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अनुभूति कलश

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12 Jun 2010
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समीकरण बैठाए कितने?

१- साँसों से अनुबंध हुआ कब? पंजीकरण सब फेल हुए हैं। समीकरण बैठाए कितने? फिर भी वे सब बेमेल हुए हैं॥ २- अनुबंधों की क्या हैं सीमाएँ? हमने तो अब तक न जाना । रिश्तों में कैसा समीकरण हो? दिल ने अब तक न पहचाना॥ ३- जीवन की अँधी दौड़ में, प्यार का इक क्षण [...]
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आँखों का हर एक गौहर

दिल में उतर गए तुम , आँखों की राह चलकर । दिल से निकल गए तुम , आँसू की बूँद बन कर॥ आँखों का हर एक गौहर, तेरे लिए छुपाया । आँखों का हर एक गौहर, तुम पर ही था लुटाया ॥ दोनों तरह लुटे हम , तेरी वफ़ा के चलते। तुम तो समझ सके [...]
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सिर्फ़ प्यार कर

मैंने तो दिल की गहराइयों से चाहा तुमको, और तुमने मेरी चाहत को सस्ता समझा मेरी भावनाओं से खेल कर क्या मिला तुमको? प्यार को तुमने क्यों खिलवाड़ समझा? तुमने अभी तक मेरे प्यार की नम्रता देखी है, अब तुम उसकी कठोरता भी देखोगे, नारी प्यार में मिट [...]
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वादा कर के मुकर गया कोई

वादा कर के मुकर गया कोई, आँखों में अश्क दे गया कोई। दे दीं हर धड़कनें जिसे हमने, साँसों का क़त्ल कर गया कोई । रोज़ आते थे जो हमारे दर पर, गर्दिश-ए-वक़्त छल गया कोई । नूर-ए-दिल था जो कभी अपना, आज बेनूर बन गया कोई । दिल की गलियों में जो विचरते थे, बिन कहे दिल
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प्यार पर दो क्षणिकाएँ

१- तुम दूर हो या पास , तुम्हारे प्यार का अहसास, मेरी साँसों में , संगीत भर देता है। २- ‘प्यार’ वह संजीवनी है, जो ऊसर ज़मीन को भी , उर्वरा बना देती है । डा.रमा द्विवेदी © All Rights Reserved
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हाइकु-६

१- अपना दर्द भोगना पड़ता है हर किसी को। २- प्रतिध्वनियाँ गूँजती हैं रगो में जर्जर आस्था। ३- चाँदनी रात मकबरा खामोश ताजमहल? ४- शब्दों की भीड़ बीमार कल्पनाएँ अर्थ रहित। ५- सूरज फीका चाँद पीला-पीला सा चाँदनी रोई । ६- दिगभ्रमित दमघोटूँ खामोशी मूल्यहीनता ।
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सपने गढ़े जाते हैं

सपने सच होते नहीं सपने गढ़े जाते हैं कुम्हार की मिट्टी की तरह । अनगढ़ मिट्टी में सपनों के बीज नहीं बोए जाते । जैसे कुम्हार पहले मिट्टी को तैयार करता है तब कल्पना का चक्र घुमाता है फिर उस पर मिट्टी का लोंदा रखकर हाथों की उंगलियों से मनचाहा रूप [...]
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‘प्यार’ पर तीन मुक्तक

१- यह कैसा है प्यार तुम्हारा, तुमने हमको किया नकारा , तेरे खातिर प्राण दे दिए, फिर क्यों मेरा प्यार है हारा? २- साँसों से साँसें टकराई, तब हमने थीं कसमें खाईं, साथ जिऐंगे, साथ मरेंगे, दिल ने दिल से करी सगाई । ३- प्यार हमें तरसाता भी है, प्यार हमें सहलाता
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हाइकु-५

१- वंश का नाम चलाता है आत्मज बेबुनियाद । २- खलीफ़ा बुर्ज मेहनत किसी की नाम किसी का? ३- क्रान्ति का बीज चिंगारी बनी आग जीत निश्चित । ४- सुलगा दिल रोया था रातभर ज़ुबां खामोश । ५- बिना कफ़न हो जाती हैं दफ़न दहेज बिना । ६- पीड़ा का मौन पिघलता प्यार से [...]
Feb 12 2010 10:44 AM
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चार शब्द चित्र

