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18 Mar 2010
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चौपाल : आंच पर है 'भाषा’

आँच-8 -- हरीश प्रकाश गुप्त रचनाकार के अन्दर धधकती संवेदना को पाठक के पास और पाठक की अनुभूति की गरमी को रचनाकार के पास पहुँचाना आँच का उद्धेश्य है। आँच के विगत अंक में लोगों का ध्यान आकर्षित करने वाली जिन काव्य रचनाओं का प्रसंग चर्चा में आया था उनमें से
 
करण समस्तीपुरी
टैग: आंच
Mar 18 2010 06:33 PM
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देसिल बयना 22 : दिहैं तो कपाल....

-- करण समस्तीपुरी जय राम जी की !सोचते-सोचते बुध का सांझ हो गया और हम अभी तक सोचिये रहे हैं कि देसिल बयना में आज आप लोगों के सामने का लेके हाज़िर होएं.... काहे कि आप तो पाठक लोग राजा हैं और कहावत है, "राजा-जोगी-पेखना (मेला) ! खाली हाथ न देखना !!" सो हाथ
 
करण समस्तीपुरी
Mar 17 2010 07:34 PM
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हरीश प्रकाश गुप्त के हाइकू

हाइकू-- हरीश प्रकाश गुप्तभरा उदधिहुआ मधु विस्‍फोटफूटी कविता । उतर गईअन्‍तस में, नैननपढ़ कविता । मेरी कवितामेरे मन का गीतसुर संगीत रात निठल्‍लीसोई, दिन ने थकबेबस ढोई । अचल बिंदुके इर्द-गिर्द घूमरहा बेसूध । गली-गली मेंघूमा, ठहरा, सोचालेकिन कहॉं? कुत्ता ले
 
करण समस्तीपुरी
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बाधा

-- मनोज कुमारवृद्ध भूचारण देवी गांव की हवेलीनुमा मकान में भूतपूर्व महाराज की तरह कैदी जीवन व्यतीत करने को विवश हैं। एकमात्र पुत्र अपनी एकमात्र पत्नी एवं पुत्र के साथ शहर में हैं। मां-बाप तो बच्चों का नाम भी बहुत सोच समझ कर ही रखते हैं। भूचारण देवी औऱ
 
करण समस्तीपुरी
Mar 15 2010 06:49 PM
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काव्यशास्त्र - ६

भारतीय काव्यशास्त्र पर चर्चा - 2 काल–विभाजन -परशुराम राय (काव्यशास्त्र के इस धारावाहिक लेखन का यह दूसरा भाग परशुराम राय जी ने तो यथा समय ही भेज दिया था पर हम उसे पोस्ट नहीं कर पाये। इसे हम आज प्रस्तुत कर रहे हैं, पुनः अगले रविवार से निश्‍चित क्रम में आ
 
मनोज कुमार
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अभिव्यक्ति

अभिव्यक्ति मुझे लोगों की सहज अभिव्यक्ति बहुत अच्छी लगती है। वे लोग भी सुहाते हैं जो अपनी बात को बिल्कुल सीधे-सीधे रखते हैं। मैं ऐसा ही करता हूँ। ज़िन्दगी में जो भी अनुभव किया वह मेरी रचनाओं में प्रकट होता है। मैं जब लिखता हूँ तो बातें मेरी होती हैं। वे ही
 
मनोज कुमार
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त्यागपत्र : भाग 18

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना ! रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! फिर पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत ! गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों की कटु-चर्चा
 
करण समस्तीपुरी
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चौपाल : आंच पर है "किस अधर का गीत...."

आँच-7 -- हरीश प्रकाश गुप्त रचनाकार के अन्दर धधकती संवेदना को पाठक के पास और पाठक की अनुभूति की गरमी को रचनाकार के पास पहुँचाना आँच का उद्धेश्य है। इस ब्लाग पर पिछले दिनों आई जिन कुछ काव्य रचनाओं ने विशेष ध्यान आकर्षित किया, उनमें से एक है करण समस्तीपुरी
 
करण समस्तीपुरी
टैग: आंच
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देसिल बयना 21 : तेल बनावे तिमना.....

