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हमारा खत्री समाज

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03 May 2010
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अरोड वंश की कुल 962 अल्‍लों का संकलन किया जा सका है( भाग - 5) ... खत्री सोहन लाल बजाज

तवर्ग से शुरू होने वाले अल्‍ल .............तपंगर , तंचे , तलवार , तकोजे , ततरेजे, तरबानी , तखतोला , तरीकिए , तांगा , ताबडे , तानेवली , ताकरा ,तातने , तुरीजे , तेजा , तोलबाटरिन , तरवानी , तनेजे , तरपके , तलोजे , तमेजा , तांगिए , तगतोड , तागडे , तरोने ,
 
संगीता पुरी
May 03 2010 05:48 PM
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अरोड वंश की कुल 962 अल्‍लों का संकलन किया जा सका है( भाग - 4) ... खत्री सोहन लाल बजाज

टवर्ग से शुरू होने वाले अल्‍ल .............टक्‍कर , टकरेजेटढयानी , टनोजिये , टांडरे , टाटरेजे, टाटरा , टारिये , टेजे , टनाका , टंडन , टिंकू , ठक्‍कर , ठकनोजिये , ठकराल , ठठयारे , ठढई , ठुकरालिया , ठठानीवारे , ठाठभूरे , ठुकरेजा , ठांड , ठुड्डी ,ठठराल ,
 
संगीता पुरी
May 02 2010 10:40 AM
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अरोड वंश की कुल 962 अल्‍लों का संकलन किया जा सका है( भाग - 3) ... खत्री सोहन लाल बजाज

चवर्ग से शुरू होने वाले अल्‍ल .............चटकारे , चलतर , चडे , चटयानिये , चचक , चचरे , चनन , चोले , चराई , चोत्रे , चगाये , चंदानी , चटाके, चकने , चनन , चाहल , चावे चावले , चांदना, चिलडे, चिलाने , चुघ , चुग , चुण्‍ड  चुगतिवे , चुटकानी , चुकियारा ,
 
संगीता पुरी
May 01 2010 01:27 PM
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अरोड वंश की कुल 962 अल्‍लों का संकलन किया जा सका है( भाग - 2) ... खत्री सोहन लाल बजाज

कवर्ग से शुरू होनेवाले अल्‍ल .....ककडे , ककरानी ,कगडा , कंघरे , कचरा , करेजे , करोडी , करोडे ,, कटारिये , कठोरे , कतरपाल , कतरेजे , कथल , कथायर , कामरे , कालडे , कथूरिये , कंतोड , कंधारी , कनडे , कपकजे , कोनी , किरानिये ,कुमार , कमालपुरिये , करवे ,
 
संगीता पुरी
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अरोड वंश की कुल 962 अल्‍लों का संकलन किया जा सका है( भाग - 1) ... खत्री सोहन लाल बजाज

स्‍वर वर्ण से शुरू होनेवाले अल्‍ल .....अकारी , अखलेजे , अगंदा , अंगी ,अधेले , अचरू , अछपानेवाले, अच्‍छपरानी , अजायती , अजमानी ,अजहाली, अठरेजा , अथडेजे , अथरेजे , अधरेजे, अधलिखे , अन्‍द , आन्‍दा , अनंदा , अन्‍दरानी , अन्‍दाहमुखी , अन्‍देमानी , अनेजे , अपन
 
संगीता पुरी
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अरोड वंश का इतिहास ( चतुर्थ भाग ).... अरोड वंश में पूज्‍य श्री अमर लाल (श्री झूले लाल)

सिंध के नसरपुर शहर में अरोडवंशी ठक्‍कर भक्‍त रतन राय के घर संवत् 1007 चैत्र सूदी दूज शुक्रवार प्रात: 4 बजे श्री वरूण दरियाब देव(श्री झूले लाल)साकार रूप में प्रकट हुए। उस समय सिंध में मराव नाम का मुसलमान बादशाह का राज्‍य था। सिंध की राजधानी तब उटा नगर थी।
 
