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कुछ पन्ने मेरी दराज़ से....

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31 May 2010
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फलक

न जाने कब ये शाम का गोला ढल जाए. और एक स्याह रात की चादर सिल जाए.करोड़ों जगमगाते टुकड़े पैबंद हों उस पर, स्याह शामियाने पे नक्काशी खिल जाए.तू रोज़ देखता है टक-टकी लगाए मुझे.बढाऊँ हाथ जो ऊपर, तू छिटक जाए मुझे किसी रोज़ पैबंद हो जाऊं शामियाने पर,ए खुदा तू
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तन्हाई

ए कलम काश मेरा भी कोई तेरे कागज़ की तरह हमदम होता,मेरे दिल से उमड़ती स्याही कोमैं किसी से तो बाँट पता.ए आंसू काश मेरा भी कोई तेरेगाल की तरह हमराज़ होता,मेरे बिखरते मोतिओं को यहाँ कोई तो समझ पता.ए धरती काश मेरा भी कोई तेरेआसमां की तरह हमजाद होता,मेरी आग
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मौन

मौन है क्यों मौन हैयहाँ सभा भरी क्यों मौन है,क्या हुआ है यहाँ बताओ,इस नीरस गढ़ का राज़ बताओ.धुआं हुआ है बिन आग यहाँ क्या?यहाँ सभा भरी क्यों मौन है?रात बढ़ी है आहिस्ता सेयहाँ अन्ध्यारा क्यों चोर है,क्या हुआ है यहाँ बताओ,इस खामोशी का राज़ बताओ.भूख पड़ी है
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हम

कुछ ख्वाब तुमने बुने थे, कुछ मैंने, कुछ हमनेऔर कुछ अध्बुने ही रह गये थे वक़्त की मेज़ पे.तुम वो खवाब मुझ से और मैं तुमसे मांगता रहा,आज जब कई साल बाद मैंने महसूस किया कि वोन तुम्हारे पास थे और न मेरे, वो ख्वाब आज भी वक़्त की मेज़ पर महफूज़ उसी करवट सोये हुए
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May 25 2010 07:03 PM
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बुत

ये दुनिया बड़ी नादान है, हर रंगीन बुत को भगवान समझ लेती है. हाथ बढ़ा दे गर कोई प्यार का.रावन को भीराम समझलेती है.--नीरज 
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May 08 2010 09:53 AM
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कश्ती

ख़्वाबों की एक कश्ती है,जो पलकों की वादी के पाररोज़ चली आती है.कभी सतरंगी ख्वाब लाती हैकभी बेरंगी ख्वाब सजा लाती है.--नीरज
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May 08 2010 09:43 AM
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ये रात है बड़ी

ये रात है बड़ी, मंजिल कहीं नहीं.यहाँ काफिले बहुत, माज़ी कहीं नहीं.इस खुदाई रात में हम आसमां देखते रहे,कुछ तारे जगमगाते रहे कुछ यूँही टूटते रहे.ये रात है बड़ी, मंजिल कहीं नहीं. यहाँ काफिले बहुत, माज़ी कहीं नहीं.उफक तक देखते रहे रास्ता तेरा,अँधेरा कर गया
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बातें वो अनकही सी

बहुत बार कही, मगर कई बातें बेजुबां सी लबो तक आने को लफ्ज़ ढूंढती रही . बिलखते से जज्बात की तरहजहन में कौंधती रहीं.तुमने देखा नहीं शायद,मेरी पलकों के साहिल पेउन्हें खामोश बैठे हुए.छूकर जो गुजरी यादो की बदली,आँखों को समंदर करती रही.बातें वो अनकही सी तड़पती
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कुछ यादें तुम्हारा रास्ता पूछ रहीं हैं

गिरह में लिपटी हैं कुछ रात तुम्हारी,कुछ कागज़ के पन्नों पे बिखरी हैं.कुछ बारिश में भीग रहीं हैं, कुछ मिटने का बहाना ढूंढ रहीं हैं.आजाओ किसी रोज़ एक बार फिर तुम भी,कुछ यादें तुम्हारा रास्ता पूछ रहीं हैं.सूखे लबों से कंप-कंपाती याद तुम्हारी,मयखाने से भी आज
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छाले

कुछ नन्हे हाथों को आज हाथ छुडाते देखा हैउन कोमल हाथों पे छालों का एक गुलदस्ता देखा हैतपती कंकरीली धरती पे दिन भर रेंगते देखा हैखाने के चंद निवालों पे मैंने उनको पिटते देखा हैभूख मिटाने की खातिर यहाँ रूह नाचती देखी हैहर गाडी में झांकती उनकी आस टपकती देखी
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निशाँ उनके

वो चल दिए यूँ हम से हाथ छुड़ाकर, हम तकते रहे निशाँ उनके.सोचा कभी मिलजायेंगे राह में, हम ढूंढते रहे निशाँ उनके.रात की वीरानिओं में खो गये कहाँचाँद भी पहचान न पाया निशाँ उनके.नीर से गुजरी है वो कुछ इस कदरवहां भी न मिल पाए
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भरम है या हकीकत कोई?

