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नयी प्रविष्टी लिखी
15 Jun 2010
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गीत / हर घर में हो एक गाय और गाँव-गाँव गौशाला ...

गाय... कहने को मनुष्येतर जीव है. लेकिन देखा जाये तो वह अपनी माँ से बढ़कर है. माँ का दूध हम दो साल तक पीते हैं लेकिन गाय कादूध जीवन भर. गाय से बनी चीज़ें भी हमारे साथ जीबव भी चलती है,. दही, मठा, छाछ, खीर, मलाई, रसगुल्ला. गुलाब जामुन, आदि न जाने कितनी चीज़े
 
girish pankaj
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अभियान-गीत/ मेरी जात है हिन्दुस्तानी,

इस वक़्त देश में जातीय आधारित जनगणना को लेकर खूब चर्चा हो रही है. मैंने अपने एक लेख में पिछले दिनों लिखा था-''जाति न पूछो साधु की''. कबीर छः सौ साल पहले कह गए है. मैंने भी तीन दशक पहले -जब होश संभल रहा था, अपनी जाति विलोपित कर दी थी. मुझे भी लगता है, कि
 
girish pankaj
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ग़ज़ल/ मै उजियारा बाँट रहा था मगर हवा को रास न आया

मै उजियारा बाँट रहा था मगर हवा को रास न आया उसने आँधी को भेजा और मेरा जलता दीप बुझायाएक दीप बुझ जाने पर भी हार नहीं मानी मैंने फिर से दीप जलाकर मैंने बस आँधी को सबक
 
girish pankaj
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भूल गया सारी कडुवाहट इतना ज्यादा प्यार मिला

नई ग़ज़ल..ग़ज़ल के हर शेर अपनी बात खुद बयाँ  कर देते है. इसलिए उनके लिए कुछ लिखना ठीक नहीं, इसलिए बिना किसी लम्बी व्याख्या के, पेश है मेरी नई ग़ज़ल...जितना मुझको मिला सच कहूँ जी भरकर उपहार मिलाभूल गया सारी कडुवाहट इतना ज्यादा प्यार मिलाजैसा दोगे इस दुनिया
 
girish pankaj
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हिंसा की देवी,तुम सुन रही हो न..?

दो नई कविताएँ (१)हिंसा की देवी, तुम सुन रही हो न..?  हिंसा की देवी, तुम सुन रही हो न..? जब तुम अपने कोमल होंठों से गाती हो हिंसा के गीत तब लगता है, एक सुन्दर फूलकाँटों के साथ मिल कर अपने ही फूलो के जिस्मो को छलनी कर रहा है.ओ
 
girish pankaj
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गीत/ पापी है वह गौपालक तो, जिसकी गैया हुई हलाल.

कल रात नाली में गिरकर एक गर्भवती गाय की जान चली गयी. मै अपने आँसूं नहीं दिखा सकता लेकिन इस घटना ने मुझे कितना दुःख दिया, वह मेरी आहत-भावना को देख कर समझ सकते है. अब तक उबर नहीं पाया हूँ इससे. कल बेटे साहित्य ने आकर बताया कि घुप्प अँधेरे के कारण एक गाय
 
girish pankaj
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ग़ज़ल/ सच कहना दुश्वार हुआ है...

सच कहना दुश्वार हुआ हैखुलकर अत्याचार हुआ हैबड़े-बड़े भी मात खा गए छिपकर जब भी वार हुआ हैझूठ बिका है सबसे ज्यादा अच्छा कारोबार हुआ है टूट गया हर सुन्दर सपना ऐसा बारम्बार हुआ हैहार नहीं मानी जिद्दी नेसपना तब साकार हुआ हैखून-खराबा सहज हो
 
girish pankaj
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एक जून ...दो ग़ज़ले...

एक जून... सुधी पाठक अनुमान लगा सकें तो लगा लें, मगर मैं बताऊंगा नही, कि आज के दिन क्या हुआ था. बस इतना ही कहूंगा कि, ज़िंदगी की राह पर अच्छा-खासा अकेला चला जा रहा था, कि कोई और साथ आ गया और बोला, ''अकेले-अकेले कहाँ जा रहे हो/ हमें साथ ले लो, जहाँ जा रहे
 
girish pankaj
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कानपुर के अभिषेक को समर्पित एक गीत

आज एक समाचार पढ़ा कि जूता पालिश करने वाले पिता के मेहनतकश बेटे ने लालटेन की रौशनी में पढ़ाई करके 'आईआईटी'की परीक्षा पास की.पिछले दिनों एक और खबर आई थी, कि एक मजदूर का लड़का कलेक्टर बन गया.समय-समय पर इस तरह की प्रेरक खबरे उन बच्चों का हौसला बढ़ाती है
 
girish pankaj
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गीत./नून, तेल, लकड़ी के पीछे....

