सोचने बैठता हूँ तो,कभी कभी लगता है जैसे,लगता है जैसे तुमको,महसूस हो रहा हो वो सब,वो सब जो मैने सोचा, चाहा,देखा, सुना या देखना सुनना चाहा...जबकि मैं ये जानता हूँ कि,कोई न्यूरल कनेक्शन नहीं,ना ही कुछ ब्लूटूथ के जैसा है...फिर भी कभी कभी,कभी कभी लगता है
एक आलमारी भरी हुई,medals और trophies से,newspaper की वो cuttings,है जिनमें ज़िक्र कहीं,या हमारी कोई तस्वीर,वो भारी भरकम folder,certificates से भरा हुआ...कविताओं और कहानियों से भरी,वो कितनी सारी diaries,वो unpublished, incomplete novel,'उसके' कहने पर
हवा का एक तेज झोंका,आया था मुझसे मिलने,कमरे की खिड़की आधी खोल गया...कुछ खास था इस झोंके में,हर झोंका नहीं आता मुझ तक,खिड़की खोलकर, कुछ कहने...हर झोंका लेकर नहीं आता,एक खास खुशबू साथ अपने,काँच पर खिड़की के मेरे,लिखकर नहीं जाता हर झोंका...कुछ खास तो था ये
काश कुछ लम्हे ज़िंदगी के,हो पाते Shift+Delete,Text messages की तरह…मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगीकाश कि रियल लाइफ में भी,अच्छी लगती sad stories,गीतों ग़ज़लों की तरह…मगर ये ज़िंदगी है, चलती रहेगीआसमान में टूटा चाँद देखकर, आया दिल में एक नेक ख़याल,काश कि
दे पाया ना सबको जहान मुकम्मल,खुदा ये जहान बनाया क्यों है...एक पल जी लेने की आस में,हमने सिफ़र बस पाया क्यों है...दिल में तो सबके घनघोर अंधेरा,घर में दीया ये जलाया क्यों है...दिखता नही अब चेहरा इसमें,ऐसा आईना लगाया क्यों है...रिश्ता नींद से कबका
कह दिया था सब कुछ आँखों से , फिर भी होठों को कंपकंपाया था ... थामना ना थामना थी तेरी मर्ज़ी , मैने तो अपना हाथ बढ़ाया था ... बुला रही थी या कहा था अलविदा , देर तक हाथों को हिलाया था ... करता हूँ इंतज़ार रोज ख्वाबों में , ख्वाब ख्वाबों का तूने दिखाया
एक ऐसी ट्रेन, जिसमें चढ़ना कोई चाहता नहीं, और उतरने कोई बचा नहीं, रुकी है ऐसे स्टेशन, जहाँ कोई नजर नहीं आ रहा... घंटों रुक कर जब ट्रेन खुली, जल्दी ही दुबारा रुक गयी, ड्राईवर ने inverse function लगा दिया शायद...
नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन, प्लॅटफॉर्म नंबर 14 पर, कुछ बेजान और, कुछ साँस लेते, सामानो के बीच, अपने आप को, बहुत अकेला पाया... तेरी ट्रेन भी ना, प्लॅटफॉर्म नंबर 2 पर क्यों आई...
