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अक्षरछाया

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25 Apr 2010
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सड़क पर: कुछ दृश्य

           1नो एंट्री में घुसने से रोकतीट्रैफिक पुलिसमुट्ठी बंद होते हीबन जाता था रास्ता          2 नेताजी चले
 
Narendra Kumar
Apr 25 2010 11:47 AM
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प्रतिदान

घोड़े सरपट दौड़ते हैं..और तेज दौड़ते हैं         गिरकर उठते हैंफिर कोशिश करते हैंकुछ गंतव्य तकपहुंचते हैंप्रशिक्षित करकेअंत मेंगदहों की सेवा मेंलगाये जाते हैंगदहेघोड़ों कोउपकृत करते हैंउनकी मादाओं सेसहवास करते
 
Narendra Kumar
Mar 21 2010 12:39 PM
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आधी रात का सच

आधी रात कोथम जाता हैगली में तैरते सपनों का प्रवाह जब अपने ही बोझ से लदारिक्शेवाला घर लौटता हैचौंक कर भौंकते हैं कुत्तेएक भद्दी गालीफिर से सब कुछ शांतबिस्तर में कुनमुनाते बच्चेनींद में भी कर रहे शिकायत अभी भी पत्नी की आँखों में हैउसके आधी रात तक बाहर रहने
 
Narendra Kumar
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मुखौटा

ऐसा पहली बार हुआ थाजनता से मुखातिब नेताजीखो जाते थे कहीं शब्द उन्हें चकमा दे  रहे थेलिखित भाषण पहली बार पढ़ रहे थेकोस रहे थे पार्टी अध्यक्ष को सोचा था शासन करेंगेपरदिल्ली में तो शासित हैंजनहित,विकास
 
Narendra Kumar
Feb 14 2010 12:57 AM
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शंकित मन

उनके तिरुपति और अजमेर कीत्वरित यात्राओं को देखकर      होने लगा है मुझे विश्वास   ...कि वहीं मिलते होंगे  अधिकारपत्रहत्या,अपहरण और घोटालों केतभी तो हर आरोपमुक्ति के बादपुर्नदर्शनार्थ जाते हैं...कि काले धन के चढ़ावों
 
Narendra Kumar
Feb 07 2010 10:50 AM
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नई पहचान

कितने पड़ोसी गोलियों से मारे गएकितने हवाई हमलों सेकोई हिसाब नहींहमलावर ही गिन रहे हैंहर नए हमलों के साथएक जनसमूह ख़त्मजो ढूंढ रहा थाकिसी खंडहर में आश्रयचूल्हे सुलगा रहीं औरतेंजन्म दिन मना रहे बच्चेनिशाने बनतेहमलावरों केऔर गिने जातेआतंकियों मेंमरने के
 
Narendra Kumar
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प्रवासी भारतीय सम्मलेन

आठवां प्रवासी भारतीय सम्मलेन नई दिल्ली में इस बार कुछ भी अलग नहीं केवल नाम का भारत कोई भारतीय नहीं सभी अमेरिकन,यूरोपियन मंत्री भीनहीं पहचाने जा रहे याद है हमेंमुंबई सम्मलेन एक प्रतिनिधि के हिन्दी में बोलने पर हुआ था काफी विरोध माफी मांगनी पड़ी थीमंत्री
 
Narendra Kumar
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स्कूल में

स्कूल में स्वेटर बुनती हुई शिक्षिका कह रही थी-परिश्रम सच्चे मन से होनी चाहिए सह शिक्षक बैठे उंघ रहे थे
 
Narendra Kumar
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अमरबेल का अमरत्व

खत्म हो जाता है पेड़ अमरबेल नहीं मौसम की मार से पूरी तरह बेअसर उसे परवाह नहीं मृदा-क्षय,जल तथा पोषक तत्वों की कमी थी सब पेड़ की जरुरते हैं उसे तो चाहिए केवल पेड़ का संचित जीवद्रव्य किसी भी कीमत पर अनवरत,असीमित वृद्धि के लिए अमरबेल के आलिंगन की कीमत चुका
 
Narendra Kumar
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सेंसेक्स और माँ

सेंसेक्स का संवेदी सूचकांक और बूढ़ी तथा अशक्त माँ की उखड़ती साँसे दोनों कितनी समान दोनों का उतार-चढाव कितना जोखिम भरा बस इतना सा फर्क सेंसेक्स पर हर सेकेंड नजर है (संवेदी जो है) लेकिन माँ अंधेरे और एकांत में उपेक्षित नजर कैसे आएगी वो किसी वेवसाइट या
 
Narendra Kumar
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हमारे सपने उनके सपने

हमें अब सपने नहीं आते हैं हमारे पास रात नही है हमारी रातें खरीदकर वे अपने सपने पूरे करते हैं सुबह हमारे लिए शाम बनकर आती है दिन ही हमारी रात होती है और दिन के सपने कब पूरे होते हैं
 
Narendra Kumar
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दुःख की शुरुआत

मुझे वहीं जाना होगा जहाँ मैंने अपनों को छोड़ा था उनके दुःख से अपने को अलग कर लिया था। अब जिन्हें अपना समझा था वे भी जा रहे हैं सुख की जिंदगी जीने मुझे छोड़कर मानो अपने सुख मुझसे दूर रहकर ही पा सकते हों। मैं कुछ नहीं कह पाता क्योंकि,ये रास्ते मैने ही त
 
Narendra Kumar
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शांति का शोक

पिछले साल रामधारी सिंह दिनकर की जन्म शती मनाई गई।अभी हाल में ही 23 सितंबर को उनकी जयन्ती मनाई गई।उनकी रचनाएं उर्वशी,कुरुक्षेत्र एवं रश्मिरथी सभी आज के परिवेश में भी अपनी सार्थकता साबित करती हैं।पर आज के परिदृश्य में जो रचना मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित
 
Narendra Kumar
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हिन्दी साहित्य की विडंबना

वर्तमान समय में हम हिन्दी साहित्य की गुणवत्ता का स्तर गिरता हुआ देख रहे है। अधिकांश रचनायें यथार्थ से परे लगती है, जिनका हमारे जीवन की रोजमर्रा की घटनाओं से सही संबंध नहीं होता है। इसी कारण देखने में यह अक्सर आता है कि जो लोग कभी हिन्दी साहित्य के पा
 
Narendra Kumar
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अक्षरछाया की शुरुआत

आज 14 सितंबर को इसकी शुरुआत को लेकर मैं काफ़ी रोमांचित और उत्साहित हूं. मुझे पता है कि मैं हिंदी साहित्य को समझने की एक मामूली कोशिश कर रहा हूं. इसके माध्यम से मैं हिंदी के गणमान्य सर्जकों और सेवियों से संपर्क स्थापित करना चाहता हूं. उनके आशीर्वाद और
 
Narendra Kumar