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13 Jun 2010
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सच्चा हिंदुस्तान-१

अभी अभी गाँव से लौटा हूं , सुखद अनुभूतियों के साथ ।हमारे गाँव के आसपास बागों की बहुतायत है और लगभग ३ कि.मी. पर जंगल है तो वातावरण काफी अच्छा रहता है ।हालांकि गर्मी बहुत थी , फिर भी शाम से मौसम ठीक हो जाता था ,और छत पर सोने का अह्सास सुखद था । हैंडपम्प से
 
अजय कुमार
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नासमझ

                   **माफ करना समझने में भूल हुई****वो रोज़ मुझे आदाब आदाब कहकर मुस्कुराने लगे !!वो रोज़ मुझे आदाब आदाब कहकर मुस्कुराने लगे!!एक दिन दाब दिया गला
 
अजय कुमार
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माँ तूं मुझको याद आती है---

जब कोई चिड़िया गाती है . मुझको नींद नहीं आती है । तेरी  लोरी याद आती है , माँ तूं मुझको याद आती है ॥दिन भर कुछ करती रहती है , सुबह सुबह तूं उठ जाती है ।माँ तूं कब सोने जाती है ?तेरी लोरी याद आती है , माँ तूं मुझको याद आती है ॥जब बच्चे ऊधम
 
अजय कुमार
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क्या क्या बदल डाला ???

धरती बदल डाला ,अंबर बदल डाला ।इस तरह हमने रहने का स्तर बदल डाला ॥मिलकर लड़े अंग्रेजों से ,आपस में अब लड़ें ।आजादी मिल गई तो कल्चर बदल डाला ॥तैमूर ,गजनवी ,ब्रिटिश ,तेलगी ,मधु कोड़ा ।सबने किये हैं वार ,बस नश्तर बदल डाला ॥मिलने गया सुदामा ,मुलाकात न हुई ।सुनते
 
अजय कुमार
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मिलने जब आउंगा

सुन लो हे प्राणप्रिये , मिलने जब आउंगा ।सारी रात पूनम की , जाग कर बिताउंगा ॥रास्ते में चलते चलते , लोग ठहर जायेंगे ।और सारे भौंरे भी राह भूल जायेंगे । खुशबुएं लुटाउंगा , बाग इक बनाउंगा ।तेरी जुल्फ फूलों से , इस तरह सजाउंगा ॥कर के मुझे मदहोश , जब
 
अजय कुमार
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औरत का सम्मान करो----

औरत का सम्मान करो , औरत संसार की ज्योती है ।जिसने हम सबको जन्म दिया , वो जननी औरत होती है ॥जो करती भाईदूज के दिन , भाई के माथे पर टीका ।राखी के दिन राखी बांधे , वो बहना औरत होती है ॥औरत का सम्मान करो , औरत संसार की ज्योती है ॥उसके बिन सभी अधूरा है ,
 
अजय कुमार
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अन्तर्मन सतरंगी कर दे---

खुशी मनाओ नाचो गाओप्यार से सबको गले लगाओअन्तर्मन सतरंगी कर दे , ऐसा रंग अबीर लगाओ ॥पिचकारी की अदा निराली रंगों की वर्षा कर डालीप्रेम रंग में खूब नहाओ ।अन्तर्मन सतरंगी कर दे , ऐसा रंग अबीर लगाओ ॥मीठी गुझिया का है कहना हरदम मीठी बातें करनामन में तनिक
 
अजय कुमार
Feb 28 2010 01:34 PM
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हे भाग्य विधाता !!

लोकतंत्र यदि मानव होता ,चीख चीख रोता चिल्लाता ।अब कितना अपमान सहुंगा ,बतलाओ हे भाग्य विधाता ॥है स्वतंत्र गणतंत्र राष्ट्र पर , क्या सब जन स्वतंत्र अभी हैं ?जो निर्धन ,निर्बल, दुर्बल हैं ,वो सारे परतंत्र अभी हैं ॥जिसके हाथ में मोटी लाठी , भैंस हांक कर
 
अजय कुमार
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सर्दी में तुम आ जाओ---

सर्दी में तुम आ जाओ लेकर कुछ गरमी ।आँखों में कुछ शर्म,नमक जितनी बेशर्मी ॥लाना वो मुस्कान मुझे व्याकुल जो कर दे ।वही महकता बदन वही हाथों की नरमी ॥इक दूजे पर अपना सारा प्यार लुटा दें ।कभी तनिक बिंदास, कभी कुछ सहमी सहमी ॥चलो आज आओ मेरा अन्तर्मन छू लो ।छूने
 
अजय कुमार
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नये ब्लागर का स्वागत करें

