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मसि-कागद

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16 Jun 2010
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दो खुशखबरियां, सिगरेट छोड़ने के नुस्खे के साथ--------------->>>दीपक 'मशाल'

चलिए आज आपको २ समाचार सुनाता हूँ.. पहली तो खुशखबरी है कि अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सा समुदाय का आयुर्वेद में विश्वास बढ़ता ही जा रहा है.. खुद ही
 
दीपक 'मशाल'
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पहली बार दारु.. मैगी, सुट्टे के बाद(झाँसी के किस्से... हास्य से)--------->>>दीपक 'मशाल'

अब जब मैगी और सुट्टे के प्रथम पान की कथा आपसे बिन पूछे ही कह सुनाई तो सोचता हूँ कि मदिरापान पुराण क्यों छोड़ा जाए??? वैसे भी इस मामले में मैं मोतीलाल नेहरु जी को ठीक मानता हूँ कि जब गांधी जी ने उनसे एक बार कहा कि, ''मोती तुम्हे अगर पीना ही है
 
दीपक 'मशाल'
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पहली बार मैगी.. पहली बार सुट्टा (झांसी के किस्से.. हास्य से)--------------->>>दीपक 'मशाल'

ये तो आपको पता ही होगा कि भोजन के आधार पर मनुष्य को सामान्यरूप से दो प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है... एक शाकाहारी और दूसरा माँसाहारी वर्ग, लेकिन जो लोग संविधान, न्याय और कानून में भरोसा करते हैं
 
दीपक 'मशाल'
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कीमत(लघुकथा)------------------------>>>दीपक 'मशाल'

रमा के मामा रमेश के घर में कदम रखते ही रमा के पिताजी को लगा कि जैसे उनकी सारी समस्याओं का निराकरण हो गया.रमेश फ्रेश होने के पश्चात, चाय की चुस्कियां लेने अपने जीजाजी के साथ कमरे के बाहर बरामदे में आ गया. ठंडी हवा चल रही थी.. जिससे शाम का मज़ा दोगुना हो
 
दीपक 'मशाल'
Jun 08 2010 06:52 PM
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''चोर कहीं का..''(लघुकथा)----------------------------------->>> दीपक 'मशाल'

''कल तो किसी तरह बच गया लेकिन आज? आज कैसे बच पाऊँगा पिटाई से, जब घर पर पता चलेगा तो....'' ये सोच-सोच कर सिहरा जा रहा था वो. थोड़ी-थोड़ी देर बाद क्लास के बाहर टंगी घंटी को देखता जाता और फिर चपरासी को.. ठीक ऐसे जैसे जेठ की दोपहर में प्यास से
 
दीपक 'मशाल'
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असली बुद्धिजीवी- नकली बुद्धिजीवी (ज़रा सी मसखरी)-- >>>दीपक 'मशाल'

बुद्धिजीवी!!! एक ऐसा शब्द जिससे मेरा तब पाला पड़ा जब उसका मतलब समझ में आने लगा था.. असल में है क्या कि मैंने ये महसूसयाया है कि
 
दीपक 'मशाल'
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आज तुम लटके मिले हो फाँसी पर----------------->>>दीपक 'मशाल'

आज मई माह की हिन्दयुग्म यूनिकवि प्रतियोगिता में चौथा स्थान प्राप्त एक रचना जो कि किसान आत्महत्या पर केन्द्रित है देखिएगा.बीज और आज तुम लटके मिले हो फाँसी परमगर फिर भी शहीद ना बन पाएअनगिन ख्वाबों के बीज अनगिनततुमने रोपे मेरी आँखों मेंऔर चले गए बिन सींचे
 
दीपक 'मशाल'
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छमिया(लघुकथा)---------------------->>>दीपक 'मशाल'

नए शहर में पहले दिन बाज़ार से कुछ खरीदने गई थी रमा.... कि तेज धूप में अचानक सड़क पर गिरते उस लड़के को देख वो भी अपनी स्कूटी ले उसकी तरफ बढ़ गई. १०-१२ लोग लड़के को घेर कर खड़े हो गए, मगर सभी उसे देख केवल उसकी बीमारी के बारे में कयास लगाए जा रहे
 
दीपक 'मशाल'
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बड़ा आदमी(लघुकथा)----------------------------------->>>दीपक 'मशाल'