अपनी सबसे लम्बी ग़ज़ल के बाद अब मै गीत विधा की ओर लौट रहा हूँ. गीत, नवगीत, ग़ज़ल, दोहे, नई कविता, बाल कविता, व्यंग्य, कहानी, लघुकथा, लेख ....जब जैसा मन हो जाये लिखना चाहिए.सृजन अपना आकार खुद-ब-खुद ले लेता है. मन अपनी विधा खुद चुन लेता है. अब एक गीत...सुधी
 
girish pankaj
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''अब तक की सबसे लम्बी ग़ज़ल''..

जी हाँ, मेरे द्वारा कही गयी अब तक की सबसे लम्बी ग़ज़ल.. इससे भी लम्बी ग़ज़ल किसी न किसी ने ज़रूर कही होगी. उसकी मुझे जानकारी नहीं है.न में कोई कीर्तमान ही रचने का दावा कर रहा हूँ. मैं तो केवल अपना एक सुख आप तक पहुँचना चाहता हूँ. .कभी-कभी कोई सुखद संयोग बन
 
girish pankaj
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नई ग़ज़ल/ आंकड़ों में मुल्क ये खुशहाल लगता है

आंकड़ों में मुल्क ये खुशहाल लगता है   पर हकीकत में बहुत कंगाल लगता है अब यहाँ आलोचनाएँ कौन सुनता हैसच तनिक-सा बोलिए मुंह लाल लगता है  झूठ की बुनियाद पर हैं कुरसियों के घर सत्य बेचारा बड़ा बदहाल लगता हैप्यार से जो बोलता है वह बड़ा
 
girish pankaj
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सुन्दर-प्यारे बस्तर में ये हिंसा भरे नज़ारे कब तक ..?

बस्तर में आज फिर नक्सलियों ने खूनी इतिहास लिखा. ३० से ज्यादा लोग एक धमाके में ही कल-कवलित हो गए. समझ में नहीं आता कि क्रांति की किस किताब में यह लिखा गया है, कि लोगों की जानें लो, तभी इन्कलाब आयेगा. यह बड़ा भ्रम है. जैसे कुछ लोग देवी को प्रसन्न करने के
 
girish pankaj
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अगर बचाना है भारत को, गऊ को आज बचाएं हम

एक लेखक के नाते समजिक सरोकारों से जुडा रहता हूँ. सामाजिक मोर्चे पर लेखक को एक नागरिक की तरह तैनात रहना चाहिए. लेकिन कुछ लोग केवल लेखन तक सीमित रहते है. मै विनम्रतापूर्वक उससे भी आगे बढ़कर समाज के लिए कुछ करना चाहता हूँ. वैसे घोर नास्तिक हूँ, फिर भी
 
girish pankaj
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ग़ज़ल/ 'अहम्' क्या है वो हमारे अंत की शुरुआत है

'अहम्' का अर्थ होता है-''मै'' और ''अहंकार''. इस शब्द का उपयोग हम लोग करते ही रहते है, जैसे,''उसमे तो आजकल बहुत अहम् आ गया है''. यानी घमंड आ गया है. पिछले दिनों फेसबुक पर किसी मित्र ने ''ईगो'' उर्फ़ अहम् पर चर्चा छेड़ी. 'ईगो' में जीने वाले अंततः पछताते है.
 
girish pankaj
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नयी कविता/ लोकतंत्र की खुशहाली और शांति के लिए

इधर हमारी सरकार ने लोकतंत्र की खुशहाली और शांति के कुछ फार्मूलेजनहित में कर दिए हैं जारीअनुरोध है देश की जनता से कि वह जनता द्वारा ही चुनी गयीलोकप्रिय सरकार की बात मानकर लोकतंत्र के हाथ मजबूत करे.सबसे पहले तो जनता एक बड़ा काम यह करे किनेता-अफसरों के घरों
 
girish pankaj
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माँ दिवस नहीं, ''माँ-शताब्दी'' मनाना होगा