नव वर्ष में मेरे मित्र  दिपायन कंठा जी का हिंदी ब्लाग जगत में आगमन हुआ है । दिपायन जी मूल रूप से बांग्ला भाषी हैं लेकिन हिंदी पर भी समान अधिकार रखते हैं । उनके ब्लाग का नाम है भावनायें  । ब्लाग जगत के सभी सदस्यों से अनुरोध है कि नये ब्लागर का
 
अजय कुमार
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गये साल का तराना

तुमको कुछ बात बताना था इस दिल का हाल सुनाना था क्या क्या गुजरी बतलाना था तुम चले गये तुम्हे जाना था ।कभी सफल रहे , कभी विफल रहे कभी दहल गये , कभी अटल रहे क्या क्या झेला बतलाना था ।तुम चले गये तुम्हे जाना थाखेतों में हरियाली होगीअब देश में खुशहाली होगी
 
अजय कुमार
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नया तराना नये साल का

उम्मीदों भरा क्या नया साल होगा ?हर देशवासी क्या खुशहाल होगा ?सभी को सुबह शाम रोटी मिलेगी या मंहगाई का फिर महाजाल होगा ?क्या अपराधियों की भी आयेगी शामत या फिर पहुंच का उन्हें ढ़ाल होगा ?करेगा दलाली वो काटेगा चाँदी जो खेती करेगा क्या बदहाल होगा
 
अजय कुमार
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एहसास

रात भर हम तो करवट बदलते रहे दिल के अरमान अश्कों में ढ़लते रहे । फूल घायल करेंगे नहीं इल्म था हम तो कांटों से बच के निकलते रहे । धूप में पांव जल न जायें कहीं घनी अमराइयों में ही चलते रहे । बात करनी बहुत थी ,मगर जब मिले शब्द निकले नही होंठ हिलते रहे । म
 
अजय कुमार
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इश्क की बात

इश्क की बात हम बताते हैं, एक ताजा गज़ल सुनाते हैं । उनकी यादों से सजाया है इसे , प्यार से लोग गुनगुनाते हैं ॥ नाज़ है गुल को अपने किस्मत पे पहले चूमा गया मुहब्बत से । अदा के साथ उसको जूड़े में हाथ महबूब के लगाते हैं ॥ क्या करें जिक्र हम , शबे ग़म की कैसे
 
अजय कुमार
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विचलित मन

अब अपने नन्हें-बच्चों को पाठ विनम्रता का न पढ़ाना ! आने वाले कल की ख़ातिर सत्य -अहिंसा नहीं सिखाना !! जब नेता हों चोर -उचक्के ऐसे मंज़र रोज़ ही होंगे, अपनों में गद्दार छुपे हों दिल पर खंज़र रोज़ ही होंगे ! रोज़ ही होगा देश में मातम,ख़ूँ के समन्दर रोज़ ही होंग
 
अजय कुमार
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जिंदगी

आज ठुमरी वाले विमलजी का जन्मदिन है , उनके दीर्घायु होने की कामना करते हुये ,आज की रचना उनको समर्पित करता हूं- देखा है जिंदगी को कुछ कुछ करीब से । एह्सास इस सफर में हुए हैं अजीब से ॥ रह्ता है मेरे दिल में ही, जिसने दिया है गम । शिकवा करुंगा कैसे मैं ,
 
अजय कुमार
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तन्हाई

तन्हा तन्हा सफ़र जिन्दगी का । साथ मुझको मिला न किसी का ॥ उनके दामन से निकली जुदाई । अब भरोसा नही है किसी का ॥ उनके बिन तारे लगते हैं फीके । रंग उतरा सा है चाँदनी का ॥ लोग सजने सँवरने पे घायल । मुझ पे बिजली गिरा सादगी का ॥ चन्द टुकड़ों पे बिकन
 
अजय कुमार
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बाल दिवस

जिनका बाल दिवस होता ,कैसे बच्चे होते हैं ? खाने के ढाबे पर अब भी ,बरतन बच्चे धोते हैं || भूख ,गरीबी ,लाचारी में ,जीवन इनका बीत रहा | जाने कितने नौनिहाल बस पेट पकड़कर सोते हैं || खेलकूद ,शैतानी करना ,जिद करना तो भूल गए | इनको पता चलेगा कैसे ,अक्षर कैस
 
अजय कुमार
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मेरा देश महान ??