मुजीब ढाबे से चाय पीने के बाद लौट कर अपने ट्रक पर आया, गाना चालू किया और एक बार फिर ट्रक को पुणे की तरफ दौड़ा दिया.. थोड़ी देर बाद जैसे ही दो गानों के बीच गैप आता, उसे ऐसा लगता कि ट्रक में कोई दूसरा भी है उसने इधर-उधर देखा तो कोई दिखाई ना दिया. अपने
 
दीपक 'मशाल'
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त्रिवेणी और एक कविता---------------->>>दीपक 'मशाल'

पहली बार गुलज़ार साब द्वारा विकसित विधा 'त्रिवेणी' लिखने की कोशिश की है, ज्यादा नहीं पता इसके बारे में इसलिए आपकी अमूल्य राय अपेक्षित है(इसको भ्रष्टाचार से जोड़ कर देखिएगा)... कई लोग आजकल मेरी लघुकथाओं से ऊब से गए हैं इसलिए आज लघुकथा से ब्रेक लेकर ये कल
 
दीपक 'मशाल'
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दाग अच्छे हैं(लघुकथा)-------------------------------->>>दीपक 'मशाल'

''निकल बाहर यहाँ से... बदतमीज़ कहीं का..'' बरसाती गंदे पानी से सनी चप्पलें पहिनें कल्लू को अपने घर में अन्दर घुसते देख शोभा आंटी ने अचानक काली रूप धारण कर लिया और उसकी कनपटी पर एक तमाचा जमाते हुए उसे घर से बाहर निकाल दिया.''रमाबाई तुमसे कितनी
 
दीपक 'मशाल'
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बरसाती (लघुकथा)---------------------------------->>>दीपक 'मशाल'

५-६ रेनकोट देखने के बाद भी उसे कोई पसंद नहीं आ रहा था. दुकानदार ने साहब को एक आखिरी डिजाइन दिखाने के लिए नौकर से कहा.. 'पता नहीं ये आखिरी डिजाइन कैसा होगा? इन छोटे कस्बों में यही तो समस्या है कि जरूरत की कोई चीज आसानी से मिलती नहीं.' वो हीरो
 
दीपक 'मशाल'
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बोनट(लघुकथा)----------------------------->>> दीपक 'मशाल'

रोज की तरह कॉलेज जाने के लिए जब उसने अपनी सहेलियों के साथ पास के शहर जाने वाली पहली बस पकड़ी तो बस में क़दम रखने पर कुछ भी नया नहीं मिला.. सामने वाली सीट पर वही बैंक बाबू अपनी अटैची लिए बैठे थे, उनके साथ रस्ते के गाँव में उतरने वाले वो प्राइमरी
 
दीपक 'मशाल'
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तलब (लघुकथा)------------------------------->>> दीपक 'मशाल'

आँख खुलते ही सुबह-सुबह मुकेश को अपने घर के सामने से थोड़ा बाजू में लोगों का मजमा जुड़ा दिखा. भीड़ में अपनी जानपहिचान के किसी आदमी को  देख उसने अपने कमरे की खिड़की से ही आवाज़ देते
 
दीपक 'मशाल'
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रौंग नंबर(कविता ->>>दीपक 'मशाल'

तुम्हारे भेजे आखिरी ख़तअब तक मुझे ये समझाने में नाकाम रहे थेकि मैं क्यों नाकाबिल था तुम्हारे लिए..क्या तुमने अपनी अनुभवी आँखों के दूरबीन मेंअपनी तीक्ष्ण बुद्धि के लेंस लगाकरदूर खड़े भविष्य के आस-पासमेरे साथ बाँहों मे बाहें डाल चलती जो आकृति देखी थीजो
 
दीपक 'मशाल'
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वतन के रखवाले (लघुकथा)------------------------------->>>दीपक 'मशाल'

''आप कैसे ये जनरल बोगी खाली करा सकते हैं जबकि इसके बाहर 'सैनिकों के लिए आरक्षित' या ऐसा कुछ भी नहीं लिखा?'' उन १०-१२ सैनिकों के कहने पर चुपचाप उस सामान्य बोगी से उतरते लोगों में से उस पढ़े-लिखे से
 
दीपक 'मशाल'
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जरिया(लघुकथा)----------------->>>दीपक 'मशाल'

