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मेरी ग़ज़लें, मेरे गीत/प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

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06 Jun 2010
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कौन जिन्दा है कब तलक जाने

आज एक अरसे बाद मैं फिर लौटा हूँ ब्लाग की दुनिया में......है न....! जब मैं वाराणसी से बाहर था तो मेरे कार्यक्षेत्र के एक पुराने एडवोकेट इस दुनिया को छोड़ गये । इसी परिस्थिति में पूर्व की लिखी गयी मुझे अपनी कुछ पंक्तियाँ याद आ गयीं जो मैं आप से जरूर बांटना
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ग़ज़ल/जब भी मन विचलित होता है

जब भी मन विचलित होता है।भावों से सिंचित होता है।झूठ कहीं पर छिप जाता है,जब भी सच मुखरित होता है।कुछ भी अच्छा काम करूँ तो,क्यों अक्सर बाधित होता है।बीती बातें याद करूँ जब,हर छण ज्यूं चित्रित होता है।सच्चे मन से काम करो तो,मिलता जो इच्छित होता है।धारावाहिक
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गीत/भूलने वाले मुझे याद कर

भूलने वाले मुझे याद कर,भूलने वाले मुझे याद आ। आ खयालों में मेरे तू आ,मुझको अपने खयालों में ला। ये तनहाई है मेरी दुश्मन, ये तो तुमको भी सताती होगी; मैं इधर जब तड़पता हूँ इतना,ये तुम्हें भी तड़पाती होगी; पास आ तू मेरे पास आ,और तनहाइयों को भगा........ अ
Dec 29 2009 11:53 AM
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ग़ज़ल/आप दिल की जुबां समझते हैं

आप दिल की जुबां समझते हैं। फिर भी अनजान बन के रहते हैं। खूब मालूम आप को ये है, हम यहाँ किससे प्यार करते हैं। है ये दस्तूर ले के देने का, दिल मेरा ले के अब मुकरते हैं। मुझको मालूम है अकेले में, आप मेरे लिए सुबकते हैं। हर हसीं को गुमा ये होता है, लोग स
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बडी़ मुश्किल है बोलो क्या बताएं

एक नई ग़ज़ल ["मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन"पर आधारित] प्रस्तुत कर रहा हूँ... बडी़ मुश्किल है बोलो क्या बताएं । न पूछो कैसे हम जीवन बिताएं। अदाकारी हमें आती नही है , ग़मों में कैसे अब हम मुस्कुराएं। अँधेरा ऐसा है दिखता नही कुछ , चिरागों को जलाएं या बुझाएं। फ़
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दूर रहकर भी मेरे पास हो तुम

दूर रहकर भी मेरे पास हो तुम। जिसको ढूंढू वही तलाश हो तुम। प्यार जो पहली-पहली बार हुआ, मेरे उस प्यार का अह्सास हो तुम। इस जहाँ में बहुत से चेहरे हैं, इन सभी में बहुत ही खास हो तुम। तेरा-मेरा मिलन तो फिर होगा, ऐ मेरे यार क्यों उदास हो तुम। तुमसे ही मेर
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ग़ज़ल/प्रसन्न वदन चतुर्वेदी/पास आओ तो बात बन जाए

कई दिनों बाद इस ब्लाग पर कोई रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।देर की वजह कुछ तो " समकालीन ग़ज़ल [पत्रिका] "," बनारस के कवि/शायर " में व्यस्तता थी ; कुछ मौसम का भी असर था।दरअसल गर्म मौसम में नेट पर बैठने का मन नहीं करता ; परन्तु अब नई रचनाएँ पोस्ट कर रहा हूँ ,
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गीत/प्रसन्न वदन चतुर्वेदी/हर रोज़ कुआँ खोदना

हर रोज़ कुआँ खोदना फ़िर प्यास बुझाना , ये ज़िन्दगी है ज़िन्दगी या एक सजा है। जाना जहाँ से फिर वही वापस भी लौटना , ये ज़िन्दगी है ज़िन्दगी या एक सजा है। ज्यूं हर खुशी के घर का पता भूल गया हूँ , मैं मुद्दतों से खुल के हंसना भूल गया हूँ , रोना , तरसना छोटी -
Dec 29 2009 11:53 AM
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तीन ग़ज़लें /प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