-- करण समस्तीपुरी ई बार फगुआ में घर गए तो चमकी मौसी के घर बेनीपुर भी घूम आये। इस्कूल में कुछो के छुट्टी मिले कि हम सीधे बेनिपुरिया रास्ता पकड़ लेते थे। शीत भैय्या के बियाह में तो चार महीना तक हम बेनियेपुर में रहे थे। फागुन में गए सो गर्मी-तांतिल
 
करण समस्तीपुरी
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मन तरसे इक आंगन को

-- मनोज कुमार हुआ असह्य अब एकाकीयांत्रिक जीवन, आपाधापी !मिले जो कुछ मनभावन को,मन तरसे इक आंगन को ! ओसारे पर की बैठक,बहुओं की चुहलबाजियां !ननदों की शरारतेंदेवरों की मस्तियां !! सासों के ताने,ससुर का खांसना !बधुओं का घुंघट से,शर्माकर झांकना !! देना इशारे
 
करण समस्तीपुरी
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फैसला

-हरीश प्रकाश गुप्त सुजय की शादी में वे सारे तामझाम हुए जो उसके परिवार की मान और ठसक के अनुरूप थे। बरात में नाचनेवालियाँ न हो तो रुतबे में आँच आती है। सो, नाचनेवालियाँ भी बुलाई गईं। बरात अपने शबाब पर थी। गाजे-बाजे के साथ जगह जगह रुक कर भड़कीले गानों की
 
करण समस्तीपुरी
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काव्यशास्त्र : भाग 5

आचार्य दण्डी --आ.परशुराम राय आचार्य दण्डी महाकवि भारवि के प्रपौत्र हैं। इसका उल्लेख उन्होंने अपने ग्रंथ ‘अवन्तिसुन्दरीकथा’ में किया है। आचार्य दण्डी का काल आठवीं विक्रम शताब्दी में विद्वानों ने तय किया है। आचार्य भामह के बाद काव्यशास्त्र पर जिनका ग्रंथ
 
करण समस्तीपुरी
Mar 07 2010 05:30 PM
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चैत खेलब बलजोरी हो रामा....

-- करण समस्तीपुरी फागुन का रंग उतरा भी नहीं कि चतुरंगिनी चैती बयार चित्त की चंचलता में चार-चार चपल-चारु पंख लगा रही है। ऋतुराज के यौवन पर मन्मथ की मार से उपजे जलन को फागुन का पूर्ण-चन्द्र भी शीतल न कर सका। वसुधा की धानी चुनर के रंग ढलने लगे, प्रकृति का
 
करण समस्तीपुरी
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त्याग पत्र : भाग 17

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना ! फिर रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! रामदुलारी अब पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत है ! गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों
 
करण समस्तीपुरी
Mar 05 2010 06:56 PM
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चौपाल : आंच पर फिर 'रो मत मिक्की'

आँच-6 ‘रो मत, मिक्की’ पर....... -मल्लिका द्विवेदी रचनाकार के अन्दर धधकती संवेदना को पाठक के पास और पाठक की अनुभूति की गरमी को रचनाकार के पास पहुँचाना आँच का उद्धेश्य है। हमें ख़ुशी है कि हम अपने उद्देश्य के रास्ते आप तक पहुँच रहे हैं। इसी ब्लॉग पर
 
करण समस्तीपुरी
Mar 04 2010 05:30 PM
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देसिल बयना - 20 : बिना ब्याहे घर नहीं लौटे..... !

-- -- करण समस्तीपुरी जय हो ! जनता-जनार्दन !! कैसन रही होली ? सब कुशल है ना.... ? अरे मरदे का बताएं.... हमरे होली में तो ऐसन गुलाल उड़ा कि जिनगी भर नहीं भूलेंगे। बड़ी शौक से गए रहे गाँव होली खेले.... लेकिन वही हो गया, 'शौक में सोहारी [रोटी] ! आलू बैगन के
 
करण समस्तीपुरी
Mar 03 2010 06:26 PM
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यह होली सचमुच होली थी

ऊन्न्ह्ह............... !!!!सज्जनों एवं सजनियों,राम-राम !!!ऊंन्ह्ह्ह......... कल होली थी और आज धुलेंदी......... ! खुम्हारी अभी भी नहीं टूट रही है ! ब्लॉग पर कुछ तो लिखना है..... तो पढ़िए क्या हुआ होली में..... कैसी रही होली ?-- करण समस्तीपुरी यह होली
 
करण समस्तीपुरी
Mar 02 2010 05:35 PM
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पूर्वजों की रीत हूँ मैं....