संगीता पुरी
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अरोड वंश का इतिहास ( तृतीय भाग ).... अरोडवंश और राजस्‍थान

ग्‍यारहवीं शताब्‍दी के प्रारंभ में जब पंजाब पर विदेशी आक्रमण हुए , तो कुछ अरोडवंशी राजस्‍थान की ओर भी चले गए। चिरकाल तक उनका संबंध पंजाबी अरोडवंशियों के साथ बना रहा। इस बात के अनेक प्रमाण मिलते हैं कि राजस्‍थान के अरोडवंशी पंजाब से होकर ही राजपूताने में
 
संगीता पुरी
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अरोड वंश का इतिहास ( द्वितीय भाग ).... ऐतिहासिक तथ्‍य

अरोड शब्‍द की व्‍याख्‍या के अनुसार अरोड प्रांत के राजा या क्षत्रिय अरोडा कहलाए। इतिहासकार टॉड की राय है कि अरोडनगर सिंधु नदी के किनारे पर वर्तमान रोडी या अरोडी नगर से पांच मील पूर्व की ओर था। सिंधु नदी किसी समय में अरोड नगर के नीचे बहा करती थी। लाहौर
 
संगीता पुरी
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अरोड वंश का इतिहास ( प्रथम भाग ).... उत्‍पत्ति

भविष्‍य पुराण के जिस श्‍लोक के अनुसार अरोड वंशी अपने को त्रेतायुग में हुए महाराज श्री अरूट का वंशज मानते हैं , वह इस प्रकार है ......'नाग वंशोद्या दिब्‍या, क्षत्रियास्‍म सुदाहता। ब्रह्म वंशोदयवाश्‍चान्‍ये, तथा अरूट वंश संभवा।।'(भविष्‍यपुराण , जगत प्रसंग
 
संगीता पुरी
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धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे मान्‍य तीर्थस्‍थान

हिंदू परिवारों की तरह ही खत्रियों में भी कुछ तीर्थस्‍थान अत्‍यंत पवित्र माने जाते हैं। कम से कम प्रत्‍येक हिंदूओं की प्रबल इच्‍छा होती है कि वे इन तीर्थस्‍थानों में जाकर अपना परलोक सुधारे। जीवन में उनकी यात्रा करना एक कर्तब्‍य माना जाता है। कुछ प्रमुख
 
संगीता पुरी
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देव स्‍थान या ठाकुरद्वारा हिंदुओं के घर में आवश्‍यक है !!

सिर्फ खत्रियों में ही नहीं , प्रत्‍येक हिंदू के घर में एक गृह देवता या देवी आवश्‍यक हैं। प्राय: प्रत्‍येक घर में एक कमरा , खिडकी या स्‍थान ऐसा होता है , जो देवस्‍थान या ठाकुरद्वारा कहलाता है। प्राय: संध्‍या , गायत्री या पूजन वहीं पर किया जाता है। किंतु
 
संगीता पुरी
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या देवी सर्व भूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

देवी दुर्गा की उत्‍पत्ति एवं परिकल्‍पना अत्‍यंत प्राचीन है। वैदिक काल में उनकी परिकल्‍पना शक्ति रूपा रात्रि देवी के रूप में की गयी है, जो कर अपनी बहन ब्रह्मविद्यामयी उषा देवी को प्रकट करती है। जिससे अविद्यामय अंधकार स्‍वत: नष्‍ट हो जाता है। निरू स्‍वसार
 
संगीता पुरी
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धर्मग्रंथो के अनुसार हमारे मान्‍य वृक्ष

हिन्‍दुओं के ग्रंथों के अनुरूप ही खत्रियों के यहां बरगद , पीपल , जंड , आम , जामुन , पलास , खीदर , बिल्‍व , आमला आदि के वृक्ष पवित्र माने जाते हैं तथा इनकी पूजा भी की जाती है। जंड का वृक्ष तो सबसे अधिक पवित्र माना जाता है, बच्‍चों के मुंडन और अन्‍य
 
