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18 May 2010
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यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

मुद्दत के बाद उसने जो की लुत्फ़ की निगाह जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़ेजिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के अश्के-ग़मयूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े रचयिता - कैफ़ी आज़मी प्रस्तुति - अलबेला खत्री
 
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कई बार मुड़ मुड़ कर देखा आधा घूँघट खोल

नयन अधमुंदेअधर अधखुलेलरज़े लाल कपोलउस पर भी कुछ कमी दिखी तो बोल दिये दो बोलदीवानों परक्या गुज़रेगीतुमने कभी न सोचाकई बार मुड़ मुड़ कर देखा आधा घूँघट खोलरचयिता : रामरिख मनहर प्रस्तुति : अलबेला खत्री www.albelakhatri.कॉम
 
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कबीर जी कहिन

सोता सन्त जगाइए, करै राम का जापये तीनों सोते भले,साकत, सिंह और सांपरचयिता : कबीरप्रस्तुति : अलबेला खत्री
 
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जिगर मुरादाबादी के चन्द शे'र

ज़िन्दगी इक हादिसा है और कैसा हादिसामौत से भी ख़त्म जिसका सिलसिला होता नहींअक्ल बारीक हुई जाती हैरूह तारीक हुई जाती हैकाँटों का भी हक़ है आखिरकौन छुड़ाये अपना दामनइश्क़ जब तक न कर चुके रुसवाआदमी काम का नहीं होतारचयिता : जिगर मुरादाबादीप्रस्तुति : अलबेला
 
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इति सिद्धम

॥ इति सिद्धम ॥ चूँकि स्त्रियाँ अभी भी हँसती हुई दिखाई देती हैंऔर बच्चे खेलते हुएतितलियों को फूलों के नज़दीक जाने सेरोका नहीं गयाऔर बूढ़ों को खाँसते रहने सेइसलिए ये सिद्ध होता हैकि गणतन्त्र की जड़ें गहरे तक चली गई हैंचूँकि जारी है अभी भीसंतों के प्रवचन
 
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कवि सम्मेलन की महफ़िल में शोभा बढ़ा रही है आज सात समन्दर पार से सुधा ओम ढींगरा की कविता - - मना ले

मना ले घरौंदे से, बाहर सिर निकाल,कोई तो आवाज़ देकर उन्हें बुला लें.तैयार हैं, गगन से गिरने को जो,कोई सीप मुँह खोल उन्हें अपने में समा लें.समुद्र में,रह कर भी प्यासे रहे,कुछ अश्रु ही टपकें तो प्यास बुझा लें.स्मृतियों की दीवारों पर, इच्छाओं की छत्त डाल,चलो
 
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कवि सम्मेलन में आज पधारे हैं यू के से प्राण शर्मा .अपनी प्यारी सी कविता के साथ...

हमकोजब मालूम हुआये रामू के बारह बच्चे हैं,अपने पास बुला कर हमने समझाया-ऐ भाई !45 की उम्र में तेरे 12 बच्चे ?राम दुहाई !महंगाई के दौर मेंये बारह बच्चेजनना ठीक नहीं है,गुरबत मेंइतनेबच्चों का बापूबनना ठीक नहीं हैरामू बोला-साहेबये तो ऊपर वाले कीमाया हैउस
 
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कलाम - ए - जिगर

ज़िन्दगी इक हादिसा है और कैसा हादिसा मौत से भी ख़त्म जिसका सिलसिला होता नहीं रचयिता : जिगर मुरादाबादी प्रस्तुति : अलबेला खत्री watch & enjoy laughter ke phatke by albela khatri & abhijeet sawant new year special episod on STAR ONE 31 dec . 200
 
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कवि सम्मेलन में आज पेश हैं इकबाल के तीन नायाब शे'र

राज़े - हस्ती राज़ है जब तक कोई महरम न हो खुल गया जिस दम तो मरहम के सिवा कुछ भी नहीं तेरे आज़ाद बन्दों की न ये दुनिया न वो दुनिया यहाँ मरने की पाबन्दी , वहां जीने की पाबन्दी मुझे रोकेगा तू ऐ नाखुदा क्या ग़र्क होने से कि जिनको डूबना हो , डूब जाते हैं स
 
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पूनम गुजरानी की कविता खामोश पानी

आँख के खामोश पानी मत बहो स्थिर रहो तुम मोल क्या है इस जगत में इक नन्हीं बूंद का ठहरो स्वाति द्वार पर फिर ज़रा मोती बनो तुम मत बहो स्थिर रहो तुम रचयिता : पूनम गुजरानी प्रस्तुति : अलबेला खत्री
 
