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सदाग्रह..

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21 May 2010
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गाँधी जी की ताबीज:एक बहु-प्रचलित उद्धरण

गांधी जी की ताबीजगांधी जी कहते हैं, मैं तुम्‍हें एक ताबीज देता हूँ। जब भी दुविधा में हो या जब अपना स्‍वार्थ तुम पर हावी हो जाए, तो इसका प्रयोग करो। उस सबसे गरीब और दुर्बल व्‍यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो, और अपने आप से पूछो- जो कदम मैं
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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नायक नेपथ्य में चला जा रहा था-- गाँधी और मै: सुशील यादव

देखिये ना गाँधी किन-किन के लिए क्या-क्या हैं .इसतरहा है महामना गाँधी की व्यापकता..सुशील जी गहरे सरोकारों के लेखक हैं. इनकी कुछ बेहतर रचनाएँ  "हम तो कागज मुड़े हुए हैं"  पर जाकर पढ़ी जा सकती हैं.. श्रीश पाठक  ] घर में खाद
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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प्रभाष जी को गोरखपुर ने निराश नहीं किया-रोहित पाण्डेय

अब जबकि लोग इस पर भी लिखने लगे हैं कि 'प्रभाष जी पर इतना रूदन क्यूँ और पहले भी तो शलाका पुरुष गुजरे हैं'....फिर सदाग्रह पर एक और लेख देना कैसा होगा..? मै सोचने लगा. सोचने मै ये भी लगा कि लोग इतना क्यूं लिख रहे हैं..जवाब बहुत आसानी से मिला मुझे...ठीक
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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वह प्राणवान भावावेश-प्रभाष जोशी

प्रखर पत्रकार और गाँधीवादी विचारक प्रभाष जोशी का असमय गुजर जाना.......} रात दो बजे मोबाइल की घंटी बजी तो एक बार तो बंद कर दी। पर वह फिर बजी। दूसरी तरफ रवीन्द्र त्रिपाठी थे। एक दुखद खबर, इससे शुरू कर खबर दी की प्रभाषजी का निधन हो गया। अरे! कहकर मोबाइल
 
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"रोज सुबह मन में एक गांधी को लेकर उठता हूं" गाँधी और मै-अभिनव उपाध्याय

मुझे लगता है कि मैं आज तक गांधी को ठीक से जान नहीं पाया। बहुत सारी छोटी, बड़ी, पतली मोटी किताबें पढीं,लोगों की टिप्पणियां  पढ़ी लेकिन हर बार लगा गांधी केवल इतने ही नहीं हैं अभी इससे अलग हैं।  गांधी को जिसने जैसे देखने की कोशिश की गांधी उसे
 
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व्यक्ति को , विकार की तरह पढ़ना , जीवन का अशुद्ध पाठ है...गाँधी और मै--अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

किसी सोच का दायरा इतना बड़ा हो सकता है ; यह गांधी जी पर सोचते हुए महसूस होता है क्योंकि गाँधी जी पर सोचना खुद पर सोचना है परिवेश पर सोचना है , इतिहास पर सोचना है , भविष्य पर सोचना है , संस्कृति पर सोचना है.....और इस सबके निराशा , उलझाव , विसंगति , प्
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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गांधी और मैं -रोहित पाण्डेय

जबसे होश सम्हाला है...गांधी की चर्चा सुनी है तो गांधी सबके हैं, सबके भीतर...पर क्या वाकई सबके भीतर हैं...? तो सबसे पहले मैंने खुद को टटोला..और जो पाया वो लिखा था "गांधी और मै" शीर्षक से..अब बारी है श्री रोहित पाण्डेय जी की. बेबाकी से लिखा इन्होंने, ज
 
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इस दीवाली एक सदाग्रह..

सदाग्रह इस दीवाली आप सभी से अपील करता है.. १. मो मबत्ती नहीं दीप जलाएं. २. पटाखों में मितव्ययिता बरतें. ३. अपने आस-पास के वातावरण को स्वच्छ बनायें. ४. इस दीवाली पर अपना पर्यावरण प्रेम व्यक्त करें. ५. खुशियाँ सामूहिक हो बाटें. ६. सेवा का कोई एक संकल्प
 
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गाँधी और मै.

गाँधी जी जैसा रीयल परसन अपने जन्मदिन पर आपको निष्क्रिय कैसे रहने दे सकता है.. ? जितना पढ़्ता जाता हूँ गाँधी जी को उतना ही प्रभावित होता जाता हूँ. गाँधी और मै. मेरे लिये गाँधी जी सम्भवत: सबसे पहले सामने आये दो माध्यमों से , पहला -रूपये की नोट से , दूस
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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ईश्वरत्व से बचते हुए

आर्डिनरी जब एक्स्ट्रा-आर्डिनरी बन जाता है, तो वह चमत्कार हो जाता है. महामना गांधी जानते थे कि चमत्कार पर मुग्ध हुआ जा सकता है, पर इसे अपनाया नहीं जा सकता. महात्मा जीवन भर प्रयास करते रहे कि जो जीवन भर प्रयोग उन्होने किया उसके निष्कर्षों को लोग स्वयं
 
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Oct 04 2009 08:28 PM
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स्वीकारने से कायम होगी सद्भावना

परिवर्तन शाश्वत हैं और नितांत आवश्यक भी. प्रत्येक पीढ़ी अपने साथ बदलाव का झनकार लाती है. पर इस स्वर में मधुरता का अनुशासन ना हो तो यह कालांतर में अप्रासंगिक हो जाती है. इस बदलाव में जरूरी है कि कुछ शाश्वत मूल्य जो मानवता से उपजे है उन्हें अछूता रहने द
 
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Oct 04 2009 08:28 PM
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सदाग्रह एक अपील...शांति, सद्भावना के लिए..

जीवन की होड़ में जीवन फिसल जाता है.. हम हिसाब लगाते रह जाते हैं और मोड़ आ जाता है. फिर बदल जाते हैं मायने सब मतलबों के और एक प्याला खाली का खाली ही टूट जाता है. समाधान है हर एक विवाद का, शांतिपूर्वक और सद्भावना के साथ.. विवाद, संवाद को प्रेरित करता ह
 
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Oct 04 2009 08:28 PM