होली की शुभ-कामनाएं और ईद-मिलाद-उल-नवी का मुबारकबाद ! कल सायं से ही मुझे अपनी एक कविता की अन्त्य-पंक्तियाँ "भूल बैठे सब जिसे वह पूर्वजों की रीत हूँ मैं....." याद आ रही है। कविता मैं इस ब्लॉग पर प्रकाशित कर चुका हूँ।क्रूर काल का ग्रास हूँ !किन्तु अमित
 
करण समस्तीपुरी
Mar 01 2010 10:22 PM
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होली का रंग

होली का रंग-- परशुराम रायहोली के रंग कैसे सजनमस्त हमारा इतना तन-मनसाँस-साँस में झूमे फागुनमदभरे नयन के कोर-कोर।सर-सर पवन चले घर-बाहरगाएँ भौंरे फूल-फूल परदेती कोयल कूक ताल परचूम के डाली की हर पोर।तरु-तरु की गदराई डालेंरंग-बिरंगी चूनर डालेउषा सबेरे कलि
 
मनोज कुमार
Feb 28 2010 07:05 PM
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बोल जोगीरा सा..रा...रा..रा...रा.... होली है !!!!

-- करण समस्तीपुरी कल आप लाल,पीले, नीले, हरे हो जायेंगे। अजी ये आपकी राशिफल नहीं, कल होली है.................... भैय्या रे सा..रा...रा...रा..... !!! भाई नाच में सकीरा का, ताल में मजीरा का और होली में जोगीरा का बड़ा ही महत्व है। बिन जोगीरा होली के रंग फीके।
 
करण समस्तीपुरी
Feb 28 2010 05:30 AM
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काव्यशास्त्र : भाग 4

आचार्य भामह -- आचार्य परशुराम राय आचार्य भामह का काल निर्णय भी अन्य पूर्ववर्ती आचार्यों की तरह विवादों के घेरे में रहा है। आचार्य भरतमुनि के बाद प्रथम आचार्य भामह ही हैं जिनका काव्यशास्त्र पर ग्रंथ उपलब्ध है। आचार्य भामह के काल निर्णय के विवाद को
 
करण समस्तीपुरी
Feb 27 2010 08:59 PM
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त्याग पत्र : भाग 16

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना ! फिर रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! रामदुलारी अब पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत है ! गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों
 
करण समस्तीपुरी
Feb 26 2010 06:30 PM
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कुछ ख़ास है....... !

नमस्कार मित्रों ! मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि आप हैरत कर रहे होंगे या कोफ़्त........ ये ब्लॉग का कीड़ा अब दिन में तीन-तीन बार काटने लगा ? ख्वातीन-ओ-हजरात ! अजी बात ही है कुछ ख़ास !! मैं तो बस कहने आया हूँ, "मुबारक हो ..... !!!" दरअसल आज इस ब्लॉग के
 
करण समस्तीपुरी
Feb 26 2010 03:31 PM
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चौपाल : आंच पर देसिल बयना

आँच-5 -- हरीश प्रकाश गुप्त रचनाकार के अन्दर धधकती संवेदना को पाठक के पास और पाठक की अनुभूति की गरमी को रचनाकार के पास पहुँचाना आँच का उद्धेश्य है। सृजन का मूल संवेदना है। इसी संवेदना से बीज ग्रहण कर रचनाकार अपने सृजन में जीवन का सत्य और यथार्थ मात्र ही
 
करण समस्तीपुरी
टैग: आंच
Feb 25 2010 05:30 PM
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देसिल बयना 19 : घर भर देवर.....