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पीली घास

पश्चिम से हवा ही ऐसी चली कि हम गुलाम हो गये हैं । संस्कारों में ये कैसा तेज़ाब भर गया है ? जिसने सबको जला डाला । अंकुरित फूल की जगह कंटीले झाड़ उग आये हैं । संगमरमर की दीवारों पे पीली घास उग आई है बीमार हूँ मैं , लेकिन घर के आँगन में धुओं के साये हैं
 
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Dec 24 2009 07:23 PM
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आज प्रस्तुत है अज्ञेय की कविता "याद उसकी"

जहाँ तक दीठ जाती है फैली हैं नंगी तलैटियाँ एक - एक कर सूख गये हैं नाले , नौले और सोते कुछ भूख , कुछ अज्ञान और कुछ लोभ में अपनी संपदा हम रहे हैं खोते ज़िन्दगी में जो रहा नहीं , याद उसकी बिसूरते लोकगीतों में कहाँ तक रहेंगे संजोते ? रचयिता : अज्ञेय प्रस्
 
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लड़कियां जवान थीं ..........

लड़कियां हिन्दू थीं लड़कियां मुसलमान थीं धौलपुर से दुबई तक बिक्री आसान थीं लड़कियां जवान थीं रचयिता : अक्षय जैन प्रस्तुति : अलबेला खत्री
 
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ज़िन्दगी पर फ़िराक गोरखपुरी के चन्द अनमोल शे'र

मौत का भी इलाज हो शायद ज़िन्दगी का कोई इलाज नहीं न समझने की ये बातें हैं न समझाने की ज़िन्दगी उचटी हुई नींद है दीवाने की गुर ज़िन्दगी के सीखे खिलती हुई कली से लब पर है मुस्कुराहट दिल खून रो रहा है रचयिता : फ़िराक गोरखपुरी प्रस्तुति : अलबेला खत्री
 
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कवि-सम्मेलन में आज आनन्द लीजिये अमृता प्रीतम की अद्भुत और अभिनव कविता आदि धर्म का

आदि धर्म मैंने जब तू को पहना तो दोनों के बदन अन्तर्ध्यान थे अंग फूलों की तरह गूंथे गये और रूह की दरगाह पर अर्पित हो गये ..... तू और मैं हवन की अग्नि तू और मैं सुगन्धित सामग्री एक दूसरे का नाम होठों से निकला तो वही नाम पूजा के मंत्र थे , यह तेरे और मे
 
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Dec 17 2009 12:48 AM
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तोतले भी गीतगायक हो गए

मंच जब से अर्थ दायक हो गए तोतले भी गीतगायक हो गए राजनैतिक मूल्य कुछ ऐसे गिरे जेबकतरे तक विधायक हो गए रचयिता : तेजनारायण शर्मा ' बेचैन ' प्रस्तुति : अलबेला खत्री
 
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Dec 16 2009 09:01 AM
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कवि सम्मेलन में आज अलबेला खत्री प्रस्तुत करता है सरस्वती कुमार 'दीपक' का अनुरागी मन

यह मेरा अनुरागी मन रस माँगा करता कलियों से लय माँगा करता अलियों से संकेतों से बोल मांगता - दिशा मांगता है गलियों से जीवन का लेकर इकतारा फिरता बन बादल आवारा ___ सुख - दुःख के तारों को छूकर ___ गाता है बैरागी मन ___ यह मेरा अनुरागी मन कहाँ किसी से माँग
 
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Dec 15 2009 10:05 AM
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आज कवि सम्मेलन की महफ़िल सजी है 'नीरज' जी से

एक दिन भी जी मगर तू ताज बन कर जी अटल विश्वास बन कर जी अमर युग गान बन कर जी आज तक तू समय के पदचिन्ह सा ख़ुद को मिटा कर कर रहा निर्माण जग - हित एक सुखमय स्वर्ग सुन्दर स्वार्थी दुनिया मगर बदला तुझे यह दे रही है - भूलता यह - गीत तुझको ही सदा तुझसे निकल क
 
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Dec 14 2009 09:55 AM
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आज बांचिये महेश अनघ की अद्भुत रचना...........

कौन है ? सम्वेदना ! कह दो अभी घर में नहीं हूँ । कारखाने में बदन है और मन बाज़ार में साथ चलती ही नहीं अनुभूतियाँ व्यापार में __ क्यों जगाती चेतना __ मैं आज बिस्तर में नहीं हूँ । यह , जिसे व्यक्तित्व कहते हो महज सामान है फर्म है परिवार सारी ज़िन्दगी दूका
 
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Dec 13 2009 08:15 AM
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कवि सम्मेलन में आज पेश है दुष्यंत कुमार की सुविख्यात ग़ज़ल - हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

हो गई है पीर पर्वत सी , पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए आज यह दीवार , परदों की तरह हिलने लगी शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए हर सड़क पर , हर गली में , हर नगर , हर गाँव में हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए सिर्फ़ हंगामा खड़ा करन
 
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Dec 12 2009 12:06 PM
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कवि-सम्मेलन में आज हाज़िर है कात्यायनी की कविता "या कि होगा ?"

