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रचना रवीन्द्र

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13 Jun 2010
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धुंआ

धुंआ जाने कुछ अजीब सी बात है तुममें बुरी चीजों में भी कुछ अच्छा सोच ही लेते ही अपने लिए तभी तो तुमने धुंए से सीखा ऊपर, ऊपर और ऊपर उठनाफैलना, मिलना, मशहूर होना कभी आँखों में उतरना फिर वो भला आंसू की तरह ही क्यों न हो तुम्हारी रूचि तो जलने, जलाने, धुंए और
 
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जीवाश्म

जीवाश्मसंकेत, सूत्र औ संरचना इंगित करते हैं जिस रचना को उसके कल अनुमान मिले हैं गूंज रहे इस शाद्वल में प्रणय के कुछ गान मिले हैं पर्वत, घाटी, नदिया, झरनों परअपने कुछ वृतांत मिले हैं हिमखंडों के भीतर बाहरतेरे मेरे नाम मिले हैं अपनी भंगुर सांसों की
 
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राहें

राहेंकभी भूल गए थे, जिन राहों कोकल, मैंने उन पर चल कर देखाप्रेम पसारे, राहें तकते उनको   आज वहीँ पर देखामैंने कितनी धारें बदलीं, हर पल अपनी  राहें बदलीं नाते-रिश्ते,  दुनियादारी,जाने कितनी बाहें बदली पर, आस बिछाए,
 
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शांति पथ

शांति पथ बाहर हर तरफ हैं गर्म हवा के बबंडर,चक्रवात, तपिश, तूफ़ान और सब कुछ मुरझाया, सूखा उजड़ा सा. जमीं पर पड़े सूखे बेदम, जरा सी हवा में घसिटते, लड़खड़ाते पत्ते. आँधियों में गिरे टूटे कुछ फल, उनको ले जाने कोव्याकुल लोग.फिर
 
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लक्ष्मण रेखा

लक्ष्मण रेखामेरे लक्ष्मण  मस्तिष्क ने मेरे चहुँ  ओरखींच रखे हैं कुछ रंगीन टेढ़े - मेढ़े से घेरे.मेरे रावण मन कीलोलुप निगाहों नेबार बार प्रलोभन भी दिया.शायद, मैं लखन
 
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दरख़्त

दरख़्तमैं बाहर से सख्त होना चाहती हूँ.त्यज कर सारी कुटिलता,ओढ़ कर मुख पे जटिलता,   आश्वस्त होना चाहती हूँ.   मैं एक दरख़्त होना चाहती हूँ.   उजड़ गए जो कुछ घरोंदे,   सांसों में रहते थे मेरे,  
 
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जलकुम्भी

जलकुम्भीसड़क के किनारेकच्ची मिटटी मेंठहरे पानी और नमी मेंफैली ऐ जलकुम्भी !पसर जाओ, मेरी आँखों में भी.फैलाओ  हरियाली का छद्मावरण.सोख लो
 
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विस्तार

विस्तार मेरे नैनों के नीलाभ व्योम में, एक चन्दा, एक बदली और कुछ झिलमिल तारे रहते हैं. सावन में, जब घनघोर घटायें उमड़ घुमड़ कर,आँखों में खो जाती हैं. चन्दा, तारे सो जाते हैं. वर्षों मरु थे, जो पोखर सारे,स्वमेव ही भर जाते हैं. कभी
 
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राजनीति

राजनीतिराजनीति मेरे रग रग में बसी है लूट, खसोट, सेंधमारी और क़त्ल करवाए मैंने. फिर उन्हीं  के आशियाने भी बसवाये मैंने.हर राजनीतिज्ञ की तरह  अपने इर्द गिर्द, अभेद्य सुरक्षा आवरण भी रचाए मैंने. हर सुरक्षा चूक की
 
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प्रपंच

प्रपंच दर्द की दीवार हैं, सुधियों के रौशनदान. वेदना के द्वार पर, सिसकी के बंदनवार. स्मृतियों के स्वस्तिक रचे हैं. अश्रु के गणेश. आज मेरे गेह आना, इक प्रसंग है विशेष.द्वेष के मलिन टाट पर, दंभ की पंगत सजेगी.अहम् के हवन कुन्ड में,आशा की आहुति जलेगी.दूर बैठ
 
