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एक प्रयास

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17 Jun 2010
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दिव्य प्रेम

प्रेम प्रतिकार नहीं मांगता तुझसे तेरेहोने का हिसाब  नहीं मांगताप्रेम तो प्रेमी कादीदार भी नहीं मांगताजो रूहबन गया हो जो साँसों में समा गया होजो जिस्म के रोएँ- रोएँ मेंबस गया होफिर दीदार किसका करे और कौन
 
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प्रीत का रंग

प्रीत चदरिया ऐसी ओढ़ी हो गयी मैं बेगानी अपना पता खोजती डोलूंबन के मैं दीवानी बांसुरी की धुन परवन -वन खोजूं बन के मैं मतवालीश्याम प्रीत की ओढनी ओढ़ केहो गयीं मैं अनजानीश्याम के  रंग में ऐसी रंग गयींहो गयी मैं भी कारी श्याम
 
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सखी री मेरे नैना भये चितचोर

सखी री मेरेनैना भये चितचोर श्याम को चाहेंश्याम को निहारें प्रेम सुधा मेंभीग- भीग जावें मुझ  बैरन केहिय को रुलावैं सखी री मेरेनैना भये चितचोरश्याम छवि परबलि -बलि जावेंमधुर स्मित परलाड- लड़ावें मुझ  बेबस की एक ना
 
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श्यामा , अपना मुझे बना लेना

    मैं भूल जाऊँ कान्हा , कुछ गम नहीं    पर तुम ना मुझको भुला देना     श्यामा , अपना मुझे बना लेना१) मैं तेरी जोत जलाऊँ या ना जलाऊँ     पर तुम ना मुझे भुला देना   अपनी दिव्य
 
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मन की थकान

तन की थकान तो उतर भी जाये मन की थकानकहाँ उतारूँकिस पेड़ को साया बनाऊँकिस डाल परझूला डालूँकहाँ मैं यादों का घरौंदा  बनाऊँकौन सा अबफूल खिलाऊँ  किस देहरी पर माथा नवाऊँकिस आँगन कोमैं बुहारूँकिस मकां की दहलीज पर मन
 
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अश्क कैसे बहाऊँ?

तेरी याद मेंजब अश्कों का दरिया बहता थातब अंतस में बैठा तू ही तो तड़पता थाआज तेरा ये अंदाज़ समझ आया है जब मैं और तूदो रहे ही नहीं जब तू ही वजूदमें समाया है हर ओर तेरा हीनूर समाया है जहाँ मेरा "मैं"ना नज़र आता है जब एकत्व
 
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"मोहब्बत " हो गयी

तुझे देखानहीं हुईतुझे पाया नहीं हुईतुझे चाहानहीं हुईमगर जिस दिनतुझे जाना"मोहब्बत "हो गयी
 
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एक सत्य ---------५० वीं पोस्ट

प्यारइश्क मोहब्बतप्रेम सब कर लियामगर फिरभी खुदाना मिला जब खुद कोनेस्तनाबूद किया तब"मैं "ना मिलाबस "खुदा "ही था वहाँ
 
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ओ मेरे प्यारे

सुनो  तुम्हें ढूंढ रही हूँजन्मों से रूह आवाराभटकती फिरती हैइक तेरी खोज मेंऔर तू जो मेरेवजूद का हिस्सा नहींवजूद ही बन गया हैना जाने फिर भीक्यूँ मिलकर भीनहीं मिलतासिर्फ अहसासों मेंमौजूद होने सेक्या होगा अदृश्यता
 
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गीत- गोविन्द

गीत गोविन्द के गाती फिरूँमैं तो तन- मन में गोविन्द झुलाती फिरूँ गली- गली गोविन्द गाती फिरूँमैं तो तेरे ही दर्शन पाती फिरूँअँखियों में गोविन्द सजाती फिरूँहिय की जलन मिटाती फिरूँजन जन में गोविन्द निहारती फिरूँकभी गोपी कभी कृष्ण बनती फिरूँमैं तो
 
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नैनन पड़ गए फीके

सखी री मेरे नैनन पड़ गए फीकेरो-रो धार अँसुवन की छोड़ गयी कितनी लकीरेंआस सूख गयी प्यास सूख गयीसावन -भादों बीते सूखे सखी री मेरेनैनन पड़ गए फीके बिन अँसुवन  के अँखियाँ बरसतीं बिन धागे के माला जपती  हो गए
 
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ये मोड़ किस मोड़ पर ? ..............अंतिम भाग

