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10 Oct 2009
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दो कवितायें

मूक प्रश्न - (कविता) बीजगणित के "इक्वेशन" भौतिकी के "न्युमैरिकल" और जैविकी की "एक्स्पैरिमेंट्स" से परे भी, एक दुनिया है भूख और गरीबी से सनी हुयी ! वहीँ मिलूँगा मैं तुम्हें यदि तुम मेरे मित्र हो तो आओ इस इक्वेशन को हल करें कि क्यों मुट्ठी भर लोग करोड़
 
प्रकाश गोविन्द
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लड़के-लड़कियां साथ पढ़ें लेकिन .......

सहशिक्षा की नीति उचित है लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है शिक्षा ! यूपी बोर्ड की सहशिक्षा के पक्ष में सिफारिश के बाद शासन का असमंजस में पड़ना स्वाभाविक है ! हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं , अब हमें कदम आगे बढ़ाना होगा ! लड़कों और लड़कियों को अलग-अलग नहीं
 
प्रकाश गोविन्द
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रोजाना

कविता) देखिये जनाब, आज का दिन, फिर ऐसे ही गुजर गया, मै सुबह उठा, चाय, सिगरेट, अखबार, यानी वही सब रोजाना के बाद, मै यही सोचता रहा, कि आख़िर ऐसा कब तक चलेगा !! ******************************** फिर जनाब मै दफ्तर गया, फाइल, दस्तखत, साहब की झिड़की, यानी क
 
प्रकाश गोविन्द
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दास्तान - ए - लोकतंत्र

व्यंग कथा - उस बस्ती से बाहर जाने वाले रास्ते पर एक विशाल पत्थर पड़ा था ! बस्ती वालों ने कई बार सरकारी संस्थाओं से गुहार की थी कि उस पत्थर को हटा दिया जाए क्यूंकि उससे आम जनता को बड़ी परेशानी होती है , लेकिन जैसा कि सरकारी काम काज में हमेशा होता है ,
 
प्रकाश गोविन्द
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Oct 14 2009 09:33 PM
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ये देश है बस अवकाशों का ....

एक तरफ़ निजी क्षेत्र हैं जहाँ छुटि्टयों के लिए इन्तजार करना पड़ता है और दूसरी तरफ़ सरकारी कार्यालय हैं जो खुलने से ज्यादा बंद रहते हैं [खुलते भी हैं तो कितना काम करते हैं ] विदेशों की नक़ल कर के उन्होंने सप्ताह में दो दिन छुट्टी कर रखी है ...........
 
प्रकाश गोविन्द
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पहले हम तो सुधरें .......

ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल के ताजा आँकड़ों के मुताबिक भारत भ्रष्ट देशों की सूची में ८५ वें पायदान पर है ! पिछले साल के मुकाबले भारत १२ पायदान ऊपर चढ़ा है ! पिछले साल हम चीन के साथ ७२ वें स्थान पर थे ! १८२ देशों में कराये गए सर्वेक्षण में भारत की स्थिति
 
प्रकाश गोविन्द
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क्यूँ बदल रहा है बचपन ?

यूँ तो बड़ों जैसा दिखना और बनना हमेशा ही बच्चों की फितरत होती है लेकिन आजकल यह प्रवृत्ति काफ़ी बढ़ गई है और ग़लत रूप में विकसित हो रही है यही वजह है कि वे कम उम्र में ही बड़ों कि तरह व्यवहार करने लगते हैं उनकी मासूमियत और बचपन कहीं गुम - सा नजर आता ह
 
प्रकाश गोविन्द
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आतंकवाद का महिमा मंडन कब तक ?