आज हमारी चार माताएं सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं. जन्म देनेवाली माता के साथ ही भारत माता, गंगा माता और गौ माता. सबकी दशा ख़राब है. इन सबके लिए अब एक दिन नहीं,पूरी ''माँ-शताब्दी'' मनाने की ज़रुरत है.लेकिन ऐसा होगा नहीं, क्योकि बहुत से तथाकथित आधुनिक कहेंगे इन
 
girish pankaj
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जब्बार ढाकवाला को याद करते हुए एक ग़ज़ल ..

मेरे बेहद आत्मीय मित्र-लेखक जब्बार ढाकवाला और उनकी पत्नी ''तरन्नुम'' का चंबा के पास एक हादसे में कल ७ मई को निधन हो गया. उस भयानक हादसे की कल्पना कीजिये, कि उनकी कार पांच सौ मीटर गहरी खाई में जा गिरी. पल भर में जीवन का खेल ख़त्म....ढाकवाला जी के पर्स से
 
girish pankaj
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स्वारथ जब दिमाग पर छाया रिश्ते टूट गए...

इस क्रूर समय में अच्छे लोगों का जीना कठिन हो गया है, बाहर की क्या बात करुँ , अब तो घर-घर में नफ़रत और अलगाव का मंज़र नज़र आने लगे हैं. दुःख होता है देख कर, जब एक भाई दूसरे भाई की जान लेने पर आमादा हो जाता है,क्योंकि उसे संपत्ति में बंटवारा चाहिए. यह दौलत
 
girish pankaj
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अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है,

बस्तर अशांत है, हिंसा का खेल खेलने वाले नक्सलियों के कारण. नक्सली विकास की बात करते है और हमेशा विनाश के दृश्य उपस्थित करते है. अरुंधती राय जैसी लेखिकाएं और कुछ छद्म बुद्धिजीवी नक्सलियों को महिमामंडित करते रहते है, जबकि नक्सलियों की हरकतें केवल निंदनीय
 
girish pankaj
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ग़ज़ल/ कोई तकरार लिखता है कोई इनकार लिखता है...

आज सिर्फ एक ग़ज़ल, बिना किसी टिप्पणी के.....कोई तकरार लिक्खे है कोई इनकार लिखता हैहमारा मन बड़ा पागल हमेशा प्यार लिखता है वो अपनी खोल में खुश हैं कभी बाहर नहीं आतेमगर ये बावरा दुनिया, जगत, व्यवहार लिखता हैअगर हारे नहीं टूटे नहीं तो देख लेना
 
girish pankaj
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दो ग़ज़लें / काले धंधे में डूबा है.... जितना सुख हिस्से में आया..

मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है,यह देख कर कि, कुछ लोग मुझसे जुड़ते जा रहे है. ये ''गिव एंड टेक'' वाले नहीं हैं. ये सब दिल से जुड़ रहे हैं. ये भले लोग है. इनमे विवेक है. भले-बुरे की समझ है. यही चाहता रहा हूँ कि मुझे कम लोग ही मिलें मगर वे सज्जन हों, उनका मन
 
girish pankaj
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ग़ज़ल/ लेकिन 'सदा' सुनायी दे.

ग़ज़ल के हर शेर अपनी बात कहते हैं, इसलिए आज कुछ न कहते हुए पेश है मेरी बिल्कुल ही नई ग़ज़ल...मेरे बेहद अन्तरंग हो चुके सुधी पाठको एवं चिट्ठाकारों के लिए.... -------------------कितनी दूर चला आया हूँ लेकिन सदा सुनाई दे.आँखें जब भी बंद करुँ तो चेहरा एक
 
girish pankaj
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मई दिवस पर विशेष ग़ज़ल/ मेहनत और पसीना...

एक मई.... मजदूर दिवस. श्रम की आराधना का दिन. पूजा का दिन. मै दो बार रायपुर श्रमजीवी पत्रकार संघ का अध्यक्ष रहा .अविभाजित मध्यप्रदेश में प्रांतीय महासचिव भी रहा. मैंने श्रमजीवी पत्रकारों के लिए लगातार संघर्ष किया. खतरे उठा कर अनेक आन्दोलन किये. उस वक्त के
 
girish pankaj
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दो ग़ज़लें / इतना अधिक ज़हर मत घोलो,, पाँच सितारा होटल में...

