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15 Jun 2010
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गौरव सोलंकी की कविता - चार लड़कियाँ भी हैं अकेली लड़कियाँ

गौरव सोलंकी की यह कविता अद्यतन कविता परिदृश्य को समृद्ध करती है. आई.आई.टी रूड़की से पढ़े लिखे गौरव फिलवक्त पत्रकारिता से जुड़े है. बेहद अच्छा और जरूरी कवि. गौरव की बहुत सारी कविताओं के लिये यहाँ क्लिक करें.यह उजाले की मजबूरी हैकि उसकी आँखें नहीं होतींऔर वह
 
चन्दन
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दिल्ली में बच्चे

यह तस्वीर पूजा ने उपलब्ध कराई है.इनके नये मोबाईल – नोकिया 2700 क्लासिक के कैमरे से उतारी गई यह तस्वीर जिस क्षण की है उसके ठीक पहले, जैसा पूजा ने बताया, ये तीनों बहादुर अपनी इस साईकिल पर सवार होकर किसी कार से रेस लगा रहे थे और फिर जो हंसी छूटी कि अब भी
 
चन्दन
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तस्वीर और तस्वीर

(किसी भी फोटोग्राफर/कैमरा मैन के लिये) मैं समझता हूँ पालतू कैमरे को बन्दूक रंगो को स्याही अक्षर हैं चेहरे तस्वीरों के किताबी जीवन मेंजीता रहा ज्ज्ज्ज्जूँssssssजीक्क की आवाज में मैने उतारी है चुम्बनों में शामिल आवाज की तस्वीर पानी और हवा में हस्ताक्षर की
 
चन्दन
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बेहिसाब मौसम के लिये बाबा नागार्जुन की कविता – कल और आज

बाबा नागार्जुन की यह कविता बचपन में पढ़ी थी. उस समय, याद है, इसके शीर्षक में उलझ गया था. मतलब दिमाग यह मानने को तैयार नही होता था कि एक दिन में इतना परिवर्तन कैसे आ सकता है? अभी जब इसे दुबारा पढ़ रहा था तो स्पष्ट हुआ कि ये जो ’कल’ है वो बहुत लम्बा वक्फा है
 
चन्दन
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वर्षा ऋतु से..

वह मद्धिम करार भी टूट चुका वर्षा रानी ये जिद छोड़ोबादलों की धार फोड़ो तुम्हारी जल पंखुड़ियाँ धरती को सरोबार जब चूमेंगीसहसा, तुम्हारी बूँदे निगाह बन उसे ढ़ूँढ़ेंगी जो अब नही होगी वहाँ आंगन के पार द्वार पर तैयार वर्षों वर्षों तक हमने हथेलियों में थामें हाथ किया
 
चन्दन
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Jun 06 2010 04:24 PM
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निकानोर पार्रा की कविता - मर जाएगी कविता

मर जाएगी कविताकविता मर जाएगीअगरउसेतकलीफ न दो लेकर केगिरफ्त में, तोड़ना होगाउसका दर्प सरेआम फिर दिखेगाक्या करती है वह। ..........(मूल स्पेनिश से यह सुन्दर अनुवाद श्रीकांत का है. श्रीकांत को नई बात की ओर से स्नेहिल बधाई कि उनकी एक अच्छी कहानी “धरती के भीतर
 
चन्दन
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मोरा पिया मोसे बोलत नाही.. 2 और राजनीति फिल्म

उमंग के आने से नफा यह हुआ कि आज वर्षों बाद किसी फिल्म का ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो’ देखा. राजनीति. मनोज वाजपेई रॉक्स!! गज़ब का अभिनय किया है. इस फिल्म मे मनोज का पार्ट दरअसल ड्रामा के विद्यार्थियों के लिये कोचिंग सरीखा है. सम्वाद अदायगी का उत्कृष्ट नमूना पेश
 
चन्दन
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मोरा पिया मोसे बोलत नाही.. 2 और राजनीति फिल्म