संगीता पुरी
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हमारे मान्‍य पशु पक्षी और अस्‍त्र शस्‍त्र

गाय समस्‍त हिंदुओं की माता है। गाय को बेचना एक महान पाप है। प्रत्‍येक गृहस्‍थ के घर में एक गाय पाली जाती है। मृत्‍यु के समय भी गोदान सर्वोत्‍तम होता है। प्रत्‍येक शुभ संस्‍कार के अवसर पर गोदान महत्‍वपूर्ण माना जाता है। गोशाला को खोलना और चलाना अत्‍यंत
 
संगीता पुरी
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युवा पीढी के नाम एक संदेश .... डॉ रमा मेहरोत्रा

भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास और पिछली सदी में देश के हजारो बन्‍दों का बलिदान साक्षी है कि भाईचारे , एकता , अभिन्‍नता और अखंडता के लिए मर मिटने की तन्‍मयता कितनी उग्र थी। पर आज की युवा पीढी भौतिकता से जुडे अर्थवाद की ओर तेजी से उन्‍मुख हो रही है। यही अध:पतन
 
संगीता पुरी
Mar 07 2010 04:01 PM
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होली की बात क्‍या कहूं .. होली में रंग है !!

होली की बात क्‍या कहूं , होली में रंग है। त्‍यौहार की खुशी में सब लोग संग हैं।। गालों पे है गुलाल , लगा माथे पर अबीर। मस्‍ती से खेलते हैं , सभी रंक और अमीर।। ये अंगराज से सजा हुआ सा अंग है।होली की बात क्‍या कहूं , होली में रंग है।।होली को खेला सूर ने ,
 
संगीता पुरी
Feb 28 2010 10:32 PM
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जाति से संबंधित कुछ भ्रांतियों का उन्‍मूलन

प्रश्‍न ... प्राचीन काल में एक गोत्र और अल्‍ल में विवाह क्‍यूं वर्जित था ?उत्‍तर .. वह इसलिए ताकि आनेवाली पीढी में किसी प्रकार के रोगयुक्‍त होने का भय कम से कम तो हो ही , इसके अलावे वे पीढी से शारीरिक और मानसिक रूप से अधिक सक्षम हो।प्रश्‍न .. यदि ऐसी बात
 
संगीता पुरी
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रंग बिरंगी होली का यही तो है संदेश

ऐसे रंग में क्‍या रंगा, स्‍वयं हुए बदरंग। प्रेम रंग सांचा 'रसिक' जीवन भरे उमंग।।रंगी हथेली ले बढे,चेहरा रंगा उजास। सच्‍ची होली हो तभी, फैले प्रेम प्रकाश।।लाल लाल उडने लगी , चारो ओर गुलाल। शहर शहर बाजार से, गांव गांव चौपाल।।जल में जैसे रंग घुला, एक हृदय
 
संगीता पुरी
Feb 21 2010 05:39 PM
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आकाश राज जी ... क्‍या आप अपने गांव और जिले का नाम लेने से परहेज कर सकेंगे ??

भारतवर्ष के इतिहास से पता चलता है कि खत्री जाति का काम प्रजा की रक्षा करना था। समाज में , राज्‍य में और शासन व्‍यवस्‍‍था को सुचारू रूप से चलाने में उनकी अहम् भूमिका रही है। पर कालांतर वे सिर्फ व्‍यवसाय में ही रम गए और आज भी उसी में रमे
 
संगीता पुरी
Feb 19 2010 08:50 PM
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खत्री जाति को देशवासियों के लिए प्रेरणास्रोत बनना चाहिए !!