एक दिन पर्यावरण की सुरक्षा पर कोई कार्यक्रम नहीं हुआ । जनसँख्या - विस्फोट पर नहीं प्रकट की गई कोई चिन्ता । कला की शर्तें पूरी करने के लिए नीलामी नहीं बोली गई सच की , या ईमान की एक दिन मृत्यु नहीं हुई किसी कवि की या कविता की नहीं बैठा कोई विद्वान किसी
 
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Dec 11 2009 09:29 AM
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दो दोहे गोस्वामी तुलसी दास के..........

तुलसी के दोहे स्वारथ के सब ही सगे , बिन स्वारथ कोई नाहिं सेवें पक्षी सरस तरु , निरस भये उड़ जाहिं नीच नीच सब तरि गए , सन्त चरण लौलीन जातिहि के अभिमान ते , डूबे बहुत कुलीन रचयिता - गोस्वामी तुलसी दास प्रस्तुति - अलबेला खत्री
 
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Dec 10 2009 10:11 AM
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लीजिये पेश है आज व्यंग्य सम्राट माणिक वर्मा की ग़ज़ल प्यार नाम का बूढ़ा व्यक्ति जाने क्या-क्या बकता है

आँसू भीगी मुस्कानों से हर चेहरे को तकता है प्यार नाम का बूढ़ा व्यक्ति जाने क्या - क्या बकता है अंजुरी भर यादों के जुगनूँ , गठरी भर सपनों का बोझ साँसों भर इक नाम किसी का पहरों - पहरों रटता है ढाई आखर का यह बौना , भीतर से सोना ही सोना बाहर से इतना साधा
 
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Nov 21 2009 10:03 AM
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आज प्रस्तुत हैं प्रकृति के कवि सुमित्रानन्दन "पंत"

पावस ऋतु पावस ऋतु थी , पर्वत प्रदेश पल - पल परिवर्तित प्रकृति वेश ! मेखलाकार पर्वत अपार अपने सहस्त्रदृग सुमन फाड़ अवलोक रहा है बार - बार नीचे जल में निज महाकार , जिसके चरणों में पड़ा ताल दर्पण सा फैला है विशाल ! गिरि का गौरव गा कर झर - झर मद से नस - नस
 
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Nov 20 2009 09:02 AM
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आजकल तो बोतलों पर बोतलें नित फोड़ता हूँ - बैठ कर आराम से,आराम कुर्सी तोड़ता हूँ

लीडरी का लोभ ' काका ' इसलिए नहीं छोड़ता हूँ बैठ कर आराम से , आराम कुर्सी तोड़ता हूँ बोल कर ' जयहिंद ' बन्दा शुद्ध खादी धारता है मंच के ऊपर पहुँच , लम्बी छलांगें मारता है देख कर झंडा तिरंगा हाथ दोनों जोड़ता हूँ जब नशीली वस्तुओं को दे के धरना रोकता था जो
 
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Nov 19 2009 08:24 AM
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बालकवि बैरागी की ग़ज़ल - मैं फिर भी गा रहा हूँ

मैं फिर भी गा रहा हूँ कितना उदास मौसम , मैं फिर भी गा रहा हूँ सरगम नहीं है सरगम , मैं फिर भी गा रहा हूँ ये दर्द का समन्दर , ये डूबता सफ़ीना चारों तरफ़ है मातम , मैं फिर भी गा रहा हूँ सपनों का आसरा था , ये भी सहम गए हैं सहमा हुआ है आलम , मैं फिर भी गा
 
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Nov 18 2009 08:07 AM
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भई सूरज, ज़रा इस आदमी को जगाओ - भवानीप्रसाद मिश्र

इसे जगाओ ...... भई सूरज , ज़रा इस आदमी को जगाओ , भई पवन , ज़रा इस आदमी को हिलाओ , यह आदमी जो सोया पड़ा है जो सच से बेख़बर सपनों में खोया पड़ा है भई पंछी , इसके कानों पर चिल्लाओ ! भई सूरज , ज़रा इस आदमी को जगाओ वक्त पर जगाओ , नहीं तो जब बेवक्त जागेगा यह
 