उमंग के आने से नफा यह हुआ कि आज वर्षों बाद किसी फिल्म का ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो’ देखा. राजनीति. मनोज वाजपेई रॉक्स!! गज़ब का अभिनय किया है. इस फिल्म मे मनोज का पार्ट दरअसल ड्रामा के विद्यार्थियों के लिये कोचिंग सरीखा है. सम्वाद अदायगी का उत्कृष्ट नमूना पेश
 
चन्दन
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अनॉनिमस से मदद की माँग

Anonymous said... एक भ्रम यहां बार-बार फैलाया जा रहा है चंदन जी को बहुत पढ़ा जाता है !!दूसरी जगहों का तो नहीं पता लेकिन ब्लाग की दुनिया में उनकी हालात काफी खराब है !! Site Information for nayibaat.blogspot.com • Alexa Traffic Rank: 4,195,073 • No regional
 
चन्दन
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मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं...

बीते कल से मेरे अनुज उमंग यहाँ करनाल आये हुए हैं। कल ही शाम को हम काईट्स देखने गये और पाया कि आलोचना की अजीब सी बीमारी भारतीय जन मानस मे घर करती जा रही है। आलोचना होनी चाहिये पर एक पैमाने के साथ। यहाँ तो हो यह रहा है कि जो पत्रकार नही बन पाया वो पूरी
 
चन्दन
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आना

अपने अतिप्रिय कवि केदारनाथ सिंह की यह कविता इधर अचानक से यों ही याद आई है, वैसे ही जैसे कोई सिनेमाई गीत कभी कभी ज़बान पर अटक जाता है और उसे हम गाहे बे-गाहे गुनगुना लेते हैं। यह कविता मुझे पूरी याद न आकर टुकड़ों में याद आ रही थी पर जब अभी, यहाँ जालन्धर में,
 
चन्दन
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जफर पनाही की रिहाई और रिहाई के पहले की कैद....

चारेक साल पहले की बात होगी कि एक फिल्म देखने को मिली- “क्रिमसन गोल्ड”. एक ऐसे इंसान की कहानी जो अपने जमीर को, स्वाभिमान को सबसे ऊँचा दर्जा देता है पर उसकी नौकरी ऐसी है कि हर बार उसे किसी ऐसी परस्थिति का सामना करना पड़ता है जहाँ सब कुछ के साथ अपमान का एक
 
चन्दन
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निकानोर पार्रा की कविता

एक तात्कालिक ट्रेन की योजना(सांतियागो और पुएर्तो मोंत के बीच)तत्काल की उस ट्रेन में इंजन खड़ा होगा गंतव्य (पुएर्ता मोंत) पर और उसकी आखिरी बोगीसफर के प्रस्थान बिंदु (सांतियागो) में होगीइस की ट्रेन का फायदा यूं होगाकि यात्री पुएर्तो मोंत ठीक उसी क्षण पहुंच
 
चन्दन
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मृत्यु का शीर्षक कहाँ होता है?

कल एक या दो अजीब बातें हुई. बहुत दिनों बाद कल मैं करनाल था और एक साहित्यिक मित्र से किये वादे को नहीं पूरा कर पाने का दुःख मुझे घेर रखा था.यह दूसरा मौक़ा था जब मैंने उनसे कहानी देने का वादा किया और अंततः अपनी व्यस्तताओं के कारण कहानी समय पर लिख पाने में
 
चन्दन
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मृत्यु का शीर्षक कहाँ होता है?

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चन्दन
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निजार कब्बानी की कविता जो वर्षों पहले निरूपमा के लिए ही लिखी थी

पारिवारिक तानाशाही का शिकार बन चुकी निरूपमा ने अपनी मृत्यु के बाद एक बड़ा काम किया है. विभाजक रेखा खींची है: ढोगियो और पाखंडियों को इतनी आसानी से मंच पर कभी नहीं देखा गया जो उस परिवार के सुख चैन के लिए हो-हल्ला मचा रहे है जिसने, अगर रिश्वतखोरो और दबाव बना
 
चन्दन
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एक ही पर अनदेखी और अनजानी राह के साथी.

