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29 May 2010
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जिन्दगी यहां

हर कदम से ताल मिला लेऐसी भी आसान नहीं है जिन्दगी यहांपल पल मरकर भीजीते है लोगऐसी भी लाचार नहीं है जिन्दगी यहांनफे नुक्सान का हिसाब न मांगेऐसी भी बेजुबां नहीं है जिन्दगी यहांअरे हंसने वालोसिसक सिसक कर दम तोड़ती है जिन्दगी यहांअपनी राते काली करमहफिल रोशन
 
Vimla Bhandari
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कहां खो गये

जागे थे भाग कभीबजे ढ़ोल, बंटे बताशे भीलोरी और पालने के स्वर भी वहींफिर आज न जाने वे नन्दलाल कहां खो गये?मां आज तू नितान्त अकेली हो गई।नहला धुलाकरसाफ-सुथरे कपड़े पहनालगा दिये थे तूने काजल के टीकेफिर आज न जाने वो झूलेलाल कहां खो गये ?मां आज तू नितान्त अकेली
 
Vimla Bhandari
May 09 2010 08:01 AM
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विश्वास

मैं ‘सुसाईड’ कर रही हूं। मैंने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया है। कमरे के सभी खिड़की दरवाजे भीतर से बंद कर दिए है और टी. वी. चालू करके उसकी आवाज तेज कर दी है ताकि बाहर मेरे मम्मी पापा को भी किसी तरह की भनक ना लगे कि मैं क्या करने जा रही हूं। मैंने पंखे से
 
Vimla Bhandari
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विशवास

मैं ‘सुसाईड’ कर रही हूं। मैंने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया है। कमरे के सभी खिड़की दरवाजे भीतर से बंद कर दिए है और टी. वी. चालू करके उसकी आवाज तेज कर दी है ताकि बाहर मेरे मम्मी पापा को भी किसी तरह की भनक ना लगे कि मैं क्या करने जा रही हूं। मैंने पंखे से
 
Vimla Bhandari
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हर बार

ऐसा क्यों होता हैकि हर बारमुझे ही हारना होता हैफिर चाहे वहमेरी तरूण अवस्था होया यौवन का मधुमासमेहनत का फलक्यों खट्टा हीपकता है मेरीअम्बुए की डालमेरे सामने हर बार हार ही होती हैजीत से तो वास्तामेरा कभी पड़ा नहींछद्म रूपधारी देवताओं की तरहउसे तुम पहले ही
 
Vimla Bhandari
Apr 23 2010 02:47 PM
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आज का दिन

आज का दिन खूनी था शायद, तभी तो- अभी वह घर से निकलकर पचास कदम आगे बढ़ भी नहीं पाया था कि........बस! एक मोड़ ही मुड़ा था। सीधी और चौड़ी सड़क थी। सुबह के सात बजे वह निकला था, तब हल्का धुंधलाका था पर अब सात बजकर पांच मिनिट होने को हैं, चारों ओर पूरा उजियाला पसर
 
Vimla Bhandari
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स्थगन

लो आज फिर रसोई से सफेद छुरी गुम हो गई, कहां जा सकती है? शक की सुई फिर भुआ की ओर उठ गई। घर में यह पहली बार घटने वाली घटना नहीं है। जबसे भुआ इस घर में काम करने आई है तबसे कई चीजे गुम हो चुकी है। साबुन, टूथपेस्ट, टूथब्रश से लेकर अगरबत्ती, केसर-चंदन डिब्
 
Vimla Bhandari
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मैं और तुम

उसका और मेरा संघर्ष कब शुरू हुआ ये तो मुझे ठीक से मालूम नहीं, हां इतना मालूम है कि जब मेरे हाथ पैर और आंख नाक बन रहे थे और मुझमें थोड़ी- थोड़ी हरकत शुरू हुई थी तभी मैंने अपने पड़ौस मैं अपनी ही जैसी हल्की सी सरसराहट महसूस की थी। यद्यपि वो ओर मैं अपनी अलग
 
Vimla Bhandari