गतांक से आगे .....................अब निशि मंझधार में फँसी थी जिसका कोई साहिल ना था. अब उसे समझ आ रहा था घर , परिवार , पति , बच्चों का महत्त्व. अब उसे लग रहा था कि वो कैसी झूठी मृगतृष्णा के पीछे भाग रही थी. रंग - रूप , धन -दौलत, ऐशो- आराम कोई मायने नहीं
 
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ये किस मोड़ पर ?.............भाग ४

गतांक से आगे .........................निशि ने राजीव से वादा लिया कि वो उसकी पूरी बात ध्यान से सुनेगा और उसे समझने की कोशिश करेगा , उसके बाद कोई फैसला लेगा और फिर निशि ने दिल पर पत्थर रखकर , अकेलेपन से उपजी त्रासदी की पूरी दास्ताँ राजीव को सुना दी , निशि
 
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ये किस मोड़ पर ?..........भाग ३

गतांक से आगे ...........................अपने हालात के बारे में ना तो निशि किसी से कह सकती थी और ना ही सहन कर पा रही थी. उसे तो यूँ लगा जैसे स्वच्छंद आकाश में विचरण करने वाले पंछी को किसी ने घायल कर दिया हो और वो फ़ड्फ़डाता हुआ जमीन पर आ गिरा हो. धीरे -धीरे
 
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ये किस मोड़ पर ?.............भाग 2

गतांक से आगे ....................निशि उस दिन जैसे ही कंप्यूटर पर चैट करने बैठी तो एक शख्स बार- बार उससे बात करने की कोशिश करने लगा  . निशि के मना करने पर भी वो नही माना तो निशि ने सोचा चलो जब चैट  ही करनी है  तो इससे भी बात कर ही ली जाये
 
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ये किस मोड़ पर ?

निशि की सुन्दरता पर मुग्ध होकर ही तो राजीव और उसके घरवालों ने पहली बार में ही हाँ कह दी थी . दोनों की एक भरपूर , खुशहाल गृहस्थी थी . राजीव का अपना व्यवसाय था और निशि को लाड-प्यार करने वाला परिवार मिला. एक औरत को और क्या चाहिए . प्यार करने वाला पति और साथ
 
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शक्ति का वंदन

शक्ति कापूजन , अर्चन वंदन,श्रृंगारकिया तुमने मगर साथ हीशक्ति काउपहास, परिहासखण्डन, मर्दन ह्रास ,त्रास  और तर्पण भीकिया तुमनेफिर कैसे शक्ति के उपासक बनते होजब शक्ति को हीशक्ति सा ही ना वंदन करते  होपहले
 
वन्दना
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फेरों का फेर

ये फेरे जन्म मरण केलगाये तू जा रहा हैकोल्हू के बैल साचलता ही जा रहा हैकभी उनकी गली के फेरेकभी मंडप के हैं फेरेबस फेरों के फेर मेंफिरता ही जा रहा हैकहीं रुसवाइयों के डेरेकभी डॉक्टर है घेरेकहीं मंदिर के हैं फेरेइन फेरों के फेर मेंफिरता ही जा रहा हैइक पल
 
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श्याम संग खेलें होली

कान्हा ओ कान्हाकहाँ छुपा है श्याम सांवरियाढूँढ रही है राधा बावरियाहोली की धूम मची हैतुझको राधा खोज रही हैअबीर गुलाल लिए खडी हैतेरे लिए ही जोगन बनी हैमाँ के आँचल में छुपा हुआ हैरंगों से क्यूँ डरा हुआ हैएक बार आ जा रे कन्हाईतुझे दिखाएं अपनी रंगनायीसखियाँ
 
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Feb 27 2010 11:18 AM
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ऐसा आखिर कब तक -----------अंतिम भाग

दीप्ति से अलग होने के बाद , उसे किये वादे की लाज रखने और उसके त्याग को सम्पूर्णता प्रदान करने के लिए तथा अपना बेटा होने का कर्त्तव्य पूरा करने के लिए आकाश ने अपनी सभी इच्छाओं की बलि चढाते हुए माता- पिता की पसंद की बहुत ही सुन्दर , रईस खानदान की अपनी ही
 
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Feb 18 2010 10:10 AM
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ऐसा आखिर कब तक ?

गतांक से आगे ..................जैसे ही आकाश ने अपने घर में दीप्ति के बारे में बताया तो उसके माता- पिता बहुत खुश हुए। वो तो कब से इस दिन का इंतज़ार कर रहे थे इसलिए उसी दिन रिश्ता लेकर दीप्ति के घरवालों के पास गए मगर वहाँ जब पता चला कि दीप्ति छोटी जाति की
 
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Feb 17 2010 10:03 AM
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ऐसा आखिर कब तक?