कर्तव्यनिष्ठ और जुझारू पत्रकार स्वर्गीय सुश्री निरूपमा की निर्मम ह्त्या ने लोगो को गहरे तक विचलित किया है. मेरे बॉस की पत्नी जिनका इन बातो से कोई एक ज़रा लेना देना भी नहीं है, जब उन्होंने इसके बारे में सुना तबसे कई बार पूछ चुकीं है, दोस्तों की साझा
 
चन्दन
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काश निरूपमा मेरी बेटी होती....!

जीवन में बहुत कम ऐसे मौके आये जब अपने निर्बल और नाकारे होने पर बेहद अफसोस हुआ, उन्ही गिने मौकों में से एक महान भारतीय परिवार द्वारा निरूपमा की हत्या भी है. जबकि निरूपमा से मेरा कोई परिचय नहीं रहा पर जब से यह खबर सुनी तब से किसी भी साथी से बातचीत करने में
 
चन्दन
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नोयडा से दिल्ली, ऑफिस से घर

(नोयडा से दिल्ली मैं, हद से हद, दस बार आया होउंगा. पांच छः बार नोयडा से जे.एन.यू. तथा तीनेक बार नोयडा से आई.टी.ओ. और हर बार पाया कि दिल्ली के भीतर आना जाना जितना आसान है उतना नोयडा से दिल्ली नहीं. ना ज्यादा बसें हैं, मेट्रो भी अभी शुरू हुई है और भारी
 
चन्दन
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जिस दिन मैं इतिहास के निर्माण का एक दर्शक था.

साइबर कैफे पर बैठा लिख रहा हूँ तो अजीब सा परायापन लगा. लगा जैसे यहाँ आना ही नहीं चाहिए था. हो सकता है मात्राएँ गलत पड़ जाए क्योंकि ये जो कुछ भी है गूगल इंडिक ट्रांसलिटरेशन के सहारे लिखा जा रहा है. बहुत दिनों बाद आप सब से मुखातिब हूँ तो और भी अजीब लग रहा
 
चन्दन
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निकानोर पार्रा की एक और कविता - पहले सबकुछ भला दीखता था

पहले सबकुछ भला दीखता थाअब सब बुरा लगता हैछोटी घंटी वाला पुराना टेलीफोनआविष्कार की कुतूहल भरी खुशियां देने कोकाफी होता थाएक आराम कुर्सी - कोई भी चीजइतवार की सुबहों मेंमैं जाता था पारसी बाजारऔर लौटता था एक दीवार घड़ी के साथ-या कह लें कि घड़ी के बक्से के साथ
 
चन्दन
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इस ब्लाग के पाठकों के लिए सूचना

बीते शनिवार को कुछ लुटेरों ने मेरा लैपटाप मुझसे छीन लिया. मुझे तत्काल यह समझने में वक्त लगा कि वह घटना मेरे साथ घटी है. अब इसके बारे में क्या बताऊँ कि लैपटाप कैसे छिना. बस इतना बताना काफी है कि लैपटाप मेरे लिए महज कुछ हजार रुपए की कोई चीज नहीं था. उसके
 
चन्दन
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देवता बीमार है: कुमार विनोद की मशहूर गज़ल

आस्था का जिस्म घायल रूह तक बेजार हैक्या करे कोई दुआ जब देवता बीमार हैतीरगी अब भी मजे में है यहाँ पर दोस्तोंइस शहर में जुगनुओं की रौशनी दरकार हैभूख से बेहाल बच्चों को सुनाकर चुटकुलेंजो हँसा दे, आज का सबसे बड़ा फनकार हैमैं मिटा के ही रहूँगा मुफ़लिसी के दौर
 
चन्दन
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गाब्रिएल गार्सिया मार्केस की कहानी: समार्रा में मृत्यु

(श्रीकांत का अनुवाद)भयाक्रांत नौकर मालिक के घर पहुंचता है।कहता है- हुजूर, मैंने बाजार में मृत्यु को देखा और उसने मुझे खतरे का इशारा किया।मालिक उसे एक घोड़ा और पैसे देता है, और बोलता है : तुम समार्रा के लिए भाग निकलो।नौकर समार्रा के लिये भाग निकलता है।उसी
 