आज की ग़ज़ल" में द्विजेन्द्र ’द्विज’ की एक ग़ज़ल की पंक्ति-"सात समन्दर पार का सपना सपना ही रह जाता है" पर आधारित ग़ज़ल लिखने की प्रतियोगिता हो रही है,मैं उसी बहर में उसी ग़ज़ल पर आधारित ये तीन ग़ज़लें प्रस्तुत कर रहा हूँ ,ये ग़ज़लें कैसी हैं ये आपको तय करन
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ग़ज़ल/तेरी नाराज़गी का क्या कहना

तेरी नाराज़गी का क्या कहना । अपनी दीवानगी का क्या कहना । कट रही है तुझे मनाने में, मेरी इस जिंदगी का क्या कहना । तेरी गलियों की खाक छान रहा, मेरी आवारगी का क्या कहना । तेरी मुस्कान से भरी महफ़िल, मेरी वीरानगी का क्या कहना । जान पर मेरे बन गई लेकिन, ते
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ग़ज़ल /बात करते हैं हम मुहब्बत की

बात करते हैं हम मुहब्बत की,और हम नफ़रतों में जीते हैं । खामियाँ गैर की बताते हैं ,खुद बुरी आदतों में जीते हैं । सबको आगे आगे जाना है,तेज रफ़्तार जिन्दगी की हुई; भागते दौड़ते जमाने में, हम बडी़ फ़ुरसतों में जीते हैं । आज तो ग़म है बेबसी भी है,जिन्दगी कट र
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ग़ज़ल/मुझे तनहाइयां भाती नहीं है

मुझे तनहाइयां भाती नहीं हैं। मैं तन्हा हूँ तू क्यों आती नहीं है। तुझे ना देख लें जबतक ये नज़रें, सुकूं पल भर भी ये पाती नहीं है। गये हो दूर तुम जबसे यहाँ से, बहारें भी यहाँ आती नहीं है। तराने गूंजते थे कल तुम्हारे, वहाँ कोयल भी अब गाती नहीं है। तुझे अ
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ग़ज़ल/मंजिल को पाने की खातिर

मंजिल को पाने की खातिर , कोई राह बनानी होगी । दूर अंधेरे को करने को , कोई शमा जलानी होगी । अंगारों पर चलना होगा , काँटों पर सोना होगा ; कितने ख्वाब तोड़ने होंगे , कितनी चाह मिटानी होगी । बस दो ही तो राहें अपने , इस जीवन में होती हैं ; अच्छी राह चुनो
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बनारस में एक कवि गोष्ठी

दिनांक 20-08-09 को वाराणसी में नई दिल्ली से पधारे श्री अमित दहिया ‘ बादशाह ’, कुलदीप खन्ना , सुश्री शिखा खन्ना , विकास आदि की उपस्थिति में श्री उमाशंकर चतुर्वेदी ‘ कंचन ’ के निवास स्थान पर एक काव्य - गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें इनके और मेरे अतिरिक्त द
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ग़ज़ल/है कठिन इस जिंदगी के हादसों को

है कठिन इस जिंदगी के हादसों को रोकना । मुस्कराहट रोकना या आसुओं को रोकना । वक्त कैसा आएगा आगे न जाने ये कोई , इसलिए मुश्किल है शायद मुश्किलों को रोकना । मंजिलों की ओर जाने के लिए हैं रास्ते, इसलिए मुमकिन नहीं है रास्तों को रोकना । इनको होना था तभी तो
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भजन/प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर मैं अपना लिखा एक भजन प्रस्तुत कर रहा हूँ..... दर्शन दो प्रभु कबसे खडे़ हैं। हम भारी विपदा में पडे़ हैं। कोई नहीं प्रभु-सा रखवाला, मेरे कष्ट मिटाने वाला, जीवन में कर दीजै उजाला; आप दयालू नाथ बडे़ हैं....... झूठी
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गीत/मुझे याद आ रहे हैं,वो ज़िन्दगी के दिन

आज मैं एक ऐसा गीत यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ जो कई मायनों में एकदम अलग है।इस गीत की खा़सियत यह है कि पूरे जीवन का वर्णन एक गीत में ही हो जाता है।है न अनोखी बात ! मुझे यकीन है कि आप को मेरा यह गीत जरूर पसन्द आयेगा क्योंकि यह आप के जीवन की कहानी भी तो बय
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ग़ज़ल/चाहे जितना कष्ट उठा ले