याद है , वो पहली मंजिल , जहाँ सचेत किया था , रास्ते ने मुझे , के ऐ मुसाफिर , थमना नहीं , कई मुकाम बाकी है , जीतने के लिए , मुकम्मल जहान बाकी है ... चाँद सूरज गिने तो क्या , तारों से भरा , ये आसमान बाकी है ... फिर क्या , चलते ही जा रहे , उस राह पर हम
क्या अब भी मिलती हो तुम, सबसे वैसे ही मुस्कुरा कर, या तेरे अंदर भी बना लिया, है खामोशी ने अपना घर... बोल पाती हो वैसे ही सब, शब्द शब्द अक्षर अक्षर, या फिर मेरी बातों में, काँप सा जाता है तेरा स्वर... अब
वो दीया, हाँ वही, जो जलता आ रहा है, आंधी, पानी, तूफ़ान, सब झेल गया, और जलता ही रहा, इस उम्मीद में, के इक दिन पायेगा, तेरे हाथों की छाँव, और अमर हो जायेगा, हमेशा हमेशा के लिए... वो दीया!!! आज हवा के, एक हल्के झोंके ने, बुझा दिया उसको, हाँ, ठीक सम
फ़ुर्सत निकाल कर ज़िंदगी से , जाओ कभी वापस बचपन , तुमको तुम मिल जाओ शायद … *** (2) याद है मुझे अब भी वो दिन , रो रही थी तुम शायद , भीगी पलकों से ठीक से दिखा नही … *** (3) रौशन करते जग को उमर भर , नील गगन के तारे , कहाँ जाते हैं ये टूट कर … *** (4) जी
१) अब तो आदत सी हो गयी है, सितम सहने की हमें, कभी इंटरनेट तो कभी तुम... *** (२) डर लगता है मुझे, कैसे काटेंगे बिन तेरे, उम्र है कोई रात नही है... *** ( ३ ) चलते रहे सीधी लाइन पर , लिए मन में पुनर्मिलन की आस , हम दोनों की ज
१ भूखे तुम, हम ऐश कर रहे लोकतंत्र की जय जयकार, आखिर तुमने हमें "चुना" है... *** २ छुट्टियाँ खराब करके बनाया, एक सांचा उपर वाले ने, और तुझे बनाकर उसे तोड़ दिया... *** ३ बेशक बहुत मेहनत का, होता होगा खुदा का काम, तुझ
नवम्बर 2009 को राजस्थान पत्रिका, जयपुर संस्करण के नियमित स्तंभ 'ब्लॉग चंक' में मेरा कुछ सामान... की एक कविता बी एस पाबला जी का बहुत बहुत आभार इस सूचना के लिए..
रह पाओ जिंदा मरने के बाद भी... " शीर्षक कविता पर आदरणीय शरद कोकास जी की टिप्पणी समझ में नही आई थी और उन्होने विस्तार में मेल से बताने की बात कही थी पर शायद भूल गये... मैने दुबारा समझने की कोशिश की और जो समझ में आया उससे मधुशाला की पंक्तियाँ याद आ गयी
झूम उठा मेरा जहान , तुम जो मिलने आई मुझे , काश ये ख्वाब नहीं हकीक़त होता ... ठहर न पाए आँखों में , निकल गए आंसू सारे , तुम जो बसे हो इन आँखों में ... एक समंदर सा बना डाला , इन आंसुओं का हमने देख
कभी लिखा था मैंने, " जियो कुछ ऐसे कि, रह पाओ जिंदा तुम, मरने के बाद भी... " आज बात आगे बढा रहा हूँ अपनी... गौतम बुद्ध की पावन धरती, अब न रही महफूज़ यारों... कब तक तुम खामोश रहोगे, अब तो करो आगाज़ यारों... गली अँधेरी अपनी ही है, ज
साथ देती ही क्यों हो, पल दो पल का मुझे, ख़्वाबों में कभी कभी, देने मुझे आंसुओं का साथ, क़यामत तक के लिए... समंदर रेत को हमने, है आंसुओं से कर दिया, आओ कभी जिंदगी में भी, निकल कर ख़्वाबों से, तुम भी देखने के लिए... आंसू की एक बूँद से पूछा, क
आज हमारे महफूज़ भाईजान का जन्मदिन है. जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो भैया. हमने सोचा क्यों न उनके जन्मदिन पर अपना कुछ टूटा फूटा लिखने कि बजाय उन्ही का लिखा एक सॉलिड आइटम पेश किया जाये... तो पेश है "SEE THIS BOY" by Mahfooz Ali This boy says he is a king
मेरी पिछली कविता पर एक दोस्त की टिपण्णी आई कि ये पुराने ज़माने की कविता लगती है... ख़त वगैरह की वजह से... मैं सहमत नहीं हूँ, फिर भी.. पेश है एक modern version with same meaning!!!) तेरे दिए कुछ gifts, चंद mails जो starred थे, आज से पहले, वो अनगि
तेरे वो सारे ख़त, जो तुने कभी नहीं लिखे, बस दिल में ही रखा, और तुम समझती हो, मुझ तक नहीं पहुंचे, नहीं पहुंचे होंगे शायद, पर उनके जवाब नहीं तो, और क्या थे, कागज़ के वो चाँद टुकड़े, जिन्हें आज जला आया हूँ...
