अब हमें यह मानने में देर नहीं करनी चाहिए कि तमाम शोषण, गैर-बराबरी,आदिवासी हकों की उपेक्षाओं और अपने ही जल-जंगल-जमीन से बेदखल कर देनेवाली सरकारी नीतियों के विरोध में उपजा नक्सलवाद अब एक खूनी क्रांति कीउद्घोषणा है। क्रांति तो इसे अब भी कही जानी चाहिए
नोएडा के सेक्टर-1 पर एक छोटे से ऑटो मेंठूंस दी गयी दिहाड़ी से लौटी कुछ अर्द्ध-नग्न औरतेंमुश्किल से एक माह पुराने बच्चे के साथ. सेक्टर-9 तक पहुँचने के उन बीस मिनटों में एक बेहद निजी बच्चे को कराया गया सार्वजनिक स्तनपान कला फिल्म के 'अश्लील' दृश्य की भांति
For me personally it was blessing to be part of the Self-exploration through kabir workshop organised by Pravah, Delhi from 29-1April, 2010 in Jamia Hamdard University, Delhi. It helped me to understand the essence of Kabir’s philosophy in deeper way.
पिछले दिनों बीकानेर अपने मरहूम शायर अज़ीज़ आज़ाद की स्मृतियों में खोया-खोया सा नजर आया। अज़ीज़ आज़ाद वैसे भी याद रहने वाले इन्सान थे क्योंकि वे हमेशा शायर और अदबकारों के अलावा आम जन के बीच भी अपनी रफ़ाकत के लिए जाने जाते रहे हैं. स्मृतियाँ अक्सर खामोश होती
इन दिनोंएक चिड़िया व्यस्त हैमेरे आँगन मेंकहाँ कहाँ से बटोरे हुएतिनकों और धागों सेबना रही हैमेरे घर मेंएक और घर.उसे चुनना है अपना आश्रयजिनके पुण्यों सेसंतति को नहीं मिलेगाकोई देवलोककिसी बहेलिये* की पापात्माकोप है लाखों योजन का विस्तार भी.तुम मत गिराओ
The recent news in Dainik bhaskar dated 18 December 2009 says that Our water official went to Israel, learnt from Mokerot (Israil's national water company) "How to conserve water". Why our government water department's officers did not visit Jaisalmer,
तुम पापों का पक्ष तपों की गति प्रतीक्षा या संदेह! वो सृष्टि तजि हुई काया सी रंधित जिसे अवशेष समझ चढ़ाए थे चढापे ढकी थी चादर गंगा का आचमन यक्ष धूप अभिक्त टंकारे यथा जयकारे होगा पारायण भेद-अभेद मुक्ति द्वार बरबस निहारेंगे दिशाओं के संकेत छोड़ भी दो चाप
पहाड़ों में नहीं रहता जंगल या कोई नदी। घुप्प अंधेरे में बसता है यहां मॊन, नि:शब्द। तुम जिसे सुनते हो स्पर्श, हवा और हवा के बीच। तुम जिसे देखते हो सॊंदर्य, दृश्य और दृश्य के बीच। वह कहीं गहरा है अपने मन सा. अपनी ही खोज में किसी और पहाड़ पर।
मार्च 1948। स्थान सेवाग्राम। गांधीजी जी हत्या के कुल छः हफ्तों बाद सेवाग्राम में नेहरू, प्रसाद, आज़ाद, विनोबा, कृपलानी, जे पी और कुमारप्पा सहित वे सभी राजनेता, अर्थशास्त्री और दार्शनिक अपने सूने दिलों और भटकते दिमागों के साथ जमा हुए जो गांधीजी के अचानक
उजड़े पातालों की कोखबिसरा है नादसद् सद् आरूढ़खण्डहरों की देवीतुम हो आंलिगतश्रापित देह विभूति बनपत्थरों का अरण्यपाया है तुमनेनींद से टूटे जगराते इसी धरा पर बचे होंगेछत गिरे घौंसलों मेंरति का संतापअनावृत खण्डहर काआबद्ध मौनकुलधराइन्हीं पराजयों का जन्म काल
अचानक कुछ डबडबाया हैआंख की कोर पेइशारा पाते ही पलकों काफूट पड़ेगा वहहोठों को तर करतागले के किनारों सेकहीं अटक गया हैकिसी पल के लिएहलक के बीचो-बीचबिना बूंद काएक शब्द!
