उस ग्रुप का
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मै, तुम, बेटा और दीवारे….

कभी कभी बस किसी का लिखा दिल को छू जाता है…कुछ लफ़्ज कभी नही भूलते, कुछ ज़ुमले बस जबा से लग जाते है… ऐसी ही एक कविता मैने हाल मे ही पढी ( चिट्ठाचर्चा के सौजन्य से)…और न जाने क्यू बार बार पढने को मन होता है…… मैने सोचा कि मै अपने ब्लाग के माध्यम से उन्हे
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वो गुल्लक फ़ोड आया!!

कुछ दुआये मै एक गुल्लक मे रखता था.. चन्द कौडिया थी, रहमतो मे लिपटी हुयी.. बुजुर्गो ने बरकते दी थी..       उस बूढे फ़कीर ने, जब सर पे हाथ रखा, दुआ दी कि एक अच्छे इन्सा बने रहना… वो सारी कौडिया मै उसके कासे मे डाल आया….. आज… आज मै वो गुल्
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गुलज़ार साब और मेरी पहली त्रिवेणी….

१- ज़िन्दगी क्या है जानने के लिये,     ज़िन्दा रहना बहुत ज़रूरी है।    आजतक कोई भी रहा तो नही॥ २- आओ हम सब पहन ले आईने,     सारे देखेगे अपना ही चेहरा।     सबको सारे हसी लगेगे यहा॥ ३- लब तेरे मीर ने
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काश ऐसा होता ब्लागर्स सम्मेलन!!

कुछ भी लिखने से पहले हाथ जोड्कर छ्मा। मै एक अग्यानी हू और आप सब जानकार लोग और ये हमारी विधा भी नही है॥ दो दिन से सिर्फ़ इलाहाबाद सम्मेलन के बारे मे पढ रहा हू, लोग लिख रहे है…आखो देखा हाल बया कर रहे है..पढ कर अच्छा लग रहा है और कुछ सोचने को मजबूर कर रह
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इन्डीब्लागर आफ़ द मन्थ!!

ब्लागर दोस्तो!! हमरा ब्लाग पहली बार कही नामिनेट हुआ है॥ हा जी हमने खुद ही  किया था :) लेकिन अच्छा लग रहा है कि कही नामिनेट तो हुए और १८४ और महान ब्लाग्स है जिनसे काम्पटीशन है॥ आपको यदि हमारी कविताये अच्छी लगी हो, तो प्लीज़ वोट करे.. आप ५ वोट कर स
Nov 04 2009 07:07 AM
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कागज़ की नाव थी, समन्दर मे बहाते रहे…….

सुबीर जी ने अभी दिवाली के मौके पर एक मुशायरे का आयोजन किया था जिस मे मै देर मे अपनी रचना भेज पाया। उनके ब्लाग से ही पढा कि उनका स्वास्थ्य ठीक नही है। काश वो जल्दी से ठीक हो और हमारे जैसे लोगो का मार्गदर्शन ऎसे ही करते है॥ ये आपके लिये सर!!!   “द
Nov 04 2009 07:07 AM
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सिगरेट..

सिगरेट के धुये मे, कुछ शक्ले दिखती है, मुझसे बाते करती हुयी, कुछ चुप चाप..... और सिगरेट जलती जाती है... जैसे वक्त जल रहा हो,     गये वक्त को मै, ऎश की तरह झाड देता हू और वो माटी के साथ मिल जाता है, खो जाता है उसी मे कही...... बस होठो पर एक
Nov 04 2009 07:07 AM
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काफ़ी विद मी…

चाहता हू एक दिन अपने साथ बैठू, एक काफ़ी हो और हम दोनो ढेर सारी बाते करे, हसे, खिलखिलाये …. एक दूसरे को और जाने… मै उससे पूछू कि वो इतना गम्भीर क्यू है? और बताऊ कि क्या मजबूरिया है मेरी, जो मै उससे मिल नही पाता…. उससे पूछू कि क्यू उसने मुझे तन्हा छोड द
Nov 04 2009 07:07 AM
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सम रैन्ड्म थिन्ग!!

आफ़िस की मोनोटोनस और उबाऊ ज़िन्दगी से त्रस्त आकर एक लम्बी छुट्टी पर घर गया था..वो ज़िन्दगी देखने जिसने यहा तक पहुचाया है.. वो टेरेस जिसपर टहलते हुए मै अपने आप से बात करता था..वो सारी बाते… जो मै किसी से नही कर पाता था……मैने ईश्वर को हमेशा अपने पास मुझसे
Nov 04 2009 07:07 AM
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सोशल इनवेस्टमेन्ट!!

आपने इनवेस्टमेन्ट तो काफ़ी किये होगे, क्या कभी सोशल इनवेस्टमेन्ट किया है?   रन्ग दे एक ऐसा ही प्रयास है…ये माइक्रोक्रेडिट के सिद्धान्त पर आधारित है जिसमे आप अपना धन जरूरतमन्द लोगो के बडे सपनो मे इनवेस्ट करते है जैसे किसी की चाय की दुकान, किस
Nov 04 2009 07:07 AM
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लेट्स स्माइल……

आफ़िस से बाहर आता हू…….सर उठाकर खुले आसमान को जी भरकर देखता हू……बारिश की कुछ बूदे गालो पर गिरती है, कुछ आखो पर और पलके बन्द हो जाती है…फ़ार्मल्स के गीले होने की कोइ चिन्ता नही है…आज मै खुश हू…बहुत दिनो के बाद… रिक्शा वाला देखता है, मै पैदल ही चलता हू……