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मीठी मिर्ची

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13 Jun 2010
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जाति पूछिए साधु की

मै भी कितना उजबक था जो 'जाति' को बुराई मानता था और कभी-कभार उसके खिलाफ बोलकर खुद को भगतसिंह। गाँधी, लोहिया, मार्क्स आदि ने ऐसा दिमाग खराब कर दिया था कि 'जाति' होने से घिन होने लगी थी। पढ़-लिखकर खुद को आदमी मानने लगा था। मै कैसा बंदर हो गया था कि जाति-धर्म
 
ओम द्विवेदी
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सोना है भविष्य, रोना मत

आपको पता चला क्या, अपने मुख्यमंत्रीजी ने विधानसभा में सोना बनाने की मशीन लगवाई है! जिस पारस पत्थर के बारे में बड़े-बूढ़े बताया करते थे, शायद वही लगवाया है। अब वे पूरे प्रदेश को सोना बनाएँगे। उनके जो सहयोगी विधायक और मंत्री बनने के पहले लोहे का भंगार थे, वे
 
ओम द्विवेदी
May 16 2010 01:25 AM
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सूरज की मर्दानगी

सूरज आसमान से इस तरह गोली-बारी कर रहा है जैसे अमेरिका अफगानिस्तान और पाकिस्तान पर ड्रोन से हमला कर रहा हो। सड़क पर निकलना आग की बारिश में चलने जैसा लगता है। बाहर तो बाहर घर के भीतर भी सूरज इस कदर गर्मी भेज रहा है जैसे पकिस्तान हमारे यहाँ आतंकवादी भेजता
 
ओम द्विवेदी
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मुझको भी तो भ्रष्ट बना दो!

प्रभु! जाने किस घड़ी में मैने तुझसे विद्या का वरदान माँग लिया था। जब माँगा था तो यह सोचकर माँगा था कि यही दुनिया का श्रेष्ठ वरदान है, अब बहुत पछता रहा हूँ। संभव हो तो प्रायश्चित का मौका दो और विद्या, ज्ञान, लेखनी वगैरह अपने माल गोदाम में जमा करवा लो। अपनी
 
ओम द्विवेदी
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नोटों की माला का अर्थात

बहनजी काँटों भरा सफ़र तय करके आलीशान सिंहासन तक पहुँची हैं, अतः फूलों की माला पहनकर वे काँटों का अपमान नहीं करना चाहतीं।वे जिस समाज का नेतृत्व करती हैं दुनिया आज भी उसे काँटा ही मानती है।दुनिया उस काँटे से अपने पाँव का चुभा काँटा निकालकर फिर उसे बाहर फेंक
 
ओम द्विवेदी
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प्रधानजी के नाम ख़त

प्रिय प्रधानजी!सच कहूँ तो आपको प्रिय कहने में भारी कष्ट होता है। लगता है आपको प्रिय कहा और जीभ जलकर राख हो गई, पर क्या करूँ, हम जन्म-जन्मांतर से दुश्मन को भी प्रिय कहते आए हैं, फिर आप तो हमारे भाग्य विधाता हैं। आपकी बात सुनकर कभी-कभी लगता है कि आपके मुँह
 
ओम द्विवेदी
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अद्‌भुत...अकल्पनीय...

दोस्तों, कई महीनों बाद ब्लॉग पर अपना मिलना हो रहा है। ग्वालियर में सचिन तेंदुलकर ने २०० रन बनाकर एकदिवसीय मैचों के इतिहास में विश्व कीर्तिमान रचा। २४ फरवरी को ही नईदुनिया के लिए मैंने यह टिप्पणी लिखी। पोस्ट करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा। विलंब के लिए
 
ओम द्विवेदी
Mar 05 2010 11:59 PM
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पचा रही है देश को, शाकाहारी आँत

समकालीन दोहे धरती ने हमको दिया, आम और अमरूद। हमने धरती को दिया, तोप और बारूद॥ बंदूकों से खेलकर, गली हुई शमशान। जली ठूँठ पर बैठकर, कौआ पढ़े अज़ान॥ राजा अपनों से करे, कैसा बुरा सुलूक़। पहले बाँटे सरहदें, फिर बाँटे बंदूक॥ उसके पन्नों में नहीं प्यादों का उल
 
