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कुनाल (सिफर)

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13 Jun 2010
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जिंदगी से दूर कर दिया...!

आदाब,एक ताज़ा ग़ज़ल आप सबकी नज़र कर रहा हूँ... उम्मीद है आप अपनी आरा से ज़रूर नवाजेंगे...==============================बहर:- मुज़ारी मुसम्मन अखरब मख्फूफ़ महज़ूफ़ (2 2 1   2 1 2 1   1 2 2 1    2 1 2
Jun 14 2010 09:29 AM
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चला हूँ मैं, चले हो तुम धीरे धीरे ....!

======================बहर: हजाज़ सालिम ( १२२२ १२२२ १२२२)======================चला हूँ मैं, चले हो तुम धीरे धीरे ..नज़र भी होगी, यूँ ही नम धीरे धीरे...दीवाने गर है तन्हाई के दोनों हम,होगा महसूस दर्द-ओ-ग़म धीरे धीरे...ठहर के जाम होंटों से लगाना तुम
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कुनाल (सिफर)

आदाब,एक ताज़ा ग़ज़ल बहर-ए-मुजारी मुसम्मन अखरब मे आप सबकी नज़र कर रहा हूँ ... ये बहर के हर मिश्रे मे एक अनिवार्य रुकाव (//)होता है ... उम्मीद है आप अपनी आरा से नवाजेंगे..=========================बहर :- मुजारी मुसम्मन अखरब ( 221 2122 // 221 2122 (In
May 15 2010 05:40 AM
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पत्थरों से मारा है ...!

सलाम,दिल के जज़्बात है ज्यूँ के त्यूं रख रहा हूँ ... बाकी आपकी इनायत...--------------------------------बहर:- हजज़ मुसम्मन अश्तर (212 1222 212 1222)--------------------------------नज़रों पे हुआ रोशन अश्कों का सितारा है...क्या हसीन मंज़र है, मौत का नज़ारा
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फर्क औकात का है....!

आदाब...आज कल हाथ कुछ ज्यादा जुनूनी है ... एक और ताज़ा ग़ज़ल अपनी जानिब से बहर-ए-मुतकारिब सालिम मे आपकी नज़र कर रहा हूँ..आप अपनी आरा से नवाजेंगे उम्मीद करता हूँ...=========================बहर :- मुतकारिब मुसम्मन सालिम (Fa-uu-lun  Fa-uu-lun
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लकीरों से अब उतर भी जायेगा...!

आदाब..... एक ताज़ा ग़ज़ल बहर-ए-रमाल मुसद्दस महजूफ मे आपकी नज़र कर रहा हूँ... जैसा लगे ज़ाहिर कर दीजियेगा...ज्यादा कहा नहीं जाता... ======================= बहर :- रमाल मुसद्दस महजूफ (Faa-i -laa-tun Faa-i-laa -tun Faa-i-lun)(2122 2122 212 – In Digit) =
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कागज़ पे बिखर के मैं अंगार हो जाता हूँ....!

आदाब , सभी शायरी के रहनुमाओं को मेरा ... ये जो ग़ज़ल मैं आपके रू-बा-रू कर रहा हूँ ... इस ग़ज़ल का बहर हजाज़ मख्फूफ़ महजूफ रहता ... पर एक तक्ता ज्यादा रहा .. तो कोई तकनीकी बहर नहीं बनती .... ============================ बहर:- {2211 2211 2211 222 (गिनत
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आज ही जन्मे थे आज ही जायेंगे...!

आदाब आज एक ताज़ा ग़ज़ल अपनी जानिब से बहर-ए-मुतदारिक सालिम मे आपकी नज़र कर रहा हूँ.. मुआफी का तलबगार भी हूँ उन दोस्तों से जिनके दिल को ज़रा भी ठेस पहुंचे.. क्यूंकि आज मेरे जन्मदिन पे मुझे ऐसा लिखना नहीं चाहिए था...जो जिस तरह से दिल मे आया लिख दिय
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हाँ तुम वही तो हो...!