आज अपनी एक ऐसी रचना यहाँ दे रहा हूँ जो वाराणसी के एक मशहूर गायक श्री चन्द्रशेखर चक्रवर्ती जी ने गायी है और यह रचना राग दुर्गा में उनके द्वारा निबद्ध की गयी है। इस ग़ज़ल का दूसरा शेर तथाकथित डान ( अपराधी ) के सन्दर्भ में तथा चौथा शेर भारतीय तथा पाश्चात्
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ग़ज़ल/दिल का कहना जरूर माना करो

दिल का कहना जरूर माना करो। ख़ुद को ख़ुद से ख़फ़ा किया ना करो। चीज कोई जो तुमको पानी है , ख़ुद को उसके लिए दीवाना करो। जब भला तुम किसी का कर न सको , तुम किसी का कभी बुरा ना करो। आजमाते रहे हो जीवन भर, बन्द अब ख़ुद को आजमाना करो। झूठी तारीफ़ रूबरू जो करे
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जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ। मैं तो केवल इतना सोचूँ। बालिग होकर ये मुश्किल है, आओ खुद को बच्चा सोचूँ। सोच रहे हैं सब पैसों की, लेकिन मैं तो दिल का सोचूँ। बातों की तलवार चलाए, कैसे उसको अपना सोचूँ। ऊपर वाला भी कुछ सोचे, मैं ही क्योंकर अपना सोचूँ। जो भी हो
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प्यार तब और बढ़ा

मित्रों!अपने तीन ब्लाग मेरी गज़लें,मेरे गीत और रोमांटिक रचनायें को इस एक ही ब्लाग में समेटने के बाद मैंने रोमांटिक रचनायें कम ही पोस्ट की है । इस बार एक गीत प्रस्तुत है- प्यार तब और बढ़ा और बढ़ा और बढ़ा, जब लगाये गये पहरे प्यार के ऊपर..... कोई अनारकली दी
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यार नहीं जो काम न आए

बहुत दिनों बाद आज कोई रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ..दरअसल मैं लगभग १ माह नेट से दूर रहा...आशा है आप को अवश्य पसंद aayegi... यार नहीं जो काम न आए। प्यार वही जो साथ निभाए। आता वक्त बुरा तो अक्सर, जिससे आशा वो ठुकराए। दिन में ही कुछ कोशिश कर लो, जिससे काली
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ग़ज़ल/जो है सच्ची वही खुशी रखिये

संभवत: ३० - ०९ - ०९ को १५ दिनों के लिए दिल्ली जाना हो , इस कारण हो सकता है कि अगला पोस्ट वहीं से प्रस्तुत करुँ ....तब तक ये ग़ज़ल प्रस्तुत है.... जो है सच्ची वही खुशी रखिए। सीधी-सादी सी ज़िन्दगी रखिये । जो बुरे दिन में काम आते हों, ऐसे लोगों से दोस्ती
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भजन/प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

अब मैनें अपने सभी निजी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग ‘‘मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी'' में पिरो दिया है।दरअसल मैं चाहता हूँ कि आप मेरी हर रचना देंखें परन्तु सभी दर्शकगण और पाठक अलग-अलग ब्लाग्स पर सभी
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Sep 20 2009 02:20 PM
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ग़ज़ल/कैसे कह दें प्यार नहीं है

अब कुछ प्यार की बात भी हो जाए...है न...कैसे कह दें प्यार नहीं है।हम पत्थरदिल यार नहीं हैं।अपनी बस इतनी मजबूरी,होता बस इज़हार नहीं है।मिलने का कुछ कारण होगा,ये मिलना बेकार नहीं है।तुम मुझको अच्छे लगते हो,अब इससे इनकार नहीं है।कुछ लोगों से मन मिलता है,इससे
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Sep 20 2009 02:02 PM
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ग़ज़ल/संजीदगी से गाओ ये गीत दर्द का है

अक्सर हम गायकों को गीत गाते हुए सुनते हैं|मुझे एक बार ख्याल आया की शायद कभी ऐसा भी होता होगा कि गीत तो दर्द भरा हो,पर गायक उसे हलके-फुल्के अंदाज़ में गाए जा रहा हो|जबकि उसे संजीदगी से वह गीत गाना चाहिए था|बस बन गई कुछ पंक्तियाँ --संजीदगी से गाओ ये गीत
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Sep 20 2009 01:47 PM