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चेतना के स्वर उजाले की ओर

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08 Mar 2010
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मातृ शक्ति जयते

ग्रामीण विकास का आधार बन रही महिला शक्ति खुद मेहनत-मजदूरी कर बच्चों को शिक्षित करने का सपना साकार कर रही है|पारम्परिक परिधानों में लिपटी, संकुचाती घूंघटधारी ग्रामीण नारी अब गुजरे जमाने की बात हो चुकी है। ग्राम्य संस्कृति से ओत-प्रोत रहे मारवाड़ में कभी
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Mar 08 2010 04:30 PM
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हैप्पी होली हैप्पी होली हैप्पी होली

अल सुबह सूरज ने आँख खोली धरती के माथे कुंकुम  और रोली भँवरे गायें तो कलियाँ भी बोली ब्रज में घूमे रसिओं की टोली अब आपके चेहरे पर भी तो मीठी मुस्कराहट हिल डोली  तो बोलो हैप्पी होली, हैप्पी होली सभी ब्लॉगर बांधवों और पाठकों को होली की
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Feb 28 2010 03:43 PM
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मदन महोत्सव पर भी कुछ लिखो-पढो बंधुओं

अक्सर प्रश्न उठता है कि प्रेम क्या है। आज तक प्रेम की कोई सर्वसम्मतपरिभाषा नहीं निकल पाई। इतना जरूर है कि प्रेम को ढाई अक्षरों का नाम देकर किताबों में समेट कर रखा नहीं जा सकता।जब सोणी ने महिवाल का हाथ थामा होगा अथवा हीर ने रांझे को चाहा होगा, तब कबीर
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Feb 14 2010 07:20 PM
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जग हित शिव का ज़हर पीना जरूरी है

 लोग कहते हैं जिंदगी तो हुई मौत से बदतरजीवन प्रतिमान तय करे वो मीना जरूरी है॥शान ए अमीरी चाहे औरों को नहीं दिखेगर फट जाए कपड़ा तो सीना जरूरी है॥जख्म भले कितने भी दर्दभरे और गहरेजीवन सार है यही कि सीना जरूरी है॥नीन्द चाहिए शाम को चादर तान करके
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Feb 12 2010 06:52 PM
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बायां री बंशी बाजैला, अलगोजो ठण्डो भायां रो...

 जिला परिषद एवं पंचायत समिति चुनाव में महिलाओं का दबदबाबायां री बंशी बाजैला, अलगोजो ठण्डो भायां रो।मोट्यारां नीची मूंछ करो, आयो राज लुगायां रो॥जालोर। पचास प्रतिशत आरक्षण का तोहफा मिलने के बाद इस बार जालोर जिले के पंचायतीराज चुनावों में नारी सशक्त
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Feb 11 2010 11:20 AM
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चाहत...

 सावन की सी बारिशों में नित भीगने की अब चाह कहाँ,पुष्प खिले, धरा फले ओ भीगे कंठ इतना सा तो पानी हो दुनिया जीतने का जज्बा, आसमां चीरने का भी जोश, कहाँ जाता हैं जब नन्ही सी बेटी से हार खानी हो ऑस्कर, बुकर और पुलित्ज़र जैसे तमगे किसे चाहिए,जो सीधे दिल
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Feb 09 2010 08:23 PM
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बस इतनी सी चाहत...

सावन कि सी बारिशों  में नित भीगने की अब चाह कहाँ,पुष्प खिले, धरा फले  ओ भीगे कंठ इतना सा तो पानी हो ||दुनिया जीतने का जज्बा, आसमां चीरने का भी जोश, कहाँ जाता हैं जब नन्ही सी बेटी से हार खानी हो ||ऑस्कर, बुकर और पुलित्ज़र जैसे
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Feb 08 2010 12:40 PM
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अभिलाषा नहीं पुष्प होने की

अभिलाषा नहीं रही पुष्प होने कीचाह होती हैं बस घुटकर रोने की क्यों चढ़ाया ही जाऊं उस शीश परजो सलामी में झुका खोटे सोने कीक्यों जाऊं उन केशों में वेणी बनकरजहाँ बदबू सी हैं परफ्यूम होने की उस शहादत के पथ की भी चाह नहींकोशिश हैं जहाँ स्याही से लहू धोने
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आज के पुष्प की अभिलाषा

