कुछ पन्ने मेरी दराज़ से....'s Image

कुछ पन्ने मेरी दराज़ से....

http://neer-ke-panne.blogspot.com/
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
08 Mar 2010
कुल प्रविष्टियां
40
पाठक भेजे
520
पसंद
33
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
13.00
पसंद करें
0
नापसंद करें

ए ज़िन्दगी मैं कैसे करूँ अदा शुक्रिया तेरा

ए ज़िन्दगी मैं कैसे करूँ अदा शुक्रिया तेरा?उलझी हुई कई रातें तू यूँही सुलझा देती है.उगते सपने कई तू हकीकत में ले आती है,आसमान से तोड़ देती है सितारे अनगिनत ,तोड़ के तू मेरी झोली में जड़ने चली आती है.ए ज़िन्दगी मैं कैसे करूँ अदा शुक्रिया तेरा?प्यार की पवन
टैग: my poems
Mar 01 2010 07:29 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

हुंकार

दायरे ऐसे भी बनते हैं कि फिर मिटते नहीं,लुट जाती हैं हस्तियाँ, कारवां मिटते नहीं.जितना चाहे रौन्दलो या चाहे कितना तोड़लो,हौसले फौलादों के आग से जलते नहीं.रात के हों घुप्प अँधेरे या हों कई साये घनेरे,रौशनी कि एक किरण के सामने डटते नहीं.चाहे मीलों हो गगन
टैग: my poems
पसंद करें
1
नापसंद करें

सुबह की कटारी से रात काटी है

स्याह रात तेरी याद में काटी है.सुबह की कटारी से रात काटी है.मुस्कुराता हूँ देख के तुझे यूँ,जैसे छत्ते से मैंने शहेद चाटी है.खोई हो सिलवटों में ज़िन्दगी की,मैंने उम्र एक गिरह में काटी है.लिख-लिख के थक गया हूँ तुझे,कागज़ की सिल पे याद बाटी है.फिसल गए हैं
टैग: my poems
पसंद करें
0
नापसंद करें

घुंघरू

कुछ फटी, कुछ उधडी हुई सी मैंकुछ टूटी, कुछ झड़ी हुई सी मैं,आई हूँ गुज़रे वक़्त की इमारत पे.दरवाज़े पे हुई नक्काशी अब कुछ झड सी गयी है,छतों पे जड़े झूमर भी अब कुछटूट गए हैं, कुछ लदक गए हैं.वो सफ़ेद चादरें, जो लाल कालीनकी शोभा बढाया करतीं थीं,अब किसी कोने
टैग: my poems
Jan 24 2010 08:18 PM
पसंद करें
1
नापसंद करें

ऐ दुनिया तेरे कितने रंग ...

 यह मेरी और मेरी मित्र वंदना की सांझी नज़्म है....सच होता निलाम देखूं ...या झूठ के लगते दाम देखूंऐ दुनिया तेरे कितने रंग मैं क्या देखूं क्या न देखूधर्म पे लगते बाजार देखूं ,संक्रमण सा फैला भ्रस्टाचार
टैग: my poems
पसंद करें
0
नापसंद करें

Ethunesia - Mercy Death

ये कृति एक Spanish फिल्म Mar Adentro जिसका मतलब है The Sea Inside से inspired है. जिस में की नायक Quadriplegia का शिकार होता है और 30 साल कोर्ट में ethunasia के लिए लड़ता है और अंत में हार जाता है.*Quadriplegia = एक ऐसी बीमारी जिस में की गर्दन से नीचे का
टैग: my poems
पसंद करें
1
नापसंद करें

पल

इक अकेली शाम से कुछ पल तेरे,अपने लिए चुन लिए थे मैंने,उस आधे घंटे की मुलाकात मेंकई ख्वाब बुन लिए थे मैंने.कजरारी आखों से तेरी कुछसुनहरे पल समेट लिए थे मैंने.थर-थराते गुलाबी लबों से तेरे,बिखरते लफ्ज़ चुन लिए थे मैंने.गालों पे फैलती-सिमटती लाली को,सहेज के
टैग: my poems
पसंद करें
0
नापसंद करें

School की कुछ यादें.....