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अन्वेषण

अन्वेषणआज की इस दौड़ मेंसब कुछ नया करने की होड़ में,कितना कुछ बदल गया है.असमंजस में पड़ गयी मैं, जब सुना,इतने बरसों बाद भी,नयापन नहीं है प्रेम संवाद में,डूब गया मन,तत्क्षण ही  तम के ताल में. ऊपर आने, उबराने के,तलाशने लगा विकल्प.एक
 
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अहसास

अहसासआशुतोष ने फिर उषा का घूँघट उठाया है.लजा के उसने भीचेहरा तो दिखया है.सुहागन हो गयीं दिशाएं सारीसिंदूर यूँ सजाया है.परओस की बूंदों का आंचल दूब के सर से भी तो तूने ही हटाया है, क्या बात है दिवाकर कोई
 
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गुरुत्वाकर्षण

गुरुत्वाकर्षणबचपन में पढ़े तो बहुत थेविज्ञान के नियम.पर उनके होने का पहला आभास हुआ तब,जब पहली बार तुम्हे देखा भर था,शाश्वत सा हो गया वो आकर्षण,मुझे अहसास था. मैं फिर भी आश्वस्त रही, कि किसी न किसी  दिन तो
 
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दीवानगी

दीवानगीढूंढा करती थी जिन्हें बाग़ औ दरिया में कभी,जाने क्यों आज वो सारे वीराने मिले.जम गए थे जो लफ्ज़ कभी सीने में मेरे, उनको बहाने के आज सौ बहाने मिले. इस कदर रुसवा हुआ तू मुझसे,बस मयखाने में ही तेरे ठिकाने मिले.पलट के देखा तो झुके हुए
 
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द्वन्द

द्वन्द आज आमाशय की तंग गलियों में जठर का रिसाव रोज़ की अपेक्षा थोडा कम है. प्राण वायु व कलुषित वायु की कलह से उपजे, वायु के बुलबुले जठराग्नि को हवा दे रहे हैं.फलतः मेरु द्रव में मद्धम - मद्धमस्पंदन की अनुभूति हुई है, जो मस्तिष्क द्रव से
 
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आतंक के साए

आतंक के साए क्या रंग देखो क्या रंगों का त्यौहार हर तरफ फैला है अन्धकार अब न वो रंग, न फागुन की ठिठोली हर तरफ है तो बस लाल रंग की होली क्यों वो माँ गाए, क्यों वो बहन गुनगुनाये क्यों पत्नी माथे पे, अबीर सजायेजब रंग गया हो, सदा के लिएलहू की होली में अपना ही
 
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Feb 28 2010 04:27 PM
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अपने

अपनेअपनों में ही अपनों को ढूंढा करती थी, मैं अपनों की पदचापों को पहचाना करती, मैं अपनों की दस्तक से पहले उनका नाम बताती, मैं अपनों की ही छाया से आच्छादित होती, मैं फिर भी अपनों में ही अपनों को ढूंढा करती थी, मैं अपनों की हर बात से आशान्वित होती, मैं
 
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Feb 21 2010 10:33 AM
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इंसान

इंसान कहते हैं लोग इन्सान पत्थर हो गयाअगर ये सच है तो दिखा दे अपनी सख्ती,अपना खुरदरा, पथरीला, कंकरीलापनअपनी जड़ता,जा, छू जा, कभी किसी राम के चरणों से दे दे किसी अहिल्या को जीवन दान बन राम सेतु,जीत ले लंका, मार गिरा कभी रावण,बचा ले, अबला सीताओं की लाज,बन
 
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Feb 14 2010 09:55 PM
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हिंदी की व्यथा

हिंदी की व्यथासंवेदना की परागरज ले ककहरे ने गर्भ धरा थाशब्दों के भ्रूण पनपेतो, भाषा ने खोला नयन था आशा की ओढ़ चुनरी हिंदी का हुआ आगमन था हास,परिहास, कथा,कविता, लोरी से भरा बचपन था बन गई उपन्यास, ग़ज़ल, रुबाईआ गया भरपूर यौवन था आंचल में भर के सोलह
 