खत्री जाति सदा से ही समाज का सिरमौर रही है , इसने सभी को आश्रय दिया है। हम रामचंद्र के वंशज हैं, यह निर्विवाद सत्‍य है। यदि हम उस काल के इतिहास पर दृष्टि डालें , तो ज्ञात होगा कि भगवान राम ने ब्राह्मणों , वैश्‍यों और शूद्रों को प्रश्रय ही नहीं
 
संगीता पुरी
Feb 17 2010 06:07 PM
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खत्री जाति को इस ढंग से परिभाषित किया जा सकता है !!

वास्‍तव में व्‍यापक व्‍यक्तिगत अंतरों को स्‍पष्‍ट करने के उद्देश्‍य से जाति प्रथा को जन्‍म दिया गया था। आधुनिक वैज्ञानिक व्‍यख्‍या के अनुसार 'जाति' ऐतिहासिक प्रक्रिया में विकसित एक जनसमुदाय है , जिसका उदय अपने को अभिव्‍यक्‍त करनेवाले एक समान मनोवैज्ञानिक
 
संगीता पुरी
Feb 13 2010 11:57 AM
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जीवन में ये बातें हमेशा याद रखें !!

किसी गरीब के सामने गर्वभरी वाणी बोलना , उसके साथ रूखा और कठोर व्‍यवहार करना भगवान का अपराध है , क्‍यूंकि उस गरीब के रूप में भगवान ही तुम्‍हारे सामने प्रकट हैं। अतएव सभी के साथ नम्र होकर अपनी मधंर वाणी बोलो, अपनी विनय विनम्र पीयूषवर्षिणी वाणी तथा व्‍यवहार
 
संगीता पुरी
Feb 10 2010 10:22 PM
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खत्री जाति की परंपरा : दूसरा भाग

खत्री प्राय: सभी त्‍यौहार , रक्षाबंधन , विजयदशमी , दीपावली और होली उत्‍साह से मनाए जाते हैं, परंतु विजय दशमी पर्व का इनमें विशेष महत्‍व है। यह शक्ति , विजय और उल्‍लास का पर्व है। आश्विन शुक्‍ल प्रतिपदा से प्रारंभ होकर निरंतर दस दिन चलनेवाले इस पर्व पर
 
संगीता पुरी
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खत्री जाति की परंपरा : पहला भाग

खत्री जाति एक प्राचीन और विशिष्‍ट जाति है। प्राचीन भारतीय वर्ण व्‍यवस्‍था में उल्लिखित क्षत्रिय वर्ण इस जाति विशेष के लिए ही है। ब्राह्मणों एवं खत्रियों के गोत्रों , प्रवरों आदि में जो साम्‍य है , वह इस तथ्‍य का स्‍पष्‍ट प्रमाण है। आज जिन्‍हें प्राय:
 
संगीता पुरी
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भारत के समस्‍त सूर्यवंशी खत्रियों के मूल गोत्र काश्‍यप है !!

खत्रियों के इतिहास को लिखनेवाली एक पुस्‍तक की परिशिष्‍ट में कुछ ज्ञात गोत्रों एवं कुलदेवता आदि की सूंचि दी गयी है , पर हजारो ऐसे अल्‍ल भी हैं , जिनके धारकों को आज न तो उनके वास्‍तविक गोत्र याद हैं और न ही कुल देवता। गोत्र और कुलदेवता का ाान करानेवाले
 
संगीता पुरी
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हमारे चारो ओर सांस्‍कृतिक अवमूल्‍यण और सांस्‍कृतिक प्रदूषण का गंभीर खतरा

आज हमारे चारो ओर सांस्‍कृतिक अवमूल्‍यण और सांस्‍कृतिक प्रदूषण का गंभीर खतरा हो गया है। डर तो यह भी बना हुआ है कि इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया के प्रभाव से भारतीय संस्‍कृति बचेगी या विलुप्‍त हो जाएगी। आज जब पश्चिम संपन्‍न देश भोग और विलास से परेशान होकर भारतीय
 