यूँ लगा दहकता अंगारा सीने पर रख दिया हो किसी ने ---------जैसे ही दीप्ति ने आकाश को देखा । ये क्या हाल हो गया था आकाश का ? वो तो ऐसा ना था । आज ५ बरस बाद जब उसने आकाश को देखा तो ज़िन्दगी के बीते लम्हे सामने आ खड़े हुए । दीप्ति ने आकाश को उठाया और अपने साथ
 
वन्दना
Feb 16 2010 11:30 AM
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भाव सुमन

आनन्द ही आनन्द समाया हैसतगुरु तुम्हारे चरणों मेंअनमोल वचन अब पाया हैसतगुरु तुम्हारी वाणी मेंआनन्द ही आनन्द .......................मैं कैसे भुला दूँ नेह तेरातुमने ही मुझे अपनाया हैदुनिया ने मुझे ठुकराया हैसतगुरु ने ज्ञान जगाया हैआनन्द ही आनन्द
 
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मैं तेरी हो जाऊँ

कान्हाप्रेम तेरावासंतिक हो जायेह्रदय- सुमनमेरा खिल जायेप्रेम पुष्पितपल्लवित हो जायेभक्ति की सरसोंमन में लहराएपीत रंगहर अंग समायेजीव ब्रह्मधानी हो जायेद्वि का हरपरदा हट जायेचूनर मेरीश्यामल हो जायेश्याम -श्यामकरते -करते श्यामल -श्यामलमैं हो जाऊंश्याम रस
 
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बेलगाम घोडा

ज़िन्दगी के अस्तबल काबेलगाम घोडातमन्नाओं, आरजूओं ,हसरतों के रथ पररथारूढ़ होपवनवेग सेदौड़ता जाता हैकहीं कोई अंकुश नहीबेपरवाह, लापरवाह वक़्त के सीने परपाँव रखआसमान को छूने कीचाहत मेंबिन पंख उड़ा जाता हैमगर एक दिनपंख कटे पंछी कीमानिन्दयथार्थ के धरातल परजब
 
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खोज अस्तित्व की

अंतस में दबी चिंगारीखुद की पहचानना कर पाने कीविडंबनाह्रदय रसातल में दबेभावपुन्ज घटाटोप अँधेरे की चादरबिखरा -बिखरा अस्तित्वचेतनाशून्य मस्तिष्कअवचेतन मन कीचेतना को खोजता सूक्ष्म शरीरकहो , कब , कैसेपार पायेगामानव ! तू कैसेखुद को जान पायेगाभावनाओं के सागर
 
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कैसे तुम्हें नमन करूँ

कैसे तुम्हारा वंदन करूँ कैसे तुम्हारा अभिनन्दन करूँ किस सूरज की लालिमा से माथे पर तुम्हारे तिलक करूँ किस चन्द्रमा की चांदनी से मन्दिर तेरा आप्लावित करूँ किन तारों की माला गुन्थूं किस इन्द्रधनुषी रंग से श्याम तेरा श्रृंगार करूँ किस ओंकार के नाद से ब्र
 
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श्रीमद्भागवद्गीता से ......................

श्रीमद्भागवद्गीता के ७ वें अध्याय के २४ वें श्लोक की व्याख्या स्वामी रामसुखदास जी ने कुछ इस प्रकार की है जिससे परमात्मा के साकार और निराकार स्वरुप की सार्थकता समझ आती है । श्लोक बुद्धिहीन मनुष्य मेरे सर्वश्रेष्ठ परमभाव को न जानते हुए अव्यक्त (मन - इन
 
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ये कैसी बेबसी?

प्यार, त्याग और समर्पण से घर संसार बनाया जाता है । ये शब्द कूट-कूटकर भर दिए जाते हैं बचपन से ही स्त्री के मन में । राधा भी इन्ही शब्दों और भावनाओं के साथ ज़िन्दगी गुजार रही थी मगर इन शब्दों का खोखलापन उसके ह्रदय को बींध जाता था । सारी ज़िन्दगी उसने इ
 
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यादों के झरोखों से ..............अन्तिम भाग

ज़िन्दगी एक नई दिशा की ओर घूमने लगी ...........अनजाने मोडों से गुजरती न जाने कौन सी राह की ओर ले जा रही थी । रवि और मैं एक बार फिर आपस में कहीं न कहीं टकराने लगे और ज़िन्दगी के इस मोड़ के बारे में सोचने लगे। शायद दोनों को ही अपनी -अपनी गलती का अहसास
 
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यादों के झरोखों से भाग ४ .............................