 ''अंकल मैं उस कॉमिक्स का दो दिन का किराया नहीं दे पाऊंगा.'' कॉमिक्स को एक दिन ज्यादा रखने का किराया देने में असमर्थता ज़ाहिर  करते हुए बल्लू ने दुकानदार से कहा. लेकिन उसके चेहरे पर कोई
 
दीपक 'मशाल'
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माँ------------------------>>>दीपक 'मशाल'

माँ दिवस पर 'अनुभूतियाँ' से एक कविता माँ के लिए...माँआज भी तेरी बेबसीमेरी आँखों में घूमती हैतेरे अपने अरमानों की ख़ुदकुशीमेरी आँखों में घूमती है..तूने भेदे सारे चक्रव्यूहकौन्तेयपुत्र से अधिकजबकि नहीं जानती थी निकलना बाहरया शायद जानती थी  पर
 
दीपक 'मशाल'
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आयरनमैन(लघुकथा)------------------>>>दीपक 'मशाल',

'तड़ाक... तड़ाक... तड़ाक...' तीन-चार तमाचों की तेज़ आवाज़ और गालियों के साथ किसी के गर्जन को सुन बरात के बीच से नन्हे  मुग्ध  का  ध्यान  अचानक  डांस से हटकर उस ओर चला गया. अपने दोनों गालों और
 
दीपक 'मशाल'
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''लोग क्या कहेंगे?''(लघुकथा)-------------->>>दीपक 'मशाल'

'अ' एक लड़की थी और 'ब' एक लड़का. बचपन से ही दोनों के बीच एक स्वाभाविक आकर्षण था, जिसे बढ़ती उम्र और मेलजोल ने प्रेम के रूप में निखार दिया. दोनों साथ में पढ़ते, घूमते-फिरते, कॉलेज जाते और कला-संगीत के कार्यक्रमों में रुचियाँ लेते. एक दूसरे की रुचियों
 
दीपक 'मशाल'
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एक मंचीय व्यंग्य कविता------------------------------------>>>दीपक 'मशाल'

आज से करीब १२ वर्ष पूर्व एक व्यंग्य कविता लिखी थी लेकिन शायद वो आज भी समसामयिक है, प्रासंगिक है और सालों तक रहेगी. लगा कि आपको भी पसंद आएगी... आती है या नहीं ये तो पढ़ने के बाद ही पता चलेगा. देखिएगा तनिक- एक 'तथाकथित' सम्माननीय नेता
 
दीपक 'मशाल'
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पचास रुपये जोड़ा------------------------------->>>>दीपक 'मशाल'

अभी एक दिन अपनी बीती ज़िंदगी के बारे में सोचते हुए अचानक फ्लैश बैक में जाती स्मृति की रील को दिल्ली की एक भीड़ भरी गली में अटका पाया...
 
दीपक 'मशाल'
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बंदरों से चिथने का मेरा पहला अहसास------->>>दीपक 'मशाल'

दोस्तों,बंदरों से चिथने के मेरे पहले अहसास को पढ़ने के लिए पहला अहसास पर जाएँ.. जायेंगे ना एक नए अनुभव को जानने?  http://pahlaehsas.blogspot.com/2010/04/blog-post_18.htmlआपका-दीपक 'मशाल'
 
दीपक 'मशाल'
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शुक्रिया डॉ.दराल सर.. लन्दन चित्र श्रृंखला भाग-२------>>>दीपक 'मशाल'

वैसे तो आप सभी मेरे प्रिय और सम्मानीय ब्लॉग मित्रों ने कल दर्शाई गई तस्वीरों को देख उत्साहवर्धन किया लेकिन डॉ. दराल सर जो खुद भी ब्लॉगवुड में एक कुशल फोटोग्राफर के रूप में जाने जाते हैं उनका आशीर्वाद मिला अपना सौभाग्य समझता हूँ. लन्दन के निकाले तो मैंने
 
दीपक 'मशाल'
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हाल ही में लन्दन टूर पर निकाली गयीं कुछ तस्वीरें:भाग-१ --------->>>दीपक 'मशाल'

हाल ही में लन्दन टूर पर निकाली गयीं कुछ तस्वीरें-- १- टेम्स नदी पर क्रूज़ से लिया गया शहर का एक दृश्य२- लन्दन आई ३- लन्दन आई ४- वेस्टमिन्स्टर के पास घंटाघर ;-)५- त्रेफ्ल्गर स्क्वायर ६- डायना मेमोरियल पार्क७- उसी पार्क से हंस और एक चिडिया८- कोहिनूर(ताज
 