चार शब्द चित्र 1- बने मेघ गर तुम, मैं नीर बनी हूँ , जब बरसे गरजकर, मैं धीर बनी हूँ । २- लगाई थी बिंदिया तेरा नूर लेकर, तेरे ही लबों की, मैं लाली बनी हूँ । ३- पिया जाम तुमने मैं मदिरा बनी हूँ, , बहके कदम जब, मैं संग -संग चली हूँ [...]
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भावनाएँ बर्फ़ बन गईं

मानव की भावनाएँ आज बर्फ़ बन गईं ज़िन्दगी की हर खुशी बस दर्द बन गईं। मीठा जहर पिला रहा मानव को मानव आज, प्रतिशोध की आग में सब जर्द बन गईं । इन्सानियत को ढूँढ़ते सदियाँ गुजर गईं, इंसा को इंसा डस रहा बस सर्प बन गईं । हर खुशी का लम्हा है दहशत भरा हुआ ज़िन्दगी की
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`मौन’ पर क्षणिकाएँ

११- ‘मौन’ ऊर्जा प्रवाह का उत्स है। १२- `मौन’ सहिष्णुता, क्षमा एवं अनुशासन, सिखाता है । १३- झूठी प्रवंचना करनेवाले, कभी मौन व्रत , नहीं साध सकते। १४- `मौन’ में होता है, अनूठा संगीत। १५- गृह-कलह को, टालने का अचूक नुख्सा सिर्फ `मौन’ है।
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हाइकु-४

१- मिट्टी का तेल दियासलाई की लौ बहू की बलि । २- सपने बुने अलगनी में पड़े सूखते रहे। ३- दिन या रात चन्द्रमा परेशान ब्रह्म मुहुर्त्त? ४- दर्पण का सच टूट-बिखर कर रहा अमिट । ५- चाँद हैरान सूरज परेशान चाँदनी रोई । ६- जीवनदाता बन गया राक्षस सुरक्षा कहाँ ? ७-
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अमेरिका पर क्षणिकाएँ

१- अमेरिका की शान्ति देखकर शान्ति भी शान्त हो बैठी है। २- यहाँ के आम लोगों की, जीवन रूपी गाड़ी, बिरले ही पटरी से, उतरती है। ३- अमेरिका का कानून, इतना सख्त है, कि आम आदमी , जुर्म करने से पहले ही, दहल जाता है। ४- यहाँ के पड़ोसी, बर्फ से भी
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यह बचपन कितना निर्द्वन्द?

यह बचपन कितना निर्द्वन्द, खुश हैं ये कितने रंगों के संग। मस्ती करते, धूम मचाते, आगे – पीछे दौड़ लगाते, नीला -पीला और हरा, लाल, गुलाल कर दें ये धरा, नहीं भंग पी फिर भी झूमै जैसे मतंग । यह बचपन कितना निर्द्वन्द? नाचे – गाएं धूम मचाएं, भर -भर
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स्वयं ही रणचंडी बनना होगा

स्वयं ही रणचंडी बनना होगा स्त्री के मन को इस देश में, कोई न समझ पाया है? कितना गहरा दर्द,तूफ़ान समेटे है, अपने गर्भ में,मस्तिष्क में, उसकी उर्वर जमीन में, बीज बोते समय तुमने न उसे खाद दी , न जल से सींचा, अपने रक्त की हर बूँद से, उसने उसे पोसा, असंख्य
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वरिष्ठ साहित्यकार श्री राजेन्द्र अवस्थी जी नहीं रहे

मध्य प्रदेश के गढ़ा जबलपुर मे २५ जनवरी १९३० को जन्में श्री राजेन्द्र अवस्थी वर्तमान मे` ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ’ के जनरल सेक्रेटरी थे । नवभारत,सारिका ,नंदन,साप्ताहिक हिन्दुस्तान और कादम्बिनी के आप संपादक भी रहे हैं। आपकी चर्चित कृतियों में `सूरज
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झूमता आया है नया वर्ष फिर