अभिलाषा नहीं रही पुष्प होने कीछह होती हैं बस घुटकर रोने की क्यों चढ़ाया ही जाऊं उस शीश परजो सलामी में झुका खोते सोने कीक्यों जाऊं उन केशों में वेणी बनकरजहाँ बदबू सी हैं परफ्यूम होने की उस शहादत के पथ की भी चाह नहींकोशिश हैं जहाँ स्याही से लहू धोने कीघुटता
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Feb 01 2010 04:28 PM
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तेरी कीमत बता गए

हमें सोते हुए से वे कुछ यूँ जगा गए, फूलों ने दिए थे ज़ख्म वे उन पर नमक लगा गए कहते थे बहुत समझदार हैं छुटपन से,बस लाड प्यार में उनके जरा कदम डगमगा गए टूटा कईयों का झूठा यकीं तो कोई बात नहीं,मुझसे लिया था उधर देकर मुझी को दगा गए कहते थे जाने नहीं देंगे
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इस तरह उड़ान भरते हैं हौसले

कभी लोगों से ताने सुनने वाले विकलांग ने दिया मूक-बधिर बच्चों को मजबूत सहारा पैरों और एक आंख से नि:शक्त धन्नाराम पुरोहित के बारे में गांव के लोग कहा करते थे कि यह बेचारा जिन्दगी में क्या कर पाएगा, लेकिन आज उसी धन्नाराम ने सैकड़ों निज्शक्तजनों को धन्य कर
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इस तरह उड़ान भरते हैं हौसले

 कभी लोगों से ताने सुनने वाले विकलांग ने दिया मूक-बधिर बच्चों को मजबूत सहारा  पैरों और एक आंख से नि:शक्त धन्नाराम पुरोहित के बारे में गांव के लोग कहा करते थे कि यह बेचारा जिन्दगी में क्या कर पाएगा, लेकिन आज उसी धन्नाराम ने सैकड़ों निज्शक्तजनों
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Jan 25 2010 02:01 PM
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इस तरह उड़ान भरते हैं हौसले

कभी लोगों से ताने सुनने वाले विकलांग ने दिया मूक-बधिर बच्चों को मजबूत सहारापैरों और एक आंख से नि:शक्त धन्नाराम पुरोहित के बारे में गांव के लोग कहा करते थे कि यह बेचारा जिन्दगी में क्या कर पाएगा, लेकिन आज उसी धन्नाराम ने सैकड़ों निज्शक्तजनों को धन्य कर रखा
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Jan 24 2010 12:12 PM
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माँ शारदे, माँ शारदे, माँ शारदे ...

माँ शारदे, माँ शारदे, माँ शारदे ... नेत्र तुम्हारे मोती जैसे वर्ण तुम्हारा जैसे कंचन मेरी जिह्वा तू विराजे चेतना  दे जीवन तार दे माँ शारदे, माँ शारदे, माँ शारदे ...तेरे सुयश को गा सकूँहर जन्म तुझको पा सकूंपद कमल को नहला सकूँ
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तू कवि है तेरे घाव कैसे भर पाएंगे

तू कवि है तेरे घाव कैसे भर पाएंगेटूटे रिश्ते बिखरे सम्बंध मांग रहे हैं जीवन की परिभाषाउनके आकुल होठ नहीं समझते मेरे नयनों की भाषास्याह रात की खामोश उदासी लगती सदा आंसू झेलती उसकी पीड़ा से छोटा लगता विंध्याचल का आंचल जब भूख देती है दलीलें तो दर्द कैसे समझ
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Jan 18 2010 02:01 PM
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विवेकानंद जयंती

स्वामी जी की वह रचना मुझे बहुत अच्छी लगी जिसमे कहा गया सर्प अपने फन तभी फैलाता है,  जब उसे चोट लगती है।अग्नि तभी धधक कर जलती है जब वह बुझने को होती है।शेर की गर्जना तभी लोगो को कम्पित करती है,जब वह खुले रेगिस्तान में दहाड़ता है।बादलों से बरसात तभी
Jan 11 2010 07:18 PM
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मैं कलम! बस थोड़ा सा जीना चाहती हूं