जी चाहता है की तेरे दिन को अपनी शाम से मिला दूँ,जो लाली उपजे इस मिलन से उसे तेरे माथे पे सजा दूँ.घुल जाएँ दो पहर जो हैं कुछ जुदा-जुदा से,बाहों में आओ तो तुम्हे रोम-रोम में बसा दूँ.राहों में खड़ी दूरियाँ सिमट जाएँ सभी,जो मैं तेरी हथेली से हथेली मिला
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मिलन

आग को बाहों में थामे दूरआकाश में उड़ रही थी रुई,मुसाफिरों का कौतूहलउड़ा रहा था धुल का गुबार,गुन-गुनाते उड़े आ रहे थे आशियानेमें अपने वापिस मुसाफिर.तो कहीं डाली पे बैठ करफिजा खिल-खिला रही थी,चलो चलें हम भी कुछगीत गा लें, मुस्कुरा लें.दिन का रात से मिलनेका
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निशानी

रात की गहराई में जाने कहाँरोज़ फिरता हूँ दर-बदर,छीनली हैं नींद मेरी जहानने आँखों से इस कदर.ख्वाबों को आँखों में संजोय,सहेज के रखा है कब से.सरहद पलकों की पार न करदे,बहलाया है उनको शब से.सजदा मेरा ये आखरी है तुझसे, आतिश ने मेरे ख्वाब जलाए हैं.अगर आओ कभी
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ए ज़िन्दगी मैं कैसे करूँ अदा शुक्रिया तेरा

ए ज़िन्दगी मैं कैसे करूँ अदा शुक्रिया तेरा?उलझी हुई कई रातें तू यूँही सुलझा देती है.उगते सपने कई तू हकीकत में ले आती है,आसमान से तोड़ देती है सितारे अनगिनत ,तोड़ के तू मेरी झोली में जड़ने चली आती है.ए ज़िन्दगी मैं कैसे करूँ अदा शुक्रिया तेरा?प्यार की पवन
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Mar 01 2010 06:29 PM
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हुंकार

दायरे ऐसे भी बनते हैं कि फिर मिटते नहीं,लुट जाती हैं हस्तियाँ, कारवां मिटते नहीं.जितना चाहे रौन्दलो या चाहे कितना तोड़लो,हौसले फौलादों के आग से जलते नहीं.रात के हों घुप्प अँधेरे या हों कई साये घनेरे,रौशनी कि एक किरण के सामने डटते नहीं.चाहे मीलों हो गगन
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सुबह की कटारी से रात काटी है

स्याह रात तेरी याद में काटी है.सुबह की कटारी से रात काटी है.मुस्कुराता हूँ देख के तुझे यूँ,जैसे छत्ते से मैंने शहेद चाटी है.खोई हो सिलवटों में ज़िन्दगी की,मैंने उम्र एक गिरह में काटी है.लिख-लिख के थक गया हूँ तुझे,कागज़ की सिल पे याद बाटी है.फिसल गए हैं
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घुंघरू

कुछ फटी, कुछ उधडी हुई सी मैंकुछ टूटी, कुछ झड़ी हुई सी मैं,आई हूँ गुज़रे वक़्त की इमारत पे.दरवाज़े पे हुई नक्काशी अब कुछ झड सी गयी है,छतों पे जड़े झूमर भी अब कुछटूट गए हैं, कुछ लदक गए हैं.वो सफ़ेद चादरें, जो लाल कालीनकी शोभा बढाया करतीं थीं,अब किसी कोने
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ऐ दुनिया तेरे कितने रंग ...

 यह मेरी और मेरी मित्र वंदना की सांझी नज़्म है....सच होता निलाम देखूं ...या झूठ के लगते दाम देखूंऐ दुनिया तेरे कितने रंग मैं क्या देखूं क्या न देखूधर्म पे लगते बाजार देखूं ,संक्रमण सा फैला भ्रस्टाचार
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Ethunesia - Mercy Death

ये कृति एक Spanish फिल्म Mar Adentro जिसका मतलब है The Sea Inside से inspired है. जिस में की नायक Quadriplegia का शिकार होता है और 30 साल कोर्ट में ethunasia के लिए लड़ता है और अंत में हार जाता है.*Quadriplegia = एक ऐसी बीमारी जिस में की गर्दन से नीचे का
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पल

इक अकेली शाम से कुछ पल तेरे,अपने लिए चुन लिए थे मैंने,उस आधे घंटे की मुलाकात मेंकई ख्वाब बुन लिए थे मैंने.कजरारी आखों से तेरी कुछसुनहरे पल समेट लिए थे मैंने.थर-थराते गुलाबी लबों से तेरे,बिखरते लफ्ज़ चुन लिए थे मैंने.गालों पे फैलती-सिमटती लाली को,सहेज के
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School की कुछ यादें.....