ओम द्विवेदी
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स्वर्ग का टेंडर

बहुत ही गुप्त बात आज मैं आपको बताने जा रहा हूं। यह बात इतनी गुप्त है कि किसी को भी बताने लायक नहीं। पति पत्नियों से न कहें, पत्नियां पतियों से न कहें, पिता-पुत्र, यार-मित्र, सगे-संबंधियों के बीच तो किसी भी सूरत में इस राज का पर्दाफाश न हो। सरकारी नौक
 
ओम द्विवेदी
Dec 29 2009 11:58 AM
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बसंत और गणतंत्र

बसंत और गणतंत्र का मिलन केवल संयोग नहीं है। बसंत अपने आप में गणतंत्र है और गणतंत्र पूरा बसंत। बसंत गणतंत्र इसलिए क्योंकि हवा किसी हुकूमत के कहने पर मादक नहीं होती, कोपलें तेज धार वाली तलवारें देखकर नहीं फूटतीं, कलियां मिसाइल और तोप के डर से नहीं खिलत
 
ओम द्विवेदी
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वो आए थे

वो दिखाने के लिए ही आए थे...आपने भी देखा होगा। क्या रूप-रंग था...क्या लाव-लश्कर... क्या संगी-साथी थे... क्या अदा थी... चेहरे पर विराजी मुस्कराहट का तो कहना ही क्या? उनके व्याकरण में लोकतंत्र है और आचरण में राजतंत्र। उनका शासन भले दुःशासन का हो मगर सि
 
ओम द्विवेदी
Dec 29 2009 11:58 AM
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दंगा उत्सव

दंगे हमारे शहर, प्रदेश और देश का गौरव हैं। महीने-चार महीने में दमदार दंगे न हों तो पता ही नहीं चलता कि हमारी कौमें जिंदा हैं और उनका अपना धर्म भी है। जैसे सिर में दर्द होने पर सिर का बोध होता है, पिछवाड़े बालतोड़ होने पर पिछवाड़े का अहसास होता है, पेट म
 
ओम द्विवेदी
Dec 29 2009 11:58 AM
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तम्बाकू का दर्शनशास्त्र

उस दिन तंबाकू निषेध दिवस था। एक दार्शनिक किस्म के तंबाकू सेवक से मुलाकात हो गई। फिर क्या था? लगा तंबाकू का दर्शन समझा जाए। इधर से सवालों की शुरुआत हुई कि उधर से झमाझम जवाबी बारिश होने लगी। 'आप दिनभर तंबाकू या गुटका क्यों चबाते रहते हैं?' 'अमीर गरीब क
 
ओम द्विवेदी
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छुट्टियों के पीछे- पीछे दफ्तर

कई महीनों बाद लंबी छुट्टी पर गया था। दफ्तर छोड़कर। दीवाली के बहाने छुट्टी मिली थी। यह तो हमारे दफ्तर की कृपा थी कि उसने इतने आसान बहाने पर अवकाश स्वीकृत कर दिया, वरना रिश्तेदारों की शादी करवानी पड़ती, बीवी को बीमार करना पड़ता, दादी जो बीस साल पहले देवलो
 
ओम द्विवेदी
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नज़र शरीफ़ों की चुपके से तालिबान बनी

दोस्तों! कई दिनों से व्यंग्य पोस्ट कर रहा हूँ। आज आपको ग़ज़लों से रूबरू कराते हैं। सामयिक ग़ज़लें। इन्हें आप व्यंग्यनुमा ग़ज़ल या ग़ज़लनुमा व्यंग्य कह सकते हैं। प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'समावर्तन' ने सितंबर अंक में इन ग़ज़लों को प्रकाशित किया है।
 
ओम द्विवेदी
Oct 14 2009 07:57 PM
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आज मैं गाँधी बन गया

कल सुबह जब कैलेण्डर पलट रहा था, तभी इस बात का ज्ञान हो गया था कि आज २ अक्टूबर है और यह देश मोहनदास करमचंद गाँधी उर्फ महात्मा उर्फ राष्ट्रपिता का जन्मदिन मनाएगा। अतः हर साल की तरह एक बार फिर मेरे पास मौका था गाँधी बनने का। मैंने इस सुअवसर को झपटकर पकड़
 