-- करण समस्तीपुरी है जोगीरा..... सा.....रा....रा...रा..... जोगीरा...... सा....रा....रा.....रा.....रा..... ! भैय्या रे होली है...... ! भैय्या रे होली है... !! "अरे ! हल्ला गुल्ला शांत करो, सुनो हमारी वाणी जी ! वाह जी वाह... ! देसिल बयना में कहता हूँ अपने
 
करण समस्तीपुरी
Feb 25 2010 04:29 PM
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खाना हो आम तो बोएं बबूल

खाना हो आम तो बोएं बबूल -- परशुराम राय आम के फलों सेये लद गए बबूल अबभ्रम में पड़ी कोयलेंनिहारती आवास निजकंटीले आम्रकुंज ।सोचती-“आम में ये काँटे बबूल के ?या ईमान ही बदला धरा काया बदला है स्‍वादजल का ही जलद से कुछ?या बदला है तेवर हीसूरज की दृष्टि का?या
 
करण समस्तीपुरी
Feb 23 2010 05:30 PM
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बंटवारा

बंटवारा -- मनोज कुमार बंटवारा तो जैसे कुदरत का नियम ही है। आर्थिक रूप से पिछड़े समाज में, पिता के गुज़रते ही पुत्रों में संपत्ति (चल-अचल ) का बंटवारा तो एकदम तय है। पर जीवन बाबू की जिंदगी में ऐसी नौबत ही नहीं आई। रेलवे में पूछताछ लिपिक की नौकरी से जो
 
करण समस्तीपुरी
Feb 22 2010 05:30 PM
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काव्यशास्त्र के मेधाविरुद्र

काव्य शास्त्र-3काव्यशास्त्र के मेधाविरुद्र या मेधावी-आचार्य परशुराम राय आचार्य भरतमुनि के बाद साहित्यशास्त्र के इतिहास पटल पर आचार्य भामह का काल छठवें विक्रम सम्वत का पूर्वार्ध माना गया। आचार्य भरतमुनि और आचार्य भामह के बीच लगभग छः- सात सौ वर्षों का एक
 
करण समस्तीपुरी
Feb 21 2010 08:49 PM
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होली आई रे....... !

-- करण समस्तीपुरी का कहें ! इधर बहुत दिन से फुर्सते नहीं मिल रहा था। उ तो कहिये जो होली आ गयी वरना फिर ऑफिस के ऑफिस ! आप सोच रहे होंगे कि होली में तो अभी टाइम है..... ई अभिये से काहे होलियाय रहा है। अरे भाई, बन्दूक में गोली का..... नीलामी में बोली
 
करण समस्तीपुरी
Feb 20 2010 09:09 PM
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त्यागपत्र : भाग 15

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना! फिर रुचिरा-समीर और प्रकाश की दोस्ती ! रामदुलारी अब पटना की उभरती हुई साहित्यिक सख्सियत है ! गाँव में रामदुलारी के खुले विचारों
 
करण समस्तीपुरी
Feb 19 2010 05:30 PM
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कथा जनस्याभिनवा वधूरिव

आँच -- आचार्य परशुराम राय कथा जनस्याभिनवा वधूरिव रचनाकार के अन्दर धधकती संवेदना को पाठक के पास और पाठक की अनुभूति की गरमी को रचनाकार के पास पहुँचाना आँच का उद्धेश्य है।आँच के दूसरे अंक के इस भाग में श्री हरीश प्रकाश गुप्त की लघुकथा ‘रो मत, मिक्की’
 
करण समस्तीपुरी
Feb 19 2010 05:32 AM
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देसिल बयना 18 : वर हुआ बुद्धू दहेज़ कौन ले....

पछिला हफ्ता तो खूब धम-कुच उड़ा। शहर में भोलंटाइन बाबा का मेला लगा रहा तो गाँव में भोला बाबा का। हम तो शहर से देखना शुरू किये और गाँव तक पहुँच गए। मिसरिया बाबा के मठ पर खूब धूम-धाम से शिवरात हुआ। शिवजी का बरातियो निकला था। पंडौल के पंडी जी आये रहे माधो
 
करण समस्तीपुरी
Feb 17 2010 05:57 PM
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किस अधर का गीत हूँ मैं