ज़िन्दगी यूँ ही अपनी रफ़्तार से चल रही थी और हमें भी चलने को मजबूर कर रही थी। आख़िर हमारी ही चुनी हुई तो ज़िन्दगी थी फिर उससे कैसे मुहँ मोड़ सकते थे हम। एक दिन अचानक जब मैं काफ़ी शॉप में बैठी हुयी थी तभी देखा सामने वाली कुर्सी पर रवि आकर बैठा है। उसे द
 
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यादों के झरोखों से भाग ३..........................

रवि और निशा की शायद यही परिणति है ...............मिलकर भी न मिलना। यही तसल्ली दिल को देकर आगे के बारे में सोचना शुरू किया। अब मैं अपने पुराने घावों को भूल एक नए सिरे से आजाद पंछी की भांति जीवन- यापन करने की सोचने लगी। पिता के घर में किसी बात की कमी त
 
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यादों के झरोखे से भाग २ ...................

ज़िन्दगी धीरे- धीरे ढर्रे पर आने लगी । दोनों ही अपनी- अपनी तरफ़ से उस दुखद पल को भुलाने की कोशिश करने लगे मगर कहीं एक चुभन शायद दोनों के ही दिलों में कहीं बहुत गहरे बैठ गई थी। फिर भी दोनों ज़िन्दगी जीने की कोशिश में लग गए थे। आत्मग्लानि की वजह से रवि
 
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यादों के झरोखों से ..................

आज भी याद है वो शाम जब अचानक तुम उस मन्दिर में मुझसे टकराए थे और मेरी पूजा की थाली गिर गई थी । कितने शर्मिंदा हुए थे तुम और फिर एक नई पूजा की थाली लाकर मुझे दी थी। भगवान के आँगन में हमारी मुलाक़ात शायद उसका एक इशारा था। उसी की इच्छा थी की हम उस पवित्र
 
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श्रीमद्भागवद्गीता से .........................

श्रीमद्भागवद्गीता के १२ वे अध्याय के १५ वे श्लोक की बहुत ही सुंदर व्याख्या स्वामी रामसुखदास जी ने की है कि भक्त कैसा होता है और कैसा भक्त भगवान को प्रिय है। श्लोक जिससे किसी प्राणी को उद्वेग नही होता और जिसको ख़ुद भी किसी प्राणी से उद्वेग नही होता तथ
 
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श्रीमद्भागवद्गीता से ....................

श्रीमद्भागवद्गीता के सातवें अध्याय के २३ वे श्लोक की व्याख्या स्वामी रामसुखदास जी ने कुछ इस प्रकार की है............... श्लोक परन्तु उन अल्पबुद्धि वाले मनुष्यों को उन देवताओं की आराधना का फल अन्तवाला(नाशवान) ही मिलता है । देवताओं का पूजन करने वाले दे
 
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श्रीमद्भागवद्गीता से .......................

श्रीमद्भागवद्गीता के सातवें अध्याय के २२ वें श्लोक में भगवान् देवताओं की उपासना के बारे में समझाते हैं और इसका बहुत ही सुंदर वर्णन स्वामी रामसुखदास जी ने इस प्रकार किया है ---------- श्लोक उस (मेरे द्वारा दृढ़ की हुई ) श्रद्धा से युक्त होकर वह मनुष्य
 
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श्रीमद्भागवद्गीता से ...............

श्रीमद्भागवद्गीता के सातवें अध्याय के २१ वें श्लोक में भगवान प्रत्येक देवता के प्रति श्रद्धा का बखान कर रहे हैं। स्वामी रामसुखदास जी ने इसकी बहुत ही सुंदर व्याख्या की है । श्लोक जो- भक्त जिस -जिस देवता का श्रद्धा पूर्वक पूजन करना चाहता है ,उस- उस देव
 
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श्रीमद भगवद्गीता से ...............

श्रीमद भगवद्गीता के सातवें अध्याय का ४० वां श्लोक आज के सन्दर्भ में कितना सटीक है । आज इसका थोड़ा सा वर्णन लिख रही हूँ जो स्वामी रामसुखदास जी ने किया है । श्लोक श्री भगवन बोले -----हे पृथानन्दन !उसका ने तो इस लोक में और न परलोक में ही विनाश होता है क्
 
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अमर प्रेम -----------अन्तिम भाग

गतांक से आगे ......................... अब अर्चना गहन अंधकार और निराशा में डूबती चली गई और दिन पर दिन खामोश होती चली गई । उसके जीने की इच्छा ही जैसे खत्म होती चली गई । धीरे- धीरे उसकी सेहत गिरने लगी । समीर डॉक्टर को दिखाता , एक से बढ़कर एक इलाज कराता
 
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