चन्दन
Feb 24 2010 05:40 PM
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भागना

(बचपन के डर और दु:साहस का यह संस्मरणात्मक आलेख पूजा का है)चन्दन की पोस्ट ‘गुमशुदा की तलाश का स्वप्न’ पढ़कर मुझे भी अपना कुछ पिछला याद आ गया। मैं भी एक बार मार खाने के डर से घर से भाग गई थी। अगर मुझे ठीक ठीक याद तो मैं उस समय चौथी में पढ़ती थी और नौ या दस
 
चन्दन
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श्रीकांत की सलामती के लिये

अभी अभी खबर मिली है कि कल रविवार को श्रीकांत एक सड़क दुर्घटना में घायल हो गये हैं। उनकी बाईक को ओवरटेक करते हुए किसी घमंडी क्वालिस ने धक्का मार दिया और वो बीच सड़क पर दूर तक घिसटते गये। उनका पैर बेतरह जख्मी हो गया। दरअसल उनका पैर क्वालिस और बाईक के
 
चन्दन
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भेड़िया, मैं

(यह कविता सूरज की है)मिशालों की जरूरत,किस्सों की खुराकऔर अपनेअपराधों को श्लील दर्ज करने केलिये सभ्यता ने तुक्के पर हीभेड़िये को बतौर खलपात्र चुनाइंसान की रुहानी भूख के लियेघृणित किस्सों का किरदार बनाभेड़िया, जान ना पाया अपनाअपराध, जबकि यह बताने मेंनही है
 
चन्दन
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मुख्यमंत्री की धूमिल याद में

अब मैं उस राज्य का नाम तो नही ही लूँगा जिसकी राजधानी लखनऊ हो सकती है। ऐसा करते हुए डर लगता है और डर लगने का कारण यह ठहरा कि मेरे घर की दीवालें लाल रंग की हैं। मेरे पास एक टी-शर्ट भी लाल रंग का है। मेरे पास जो इनका भेजा हुआ अखबार आता है उसमें यदा कदा लाल
 
चन्दन
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पता: श्रीकांत की कविता

आम बात है पड़ोसी राहगीर से कहीं का पता पूछ लेना और उतना ही कठिन है उसे आसानी से जान लेना तथा पहुँच पाना वहां तक. लोग जो बता सकते हैं कोई पता और जो लोग नहीं बता सकते उसे उनके चेहरे पता पूछने से पहले से बता रहे होते हैं की वह उस जगह का पता जानते अथवा नहीं
 
चन्दन
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गुमशुदा की तलाश का स्वप्न

कोई घर छोड़ने का निर्णय कैसे लेता होगा? क्या इसके लिये घर परिवार की अन्दरुनी परिस्थितियाँ जिम्मेदार होती हैं या बाहरी कोई गति? मेरे मौसाजी के भाई थे। दिमाग से थोड़ा सुस्त। पागल नहीं थे। बस थोड़ा अलग थे। जरुरी नहीं कि पैदाईशी ही रहा हो।हमारा समाज ही इतना
 
चन्दन
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अगली कहानी – नया

कल रात एक कहानी पूरी की। कहानी मंझोली है पर डेढ़ साल से लिखी जा रही थी और कई सारे तरीकों से लिख लिख के छोड़ता रहा। एक बार तो कहानी पूरी हो गई थी, बीते अप्रेल में, पर खुद को ही पसन्द नही आ रही थी।अब जब पूरी हुई तो मन बहुत उदास हो गया। रात भर नीन्द नही आई।
 
चन्दन
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“चलना” को संज्ञा होना चाहिये था

किसी नितांत निचाट सड़क परतुम्हारे साथहोता हूं जब भीमैं सोचता हूंकि चलनायदि क्रिया नहीं होतीहोती कोई वस्तुकाँच या मिट्टी से बनीतोड़कर रख लेताएक टुकड़ा उसकाअपने झोले मेंऔर जब भी होता अकेलापन(यद्यपि मेरे साथतुम्हारी गैर मौजूदगी मेंमौजूदगी का हीदूसरा नाम है
 