शर्ट पे सेफ्टी-पिन से लगा रुमाल,गले में वाटर बोतल,पीठ पर एक भारी बसता.अब भी वो दिन याद आते हैं.वो रबर-पेंसिल पर लड़ना झगड़ना,झूले से गिर के फिर उठना,हर बात पर मैडम से शिकायत.अब भी वो दिन याद आते हैं.पढने के नाम पर बहाने बनाना,किताब के अन्दर कॉमिक को
टैग: my poems
पसंद करें
1
नापसंद करें

याद

वो मंज़र कभी याद आते हैं , कभी आँखों से बरस जाते हैं.रह जाते हैं ठहर कर गालों पर,मुस्कान बन बिखर जाते हैं.दिन भर रहते हैं संग मेरे,रात में तारे बन जगमगा जाते हैं.चुभते हैं दिन भर दिल में मेरे,रात होते ही महेक जाते हैं.उठते हैं अंगार बनके ज़हन में,राख
टैग: my poems
पसंद करें
0
नापसंद करें

त्रिवेणी 2

बोने से बबूल आम नहीं मिलते कभी, खार से तो बस हाथ ही छिला करते हैं.सुना है पडोसी देश आतंकवाद का शिकार है.*************************घूमता है कुम्हार का चाक जबकितना हुनर बिखेर देता है जग में.ये बता ए वक़्त तेरा कुम्हार कहाँ बस्ता
टैग: triveni
पसंद करें
0
नापसंद करें

त्रिवेणी

चांदनी है जब तक ज़मीन पर कोई चाँद को देखता तक नहीं,जो आजाती है अमावस बीच में, चाँद की कमी खलने लगती है.रिश्तों ने भी आज कल कुछ यूँही घटना बढ़ना सीख लिया है.--नीरज 
टैग: triveni
पसंद करें
0
नापसंद करें

ख्वाब

मेरे दादी-दादाजी और गाँव के उस कच्चे मकान की प्यारी याद में जो अब बस याद और ख्वाब में ही नसीब हैं.आसमान के सितारे हर रात उतर के मेरी आँखों में झिलमिलाने चले आते थे,चाँद रोज़ उतर के थपकी देता था, फिजालोरियां सुनाती थी. कई ख्वाब फलक से
टैग: my poems
Jan 02 2010 03:58 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ख्वाब

रात की बेहोशी में मैंने कुछ ख्वाब संभाल के तकिये के सिरहाने रख छोड़े थे.सोचा था होश आने पे भट्टी मेंपका के पुख्ता कर लूँगा,पर आँख खुली तो बेहोशी ने ख्वाब के चमकीले टुकड़े तकिये के सिरहाने रख छोड़े थे.--नीरज 
टैग: my poems
पसंद करें
0
नापसंद करें

बंसी का भूत

अरे कनहिया....कनहिया! जा तो जल्दी से झुम्मन चाचा को बुला कर ला. (कुछ देर में कनाहिया वापिस आता है झुम्मन चाचा के घर से...)मालिक, चाचा तो मिले नहीं वो पास ही गाँव में किसी को झाड़ा देने गए हैं, तो 1 घंटे में वापिस आ जायेंगे. छोटे चाचा ने कहा है की मझले
टैग: my stories
Dec 31 2009 12:08 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

दो बहनें

काश के एक रोज़ यूँ  ही तू मुझे मिली होती, रख लेता तुझे संभाल के सहेज के, मेह्फूस कर के. तू न आई अपनी सौतेली बहन को भेज दिया. वो जब-जब आई मैंने  दरवाज़ा नहीं खोला, सदा तेरा ही इंतज़ार किया. और एक रोज़ खुद ही  उसको बुला लिया. मुझे क्या प
Dec 29 2009 12:58 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