-- करण समस्तीपुरी किस अधर का गीत हूँ मैं ?जान पाया मैं नहीं,किस साज का संगीत हूँ मैं??किस अधर का गीत हूँ मैं ??***किस भाव की अभिव्यक्ति हूँ,किस भाव में अनुरक्ति हूँ,किसी तप्त उर का उच्छवास,या तृषित मन की प्यास हूँ मैं!जान पाया मैं नहीं,किस हृदय का प्रीत
 
करण समस्तीपुरी
Feb 16 2010 05:39 PM
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जमीन से कटे हुए

-- श्याम सुन्दर चौधरीपति पत्नी एकटक उस शोकेस की ओर देखे जा रहे थे। एकाएक उनके सात साल के बच्चे ने चिल्लाकर कहा, ‘मम्मी, वह देखो, मैं वह मोटर लूंगा...........’‘हां बेटे जरूर लेना’ कहते हुए दोनों बच्चे को लेकर दुकान के भीतर गये। पति की फरमाइश के अनुसार
 
करण समस्तीपुरी
Feb 15 2010 05:40 PM
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काव्यशास्त्र : नाट्यशास्त्र प्रणेता भरतमुनि

नाट्यशास्त्र प्रणेता भरतमुनि- परशुराम रायभारतीय साहित्यशास्त्र पर उपलब्ध ग्रंथों के साक्ष्यों पर दृष्टि डालने पर यह निर्विवाद सत्य है कि इस परम्परा के आदि आचार्य भरतमुनि ही हैं और इनका एकमात्र ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ ही मिलता है। वैसे नाम से यह केवल नाट्य
 
करण समस्तीपुरी
Feb 14 2010 07:30 PM
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अच्छे मौक़े का इल्म

-- मनोज कुमारकभी-कभी वक़्त हमसे बहुत आगे निकल जाता है और हम उसे तलाशते रह जाते हैं। आज एक ख़ास दिन है। जब सारे संसार में यह दिन एक विशेष अवसर के रूप में मनाया जा रहा है तो बात तो कुछ ख़ास होगी ही इस दिन में। इस अवसर पर एक कहानी सुनाने का मन कर रहा है। हमने
 
करण समस्तीपुरी
Feb 14 2010 04:16 PM
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भाषा

भाषा जीवन के किसी भी मोड़ पर जब भी तुम रोये हो ऐसे बहुतों ने पोछे हैं तुम्हारे आंसू जिनकी भाषा को तुमने हमेशा ही समझा है बहुत झोटा करके, बिताई होंगी कितनी रातें उन्हीं छोटी भाषा वाले लोगों ने छटपटाते हुए सिर्फ देखने के लिए एक टुकड़ा सुख तुम्हारी
 
करण समस्तीपुरी
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नज़राना

नज़रानापूरे परिसर में शिशिर को एक कर्त्तव्‍यनिष्‍ठ प्रशासनिक अधिकारी के रूप में ख्याति प्राप्त थी। कर्त्तव्‍यनिष्‍ठ इस लिए कि उन्‍हें जो भी दायित्‍व दिया जाता है उसकी वे पूरी निष्‍ठा से पालन करते हैं और उसमें तन मन धन लगा देते हैं। साथ ही वे एक सफल
 
मनोज कुमार
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भारतीय काव्यशास्त्र पर चर्चा

भारतीय काव्यशास्त्र पर चर्चा -परशुराम राय नियतिकृतनियमरहितां हलादैकमयीमनन्यपरतन्याम्। नवरसरुचिरां निर्मितिमादधती भारती कवेर्जयति।। काव्यप्रकाशकार आचार्य मम्मट ने इसी कारिका से अपने ग्रंथ ‘काव्यप्रकाश’ का मंगलाचरण किया है। ‘काव्यशास्त्र’ के तत्वों को
 
मनोज कुमार
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कह हनुमंत विपत प्रभु सोई

-- करण समस्तीपुरी आज फुर्सत में ख्याल आने लगा, आह ! जिन्दगी में कितना कष्ट है...... काश सप्ताह में दो ही दिन होता...... शनिवार और रविवार। फिर तो फुर्सत ही फुर्सत.... मौजा ही मौजा था !! लेकिन कमबख्त होता है पूरे सात दिन। न एक दिन कम न एक दिन ज्यादा.....
 
करण समस्तीपुरी