मैं कलम! बस थोड़ा सा जीना चाहती हूंगहरे है ज़ख्म तनिक सीना चाहती हूंहावी अधिकार, बंटता मजहब मरते लोगगौण कर्तव्य, मौन स्वधर्म, नहीं ईश से योगसब हंसे, सब सुखी वो मीना चाहती हूंमैं कलम...बिकती बहनों, भूखी मांओं, नंगे बच्चों लुटती पांचाली, वधित क्रौंचों को
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नारी विरोधी जिस्मफरोशी

आदरणीया वर्षाजी के ब्लॉग पर लिखा लेख जायज हो जिस्मफरोशी से प्रेरणा ली और लिखने का मानस बनाया। हालांकि एक ऐसा विषय है, जिस पर मैंने पहले कभी विचार नहीं किया। ब्लॉग में शाहिदजी मिर्जा द्वारा लिखी कविता पढ़ी तो वाकई लगा मैं कुछ लिखुं। इसके पीछे प्रेरणास्
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नारी विरोधी है जिस्मफरोशी

आदरणीया वर्षाजी के ब्लॉग पर लिखा लेख जायज हो जिस्मफरोशी से प्रेरणा ली और लिखने का मानस बनाया। हालांकि एक ऐसा विषय है, जिस पर मैंने पहले कभी विचार नहीं किया। ब्लॉग में शाहिदजी मिर्जा द्वारा लिखी कविता पढ़ी तो वाकई लगा मैं कुछ लिखुं। इसके पीछे प्रेरणास्
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मैं आंसू

मैं आंसू हृदय की अंतरतम् विवशता का सत्कार विरह-वेदना का सशक्त हस्ताक्षर साक्षात पीड़ा का अनुभाविक प्रतिनिधि दु:ख और दर्द का मौन साक्षात्कार भावाभिव्यक्ति का मूक माध्यम तो कभी अनिवर्चनीय खुशी का खामोश प्रतिबिम्ब कभी कलेजे तो कभी आंखों से चुपचाप बहता हू
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कुछ निराशावादी लाइनें जिनकी आस नहीं थी...

निराशा (1) खिलना चाहता था कहीं सुदूर व्योम में, बनना चाहता था समिधा किसी होम में। धूप में भी तो कभी नहीं वो हंस पाया हवा ओ अंधेरे ने जो 'प्रदीप' बुझाया।। (2) थरथराता धुआं जब मां मेरी बेरोजगारी पर आंसू बहाया करती है, चुपके से अपनी ही ओढ़नी में आंखें छु
Dec 08 2009 08:00 PM
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पैसे खाए तो जाएंगे जेल

कल के अखबार में सीएम सर का शीर्षक छपा पैसे खाए तो जाएंगे जे एक होटल के बार में बैठे पैसे खाने वालों ने पढ़ा जेल में भेज देंगे तो चले जाएंगे। है तो वहां भी है मौज 'सत्यम्' वाले 'राजू' के लिए जेल में चिकन आ सकता है तो अपन का कुनबा भी दारू मीट मंगवा सकता
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पैसे खाने वालों को जेल

कल के अखबार में सीएम सर का शीर्षक छपा पैसे खाए तो जाएंगे जेल एक होटल के बार में बैठे पैसे खाने वालों ने पढ़ा जेल में भेज देंगे तो चले जाएंगे। क्या कर सकते हैं है तो वहां भी है मौज 'सत्यम्' वाले 'राजू' के लिए जेल में चिकन आ सकता है तो अपन का कुनबा भी द
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मैं आंसू

मैं आंसू हृदय की अंतरतम् विवशता का सत्कार विरह-वेदना का सशक्त हस्ताक्षर साक्षात पीड़ा का अनुभाविक प्रतिनिधि दु:ख और दर्द का मौन साक्षात्कार भावाभिव्यक्ति का मूक माध्यम तो कभी अनिवर्चनीय खुशी का खामोश प्रतिबिम्ब कभी कलेजे तो कभी आंखों से चुपचाप बहता हू
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चेतना के स्वर उजाले की ओर