अपना देश जब आजाद हुआ तो एक उम्मीद जगी थी, कि अब नया भारत बनेगा. हम स्वतन्त्र हो कर अपना विकास कर सकेंगे. हमारा 'शासन' होगा. 'लोक' का ही 'तंत्र' होगा. हमारे जनप्रतिनिधि ईमानदारी से काम करेंगे और देश कहाँ से कहाँ पहुँच जाएगा.लेकिन आज हालत क्या हैं? जो
 
girish pankaj
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ग़ज़ल/ कोई हमको भुला देता ...

नहीं रहते कभी तन्हा नए रिश्ते बनाते हैं.कोई हमको भुला देता किसी को हम भुलाते हैंअनोखी ज़िन्दगी है ये यहाँ पल-पल नए चेहरे कोई तस्वीर मिट जाती किसी को हम मिटाते हैंवो जिनका नाम लेके हम चले थे हमसफ़र बनके अचानक राह में क्यों एक दिन वो छोड़ जाते
 
girish pankaj
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रचने वाले ही बच जाते है मरने के बाद...चिड़िया, तुम कहाँ हो...?

एक दिन जब हम नहीं रहेंगे तब हरे-भरे पेड़ बन कर लोगों को छाँव दे रहे होंगे या फिर फूल बन कर बगरा रहे होंगे खुशबुएँ चारों ओर पेड़ न लगाया होगा तो किसी प्यासे को पिलाया होगा पानीभूखे को कभी दिल से परोसा होगा खानातब हम उसके दिल में रहेंगे
 
girish pankaj
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ग़ज़ल/ तुम तो केवल इन आँखों को कहने दो

पृथ्वी दिवस के बाद कल विश्व पुस्तक दिवस भी निकल गया. उस अवसर पर कुछ पोस्ट करना चाहता था, लेकिन कर नहीं पाया. पुस्तक के महत्त्व पर कभी पच्चीस दोहे लिखे थे, उन्हें फिर कभी दूंगा, फिलहाल तो आज एक ग़ज़ल पेश है. शायद.. कुछ लोगों को पसंद आ जाये. क्यों
 
girish pankaj
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पृथ्वी...गीत, कविता, ग़ज़ल...

आज पृथ्वी दिवस है. इस वक़्त पृथ्वी ही हमारी चिंता के केंद्र में होनी चाहिए, वरना हम सबकी हालत चिंतनीय हो जायेगी. हम लोग तो पृथ्वी को बर्बाद करके चले जायेंगे, मगर सोचिये, आने वाली पीढी को कितना कुछ झेलना पडेगा. हम लोगों ने तो अभी से झेलना शुरू कर दिया है.
 
girish pankaj
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Apr 22 2010 12:45 PM
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और क्या देंगे सभी को हौसला देते रहें ...

पांच-छः दिन बाद प्रवास से लौट कर फिर शुभचिंतको के सामने हूँ. होशंगाबाद गया था. वहां पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रकारिता पर बोलना था. खैर, जो सूझा, वो बोल दिया. यह कोई बड़ी बात नहीं, जो मै बताऊँ. बड़ी उपलब्धि तो यह रही कि माँ नर्मदा की गोद में अठखेलियाँ
 
girish pankaj
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जय-जय, जय हे पंथ खालसा....

तेरह अप्रैल १९१९. हम भारतीय कभी भी भूल नहीं सकते इस मनहूस तारीख को, जब अमृतसर के जलियावालाबाग में क्रूर जनरल डायर ने सैकड़ों भारतीयों को गोलियों से भून दिया था. उस पर लिखना शुरू करूंगा तो लंबा इतिहास हो जायेगा. इस डायर को ब्रिटिश मीडिया ने, वहां के लोगों
 
girish pankaj
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ग़ज़ल / जब भी आए गंदे लोग ....

ग़ज़ल या शेर के पहले उसके बारे में कुछ लिखना औचित्यहीन होता है, क्योंकि ग़ज़ल का हर शेर अपना अर्थ खुद अभिव्यक्त कर देता है. फिर भी यह ब्लाग है, न इसलिए लगता है कि कुछ गुफ्तगू हो जाए. ललित शर्मा के मन को-पता नहीं किस बात से- ठेस लगी और उन्होंने भरी जवानी में
 
girish pankaj
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एक मार्मिक अपील ललित शर्मा से...