ओम द्विवेदी
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दूसरे रावण की तलाश में राम

मैं दशहरे की धूमधाम देखकर लौट रहा था कि देर रात राम से मुलाकात हो गई। जटाएँ बिखरी हुई, पसीने से तरबतर, गैरिक वस्त्र धूल-धूसरित, चेहरे पर परेशानियों की अनगिनत रेखाएँ, आँखों में आँसू थामे हुए, तकरीबन पराजित से। पहले रामलीला में और फिर टीवी में उनकी शक्
 
ओम द्विवेदी
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माँ-भक्त संवाद-चार

भक्तों! धुएँ से मेरा दम घुट रहा है, शोर से मेरे कान फटे जा रहे हैं, तुम्हारे इन अश्लील नृत्यों मेरी आँखें शर्म से झुकी जा रही हैं। अब मुझे मुक्त करो। मुक्ति दो मुझे। -कैसी बात कर रही हो माँ! हम भक्तों को मुक्त करना तो तुम्हारा काम है। तुम स्वयं कैसे
 
ओम द्विवेदी
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माँ-भक्त संवाद-तीन

चाँद पर पानी-देखा, तुम लोग यहाँ पूजा-पाठ और नाच-गाने में लगे रहे, वहाँ चंद्रयान ने चाँद पर पानी खोज लिया। तुम्हारे भारत देश के वैज्ञानिकों ने कमाल कर दिया।-माँ! आप भी कैसी बातें करती हैं। क्या हम लोग आपकी महिमा से परिचित नहीं हैं। भले वह चंद्रयान है,
 
ओम द्विवेदी
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माँ-भक्त संवाद-दो

-भक्तों ! तुम्हारी दृष्टि में नवरात्रि के नौ दिनों में भक्ति क्या है?-चंदा इकठ्ठा करना, आपकी मूर्ति विराजना, गाना-बजाना करना, गरबे-डिस्कों अदि के शानदार आयोजन करना, खीर-पूड़ी की अच्छी परसादी बाँटना, समापन पर अच्छा बड़ा भंडारा करना, मूर्ति विसर्जित करने के
 
ओम द्विवेदी
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माँ- भक्त संवाद- एक

-भक्तों तुम लोग क्यों नाच-गा रहे हो?-माँ आज हम लोगों का दिल प्रसन्न है, हम नहीं नाच रहे हैं, मन ही मयूर है।-मन मयूर होने की कोई खास वजह भक्तों?-नवरात्रि है तो आपके चरणों में लोट रहे हैं।-इसके पहले गणेशोत्सव में भी आप लोगों के नृत्य से सड़कें भरी थीं,
 
ओम द्विवेदी
Sep 22 2009 07:28 PM
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दादा का जीवन सादा हुआ

अपने दादा भी वहीं से आए हैं, जहाँ से बड़े-बड़े नेता आते हैं। दादा ने पढ़ाई-लिखाई भी वहीं से की है जहाँ से अपने महान देश के महान प्रधानमंत्रियों ने की है। उनका खानदान भद्र है, उच्च है, महान नेताओं का है। वे उस राजनीतिक दल से आते हैं, जहाँ लोकतंत्र का मतलब
 
ओम द्विवेदी
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पितृपक्ष में हिंदी का एक दिन

पितृपक्ष के पंद्रह दिनों में एक दिन अपनी हिंदी का भी होता है। पुरखों के साथ अपन अपनी 'राष्ट्रभाषा' का भी स्मरण (तर्पण) करते हैं। पुरखों ने अपने वंशजों पर अनगिनत उपकारों में से एक उपकार यह भी किया है कि अपने साथ राष्ट्रभाषा का स्मरण भी नत्थी कर दिया है।
 
ओम द्विवेदी
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सुरक्षा की कमर

सरकारें सुरक्षा की कमर कसने में लगी हुई हैं। दिन-रात एक किए हुए हैं। सरकारें कमर कसती जाती हैं और सुरक्षा का अधोवस्त्र नीचे खिसकता जाता है। जबसे यह देश बना है, तबसे ऐसा ही होता आ रहा है। वे भीतर कमर कसती हैं और बाहर आकर चिल्लाती हैं कि जो हमारी ओर बुरी
 
ओम द्विवेदी
Sep 11 2009 08:48 PM