चाँद निकला है फिर , आज अपनी गली में , एक अरसे के बाद ... ये दिल - ए - बर्बाद भी , देखो आबाद हुआ है , आज बरसों के बाद ... न सुना ऐसा कभी पर , है कमल रेत में खिला , तेरे आने के बाद ... आके फिर से न  
तब जबकि तुम थे, सिर्फ तुम ही थे, पर तुम अब भी क्यों हो, जबकि तुम तो चले गए... सफलता के आसमां पर आकर, याद आ रहे हैं वो रेत जिससे, ज़मीं पर हमने खेला है... सफ़र था तो हमसफ़र थे, ऊफ़्फ़, ये जीतने की ललक!! मंजिल पे दिल
चित्र - google के सौजन्य से.) अत्याचार बढा था हमपर, बना था बोझ अंग्रेजी शाषण, अपने ही घर में अपमानित, हमने कहा था रंग दे बसंती... साठ साल अपना राज, पिछड़े के पिछड़े हैं रहे हम, भरता जा रहा स्विस बैंक, अब न कहें क्यों, रंग दे बसंती... गाँधी की खादी को
जब से यहाँ आया हूँ, दीपावली बहुत miss करता हूँ... घर से बाहर ये मेरी तीसरी दीपावली है... और बिना पटाखों के ५वी ... जब से मुझे दीपावली का सही मतलब समझ में आया, मैंने पटाखे जलाने बंद कर दिए... एक और चीज जो दीप
चमन के फूल भी, तेरी तारीफ में खिलते हैं, मैं ही नही कहता ये, यहाँ सब लोग कहते हैं... तासीर इस हुस्न का है ऐसा, सब को है तसव्वुर तेरा, खोए तेरे ही ख़याल में, सब दिन रात रहते हैं... मैं ही नही कहता ये,
पता चला बराक ओबामा भैया को नोबेल पुरस्कार मिला है शांति के लिए, तो मन गद गद हो गया.. अब बहुत कुछ हो पायेगा जो आज तक नहीं हुआ.. मिसाल के तौर पर अब राहुल गाँधी को भारत रत्न दिया जाएगा, अर्जुन तेंदुलकर को राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार और हो सकता है मुझे
तुम जानो न जानो, दिल से तुम्हें ही, हर वक़्त याद करते हैं... तुम मिलो न मिलो, दुआ ख़ुशी की तेरी ही, हम दिल से करते हैं... तुम आओ न आओ, ख्वाबो में तुम्हारा ही, हम इंतजार करते हैं... क्योंकि... तुम कहो न कहो, प्यार है तुझे मुझसे ही, हम य
तुने भी तो था दुपट्टे में मुखड़ा छुपाया, मैंने तुझे छुपकर देख लिया तो, ज़माना सुलग उठा... तुने भी तो है देखा सपना मेरा, मेरे ख्वाब में तुम आ गयी तो, ज़माना सुलग उठा... दिल में तो तेरे भी है मेरा ही नाम, मैं होठों पर तेरा नाम ले आया तो,
गीत प्यार के सब लिखते हैं , हम प्यार कर बैठे तो , ज़माना सुलग उठा ... जीते हो अपनी जिंदगी हर रोज , एक दिन हमारी जी ली तो , ज़माना सुलग उठा ... कोई नहीं था बिना जाम के उस महफिल में , मैंने थोड़ी छलका दी तो , ज़माना सुलग उठा ...
छुट्टियाँ मना कर वापस आ चुका हूँ . बहुत मज़ा आया एक हफ्ते घर पर बिता कर . वापस आते हुए ट्रेन में कुछ लिखा . अभी तो वही प्रस्तुत कर रहा हूँ . वो कली मुस्काई , और गुलाब बन गयी , देखते ही हो
इक आहट पर जो, आँखें उठाई तो, देखा सामने वो है.. मैंने कहा ये वो नहीं, दिल ने कहा, ये वही है... कोई था उसके साथ, बिलकुल मेरे ही जैसा शायद वो मैं ही था.. बातें करते रहे देर तक, फिर इक सोफ़े जा बैठे, आ गए थे बहुत पास, अनजाने ही दोनों.. आँखें ब
पहले तो समझा, कि वो ऑनलाइन ही नहीं, फिर लगा शायद, अदृश्य (invisible) हो, ऑफलाइन सन्देश भी छोड़ा, पर सब बेकार, क्योंकि अब आया है, समझ में हमारी, हमें ही सजा, दी जा रही है, वो तो है ऑनलाइन, हमें ही block , कर दिया गया है.. PS - Not "fired"