मैं तुम्हे लफ्ज-लफ्ज पढ़ना चाहता हूं देखना चाहता हूं कि तुम क्या हो चाहता हूं तुम्हें अक्षर-अक्षर समझना तब तुम मुझे मिलती हो गीता के श्लोकों में कुरान की आयातों में बाइबिल की शिक्षाओं में गुरु ग्रंथ के शबदों में तुलसी की चौपाइयों में सूर के छन्दों में
Nov 20 2009 01:20 PM
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"अर्द्धागिनी" या "माया ठगिनी"

जालोर। कुछ पैसों का मोह इन दिनों विवाह के मायने बदल रहा है। बाहर के राज्यों से ब्याहकर आने वाली बहुएं मारवाड़ी दूल्हों को चूना लगा रही हैं। अकेले सांचौर वृत्त में ही पिछले चार दिनों में पीडित पतियों की ओर से तीन मुकदमे दर्ज करवाए गए हैं। "वे" विवाह क
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राम बजावै हाजरी रावण रे दरबार

पिछले साल देश पर कई धमाके हुए। इस साल पाकिस्तान में हो रहे हैं। आखिर धर्म का नाम लेकर किए जा रहे धमाकों की मूल वज़ह क्या है। धमाका होता है। देश हिलता है और हिलकर फिर शांत हो जाता है। धर्म के नाम पर किया जा रहा जेहाद कहां तक ले जाएगा। समझ नहीं आता। कहत
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धैर्य, आयास और समर्पण मांगता है प्रेम

अक्सर प्रश्न उठता है कि प्रेम क्या है। आज तक प्रेम की कोई सर्वसम्मत परिभाषा नहीं निकल पाई। इतना जरूर है कि प्रेम को ढाई अक्षरों का नाम देकर किताबों में समेट कर रखा नहीं जा सकता। जब सोणी ने महिवाल का हाथ थामा होगा अथवा हीर ने रांझे को चाहा होगा, तब कब
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सर्किट हाउस के किचन पर ताला

जालोर। सर्किट हाउस में फर्जीवाड़े के बाद प्रबंधन की हद तो देखिए कि किचन पर ताला लगाकर नोटिस चस्पा कर दिया। पिछले कई सालों से हो रहे खर्च को लेकर जिला कोषाघिकारी ने आपत्ति जताई तो पूरा प्रशासन सर्किट हाउस प्रबंधन की पैरवी में उतर आया। इसी कारण जांच कछ
Oct 27 2009 07:11 PM
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जले दीप खुशहाली के

अकाल का मौसम होने के बावजूद चेहरे पर मुस्कराहट। यही जीवंतता है इस देश की। देशभर में दीपावली का त्योहार मनाया जा रहा है। नन्हे-नन्हे दीपक उजास का संदेश देते हुए तमस से लड़ने का आuान कर रहे हैं। दीपक प्रतीक है जीवंतता का। चैतन्यता का। कैसा जीवंत दर्शन ह
Oct 16 2009 07:45 PM
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भूख के घर दीवाली नहीं मनती है

सीधी रस्सी पर चलती हुई चलते चाकू से टलती हुई नन्हे बदन सहित छोटे से चक्कर में से निकलती हुई उस बच्ची पर नजर टिकी लगी नहीं हुई फिसलती हुई बैठे पिता के आदेश पर खड़ी मां के आवेश पर उसके चंचल पैर बड़े सधे से रस्सी पर चल रहे थे जैसे दो नन्हे सितारे आकाशगंगा
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भूखों के घर दीवाली नहीं मनती है

सीधी रस्सी पर चलती हुई चलते चाकू से टलती हुई नन्हे बदन सहित छोटे से चक्कर में से निकलती हुई उस बच्ची पर नजर टिकी लगी नहीं हुई फिसलती हुई बैठे पिता के आदेश पर खड़ी मां के आवेश पर उसके चंचल पैर बड़े सधे से रस्सी पर चल रहे थे जैसे दो नन्हे सितारे आकाशगंगा
Oct 14 2009 07:56 PM
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ये कदम्ब का पेड़

जब ब्रज की कुंज गलियन में अठखेलियां करने वाला कान्हा कभी कदम्ब की सघन छांव में आंखें बंद करके बांसुरी की तान छेड़ता तो प्रकृति भी समोहित हो उठती थी। कदम्ब  के वृक्ष से कालिया नाग पर छलांग लगाने, गोपियों के व चुराने की घटना हो या सुदामा के
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सर्किट हाउस में फर्जीवाड़ा !