सुगंधा

छोटा परिवार सुखी परिवार....कुछ ऐसा ही था आशीष और नेहा का परिवार - वो दो और उनकी एक फूल सी बच्ची सुगंधा. पर कहते हैं की सुख और शान्ति किसी के भी पास ज्यादा समय तक नहीं टिकती है, कभी न कभी दुःख की लहर आती है और सब कुछ बह जाता है. आशीष के परिवार में भी
Dec 29 2009 12:58 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

ज़िन्दगी

क्यों होता है ज़िन्दगी में अक्सर किनारे जो पास नज़र आते हैं वो ही अक्सर दूर चले जाते हैं. किनारे पे रह जाते हैं कुछ घिसे बेजान पड़े चिकने पत्थर. रात को आसमान में देखो तो बस एक गहरी तन्हाई नज़र आती है. तन्हाई में चाँद छूने को हाथ बढ़ता है मगर हाथ बस मायू
Dec 29 2009 12:58 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

Mou

छोटी सी एक प्यारी सी, नन्ही सी राज दुलारी सी. एक गुडिया घर में आई थी, mou नाम से उसे बुलाई थी. थोडी चुप-चुप, कुछ शरमाई सी, भोली भाली, कुछ घबरायी सी. मिठास शहद सी लायी थी, mou नाम से उसे बुलाई थी. अजय हुई तू एक पवन है, निडर खड़ी तू एक गगन है, ज़िंदगी मे
Dec 29 2009 12:58 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

आखरी जाम हो तो कुछ ऐसा हो....

हर एक सांस हर पल कम हो रही है, ज़िन्दगी मैकदे में जाम बन रही है. न कोई गम हो, न गिला, न शिकवा कोई दोस्त हों आघोष में मेरे, न हो दुश्मन कोई शिकन न हो चेहरे पे मेरे, न हो खौफ कोई न शिकायत हो किसी से, न उधारी कोई तमन्नाएँ अधूरी न रह जाएँ कोई सिसकियाँ न
Dec 29 2009 12:58 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

आज़ाद देश है मेरा यारों

आप सभी को स्वतंत्रता दिवस पर बहुत बहुत बधाई. यहाँ आग लगी है भबक-भबक यहाँ जाम चले हैं छलक-छलक. बीते हैं दिन वो नारों के , लहू में बहते अंगारों के , सूखे हैं मेहनत के रेले , यहाँ रात चली है चमक - चमक . यहाँ आग लगी है भबक - भबक यहाँ जाम चले हैं छलक - छल
Dec 29 2009 12:58 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

हबीब

आशकार करो चाहे जितना, अफ़कार मिटा दो चाहे जितना. मुंतज़िर बैठे हैं राहों में तेरी, अलहदा करदो चाहे जितना। रम्ज़-शिनास थे तुम हमारे, ग़म-गुसार थे तुम हमारे. क्या हुआ जो चल दिए यूँ, रकीब तो न थे तुम हमारे? गुल तो यूँ रोज़ मिलते हैं, ख़ार बस किस्मत से मिल
Dec 29 2009 12:58 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

कारगिल शहीदों के लिए

रण में शहीद , वहां से सकुशल वापिस लौटे तथा आज भी हमारी रक्षा करते सभी सैनिकों को समर्पित - मर मिटे हजारों लाल यहाँ पर श्वेत बरफ तब लाल हुई. वादी वादी गूंझी घन घन शत्रु पे बौछार हुई. चढ़े चोटी पर वीर हमारे विजय तिरंगा फेहराया. लहू के हर कतरे से अपने दि
टैग: My Poems
Dec 29 2009 12:58 PM
पसंद करें
3
नापसंद करें

दर्द महोदय

हमारे घर में कुछ दिनों पहले एक मेहमान आया था, नाम पुछा तो खुद को "दर्द" बतलाया था। रोज़ भोजन पानी मेरी खुशियों का करता था, जब देखो उदासी की जीभ लप-लपाया करता था। अतिथि देवो भावः में विश्वास करता हूँ, इसलिए अपनी खुशियाँ भी उसके नाम करता था। मेरी मसरूफ
पसंद करें
2
नापसंद करें