एक नज़्म जैसा है .. बहर की तकनीक से बोहत दूर.. बस सीधे ख्याल .....! =============== तुम वो ही तो हो... जो एक रोज़ यूँ ही मिल गयी थी कहीं... अचानक से नज़रें बस खुल गयी थी वहीँ... जो एक हवा के जैसे साँसों से टकराई और धुल से मिल कर.. तस्वीर सी उभर आई..
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बस गया वो आखिरी सदमा नज़र मे...!

आदाब अर्ज़ है... एक ताज़ा ग़ज़ल को रमाल बहर मे अपनी जानिब से अदा कर रहा हूँ,.. . शुरुवात अपनी इल्लत से मजबूर ख्याल से ही करूँगा... ------------ ख्याल :- ------------ यादों ने फिर आज मुझे घेरा है ... उस कोने मे मेरा बसेरा है... जहाँ तू आया नहीं कभी ..
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आतंक कि शाम मांगता है ....!

कभी मस्जिद का तो कभी मंदिर का नाम मांगता है.. कागजी माया के लिए मुल्ला रहीम, पंडित राम मांगता है... जीवन का हर पल मर के काटती है वो गरीब माँ.... भूक से बिलखता बच्चा रोटी जब सरे आम मांगता है ... पड़ते है छाले चलते चलते, नौजवान क़दमों मैं.. कैसे हाथ जो
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ग़ज़ल:- गली आखिरी....!

शुरुवाती ख्याल के मुत्तालिक , एक मुक्तारिब बहर मैं ग़ज़ल अपनी जानिब से पेश कर रहा हूँ.. . और बस अपने दिल को यहाँ रख रहा हूँ .. Behar hai :- mutqarib (lGaGa lGaga lGaGa lGaGa)---(In Digit:-122 122 122 122) --------- ख्याल ---------- चलने से पहले कुछ स
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और वो वहम बताते रहे

हम अलग सही आज के दौर मे... पर कैसे भूलूं मैं वो राहें... चलते थे साथ कदम, चलती थी साँसें ... बताओ क्या बदला है इस जिन्दगी मे.. पहले जगते थे तेरे प्यार मे.. अब बस इंतज़ार मैं कटती है रातें,,, मिल लेता था तुझसे तब रू-बा-रू, और अब तस्वीर से होती है बाते
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किस्मत जो बदल न पायेंगे...!

तुम हकीकत हो या ख्वाब, .. पर तुम्हे सच मान के जिंदगी जीता हूँ मैं ... की मेरे अरमानों मैं तुम्हारा अक्स है कहीं न कहीं ... जिसे मे देख सकता हूँ... छु सकता हूँ... पर पल भर मे सिमट जाता है वो कहीं... दिल रोज़ जी उठ-ता है और रोज़.........! _--_--_--_--_
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'ए' हाथ छुडाने वाले....!

आज बस यूँ ही मन किया की मैं भी अपना एक आशियाना बनों .. तो बस इस तरफ चला आया... और देख मेरे खुदा ... अपने आपको मैंने खोदा है तो क्या पाया है... वही जो बस उस वक़्त जेहन मैं आया .. जब साँसों ने चलने से इनकार कर दिया था.. पर न जाने क्यूँ.. तब भी एतबार था
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दिवाली मे घर जला रहें है ...!

अँधेरे को अँधेरा रहने दो... डूबा हुआ सवेरा रहने दो... मुझे आदत है सन्नाटे की ... रिश्तों मे हमेशा घाटे की.. ज़रुरत नहीं मुझे रोशनी की... बस हटा दो कोई लकीरें मेरे माथे की ... चाहे खलाओं मे मेरा बसेरा रहने दो.. जो मेरा है उसे मेरा रहने दो .. डूबा हुआ