१) राष्ट्रद्रोह का करें आचरण , नेताओं के वेश में | कदम-कदम पर अपमानित है , हिंदी अपने देश में ||                          &nb
 
अजय कुमार
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जबलपुर यात्रा

विगत दिनों मैं सपरिवार जबलपुर घूमने गया था | हम लोग ३१ अक्टूबर को दोपहर बाद जबलपुर पहुंचे और तुंरत ही भेडाघाट घूमने चले गए | ऊंची ऊंची संगमरमर की चट्टानों के बीच नर्मदा नदी का पानी खूबसूरत प्राकृतिक सौंदर्य बिखेरता है | हमने नौकायन का आनंद लिया | नाव
 
अजय कुमार
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बेवफा

मेरे सामने था प्याला ,और आँख में नमी थी | मेरी जिंदगी में शायद ,तेरे प्यार की कमी थी || मेरे जुल्फ बिखरे बिखरे ,मेरे पांव डगमगाते | मैं जहाँ भटक रहा था ,वो तुम्हारी ही गली थी|| मुझे दर्द-ए-दिल दिया है ,तूने रास्ता बदलकर | तेरा प्यार तेरी चाहत ,मेरे स
 
अजय कुमार
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गुजारिश

तकरार नहीं करते ,इंकार नहीं करते अच्छे मौसम को यूँ ,बेकार नहीं करते | जब भी पूछा उनसे ,है प्यार तुम्हें मुझसे ? नज़रें वो झुकाते हैं , इजहार नहीं करते | क्यों होने लगी तुमको ,परवाह जमाने की कह दो खुलकर मुझसे ,तुम प्यार नहीं करते | आहें न भरा करते ,हम
 
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कैसा दौर ?

इकरार भी होता है ,इंकार भी होता है | तुम भी लगालो डुबकी ,ये प्यार का गोता है || पहले कभी-कभी था ,अब रोज ये होता है मैं उसको जगाती हूँ ,वो मुंह फेर के सोता है || बच्चे से प्यारी बातें ,पत्नी से मुलाकातें इस दौर में मुहब्बत , वीकेंड में होता है || सबकी
 
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दिन-दहाड़े

जब गुंडे पाँव पकडें , नेताजी मुस्कुराये | जनता समझ गयी है , फिर से चुनाव आये || बंटने लगी है दारु मिलने लगा है पैसा | कन्फ्यूज हुआ वोटर , किसका बटन दबाये ? जी भर के दे रहे हैं , एक दूसरे को गाली | मुंह है या गन्दी नाली , कोई समझ न पाये || सबको मिलेगा
 
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उनके लिए

जिंदगी का अब मजा आने लगा है | देखकर उनको नशा छाने लगा है || फिर बहारों से चमन आबाद है , बाग़ में शायद कोई आने लगा है | दूर हूँ , मजबूरियां हैं इसलिए , बेवफा मुझको कहा जाने लगा है | रात भर बाँहों में रहते हैं मेरे , ख्वाब मेरा ये बिखर जाने लगा है | नज़
 
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थरूर का गुरूर

थरूर का गुरूर थरूर साहब के बारे में सुना तो लगा ,अच्छे लोग राजनीती में फिर आने लगे हैं !मगर ग़लतफ़हमी जल्दी दूर हो गई ये भी छुटभैय्या नेता निकले !इकोनोमी क्लास में ठीक ठाक लोग यात्रा करते हैं !आपने उन्हें कैटिल क्लास बोल दिया !आप जब ग्रामीण क्षेत्र में
 
अजय कुमार
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प्रेम-डगर

है ये लंबा सफर ,चलना है उम्र भर | हंसके रस्ता कटे ,प्यार की बात कर || लोग मतलब की अब बात करने लगे | लोग अपने पड़ोसी से डरने लगे || ऐसा माहौल हमको बनाना है अब | खुशियाँ जाने न पायें शहर छोड़ कर || कृष्ण , ईशा ने , नानक ने , इक बात की | सबने सम्मान की
 
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गठरी

आज २ अक्तूबर को दो महान सपूतों , महात्मा गाँधी और लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्मदिन है आज इन महापुरुषों को इस लिए याद कर रहा हूँ क्योंकि मैं एक राजनीतिक व्यक्ति हूँ ,और राजनीति में इन्हे अपना आदर्श बता कर अपना कैरियर बनाने का ट्रेंड है इसके लिए जन्मद
 
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विरासत

त्योहारों का मौसम चल रहा है , इसका लुत्फ़ उठाएं ! नवरात्री समाप्त होने को है,दशहरा आने वाला है सब तरफ़ गरबा और डांडिया की धूम है ! अभी अभी रमजान का पवित्र महीना समाप्त हुआ है , ईद की सेवईं हम खा चुके ! अब दीपावली का धमाल होगा ! कुल मिलकर ये की चारो त
 
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विश्व सुन्दरी

ब्लॉग जगत में आज मेरा पहला कदम है ! मन की बातें गठरी से निकलकर आप तक पहुँचती रहेंगीएक कविता प्रस्तुत है-- संसार की सबसे सुंदर औरतएक दिन गर्लफ्रेंड ने कहा , एक सवाल करती हूँ सोच कर जवाब देना ,मैं कैसी दिखती हूँ ?मैंने कहा -इसमे सोचने की क्या है बात ,तू तो
 
अजय कुमार