आ तंक का नंगा नाच जारी है कब कहाँ बम फट जाए कुछ नही कहा जा सकता आतंकवादी पूरे देश में खून की होली खेल रहे हैं जैसे ही कहीं बम फटता है मीडिया का पूरा लाव लश्कर वहां पहुँच जाता है उसके बाद टीवी के दर्जनों न्यूज़ चैनल दिन भर ज्यादा से ज्यादा कवरेज दिखान
 
प्रकाश गोविन्द
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गेट वेल सून ..... राज मामू

अभी जब चीन में ओलम्पिक हो रहा था तो भारत से काफ़ी लोग गए थे , जिसमे अनेक मीडिया कर्मी भी शामिल थे वहां भारतीय भोजन की काफ़ी दिक्कत थी, कुछ होशियार लोगों ने इन्टरनेट की मदद ली और वहां भी ऐसे दर्जनों रेस्ट्रोरेन्ट खोज निकाले जहाँ भारतीय भोजन मिलता था ब
 
प्रकाश गोविन्द
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हाय मीडिया

यह कितने शर्म की बात है भारत में टी वी के चैनल्स पर जिन फूहड़ और ऊलजलूल चीजों को समाचार के नाम पर परोसा जा रहा है उनका विरोध उतना नही हो रहा है जितना होना चाहिए. जब हम दूसरे देशों के चैनल्स को देखते है तो पता चलता है कि टी वी पत्रकारिता किस चिडिया का
 
प्रकाश गोविन्द
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अकेला / हमदर्द [दो लघु-कथाएँ]

पिछली पोस्ट में मैने अपने पहली लघु-कथा (यकीन) प्रस्तुत की थी ! इस बार मित्रों के आग्रह पर दो लघु कथाएँ पेश कर रहा हूँ ! जिसमें 'अकेला' मेरी लिखी आख़िरी लघु-कथा है ! इसको मैने 16 मार्च 2006 को लिखा था ! यह बात उस समय की है जब सुप्रसिद्ध लेखिका सुश्री
 
प्रकाश गोविन्द
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यकीन

मेरी पहली लघु कथा, जो मैंने 22 अगस्त 1989 को लिखी थी ! ********************************************************* रेखा चित्र - प्रकाश गोविन्द यकीन [लघु कथा] वह दोनों आमने-सामने बैठे थे ! बीच में एक छोटी सी गोल मेज थी ! जिसमें कॉफी के दो प्याले, एक शुग
 
प्रकाश गोविन्द
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वो कागज़ कि कश्ती .......

काफी दिनों बाद ब्लॉग लिखने बैठा हूँ ! इतने दिनों बाद अगर लिखने जा रहा हूँ तो इसका कसूरवार मैं नहीं हूँ बल्कि विनीता यशस्वी जी हैं ! जिन्होंने डांट-डपटकर मुझे पुनः ब्लॉग लिखने को प्रेरित किया ! ए क अत्यंत प्रिय ब्लॉगर साथी ने कुछ ही दिन पहले मेल में ल
 
प्रकाश गोविन्द
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अंध विश्वास का मायाजाल

क्या टी वी ...... क्या अखबार......क्या मैगजीन....सब जगह तंत्र-मंत्र , ज्योतिष , टैरो कार्ड , फेंग सुई - वास्तु का जाल फैला नजर आता है ! देश की आजादी के पश्चात संपन्न वर्ग के ज्यादातर लोग कभी इतने अन्धविश्वासी नहीं रहे जितने कि आज हैं ! आज समाज का शिक
 
प्रकाश गोविन्द
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Oct 14 2009 09:33 PM
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चला,,,,, मैं चला,,,,,,,,,,,

प्रिय दोस्तों ! मैं साल 2008 हूँ, चौंक गए न ? मैंने आप सभी के साथ काफी वक्त गुजारा तो सोचा कि मैंने इस दुनिया को किस तरह समझा, इस राज को आपके साथ बांटता चलूँ ! चलते-चलते क्यों न अपनों से बात कर ली जाए, जिस तरह दुनिया का नियम है जो आया है, उसे जाना है
 
प्रकाश गोविन्द
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