शर्ट पे सेफ्टी-पिन से लगा रुमाल,गले में वाटर बोतल,पीठ पर एक भारी बसता.अब भी वो दिन याद आते हैं.वो रबर-पेंसिल पर लड़ना झगड़ना,झूले से गिर के फिर उठना,हर बात पर मैडम से शिकायत.अब भी वो दिन याद आते हैं.पढने के नाम पर बहाने बनाना,किताब के अन्दर कॉमिक को
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याद

वो मंज़र कभी याद आते हैं , कभी आँखों से बरस जाते हैं.रह जाते हैं ठहर कर गालों पर,मुस्कान बन बिखर जाते हैं.दिन भर रहते हैं संग मेरे,रात में तारे बन जगमगा जाते हैं.चुभते हैं दिन भर दिल में मेरे,रात होते ही महेक जाते हैं.उठते हैं अंगार बनके ज़हन में,राख
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त्रिवेणी 2

बोने से बबूल आम नहीं मिलते कभी, खार से तो बस हाथ ही छिला करते हैं.सुना है पडोसी देश आतंकवाद का शिकार है.*************************घूमता है कुम्हार का चाक जबकितना हुनर बिखेर देता है जग में.ये बता ए वक़्त तेरा कुम्हार कहाँ बस्ता
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त्रिवेणी

चांदनी है जब तक ज़मीन पर कोई चाँद को देखता तक नहीं,जो आजाती है अमावस बीच में, चाँद की कमी खलने लगती है.रिश्तों ने भी आज कल कुछ यूँही घटना बढ़ना सीख लिया है.--नीरज 
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ख्वाब

मेरे दादी-दादाजी और गाँव के उस कच्चे मकान की प्यारी याद में जो अब बस याद और ख्वाब में ही नसीब हैं.आसमान के सितारे हर रात उतर के मेरी आँखों में झिलमिलाने चले आते थे,चाँद रोज़ उतर के थपकी देता था, फिजालोरियां सुनाती थी. कई ख्वाब फलक से
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ख्वाब

रात की बेहोशी में मैंने कुछ ख्वाब संभाल के तकिये के सिरहाने रख छोड़े थे.सोचा था होश आने पे भट्टी मेंपका के पुख्ता कर लूँगा,पर आँख खुली तो बेहोशी ने ख्वाब के चमकीले टुकड़े तकिये के सिरहाने रख छोड़े थे.--नीरज 
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बंसी का भूत

अरे कनहिया....कनहिया! जा तो जल्दी से झुम्मन चाचा को बुला कर ला. (कुछ देर में कनाहिया वापिस आता है झुम्मन चाचा के घर से...)मालिक, चाचा तो मिले नहीं वो पास ही गाँव में किसी को झाड़ा देने गए हैं, तो 1 घंटे में वापिस आ जायेंगे. छोटे चाचा ने कहा है की मझले
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दो बहनें

काश के एक रोज़ यूँ  ही तू मुझे मिली होती, रख लेता तुझे संभाल के सहेज के, मेह्फूस कर के. तू न आई अपनी सौतेली बहन को भेज दिया. वो जब-जब आई मैंने  दरवाज़ा नहीं खोला, सदा तेरा ही इंतज़ार किया. और एक रोज़ खुद ही  उसको बुला लिया. मुझे क्या प
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सुगंधा

छोटा परिवार सुखी परिवार....कुछ ऐसा ही था आशीष और नेहा का परिवार - वो दो और उनकी एक फूल सी बच्ची सुगंधा. पर कहते हैं की सुख और शान्ति किसी के भी पास ज्यादा समय तक नहीं टिकती है, कभी न कभी दुःख की लहर आती है और सब कुछ बह जाता है. आशीष के परिवार में भी
Dec 29 2009 11:58 AM
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ज़िन्दगी

क्यों होता है ज़िन्दगी में अक्सर किनारे जो पास नज़र आते हैं वो ही अक्सर दूर चले जाते हैं. किनारे पे रह जाते हैं कुछ घिसे बेजान पड़े चिकने पत्थर. रात को आसमान में देखो तो बस एक गहरी तन्हाई नज़र आती है. तन्हाई में चाँद छूने को हाथ बढ़ता है मगर हाथ बस मायू
Dec 29 2009 11:58 AM
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Mou