भादो की तपती दोपहर में,सिक रही है रेत सुदूर समय की रेखाएंउभर आयी है ताजा लिपे आंगन परमांडणे जो कोरे गये हमारे स्वागत में।आगत एक झुलसन जैसे कोई छांव हवा में तैरतीमानों हमारे ही सूखे कालखण्डों नेचुना हो हमेंछताँगढ़ के लिए।हमें लटकाना है चांदइसी थार मेंताकि
वो था बसंतकिसी थार के नूर में पककरखिल उठा अलसायी बयार के एक झौंके सा,अविश्वसनीय राग से लिपटबजने लगा हम सबकी तपती देह में।ओ! छताँगढ़ तुम्हारा आकाश तुम्हारी रेत औरतुम्हारा पानी हमने भरा है अंजुरी मेंतुम इजाजत दो तो दे लें अर्ध्य उन अंधेरों के किनारे उकड़ू
Many of us have realized in the last few days that silence can be enjoyable. We realize that there are many things that we do not have to say, and that then we can reserve the time and energy to do other things that can help us to look more deeply into
‘सबद’ पूर्ण है ‘शब्द’ से। अर्थ में ‘सबद’ वेद है। नानक से लेकर नाथों ने ‘सबद’ रचे। कबीर से लेकर दादू ने ‘सबद’ गाये। कुछ ‘सबद’ विस्मृति में हैं तो कुछ वाणियों में। कहते हैं सबद यथार्थ ज्ञान का मूल है, भव है। संत सबद की इस वाणी से होना सिखाते हैं (to be)।
पिछले दो वर्षों से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रति मेरी रूचि का बढ़ना मेरे लिए बहुत आश्चर्यजनक घटना है। आश्चर्यइ इस दुःख के साथ है क्योंकि मेरी पीढ़ी के पास शास्त्रीय संगीत को सुनने और उसे छू पाने के अवसर अब ना के बराबर है। संगीत के सारे माध्यमों
कबीर और उनकी काव्य व संगीत परंपरा की जिज्ञासाओं की तलाश में मालवा का जिक्र इतनी बार मेरे सामने आया कि उसकी मिट्टी को छूने की तड़प दिनों दिन बढ़ती ही रही। इस बीच बहुत जगह जाना हुआ लेकिन बार-बार पता नहीं क्यूं मालवा मुझसे दूर जाता रहा। मध्यप्रदेश के दायें,
कम्यूटिनी यात्रा के शुरूआती तीन महीने यानी मई से जुलाई तक का अधिकाँश समय या यूं कहें लगभग पूरा समय लम्बी यात्राओं में गुजरा। ये यात्राएं केवल एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति से मिलने या फिर एक संस्था से दूसरी संस्थाओं में जाने तक का सफर भर नहीं था बल्कि अपने
स्मरण और स्मृति का कालखंड उन गहरी रेखाओं की तरह है जो एक विराट अरण्य में अपने ही बिसरे-भटके प्रतिबिम्बों को तलाशने का उपक्रम करता हुआ शब्द की देहरी पर कुछ देर सांस लेने के लिए रूकता है। यह कविता है या समाधि! यह गुरू के सामने समर्पण है या स्वयं का अर्पण!