संगीता पुरी
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आज की राजनीति : आवश्‍यकता या मजबूरी

राजनीति का जन्‍म चाणक्‍य की देन है। किसी विषय पर सहमति या असहमति जताकर , नीतिगत निर्णय लेकर उसे परिणाम तक पहुंचा देना ही राजनीति है। पहले राजनीति जनता की भलाई के लिए की जाती थी, परंतु आज तो शायद राजनीति करने भर को ही रह गयी है। राजनीति का स्‍वरूप बिगडकर
 
संगीता पुरी
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आडंबर एवं प्रदर्शन समाज के लिए घातक होता है !!

यह सुविदित है कि हमारे धर्मपरायण समाज की आधारशिला 'सादा जीवन उच्‍च विचार' रही है। मर्यादित परिग्रह में दृढ आस्‍था रखनेवाले हमारे पूर्वजों ने आदर्श जीवन यापन किया है। उनके द्वारा प्रस्‍तुत कई उदाहरण आज भी इतिहास के पृष्‍ठों पर स्‍वर्णाक्षरों में अंकित
 
संगीता पुरी
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व्‍यक्तित्‍व विकास के लिए हीनता सबसे बडी बीमारी है !!

क्‍या आपके साथ भी ऐसा होता है कि किसी धनी , सुदर और प्रभावशाली व्‍यक्तित्‍व को देखकर और उससे मिलने पर घबराहट , बेचैनी और घुटन महसूस करते हैं, जिससे आप बात शुरू कर सकें या शुरू की गयी बात को जल्‍द समाप्‍त कर सकें या कृत्रिम मुस्‍कान के साथ बने रहें , तो
 
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सारी दुनिया भारत की गोत्र व्‍यवस्‍था को देखकर चकित होती रही हैं !!

हमारी मूल गोत्र व्‍यवस्‍था , जो कालांतर में विकसित हुई और इसी का उल्‍लेख 'सेक्रेड बुक ऑफ द ईस्‍ट' नामक प्रसिद्ध अंग्रेजी ग्रंथ में किया गया है। उसी प्राचीन काल में वेदोक्‍त वैज्ञानिक नियम के कारण ऋषियों ने एक ही वंश में उत्‍पन्‍न लोगों का आपस में विवाह
 
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संवेदनहीन संस्‍कृति के बाद भी विकास पर नाज कर सकते हैं हम ??

21 वीं सदी में हमारा न सिर्फ कंप्‍यूटर युग में प्रवेश हुआ है , वरन् हमने अनेक उपलब्धियां अ‍िर्जत की हैं , उसमें से एक महत्‍वपूर्ण उपलब्धि है आयु का बढना। प्रति व्‍यक्ति औसत आयु बढ रही है। इसे आधुनिक विज्ञान और चिकित्‍सा शास्‍त्र का चमत्‍कार कहा जा सकता
 
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नारी संसार की प्रथम आवश्‍यकता है .... न्‍यूटन

हिन्‍दुओं में स्त्रियों को जितना सम्‍मान दिया जाता है , उतना संसार में कहीं भी किसी और प्राचीन जाति में नहीं दिया जाता। ..... एच एल विल्‍सन सहधर्मिता के आदर्श को पूर्णत: निर्वाह करने वाली देवियां भारत के सिवाय अन्‍यत्र नहीं मिलती। ... अस्टिंजर एफ
 
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पुत्री के प्रति माता पिता का आज क्‍या दायित्‍व है ??

आज भी अधिकांश परिवारों में अपने लडकों के कैरियर और व्‍यक्तित्‍व विकास पर पूरा ध्‍यान दिया जाता है और लडकी के लिए माता पिता की इच्‍छा सिर्फ उसके अच्‍छे घर वर में विवाह करने की ही होती है। अपने प्रति होनेवाले  इस व्‍यवहार से लडकी इतनी दब्‍बू और संकोची
 
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चहुं ओर प्रकाश फेकने वाले दीप को ही हम सुंदर कह सकते हैं !!