दीपक 'मशाल'
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चुनाव आयोग द्वारा राष्ट्रहित में जारी(एक व्यंग्य आवेदन पत्र)----->>>दीपक 'मशाल'

एक मित्र द्वारा भेजे गए भविष्य के चुनावों के लिए लोकसभा प्रत्याशी के लिए आवेदन पत्र-(नीचे दिए आवेदन पात्र पर क्लिक कर के और फिर जूम करके पढ़ें)
 
दीपक 'मशाल'
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लन्दन से डॉ. विद्या सागर आनंद की एक रचना-------->>>दीपक 'मशाल'

आज पेश-ए-खिदमत है एक रचना वो भी एक ऐसे शायर की जो आज से ४८ साल पहले अपनी सरज़मीन को छोड़ लन्दन आ गए थे लेकिन आज भी दिल से पूरी तरह हिन्दुस्तानी ही हैं. ये हस्ती हैं डॉ. विद्या सागर आनंद जी, जिन्होंने इतिहास, कानून, राजनीति,
 
दीपक 'मशाल'
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आँखों को बेनूर कर रहा पानी

लेखक: मीनाक्षी अरोड़ाजन्मजात अंधापनबिहार के भोजपुर जिले के बीहिया से अजय कुमार, शाहपुर के परशुराम, बरहरा के शत्रुघ्न और पीरो के अरुण कुमार ये लोग भले ही अलग-अलग इलाकों के हैं, पर इनमें एक बात कॉमन है, वो है इनके बच्चों की आंखों की रोशनी। इनके साथ ही सोलह
 
दीपक 'मशाल'
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एक निहायत जरूरी पोस्ट, ये कोई मजाक नहीं------>>>दीपक 'मशाल'

नक्सली समस्या पर जो विचार मैं लिखना चाहता था और जो सवाल उठाना चाहता था वो कुछ तो गुस्से की वजह से सोच नहीं पाया और कुछ समयाभाव में... लेकिन आज एक ऐसी पोस्ट पढ़ी जो इस विषय पर एक सम्प्पूर्ण पोस्ट लगी लेकिन बहुत दुखद है कि इससे पहले से भी कई बेहतरीन पोस्ट
 
दीपक 'मशाल'
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ऐसे गृहमंत्री और अन्य मंत्रियों को फांसी पर लटका दो----->>>दीपक 'मशाल'

क्या लगता है आपको? कौन है असली दोषी इस नरसंहार के पीछे? क्या नक्सल या आदिवासी, टाटा-बिडला-अम्बानी जैसे उद्योगपति या मीडिया, पुलिस या सरकार, या कोई और?ये घटना मेरा भी उतना ही लहू जलाती है जितना कि किसी अन्य भारतीय का.. निश्चय ही बहुत ही निंदनीय
 
दीपक 'मशाल'
Apr 08 2010 02:53 AM
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आज मुनईयाँ के ससुरे सें चिट्ठी आई है------->>>मशाल

साहित्यप्रेमियों के सामने एक बुन्देलखंडी गीत प्रदर्शित कर रहा हूँ.. जो कि एक लडकी जो अपने ससुराल में है और कई दिनों तक अपने मायके(पीहर) से कोई खोज-खबर ना लिए जाने पर कुछ दुखी है को ध्यान में रख कर लिखी गई सी लगती है, गीतकार हैं
 
दीपक 'मशाल'
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आपके जैसा ही कुछ हमारे माँ-बाप भी हमारे बारे में समझते हैं(लघुकथा)------>>>दीपक 'मशाल'

आप से निवेदन है कि कृपया सुझाव दें कि ये लघुकथा पूरी रखें या जहाँ पर £ लिखा हुआ है वहाँ से ऊपर तक का भाग हटा दें.. आपके मार्गदर्शन के लिए आभारी रहूँगा.  यूनिवर्सिटी ने जब से कई नए कोर्स शुरू किये हैं, तब से नए
 
दीपक 'मशाल'
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अंग्रेजी घर तो चकाचक हिंदी के कमरे रीते हैं------->>>दीपक 'मशाल'