कोलकाता के संजय, ललिता, बबिता, पूनम और योगेश के मन में राजस्थान को लेकर कई छवियां एक साथ तैर रही है। कईयों को लगता है कि राजस्थान की औरतें बहुत खड़ूस होती है तो कोई यह मानता है कि वहां के लोग शराब ज्यादा पीते हैं। बबिता को लगता है कि राजस्थान में बहुत
मानव इतिहास में पहली बार 1819 में जर्मनी के एक शहर प्रूश्या में शुरू की गयी स्कूली व्यवस्था हिन्दुस्तान में आज शायद अपने सबसे बुरे दौर में है। शिक्षा के आदर्श प्रतिमानों में शुमार ये स्कूलें अब बच्चों की खुदकुशी का कारण बनने लगी है जिससे यह पूरा ढांचा
युवाओं में लोक व स्थानीय इतिहास के प्रति चेतना जगाने तथा उन्हें इसके प्रति संवेदनशील बनाने के उद्देष्य से उस्ता बारी के अंदर ‘‘चेंज हाट” में ‘बीकानेर का मौखिक इतिहास’ विषय पर संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। 28 दिसम्बर, रविवार को आयोजित हुए इस संवाद
आज के आधुनिक समाज से हमारी वे सभी कलाएं और कारीगरी धीरे-धीरे लुप्त सी हो गयी है जिसकी बदौलत एक पूरा का पूरा कारीगर समाज और उससे जुड़ी व्यवस्थाएं इस देश की समृद्ध परंपरा का हिस्सा थी। इसके साथ ही खत्म होने लगा हजारों लाखों कारीगरों का वह ज्ञान जो सदियों से
माड कोकिला पद्मश्री अल्लाह जिलाई बाई की 16वीं पुण्यतिथी पर उनकी स्मृति में आयोजित अखिल भारतीय माड समारोह 3 नवंबर, 08 को बीकानेर के टाउन हॉल में संपन्न हुआ। इस त्रि-आयामी कार्यक्रम के अंतिम संस्करण में हर वर्ष आयोजित होने वाली माड गायन प्रतियोगिताओं के
बाजारों में दीपावली की रौनक अपने चरम पर है। बाजार की हर गली नुक्कड़ पर खरीददारों की भीड़ हर साल की तरह इस बार भी लक्ष्मी जी को अपने घर के आंगन तक लाने के लिए या यूं कहें उन्हें रिझाने के सारे साजो सामान को खरीदने में जुटी है। एक तरफ औरतें नये बर्तनों की
तुम्हारी गुनगुनाहट, तुम्हारा नाद और तुम। कितनी चोटें हैं मेरे पास तुम्हारी दी हुई। तंबूरे के एक एक तार के साथ चुभते हो सूल की तरह। और कोई रास्ता ना मिला तो शब्द बनकर आये। मैं अब शांत हूं और चुप भी। कितनी आसानी से कह दिया कि ये देखो ''शब्द की चोट''!! तुम
कबीर एक खोज है एक ऐसी यात्रा जिसका ना कोई पड़ाव और ना कोई मंजिल। मंजिल या तो जाने के लिए होती है या पाने के लिए लेकिन यह तो एक अनजाना सा अनुभव है जिसका होना ही भीतर एक गुदगुदी पैदा करता है। एक ऐसी उर्जा जो अपने भीतर करोड़ों छिद्रों से होती हुई आपको तड़पने
क्या आपको नहीं लगता कि 20 जुलाई, 2005 को मुंबई में 24 घंटों में हुई 37 इंच बारिश, पिछले कुछ वर्षों से लगातार योरोप में चल रही भयंकर गर्म हवाओं से गयी करीब 35 हजार लोगों की जानें, 2005 में भारत में ही रिकॉर्ड किया गया 50 डिग्री सेल्शियस तापमान, अमेरिका के
मैं पिछले महीने लोकभारती, सणोसरा में था। यह गुजरात की वह संस्था है जो आज से करीब 80 वर्ष् पूर्व गांधी जी के उस सपने को लेकर उनके शिष्य नानाभाई भट्ट ने शुरू की जिसका ध्येय गांवों में प्राथमिक शिक्षा और उसके बाद ग्रामीण उच्च शिक्षा को देश में प्रतिष्ठापित