सभी प्रिय मित्रों को बड़े दिन और नववर्ष-२०१० की हार्दिक शुभकामनाएँ) हँसता, हुलसता, झूमता आया है नया वर्ष फिर, जीवन में खुशियाँ भरने को आया है नया वर्ष फिर। हर घर के देहरी-द्वार पर जगमगाते दीप ऐसे, जमीं पे उतर आए हों नभ के सभी सितारे जैसे, चन्दा औ चाँ
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कुछ क्षणिकाएँ ( अमेरिका की प्रकृति पर)

१- कल यह पेड़ हरे परिधान में झूमता था आज लाल परिधान में खिलखिला रहा है , कल इसके परिधान पीले होकर उतर जाएंगे और पेड़ नग्न होकर शर्मसार हो रहा होगा । २- देखो-देखो यह दरख़्त कितना पीला पड़ गया है? इस भय से कि कल वह [...]
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पिता की ममता (कहानी)_ डा.रमा द्विवेदी

सुनती हो दिविक ने बड़ी उदासी भरी आवाज में पुकारा। मैं बड़ी ही [...]
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क्षणिकाएँ-२

१- मौसम के रंग , निश्चित समय पर बदलते हैं, पर रिश्तों के रंग तो पल-पल बदलते हैं। २- रेखाएँ खींचना मगर, हथेली की लकीरों की तरह, कम से कम मिल सकें , कहीं पर तो हम। ३- धरती की परिधि पर, सूर्य की तरह चक्कर मत काटना, मिलन के लिए, परिधियों का टूटना, ज़रूरी
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क्षणिकाएँ-१

१- सूरज,चाँद,तारे, रोज निकलते हैं आसमां में, फिर भी जाने क्यों झोपड़ी में , उजाला नहीं होता। २- सदियों तक कोई किसी से रूठता नहीं, पर न जाने क्यों खुदा रूठा है गरीब से। ३- माना कि नासमझ थी मैं, समझ सकी न तुझको, क्या तुमने भी, मुझे समझने की, ज़रूरत नही
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आखिर क्यों?

लड़की की विदाई के समय सबने कहा, अब सब कुछ भूल कर, अपना पति और घर-संसार देखना , हां मैं भी तो इसी सीख पर चाहती हूं चलना, किन्तु क्या करूं? पहली छुअन,पहलेपहल दिल का लगना, कभी भूलता नहीं, तो फिर कैसे? इस आरोपित पुरुष के प्रति प्रेम करूं? कैसे ? कैसे? वो
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प्रेम जिजीविषा का विकास है

प्रेम’ दिल की पुकार है, ह्रिदय का विस्तार है, स्वप्निल संसार है, रस की फ़ुहार है, तन-मन झूम जाता है, गीत बन जाता है। ‘प्रेम’ जिजीविषा का विकास है, जीवन का प्रकाश है, अधरों का उल्लास है, रागात्मकता का विलास है, मन-मयूर नाच उठता है, गी
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पत्थर युग में/ उडने की कोशिश

१- पत्थर युग में ऐसा लगता है हम पत्थर युग की ओर धीरे-धीरे सरक रहे हैं। अच्छा है अगर, अगर सब पत्थर बन जाएं कम से कम ऊंच-नीच की खाई तो पट जायेगी और भावनाएं इस तरह लहूलुहान तो नहीं होंगी॥ २- उडने की कोशिश चिडियों की ऊंची और ऊंची उडने की कोशिश भी आकाश [.
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अनुभूति

हर अनुभूति परिभाषा के पथ पर बढे- यह आवश्यक नहीं, शब्दों की भी होती है एक सीमा, कभी-कभी साथ वे देते नहीं, इसलिए बार -बार मिलने व कहने पर, यही लगता है जो कहना था, कहां कहा? ‘प्रेम’ ऐसी ही इक ‘अनुभूति’ है, वह मोहताज नहीं रिश्तों
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“माया” श्रृंखला -२ ( कुछ मुक्तक)

१- भक्तों के माया-दान से, वेंकटेश भी परेशान हैं। आठो पहर रहते खड़े, अभिनय भी उनका महान है॥ २- सरकार की नज़रों से हरदम, ‘कर’ छुपा लेते हो तुम। किन्तु अपने पाप धोने को, मुझपर चढ़ा देते हो तुम॥ ३- माया की अनुमति के बिना, आशीष मेरा पा सको ना। [.
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प्रपंच और चापलूसी