काश के चाँद मेरी शर्ट का बटन होता

काश के चाँद मेरी शर्ट का बटन होता, मैं रो़ज़ उससे तोड़ता तू रोज़ उसे सीती. यूँही सिलसिला सालों चलता, ये अमावस यूँही इतनी लम्बी न हुई होती.... मखमली पंखुडी गुलाब की गर पलकों पे न सजी होती तेरे, नज़रें हमसे भी किसी रोज़ टकराई होतीं यूँ काटों में न फंसी
टैग: My Poems
पसंद करें
3
नापसंद करें

क्यों भूल जाते हैं माँ को कुछ लोग??

कई रातें बीतीं हैं यूँही पलकें झपकते-झपकते, माँ मुझे अपनी गोद में फिर जी भर के सो जाने दे. नींद से अचानक यूँही जाग जाया करता हूँ अक्सर, माँ मुझे रात भर तेरा हाथ पकड़ के सो जाने दे. ये मखमली गद्दा अब मेरे बदन में गड़ने लगा है, माँ मुझे अपने साथ फर्श पे
टैग: My Poems
पसंद करें
0
नापसंद करें

क्या हुआ गर ला इलाज हूँ,

गुज़रा है ज़माना इस बंद कमरे में टूटे हैं पंख मेरे फड-फाड़ा के बंद कमरे मे. क्या हुआ गर ला इलाज हूँ, स्वप्न नहीं रुके हैं मेरे इस बंद कमरे मे. सींचता हूँ रूह अपनी अनगिनत उन यादों से शब् टपकती है कमल पे डब-डबती उन यादों से. क्या हुआ गर ला इलाज हूँ, यादे
टैग: My Poems
पसंद करें
1
नापसंद करें

तभी तुम आज कल पलट कर नहीं देखते....

इस रोज़ के शोर ने मेरी आवाज़ छीनली है शायद, या टूट गयीं हैं वो कुछ बची हुई नाज़ुक तारें, तभी तुम आज कल पलट कर नहीं देखते.... रिश्ते में हमारी, ठंडक और धुंध पड़ गयी है शायद, या दूर से आती रौशनी हमे अँधेरे का तोफा दे गयी है, तभी तुम आज कल पलट कर नहीं देख
टैग: My Poems
पसंद करें
3
नापसंद करें

काश के चाँद मेरी शर्ट का बटन होता

काश के चाँद मेरी शर्ट का बटन होता, मैं रो़ज़ उससे तोड़ता तू रोज़ उसे सीती. यूँही सिलसिला सालों चलता, ये अमावस यूँही इतनी लम्बी न हुई होती.... -- नीरज
टैग: My Poems
पसंद करें
2
नापसंद करें

लाचारी

छोटी छोटी आँखों से उम्मीद को रोज़ झांकते देखता हूँ, आस के चमकीले कणों से सने हाथ छिले देखता हूँ. अंगार सी सड़क पे नंगे पैर बचपन झुलसते देखता हूँ, थर-थराती सर्दी में नंगे जिस्मों को सिकुड़ते देखता हूँ. नन्हे कंधे स्कूल के बस्ते से नहीं मजदूरी के बोझ से
टैग: My Poems
पसंद करें
0
नापसंद करें

-- शुभ दीपावली --

रौशनी का पर्व है आया इस वर्ष फिर से. घर-घर, गली-कूचे रंगों से चमके हैं रौशनी से दमके हैं. गली-कूचे कुछ ऐसे भी हैं जो चमके हैं न दमके. आओ रौशनी का एक दिया उस अँधेरी चौखट पे रखदें. कुछ अँधेरी ज़िन्दगियों को इस पर्व पे रोशन करदें. -- शुभ दीपावली -- --नीर
टैग: My Poems
पसंद करें
0
नापसंद करें

एक ख्वाब...एक सवाल...एक दुआ...