छोटी सी एक प्यारी सी, नन्ही सी राज दुलारी सी. एक गुडिया घर में आई थी, mou नाम से उसे बुलाई थी. थोडी चुप-चुप, कुछ शरमाई सी, भोली भाली, कुछ घबरायी सी. मिठास शहद सी लायी थी, mou नाम से उसे बुलाई थी. अजय हुई तू एक पवन है, निडर खड़ी तू एक गगन है, ज़िंदगी मे
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आखरी जाम हो तो कुछ ऐसा हो....

हर एक सांस हर पल कम हो रही है, ज़िन्दगी मैकदे में जाम बन रही है. न कोई गम हो, न गिला, न शिकवा कोई दोस्त हों आघोष में मेरे, न हो दुश्मन कोई शिकन न हो चेहरे पे मेरे, न हो खौफ कोई न शिकायत हो किसी से, न उधारी कोई तमन्नाएँ अधूरी न रह जाएँ कोई सिसकियाँ न
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आज़ाद देश है मेरा यारों

आप सभी को स्वतंत्रता दिवस पर बहुत बहुत बधाई. यहाँ आग लगी है भबक-भबक यहाँ जाम चले हैं छलक-छलक. बीते हैं दिन वो नारों के , लहू में बहते अंगारों के , सूखे हैं मेहनत के रेले , यहाँ रात चली है चमक - चमक . यहाँ आग लगी है भबक - भबक यहाँ जाम चले हैं छलक - छल
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हबीब

आशकार करो चाहे जितना, अफ़कार मिटा दो चाहे जितना. मुंतज़िर बैठे हैं राहों में तेरी, अलहदा करदो चाहे जितना। रम्ज़-शिनास थे तुम हमारे, ग़म-गुसार थे तुम हमारे. क्या हुआ जो चल दिए यूँ, रकीब तो न थे तुम हमारे? गुल तो यूँ रोज़ मिलते हैं, ख़ार बस किस्मत से मिल
Dec 29 2009 11:58 AM
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कारगिल शहीदों के लिए

रण में शहीद , वहां से सकुशल वापिस लौटे तथा आज भी हमारी रक्षा करते सभी सैनिकों को समर्पित - मर मिटे हजारों लाल यहाँ पर श्वेत बरफ तब लाल हुई. वादी वादी गूंझी घन घन शत्रु पे बौछार हुई. चढ़े चोटी पर वीर हमारे विजय तिरंगा फेहराया. लहू के हर कतरे से अपने दि
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दर्द महोदय

हमारे घर में कुछ दिनों पहले एक मेहमान आया था, नाम पुछा तो खुद को "दर्द" बतलाया था। रोज़ भोजन पानी मेरी खुशियों का करता था, जब देखो उदासी की जीभ लप-लपाया करता था। अतिथि देवो भावः में विश्वास करता हूँ, इसलिए अपनी खुशियाँ भी उसके नाम करता था। मेरी मसरूफ
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काश के चाँद मेरी शर्ट का बटन होता

काश के चाँद मेरी शर्ट का बटन होता, मैं रो़ज़ उससे तोड़ता तू रोज़ उसे सीती. यूँही सिलसिला सालों चलता, ये अमावस यूँही इतनी लम्बी न हुई होती.... मखमली पंखुडी गुलाब की गर पलकों पे न सजी होती तेरे, नज़रें हमसे भी किसी रोज़ टकराई होतीं यूँ काटों में न फंसी
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क्यों भूल जाते हैं माँ को कुछ लोग??

कई रातें बीतीं हैं यूँही पलकें झपकते-झपकते, माँ मुझे अपनी गोद में फिर जी भर के सो जाने दे. नींद से अचानक यूँही जाग जाया करता हूँ अक्सर, माँ मुझे रात भर तेरा हाथ पकड़ के सो जाने दे. ये मखमली गद्दा अब मेरे बदन में गड़ने लगा है, माँ मुझे अपने साथ फर्श पे
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क्या हुआ गर ला इलाज हूँ,

गुज़रा है ज़माना इस बंद कमरे में टूटे हैं पंख मेरे फड-फाड़ा के बंद कमरे मे. क्या हुआ गर ला इलाज हूँ, स्वप्न नहीं रुके हैं मेरे इस बंद कमरे मे. सींचता हूँ रूह अपनी अनगिनत उन यादों से शब् टपकती है कमल पे डब-डबती उन यादों से. क्या हुआ गर ला इलाज हूँ, यादे
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