आबादी में इतने आगे होकर भी आबाद नहींसरकारी एडों में सुनते हम बिलकुल बर्बाद नहींसुनते हैं इतिहास मगर अब कहते हम इरशाद नहींतन से तो हम मुक्त हो गए मन से पर आज़ाद नहींपेट की आग बुझाने को नारी शोलों पे सिंकती हैदेखो तो चौराहे पर फिर किसकी बेटी बिकती हैशाम हुई
 
दीपक 'मशाल'
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कविता----------------->>>>दीपक 'मशाल'

ज़िन्दगी वेताल बनके हर रोज़ सुनाती रहती है एक नई कहानी उसे और शाम को.. जब वो उसका बोझ ढोते-ढोते थक जाता हैतो भयानक अट्टहास के साथ लगती है पूछने रहस्यमय जवाब उस कहानी से उपजे.. उससे जन्मे पुरानी दिल्ली की ज़मीं और आसमाँ के बीच केमकड़जाली बिजली के तारों के
 
दीपक 'मशाल'
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लघुकथा------------------------>>>दीपक 'मशाल'

पूजा के लिए सुबह मुँहअँधेरे उठ गया था वो, धरती पर पाँव रखने से पहले दोनों हाथों की हथेलियों के दर्शन कर प्रातःस्मरण मंत्र गाया 'कराग्रे बसते लक्ष्मी.. कर मध्ये सरस्वती, कर मूले तु.....'. पिछली रात देर से काम से घर लौटे पड़ोसी को बेवजह जगा दिया अनजाने
 
दीपक 'मशाल'
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आज शहीदी दिवस है----->>>दीपक 'मशाल'

आज शहीदी दिवस है भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का.. कुछ याद आ रहा है-''भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु..पहन वसंती चोलेरात मेरे सपने में आये आके मुझसे बोलेहमारा व्यर्थ गया बलिदान.. हमारा व्यर्थ गया बलिदान..हम भी अगर चाहते तो सम्मान मांग सकते थेफांसी के तख्ते पर
 
दीपक 'मशाल'
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अनुभूतियाँ------->>>दीपक 'मशाल'

प्रकाश के व्युत्क्रम से जब..मन घबरा जाता है,सोना-जागना/ खाना-पीना.. जीवन का क्रम बन जाता है..सर-दर्द तो मुझकोयाद है रहताअपनी स्वयं की देह का,आसपास की.. मौतों को परजब मन बिसरा जाता है...आगे बढ़ने को आतुर हो जबएड लगाता हूँ खुद को,कोई मुझसे बेहतर हो ना
 
दीपक 'मशाल'
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खामियों से लथपथ मैं लोकतंत्र हूँ---->>>दीपक 'मशाल'

1-मैं अबोलाएक भूला सा वेदमंत्र हूँ,खामियों से लथपथमैं लोकतंत्र हूँ.तंत्र हूँ, स्वतंत्र हूँ द्रष्टि में मगरओझल मैंआत्मा से परतंत्र हूँ.कहने को बढ़ रहा हूँ मैं.पर जड़ों में न झांकियेवहां से सड़ रहा हूँ मैं.लोक को धकेलतापरलोक की मैं राह में,कुछ मुसीबतों की
 
दीपक 'मशाल'
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उसका खुदा-मेरा खुदा---->>>दीपक 'मशाल'

बेतरतीब सा मैंमुड़े-तुड़े किसी बीड़ी के बण्डल की तरह केसिकुड़नों वाले उस कुरते को हलकी सी सीयन उधड़ी जींस के ऊपर डाल चल दिया था उसके घर की तरफ अनायास ही..तोड़ दिया था मेरी जिद को उसकी हफ्ते भर पहले जायी उस चट्टानी नराजगी ने..यूँ तो हिम्मत ना थी कि घर में
 
दीपक 'मशाल'
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एक अज़ब-गज़ब लोकगीत---->>>दीपक 'मशाल'

आज मस्तिष्क के समंदर में विचारों की लहरें उठने का नाम ही नहीं ले रही थीं, साथ ही तन और मन के देव और दानवों ने थके होने का बहाना बना के मंथन से भी इंकार कर दिया.ऐसे में सोचा की आपको कुछ ऐसा पढवाता हूँ जो औरों से काफी अलग हो. अगर आपको याद हो तो
 
दीपक 'मशाल'