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दूजा ब्याह

दूजा ब्याहशब्द का कलम से जब ब्याह हुआ था मैं साक्षी थी और समाज साथ खड़ा थाहुए सातों वचन थे पूरे और सेंधुर दान हुआ थाआँखों ही आँखों में प्यार का इज़हार किया था, कलम ने फिर शब्द के माथे पे प्यार किया था सुहाग रात को सुखद स्पर्श का अहसास भी दिया था,खुश हो गए
 
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शहीद का वतन

एक अनुभव आप के साथ शेयर करना चाहती हूँ. यूँ ही ब्लॉग विचरण करते एक दिन एक महिला ब्लोगर (जो भारत के बाहर रहती हैं) के ब्लॉग पर देखी एक बेहतरीन पोस्ट महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम " यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता ". दिल खुश हो गया जब
 
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झूठ के पांव

झूठ के पांवझूठ के पांव निकलते देखा है सच पे सवार होते देखा है कान्हा की आड़ में, लीला का नाम ले, कदाचार देखा है पवनसुतों के सीने में,व्याभिचार देखा है मर्यादा पुरुशोत्तमों को करते, भ्रष्टाचार देखा हैअपनी आयु लीलने को, जानकी को लाचार देखा है दूर
 
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प्रताड़ना

प्रताड़नाकितने जनम और लूँ मैंकब तक मौन सहूँ मैं मैं वही, रंगमंच वही,वाद, विवाद, संवाद, प्रतिवाद, अपवाद वही, वेदना,संवेदना, भेदना, कुरेदना, वही,तहरीर, तकरीर, तहकीर, तदवीर वहीपीर, तकदीर, तस्वीर वही बदला है कुछ, तो बस इक किरदारपिछला जन्म पति और
 
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साथ तुम्हारा

साथ तुम्हारा तुम प्रेम गीत मैं एक कविता तुम निर्बाध संगीत मैं सुर सरिता तुम निर्भीक व्योम मैं ध्रुव तारा तुम चंचल चपला मैं अम्बर सारा तुम पुण्य प्रसून मैं वरमाला तुम गीत विरह का मैं पांव का छाला तुम मदिरा मैं मय का प्याला तुम जीवन संध्या मैं सानिध्य
 
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मेरा मन

मेरा मन  बांच रही थी रात चांदनी जब मेरी आँखे और मेरा मन. पूनम के नयनों से भी छलके थे कुछ सुधा सने हिम कण.   उस क्षण मौन   थी भाषा, मौन थे शब्द, शब्द शक्तियां मचल रहीं थीं अंतर अन्दर बिफर रही थी सांसें तन से छूट रहीं थीं
 
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पुनर्जन्म

पुनर्जन्म मेरे सपनों के शव जब पड़े थे बिखरे आँखों में था रुदन   और हर तरफ क्रन्दन निराशा के गिद्ध नोंच रहे थे उनका बदन इक आशा की डोर जो कहीं जुड़ी थी सांसों से बोली वो और फिर टूट गयी "यही नियति है सपनों की और जीवन की अब शवदाह  करो"  देख
 
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दरारें

दरारें पहले रिश्तों में कुछ दरारें रहती थीं अब दरारों में रिश्ते रहते हैं पहले दरारों को हम सीते थे आज उन्हीं दरारों में हम जीते हैं कभी ये रिश्ते धरोहर की तरह संजोये जाते थे आज सिर्फ दिखाने को ढोए जाते हैं कभी ये रिश्ते चाशनी से मीठे आज के रिश्ते ख़
 
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छत

छत घर की छत पर दीवारों के कोनों में उगते कुछ नन्हें पौधे केवल नमीं के सहारे जीते ये पौधे कितनी ही बार नोंच कर फेंक दिए हैं मैंने हर बार न जाने कहाँ से अपने अस्तित्व को बचाने को ढूँढ ही लाते हैं कुछ नमी अपने आस-पास फिर उसी नमी की गोद में पलते बढ़ते पन
 
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छल

छल शांत मन में उठती लहरें कभी ऊँची, कभी निष्प्राण, कभी उद्विग्नता की हद को पर करती जाने क्यों रहने लगी बीमार मैं जाने किस किस से बेचार मैं साधने को इस असाध्य रोग जाने कितने पीर, हकीम, अल्लाह वल्लाह ! बदल डाले मैंने और इक तुम थे कि छलते रहे मुझे सारी
 