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Nov 17 2009 08:39 AM
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मुकुट बिहारी सरोज की रचना - गणित का गीत

हो गया है हर इकाई का विभाजन राम जाने गिनतियाँ कैसे बढ़ेंगी ? अंक अपने आप में पूरा नहीं है इसलिए कैसे दहाई को पुकारे मान , अवमूल्यित हुआ है सैकड़ों का कौन इस गिरती व्यवस्था को सुधारे जोड़ - बाकी एक से दिखने लगते हैं राम जाने पीढियां कैसे पढ़ेंगी ? शेष जि
 
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Nov 15 2009 07:59 AM
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बाबा नागार्जुन की कविता - अंत श्रावण का यह मेघ

बरसता रहे इसी तरह दिन भर , रात भर अंत - श्रावण का यह मेघ भिगोता रहे इसी तरह खेतिहर मज़दूर - मज़दूर नियों के अंग - अंग अंत श्रावण का यह मेघ सुनता रहे इसी तरह रिक्शा वाले दिल फेंक छोकरे की गाली अंत श्रावण का यह मेघ लोको के आस पास अर्ध दग्ध छिटके - फिके
 
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Nov 14 2009 10:51 AM
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मुक्तिबोध की कविता - मैं उनका ही होता

मैं उनका ही होता, जिन में मैंने रूप-भाव पाये हैं वे मेरे ही हिये बंधे हैं जो मर्यादायें लाये हैं मेरे शब्द,भाव उनके हैं, मेरे पैर और पथ मेरा, मेरा अंत और अथ मेरा, ऐसे किन्तु चाव उनके हैं मैं ऊँचा होता चलता हूँ उनके ओछेपन से गिर-गिर, उनके छिछलेपन से ख
 
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Nov 13 2009 10:51 PM
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अमेरिका निवासी डॉ सुदर्शन 'प्रियदर्शिनी' की कविता - चेहरा

अमेरिका निवासी डॉ सुदर्शन ' प्रियदर्शिनी ' अत्यन्त सौम्य और मर्म स्पर्शी कवितायें करती हैं . आज कवि सम्मेलन में इनकी कविता का आनन्द लीजिये .... ________ चेहरा इस धुन्धयाये खण्डित सहस्त्र दरारों वाले दर्पण में मुझे अपना चेहरा साफ़ नहीं दिखता जब कभी अ ख
 
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Nov 13 2009 02:39 PM
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कविवर कन्हैयालाल सेठिया की रचना - सत्य कौन है, भूल कौन है ?

फूल विहँसता , शूल मौन है । __ एक डाल के दोनों साथी _ _दोनों को ही हवा झुलाती फूल झरेगा , शूल रहेगा , सत्य कौन है , भूल कौन है ? लहर नाचता , कूल मौन है । __ एक पन्थ के दोनों साथी _ _दोनों को किरणें नहलाती लहर मिटेगी , कूल रहेगा , सत्य कौन है , भूल कौन
 
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Nov 12 2009 08:37 AM
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माखनलाल चतुर्वेदी की अमर रचना - "क्या कहा कि यह घर मेरा है"?

क्या कहा कि यह घर मेरा है ? जिसके रवि ऊगे जेलों में , संध्या होवे वीरानों में , उसके कानों में क्यों कहने आते हो ? यह घर मेरा है ? है नील चँदोवा तना कि झूमर झालर उसमे चमक रहे क्यों घर की याद दिलाते हो , तब सारा रैन बसेरा है ? जब चाँद मुझे नहलाता है ,
 
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Nov 11 2009 10:30 AM
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नापने को भंवर तुम चलो तो सही - सीता सागर

सुप्रसिद्ध कवयित्री एवं मधुर , सुरीली , कोकिल कंठी साहित्यकार डॉ सीता सागर का अपना एक ख़ास अन्दाज़ है । अहमदाबाद में उनके साथ हास्य पिटारा किया तो मुझे ये रचना बहुत पसन्द आई ..... आप भी आनन्द लीजिये ... - अलबेला खत्री
 
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Nov 10 2009 10:13 PM
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जग विख्यात उस्ताद शायर निदा फ़ाजली का कलाम - सुन रे पीपल, तेरे पत्ते शोर मचाते हैं.....

जिन्हें बांचना , बाँच कर समझना , जिन्हें सुनना और सुन कर झूमने लगना .......... बड़ी अद्भुत होती है वह घड़ी ... जब उस्ताद शायर निदा साहेब हो , उनका परफोर्मेंस हो और महफ़िल जवान हो ......... पिछले 25 वर्षों में अनेक मर्तबा जिनके साथ मंच और मंच के बाद वाल
 
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Nov 10 2009 08:59 AM