ए महबूब मेरे तू मेरी यादों में है, मेरे ज़हन में है, मेरे ख्यालों में है. पहर दर पहर यूँही गुज़र जाते हैं, तू ज़बान में है, मेरी आँखों में है. परेशान सी है कुछ मैंने सुना है, घर लाने का तुझे सपना बुना है. डरता हूँ समाज से अपने मैं भी, ज़िक्र पे तेरे मै
टैग: My Poems
पसंद करें
1
नापसंद करें

कश्मीर

चांदी सी रोशन वादी सुर्ख लाल हो गयीं हैं, सरहदें जोड़ती झेलम, वादी में मौन हो गयी है रहती थी जो अमन से यहाँ जाने कहाँ वो शान्ति खो गयी है. लगी है शायद नज़र कांगडी को आंच से वो अब अंगार हो गयी है. डल के शिकारों से बहती मोहब्बत जिहाद का शिकार हो गयी है.
टैग: My Poems
पसंद करें
0
नापसंद करें

फकीर - एक गीत

ज़िन्दगी का मेला चलता,सालों साल बराबर चलता.खोज रहीं हैं मंजिल अपनी,दर दर भटक रहीं साँसे.बाँटता जा खुशियों को जग में, निकल जायेंगी सब फांसें.ज़िन्दगी का मेला चलता,सालों साल बराबर चलता.स्वर्ग नर्क किसने है देखा,शब्-ओ-सहर है सब ने जाना.मौत की चिंता छोड़ ओ
टैग: my poems
Sep 12 2009 11:20 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

प्यार की गर्मी

रात सिकुडी हैसाँसे ठहरी सी हैंकोहरा घनेरा सुन्न जिस्म है मेरा.पोटली देखी हैफुटपाथ के किनारे,गरीब का परिवारप्यार की गर्मी ले रहा है.अमीर हैं की प्यार की नरमी भूल गया.गर्मी मिटाने के लिएAC में सो रहा है--नीरज
टैग: my poems
Sep 11 2009 11:38 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

** हाइकु **

महताब हैमोहब्बत मेरी.दूर मुझसे.***************ज़मीन गीली, अजीब सी खामोशी.... बिखरे मोती.--नीरज
टैग: my poems
Sep 10 2009 12:09 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

मैं हिन्दुस्तानी.

फिर दंगे हो रहे हैं,हर जगह लड़ मर रहे हैं.minority का majority से मुकाबला हैजिस के कम सिर काटेंगे कल उसकी सरकार बनेगीहारने वाले की फिर 5 साल बाद इस सरकार को ज़रुरत पड़ेगी.हर जगह दुकाने जल रहीं हैं,लाशें नंगी तड़प रहीं हैं,बच्चों, औरतों तक को नहीं छोडा,हर
टैग: my poems
Sep 09 2009 10:22 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

** हाइकु **

रात सिकुडी,साँसें ठहरी सी हैं.गरीब सच...--नीरज
टैग: my poems
Sep 09 2009 02:50 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

कन्या भ्रूण हत्या

This is to EDUCATE PEOPLE AND TO STOP THE HEINOUS ACT of FEMALE FOETICIDE KILLING/कन्या भ्रूण हत्याये रचना प्रस्तुत है उस बच्ची की नज़र से जो की अभी तक इस दुनिया में आई ही नहीं है और कोख में ही ख़याल बुन रही है......माँ आज मैं 4 महीने की हो गयी,बस 5 महीने
टैग: my poems
Sep 08 2009 12:18 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

मुझे जीने दो....

आज में 25 साल का हूँ,अपनी खुशिओं से बे-परवाह हूँ.पिछली साल तक सब अच्छा था,मैं अपने दोस्तों के दिल का हिस्सा था.अब वो ही दोस्त जो घर पर आया करते थे,बीते साल से उनके रस्ते भी बदल गए थे.जब गली से गुज़रता था तो कोईतिरछी निगाह कर देखता न था.अब तो बस निगाहों
टैग: my poems
Sep 06 2009 11:42 PM