१- प्रपंच का भी आज आधुनिकरण हो गया है इसलिए चौपाल छोड़ नेट-ग्रुप में हो गया है, यहाँ पर भी है अँधेर नगरी का चौपट राजा, टके सेर भाजी और टके सेर खाजा हो गया है। २- प्रणाम और चापलूसी कर प्रशंसा पा लेते हैं, खुद को महाकवि मान अनुशंसा कर लेते हैं, कूपमण्ड
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अलविदा ज़िन्दगी

हम भी हरे थे,चुलबुले थे, ज़िन्दगी के हर रंग जिये थे आज हम मुरझा गये हैं दुख के बादल छा गये हैं। ज़िन्दगी की शाम में देगे नहीं कोई सदा हम, आखिरी लम्हें तो जी लें कल कहेंगे अलविदा हम। शिकवा नहीं कोई किसी से सबको भी आना यहीं हैं। आज जी भर कर विलस लो छोड
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समझौता भाता नहीं।

जब किसी से जुड़ता है दिल मेरा दिल दीवानगी को पार कर जाता है। और जब टूटता है दिल मेरा, दिल दुख की दीवानगी में डूब जाता है। क्या करें इस दिल का, समझौता इसे भाता नहीं। और दिल की उन गहराईयों तक, समझने के लिए कोई आता नहीं। इस दुनिया में दिल की बात करना, ख
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समझ लेना तुम

ये फिज़ायें गुनगुनाती हरदम, यह समझ लेना तुम। ये वादियाँ तलाशती हमदम,यह समझ लेना तुम ॥ बहारें आयेंगी गर ,पतझड़ भी जरूर आयेगा, यही चमन का नियम ,यह समझ लेना तुम॥ हवाएं सहलाती भी हैं,हवाएं झुलसाती भी हैं, समन्दर में भी रहती है अगन,यह समझ लेना तुम॥ वफ़ा क
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‘मौन’ पर क्षणिकाएँ

मौन-साधना , अपने आप मेँ , बडा तप है । 2- मौन-सागर का, कोइ निश्चित , मापदँड नहीँ होता। 3- मौन साधक् को , अक्सर लोग उस व्यक्ति की, कमजोरी समझ लेते हैँ। 4- मौन रहकर भी, सम्वाद होते हैँ। 5- [...]
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खुद को मिटाती चली गई

खुद को मिटाती चली गई तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई। दस्तूर-ए-दुनिया के निभाती चली गई॥ चारो तरफ रिवाज़ों की भीड़ है खड़ी, रस्में-वफ़ा मैं फिर भी निभाती चली गई। तेरे प्यार में मैं खुद को मिटाती चली गई॥ चाहत में तेरी खुद को मिटा डाला है मैंने,
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चिर-आयु पति की और अपनी मृत्यु की कामना?

चिर-आयु पति की और अपनी मृत्यु की कामना? अभी-अभी किसी ने मुझे करवा चौथ के शुभ अवसर पर “सदा सुहागन रहो” की शुभ कामनाएं भेजीं जिसे पढ़कर मेरे मन में एक विचार कौंधा कि भारतीय स्त्रियां कितनी भोली हैं या कितनी महान हैं या कितनी उदार हैं या फिर
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क्षणिकाएँ

क्षणिकाएँ १- ज़िन्दगी की मंज़िलों के रास्ते हैं अनगिनत, शर्त है कि रास्ते, खुद ही तलाशने पड़ते हैं। २- एक ही सूरज यहाँ भी, एक ही सूरज वहाँ भी, पर, एक साथ हर जगह, सुबह नहीं होती। ३- अधिकार मांगते हो? ज़िन्दगी का अंतिम अधिकार, मृत्यु के हाथ में ही, सौं
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यह ज़िन्दगी का फलसफ़ा

ये पेड़ झूम-झूम के , कह रहे हैं हमसे कुछ, [...]
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ज़िन्दगी के क़र्ज़ को यूँ चुकायेंगे

दर्द में भी ज़िन्दगी को जीते जायेंगे। ज़िन्दगी के क़र्ज़ को हम यूँ चुकायेंगे॥ लक्ष्य लेके रास्तों पे बढ़ते जायेंगे, [...]
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