आध्‍यात्मिक ज्ञान सहित जीवन प्रदत्‍त शिक्षा के लिए भारत विश्‍व में अग्रणी रहा है। साम्‍य भाव के स्‍तर पर निर्धन , धनी शिष्‍यों की एकता , नैतिकता और कर्मठता का पाठ व्‍यावहारिक , शैक्षिक स्‍थल से ही जिन गुरू आश्रमों में परहित भाव से प्राप्‍य था , अब वह
 
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जाति प्रथा की अच्‍छाइयों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए !!

धर्म के पालन में हमें जाति व्‍यवस्‍था को कतई ध्‍यान में नहीं रखना चाहिए , गौतम बुद्ध ने भी अपनी धर्म व्‍यवस्‍था में जाति को स्‍थान नहीं दिया और जाति व्‍यवस्‍था को कमजोर किया था। जैन धर्म , कबीर के वैष्‍णव धर्म और रामदास तथा सिक्‍ख धर्म भी ऐसे आंदोलन रहें
 
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खत्रियों में ढाई घर , चार घर , बारह घर और बावन जाति आदि बनने का असली कारण

यह तडबंदी अलाउद्दीन खिलजी के समय में विधवा विवाह के प्रश्‍न को लेकर बनी , इसपर अधिक विवाद नहीं है , किन्‍तु कालांतर में इस ऊंच नीच समझी जानेवाली तडबंदी का असली कारण क्‍या था और ऊंच नीच की भावना फर्जी थी या नहीं , यह प्रयन खत्री समाज में परम विवाद का विषय
 
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वास्‍तव में हमारी अमूल्‍य निधि क्‍या है ??

संसार में सबसे बडी निधि क्‍या है , इसपर अनेक विद्वानों ने मनन किया , विवेचना की वाद विवाद किया , पर वे अभी तक किसी निष्‍कर्ष पर नहीं पहुंच सकें। इसी बात की समझ के लिए मै सबसे पहले अपने मित्र मूल्‍यवान के पास पहुंचा, उसने बताया कि संसार में सबसे मूल्‍यवाण
 
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इतिहास की पुस्‍तकों में 'खत्रियों' के बारे में चर्चा

इतिहास की पुस्‍तकों में यत्र तत्र खत्रियों के बारे में जो चर्चा की गयी है .. उसका संग्रह यहां है ... 1 . फ्रांसिस ग्‍लैडविन द्वारा किए गए 'आइने अकबरी' के अनुवाद ( सन् 1800 के संस्‍करण के खण्‍ड 2 , पृष्‍ठ 198) में लेखक ने कहा है ' किन्‍तु आजकल विशुद्ध
 
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हिंद देश की हिंदी भाषा , जय हिंद ही नहीं, जय हिंदी भी

युग बीता अंग्रेज गए , क्‍यूं अंग्रेजी अब भी रानी। दासी बनकर हिन्‍दी बोलो , भरेगी कब तक उसका पानी ?गैरों के न हम कपडे पहनें, न औरों का भोजन खाते। क्‍यूं चोट ना लगे स्‍वाभिमान को , गैरों की भाषा ।। नाम लंच है खाते मगर , हिंदुस्‍तानी खाना यारों। 'हाय हलो'
 
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खत्रियों में महथा अल्‍ल की उत्‍पत्ति का आधार

भारतवर्ष के मध्‍यकाल के इतिहास को देखने से पता चलता है कि मुगल काल में ही नहीं , बल्कि हर्षवर्द्धन के समय में भी राज्‍य शासन में लगे हुए अधिकारियों को कोई नकद वेतन नहीं मिलता था। उन्‍हे राज्‍य की ओर से भरण पोषण के लिए भूमि मिली हुई थी , जिसकी समस्‍त आय
 
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