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बाल साहित्य

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25 Apr 2010
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हिन्दी साहित्य मंच: रिपोर्ट

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दुम दबाकर

काली बिल्ली ने सफेद बिल्ली को देखा और सफेद ने काली को। काली ने खुश होकर सफेद से कहा- ‘‘तुम्हें देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई।’’‘‘मुझे भी’’ सफेद ने जवाब दिया।‘‘कहां रहती हो?’’ काली ने पूछा।‘‘अभी नई-नई आई हूं, रहने की जगह तलाश कर रही हूं।’’‘‘मेरे घर रहोगी?’’
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झीलों की नगरी

मम्मी-मम्मी, भैया आ गया,’’ शोर मचाती हुई जया बाहर की ओर दौड़ी। जय ऑटो रिक्शा से अपना सामान उतार रहा था। वह अपने तीन दिन के स्काउट कैंप से लौटा था। इस बार उस का कैंप उदयपुर शहर में लगा था। जया की आवाज सुन माता-पिता, दोनों ही दरवाजे तक आ पहुंचे थे।‘‘कहो
Dec 29 2009 12:01 PM
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अजय के दोस्त

अजय के दोस्तअजय के पिता को मिले इस सरकारी क्वार्टर के पास दूसरा मकान नही था। न ही अजय के कोई छोटा भाई बहन। पड़ोस के अभाव में अजय बिल्कुल अकेला महसूस करता। वह हमेशा सुस्त व उदास रहता। वह मां से कहता- ’’मां मै किसके साथ खेलूं।’’ उसका मन बहलाने के लिए मा
Dec 29 2009 12:01 PM
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नन्हा सैनिक

नन्हा सैनिकगोलू वीर और सहासी बालक था। हर रोज बन्दूक लिए वह घर से दूर इन पहाड़ियों पर आता और दिनभर इधर-इधर निशाना साधता। वह बड़ा होकर सैनिक बनना चाहता था क्योंकि उसका पूरा देश युद्ध स्थल में बदल चुका था। बहुत कम नागरिक बचे थे। अधिकतर युद्ध मे मारे जा चु
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बात छोटी सी

टीटू गिलहरी और चिंकी चिड़िया दोनों पड़ोसिन थी। टीटू का घर पेड़ की खोखल था और चिंकी का घोंसला पेड़ की शाखाओं पर। चिंकी जब दाना चुगने जाती तब टीटू सभी बच्चों का ध्यान रखती।एक दिन बच्चे आपस में झगड़ने लगे। टीटू के बच्चों का कहना था कि पेड़ उनका है। चिंकी के ब
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नटखट तितली

नटखट तितली की मां बीमार थी। वह फूलों का मकरंद लाने में असमर्थ थी। मां की यह स्थिति देख नटखट तितली बोली- ‘‘मां आप आराम करो। आज मैं फूलों का मकरंद ले आऊंगी।’’‘‘जरूर जाओ बेटी, पर सुन्दर-ताजे, खुशबू वाले फूलों का मकरंद ही चुनना, साथ ही जरा तितली पकड़ने वा
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दीप झिलमिला उठे

स्कूल से घर पहुंचते ही आलोक की नजर अलमारी पर रखे लड्डू की तरफ गई। प्रसन्नता से आगे बढ़ते हुए आलोक ने मां से पूछा- ‘‘मम्मी यह लड्डू कहां से आया ?’’‘‘ बेटा ! यह कमला की सगाई का लड्डू है। ’’‘‘ कौनसी कमला की सगाई..........? ‘‘लड्डू को मुंह की तरफ ले जाते
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अबोला दर्द

बेहद गर्मी थी, उफ! ये मई का महीना। हाल यह कि पेड़ का एक पत्ता भी नहीं हिल रहा। भरी दुपहरी में जब लोग पंखे कूलर में सो रहे थे तब अकेला बबलू कंचे खेलने में मशगूल था। उसके ललाट से पसीना रिसता हुआ गालों तक आ रहा था। एक दो तीन चार....... बबलू ने कंचे गिनना
Oct 14 2009 08:02 PM
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अबोला दर्द

बेहद गर्मी थी, उफ! ये मई का महीना। हाल यह कि पेड़ का एक पत्ता भी नहीं हिल रहा। भरी दुपहरी में जब लोग पंखे कूलर में सो रहे थे तब अकेला बबलू कंचे खेलने में मशगूल था। उसके ललाट से पसीना रिसता हुआ गालों तक आ रहा था।एक दो तीन चार....... बबलू ने कंचे गिनना