प्रदीपसिंह बीदावत जालोर। महंगाई के दौर में कोई मेहमान दिन में दस किलो अनाज खा जाए तो मेहमान को भगवान का दर्जा देना मुश्किल हो जाएगा। एक मेहमान को दिन में दस किलो भोजन खिलाने का कारनामा जालोर सर्किट हाउस के कार्मिकों ने कर दिखाया है। जिला प्रशासन ने स
Oct 02 2009 03:07 PM
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श्राद्ध की थाली पर महंगाई की मार

प्रदीपसिंह बीदावत एक जमाना था जब श्राद्धपक्ष में पंडितजी के पेट का खास ध्यान रखने के लिए यजमान मालपुए, खीर और हलवे समेत कई मीठे व्यंजन मनोयोग से तैयार करवाते थे। अब स्थिति ऎसी है कि मीठे के नाम पर शक्कर के भाव सुनते ही गुड़ के चूरमे से काम चलाना पड़
Oct 02 2009 03:07 PM
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पंचायती राज में नारी : इधर हारी, उधर भारी

यह नारी है। कहने को तो क्लिष्ट शब्दजाल, सौंदर्य, घुंघरू, पायल, मेहंदी, कुलगौरव, विरह, वेदना, करूणा और भी न जाने अनगिनत संबोधन साहित्यकारों ने इसे दिए। यह कहा जाए कि संसार सागर नारी रूपी नीर के बगैर सूखा है तो गलत नहीं होगा। भारत समेत विभिन्न देशों मे
Oct 02 2009 12:52 PM
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दशानन दहन पर

इंसानों का चेहरा (1) कल था दशानन का दहन लगना था नाभि में तीर अगन उठाए धनुश राम खड़े थे। कमर पर हाथ धरे हनुमान भी अड़े थे। दैत्य मुंह की खाए धरा पर पड़े थे। कुछ ऐसे भी जो इंसानी चेहरा लिए भीड़ में खड़े थे। खुश क्यों आज (2) राम ने जैसे ही नाभिकुण्ड में दागा
Sep 29 2009 05:56 PM
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अखबार

चन्द पन्नों मे सिमटाविस्तृत संसारदैनिक अखबारदुनिया कोदेखने समझने का रास्ता सासुबह का नाश्ता साकभी कड़्वा, कभी कसैलाकभी तीखा-कभी विषैलाहां साहमे हमने इसअखबारी नाश्ते केबहुत स्वाद चखे हैंकुछ भूल गयेकुछ याद रखे हैंआप कहेंगेंना मिर्च ना मासालासफेद कागज़ पर
Sep 25 2009 11:51 AM
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एक चुटकी रेत

सिर्फ़ एक चुटकी रेतउस घर के कच्चे आंगनयाद दिलाती है एक चुटकी रेतजब लिफाफे वाले पत्र को खोलने सेउसके मुहाने पर चिपके गोंदहवा से उड़कर लगेचुटकीभर से कम मिट्टी के बारीक कणों मेंमन खुशबू की टोह लेता है।उस चुटकीभर खुशबू से पूरे मन कोसुगन्धित करने का भाव खोज
टैग: सैनिक
Jun 22 2009 03:39 PM
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देखिए यह रिवाज है

देखिए यह रिवाज हैहमारे गरीब और महान भारत काहैरान मत होइएहमारी भारत सरकार के46 मंत्रालयों के 1576 केंद्रीय अधिकारियों नेविदेशों की यात्रा कर डाली56 लाख 56 हज़ार 246 किलोमीटरअर्थात इतने में आप पृथ्वी से चांद की74 बार यात्रा कर सकते हैयात्रा में खर्च हुए
Jun 22 2009 02:57 PM