मैं ये क्या देख-सुन रहा हूँ ललित..?  कई बार तुम मज़ाक करते हो, इसलिए समझ में नहीं आ रहा कि तुम इस बार मज़ाक कर रहे हो या गंभीर हो.. तुम्हारे जैसा जिंदादिल और भविष्य का प्रतिभाशाली ब्लागर अगर ब्लागिंग को अलविदा कह देगा तो यहाँ बचेगा ही क्या..?
 
girish pankaj
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ग़ज़ल / आज खिला है फूल डाल पर....

बस्तर में नक्सलियों ने विचारधारा के नाम पर जो खूनी खेल खेला, उस पर और कुछ लिखने से कोई फायदा नहीं, फिर भी अन्याय के खिलाफ बार-बार कुछ कहना, लिखना, सड़कों पर उतरना..यह सब ज़रूरी है. यह देख कर लगता है, कि हम मुर्दे नहीं हुये है. रायपुर में आज कुछ लोगों ने
 
गिरीश पंकज
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हत्यारों को पहचान पाना अब बड़ा मुश्किल है.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों की हिंसा के कारण ७८ से ज़्यादा लोगों की जानें चली गयी. बेशक नक्सली अपनी सफलता का जश्न मना रहे होंगे. लेकिन मानवता खून के आँसू रो रही है. लोग सवाल कर रहे है कि यह कैसा नक्सलवाद है..? यह कैसी विचारधारा है..? ये कैसा माओवाद है
 
गिरीश पंकज
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जननायक स्वर्गीय रामकुमार अग्रवाल जी को समर्पित

रामकुमार अग्रवाल जी को बहुत से लोग शायद न जानते हो. श्री अग्रवाल रायगढ़ में रहते थे.पिछले दिनो उनका निधन हो गया वे.८३ वर्ष के थे. यह तो उनका सामान्य परिचय है. असली परिचय यह है कि समाजवादी सोच से संपृक्त जननायक श्री अग्रवाल रायगढ़ की अस्मिता के प्रतीक थे.
 
गिरीश पंकज
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कहने को आज़ाद हो गए किन्तु..

पिछले दिनों केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने हिम्मत का काम किया और पूरे देश को विचार के लिए एक रास्ता भी दिखा दिया. उन्होंने भोपाल के एक दीक्षांत समारोह के दौरान अपना गाउन को उतार फेंका और दो टूक कहा कि ''यह औपनिवेशवाद का प्रतीक है. हमें इससे मुक्त होने की
 
गिरीश पंकज
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जो गिर कर के संभालता है ...

साहित्यिक यात्राओं का अपना सुख है. कुछ नए साथियों से मुलाकातें हो जाती है. मित्र-सम्पदा बढ़ती है. ज्ञान बढ़ता है. दौलत काम नहीं आती लेकिन मित्ररूपी दौलत आपको सदा समृद्ध रखती है. इसलिए जैसे ही कही से बुलावा आता है तो मन नहीं मानता, निकल पड़ता हूँ प्रवास
 
गिरीश पंकज
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शक्तिस्वरूपा सुन्दर लड़की, क्या पता था दुःख गहन आ जाएगा....

बहुत दिनों से मैंने अपनी ग़ज़ले नहीं दीं, सो इस बार दो ताज़ा ग़ज़ले. नवरात्र के अवसर पर स्त्रीशक्ति की पूजा की जाती है इसलिए पहले लड़की पर केन्द्रित एक ग़ज़ल,(१)शक्तिस्वरूपा सुन्दर लड़कीउड़ती है बांधे 'पर' लड़कीअपनी ही धुन में चलती हैहो धरती या अम्बर
 
गिरीश पंकज
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तेईस मार्च आता है अनगिनत सवालों के साथ

''सबसे  खतरनाक होता है हमारे सपनो का मर जाना...' पंजाब के क्रांतिकारी कवि पाश की ये काव्य-पंक्ति आज याद आ गयी. २३ मार्च को उनकी हत्या कर दी गयी थी. शायद इसलिए कि यही वह दिन है जब महान क्रांतिकारी भगत सिंग, सुखदेव एवं राजगुरू को भी फांसी पर लटकाया
 
गिरीश पंकज