चन्दन
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Feb 13 2010 12:48 PM
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निकानोर पार्रा की कविता: एक अजनबी के लिए खत

जब गुजर जाएंगे साल,साल जब गुजर जाएंगे औरहवा बना चुकी होगी एक दरारमेरे और तुम्हारे दिलों के बीच;जब गुजर जाएंगे साल और रह जाउंगा मैंसिर्फ एक आदमी जिसने मोहब्बत की,एक नाचीज जो एक पल के लिएतुम्हारे होटों का कैदी रहा,बागों में चलकर थक चुका एक बेचारा इंसान
 
चन्दन
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असफल और आत्महंता प्रेम से उबरने की चाह में क्या क्या करते लोग?

शिमले के संझौली रोड पर दिव्य नैसर्गिक खूबसूरती के बीच वो रहता है। चारो तरफ उंचे और खालिस सफेद पहाड़। बादलों से पटी पड़ी गहरी खाईयाँ। आप पांच मिनट वहाँ ठहरे और मेरा दावा है आप या तो बेतरह खुश या बहुत उदास हो जायेंगे। शिमला से आप आगे बढ़ते जायें और संझौली,
 
चन्दन
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राजधानी दिल्ली में क्षृंगार थियेटर या श्रृंगार थियेटर?

राजधानी दिल्ली के बेहद परिष्कृत जगह प्रगति मैदान के हॉल नम्बर एक पर टँगा यह बोर्ड। लगभग रोज ही यहाँ कोई ना कोई मेला(पुस्तक, व्यवसाय, गाड़ी, घर इत्यादि) लगा रहता है। भाषा की ऐसी अशुद्धियाँ किसी कस्बेनुमा जगह की दुकानों या दीवाल पर लोकल पैंटर की चित्रकारी
 
चन्दन
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निकोलस गियेन की कविता- पहेलियाँ

दाँतों में, सुबह,और रात चमड़ी में।कौन है, कौन नहीं?......... नीग्रोउसके एक सुन्दर स्त्री न होने पर भी,वही करोगे जो उसका हुक्म होगा।कौन है, कौन नहीं?......... भूखगुलामों का गुलाम,और मालिक के संग जुल्मी।कौन है, कौन नहीं?......... गन्नाछुपा लो उसे एक हाथ
 
चन्दन
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नींद में खड़ी रहे रेलगाड़ी

जब शहर में तुम नहीं होतीतो रहें वे सारी चीजेंजिन्हें छोड़कर तुम चली गईस्टेशन पर खड़ी थी जो रेलगाड़ीकुछ दिनों तक नींद में पड़ी रहेघड़ी में सात बजेंऔर समय थककर बैठ जायखो जायें चाभियाँ बाज़ार के दुकानों कीमेरी जेब में बचे रहेंछाछठ रूपये नब्बे पैसेचप्पलें बीमार
 
चन्दन
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ऐसी नींद किसे नही चाहिये!

गोएथे की आत्मकथा “ट्रुथ ऐंड फिक्शन रेलटिंग तो माई लाईफ” पढ़ने के दौरान कुछेक गलत/उलझाऊ अनुवादों से पाला पड़ा जिसका मुझे फायदा ही हुआ। गलत अनुवाद पढ़ते हुए हम हमेशा कई सारी कल्पनाओं के लिये आजाद होते हैं, जो मुझे काफी कुछ सिखाती है। इसी तर्ज पर इस किताब से
 
चन्दन
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निकोलस गियेन की कविता : एक सर्द सुबह

सोचता हूं उस सर्द सुबह को कि जिसमें गया था मिलने तुम्हें,वहां जहां हवाना जाना चाहता है खेतों की खोज में,वहां तुम्हारे रौशन उपांत में।मैं अपनी रम की बोतलऔर अपनी जर्मन कविताओं की किताब के साथ,जो आखिरकार तुम्हें दे आया था तोहफे में।(या फिर रख लिया था तुमने
 
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उन्नीसवें पुस्तक मेले के विशिष्ट मेहमान

हुदा आलम। सात महीने की कोमल उम्र में विश्व पुस्तक मेले में शामिल।
 
चन्दन