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सड़क

सड़क क्या तुमने किसी सड़क को चलते हुए देखा है ये सड़क कहाँ जायेगी कभी सोचा है ये सड़कें न तो चलती हैं,न कहीं जाती हैं ये एक मूक दर्शक की तरह स्थिर हैं ये सड़कें आजाद हैं कहीं भी किसी भी सड़क से मिल जाने को ये आज़ाद हैं किसी को भी अपने से जुदा कर जाने को
 
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हमसफ़र

हमसफ़र सुबहो शाम इस धूप को बदलते देखा है इसी धूप में सायों को छोटा और बड़ा होते देखा है एक ही दिन में कितने मिजाज़ बदलते देखा है कभी साए को हमसफ़र के साथ तो कभी हमसफ़र को साए से लिपटते देखा है सब तो कहते हैं की बुरे वक्त में साए को साथ छोड़ते देखा है
 
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आज भी

आज भी बचपन से, उनसे सुनती रही एक माँ के न होने कि व्यथा महसूस करती रही, उनकी ये वेदना जो, कभी व्यथित कर देती थी मुझे भी इससे भी ज्यादा व्यथित होती मैं जब सुनती उनकी प्रभु से प्रार्थना जो दुःख मुझ बिन माँ के बच्चे ने पाया मेरे  बच्चे कभ
 
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ग़म

ग़म एक ग़म जो तुमसे मिला उसके मिलने का अब क्या गिला एक रहबर जो मुझे मिला उसके बिन अब क्या काफिला अब तो यूँ ही चलेगा गम का सिलसिला सुकून मिला, मिला, न मिला, न मिला उसके न मिलने का भी अब क्या गिला अब तो है यह सिर्फ ग़मों का काफिला इसमें फिर एक ग़मगीन फ
 
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ऊँची उड़ान

ऊँची उड़ान  इस आसमां को छूने की हसरत रही है दिल में मैं पांवों पे उड़ के जाऊं,हाथों को भी बढाऊँ जितना भी पास जाऊं,वो दूर ही रहा था गर्दन उठायी जब भी,वो उड़ता ही जा राह था मैंने उड़ना नहीं था सीखा,सो दूर जा गिरी थी बैसाखियों के बल पर,कुछ पाना
 
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नागफनी

नागफनी दिल को ग़म के गर्द औ गुबार और धुएँ से बचाने को ,हमने दिल में एक बगिया लगा रखी है फूल खिल के गुलाब के चार दिन को बगिया को सूनी बना जाते हैं दिल की बगिया में सावन लहलहाने को सदा, हमने नागफनी ही लगा रखी है खुशबू होती है गुलाब की चार दिन औ इतर से
 
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मेरे दुश्शासन

मेरे दुश्शासन वो ख़त जो मैंने तुम्हें लिखे थे हाँ, वो अनकहे ख़त मैंने आज भी सहेज कर रखे हैं मेरी अलमारी में बिछे अखबार की तहों के भीतर आज अचानक वो फिर हाथ लग गये खो गयी थी मैं उन पुरानी बातों में मैंने देखा मेरी सुधियों का चीर थामे तुम आज भी निर्भीक
 
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Nov 01 2009 04:23 PM
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दीपावली की शुभ कामनाएं

मेरे सभी मित्रो, पाठकों व उनके परिवार जनों को दीपावली की बहुत बहुत शुभ कामनाएं. यह दिवाली सबके लिए खुशियों कि बहार लेकर आये. रचना
 
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Nov 01 2009 04:23 PM
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रिश्ते

रिश्ते कुछ रिश्ते खो गए हैं कुछ रिश्ते हो गए हैं उस चौखट के अंदर सूनी दीवार पर लगी पुरानी खूंटी पर लटके छोड़ आयी थी कुछ रिश्ते वो रिश्ते खो गए हैं सुना है रिश्तों की एक नई ईमारत खड़ी करने की होड़ में कुछ लोगों ने वो चौखट वो दीवार गिरा दी है मेरे कुछ रि
 
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Nov 01 2009 04:23 PM
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आंसू

आंसू                           आंसुओं में आज अपने, फिर नहा कर           &nb
 
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Nov 01 2009 04:23 PM
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मधुशाला के प्याले

उन खाली प्यालों से पूंछो                                     कैसे रंग बदल आ
 
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Nov 01 2009 04:23 PM