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22 Jan 2010
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‘तुम चुप रहो!’

यदि महिला आरक्षण की बात नहीं होती तो उसका नाम कौन लेता?‘‘जठे परधान वणवां वास्ते होड़-होड़ी में आदमियां’रा माथा फूटी जावता, वठे अणी पद ने आरक्षित करी’न सरकार बब्बूड़ी’री तकदीर खोल दीदी’’।झण्डा पार्टी की ओर से बब्बूड़ी को चुनाव टिकट मिला था। वैसे तो बब्बूड़ी
 
Vimla Bhandari
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अंधेरे और उजालो के बीच

दरखतों के बीच सेगुजरता जब कोई परिंदाधूप और बैसाख कीपरवाह किए बिनाहर शाख बुनती तब एक घरौंदादूधिया, धवल याफिर हो सुआपंखीहर रंग में लुभाती जिन्दगीदाना - दाना खानेलिए अधखुली चौंचेहर दम करती मानो बंदगीपीन पंख फड़फड़ाएंउड़ने को जी चाहेहर मंजिल अनजानी, है नई ड
 
Vimla Bhandari
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रोशनी

रोशनीयह एक बेहद ठण्डी सुबह थी। रात भर बरसात की धीमी तेज बौछार चलती रही। रह रहकर हवा के तेज थपेड़े खिड़की के शीशों से टकरा टकराकर उन्हे झंकृत करते रहे। सर्दी में हुए इस मावठ और शीतलहर की ठण्डी हवा ने पूरे वातावरण में ठिठुरन भर दी। आकाश अभी साफतौर से खुल
 
Vimla Bhandari
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रिंगटोन

बेटी का फोन था‘मुझे बचा लो मां’ का रिंगटोन थाकल फिर उन्होंनेमुझे मारा और दुत्कारातुम औरत होतुम्हारी औकात है -पैर की जूतीजूती ही बनी रहोखबरदार!जो सिर उठाने की कोशिश कीतो कुचल दूंगादेखा नहीं क्यातुमने कल का अखबारकल का नहीं तोपरसों का ही देख लोरोज छपती
 
Vimla Bhandari
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Oct 14 2009 08:01 PM
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बूढ़ा जाते है मां बाप

टूटता है जब मनोबल तो घर देता है सम्बल घर में - मां है , बाबूजी है जिनकी छाह तले और भी किले है । नेह के धागों में मन के मनके पिरोकर छककर करता है अमृतपान फिर बढ़ता है -दरखत मनोबल का धीरे-धीरे उन पर चढ़ने लगती है स्वार्थों की फंफूद बरगदसी बाहें फैलाये आका
 
Vimla Bhandari
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कहानी

आरोह - अवरोह मेरी आंखों से झर झर आंसू झर रहे थे। मुझसे उनकी ये हालत देखी नहीं जा रही थी। उन्हें सांस लेने में काफी तकलीफ हो रही थी। फिर उपर से ये खांसी का दौरा, खांसते-खांसते तो मानो प्राण ही निकल जायेंगे। वह बेदम सी हुई जा रही थी। ‘हे भगवान! इन्हें
 
Vimla Bhandari
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दिव्यलोक

दिव्यलोकमेरे पति को ब्रेन ट्यूमर हो गया था। खबर सुन मैं सकते में आ गई। मेरा तो रो रोकर बुरा हाल हो गया। खाना पीना छूटने के साथ हर वक्त की दुश्चिंताओं ने मुझे चिड़चिड़ा बना दिया। ब्रेन ट्यूमर अर्थात सिर के भीतर गांठ। रिपोर्ट देख डॉक्टर बोले- ‘‘इसका तुरंत
 
Vimla Bhandari
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कहानी

http://bal-sahitya.blogspot.com
 
Vimla Bhandari
Sep 07 2009 10:38 PM
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किलर

ट्रेन धीरे धीरे रफ्तार पकड़ने लगी. प्लेटफार्म पीछे छूटने लगा. मैं जो अब तक अपनी सीट पर मुड़ी हुई खिड़की से बाहर झांक रही थी तो घूमकर सीधी हुई. जैसे ही मैं सीधी हुई तो मेरी नजरे सामने बैठे व्यक्ति पर गिरी और मेरी उपर की सांस उपर और नीचे की सांस नीचे रह गई.
 
Vimla Bhandari