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मास्टरनी-नामा

http://mastarni-nama.blogspot.com/
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28 May 2010
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जिस दिन तुमसे मिलकर लौटी ....

जिस दिन तुमसे मिलकर लौटी मैं कविता में ढलने लगी थी| विचारों को मिल गए थे पंख चाय की हर चुस्की के साथ तुम्हारी कुछ पंक्तियाँ याद आ गई थीं| आटे में कुछ गीत चुपके से आकर गुँथ गए थे| नमक मिर्च हल्दी के साथ चटपटे, रंगीन एहसास सब्जी की कटोरी में घुल गए थे|
 
शेफाली पाण्डे
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अनपढ़ और जाहिल है मेरी माँ

अनपढ़ और जाहिल है मेरी माँ ज़माने भर की नज़रों को पढ़ा उसने सबसे बचा के मुझको, हीरे सा गढ़ा उसने जब मुझको गाड़ी, बँगला और ओहदा मिला जिन्दगी में एक हसीं सा तोहफा मिला पूछा उस हसीं ने कितना पढ़ी है माँ? तो मुंह से निकल गया बिलकुल अनपढ़ है मेरी माँ भरी जवानी
 
शेफाली पाण्डे
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जन्म एक कविता का...

जबड़े कस जाते हैं मुट्ठी भिंच जाती है माथे पर असंख्य सिकुड़नें तैर जाती हैं शिराओं में रक्त की जगह बैचेनियाँ दौड़ने लगती हैं तब कहीं जाकर जन्म लेती है एक अदद कविता.
 
शेफाली पाण्डे
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पहाड़ की औरतें उदास सी लगती हैं

तीस की उम्र में पचास की लगती हैं पहाड़ की औरतें उदास सी लगती हैं काली हथेलियाँ, पैर बिवाइयां पत्थर हाथ, पहाड़ जिम्मेदारियां चांदनी में अमावस की रात लगती हैं कड़ी मेहनत सूखी रोटियाँ किस माटी की हैं ये बहू, बेटियाँ नियति का किया मज़ाक लगती हैं दिन बोझिल, रात
 
शेफाली पाण्डे
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मास हिस्टीरिया और परीक्षाओं के दिन

उत्तराखंड के सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ विद्यालय इन दिनों विद्यार्थियों के असामान्य व्यवहार को लेकर चिंतित हैं. इन दिनों बच्चों के अन्दर तथाकथित देवी या देवता अवतार ले रहे हैं. साधारण शब्दों में जिसे मास हिस्टीरिया कह सकते हैं, जिसके कारण
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इतनी असंवेदनशीलता

कल बस से उतरते समय मैं अपने बाकी पैसे कंडक्टर से मांगने की जुर्रत कर बैठी, जिसकी एवज में वह मेरे साथ इतनी बदतमीजी से पेश आया , कि अपमानित महसूस करने के साथ - साथ मैं एकबारगी हैरत में पड़ गई, और सोच में डूब गई कि क्या मैं अपने ही राज्य की बस में बैठी हूँ,
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परिवर्तन की सुखद बयार

कई सालों के बाद कानपुर जाना हुआ तो स्टेशन पर उतरते ही सुखद अनुभूति हुई| सबसे पहले नज़र पड़ी जगह -जगह रखे हुए बड़े-बड़े कूड़ेदानों पर जिन पर 'परिवर्तन' लिखा हुआ था| जानने की उत्सुकता बढ़ी कि यह कौन सी संस्था है जो सरकारी प्रयासों से इतर शहर व स्टेशन
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उससे फर्क ही क्या पड़ता है ?

२६/११ की दुखद याद के संदभ में उस इस्राइली मासूम को देखकर लिखी गई कविता, जब सारे अखबारों में वही रोता हुआ बच्चा छाया हुआ था, मेरे छोटे से मोहल्ले में रहने वाली महिलाएं भी उस बच्चे को देखकर रो पड़ी थीं, और मैंने उससे कुछ दिन पहले ही उस बच्चे की तस्वीर द
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उस लापता का पता चल गया ...

उस सात वर्षीय बच्ची की माँ जब अपनी बेटी को पड़ोस की शादी में ले जाने के लिए तैयार कर रही होगी, तो उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसे वह आख़िरी बार सजा रही होगी. घटना कोई नयी नहीं है, शादी के मंडप में खेलती - कूदती बच्ची अगवा कर के ले गए ,कौन और कहा
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इन्हें इंसान ही बने रहने दिया जाए

ग्रामीण इलाके में शिक्षण कार्य करने के कारण अक्सर मुझे वह देखने को मिलता है, जिसे देखकर यकीन करना मुश्किल होता है कि यह वही भारत देश है, जो दिन प्रतिदिन आधुनिक तकनीक से लेस होता जा रहा है,जिसकी प्रतिभा और मेधा का लोहा सारा विश्व मान रहा है, जहाँ की स
Oct 14 2009 11:24 PM
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कुछ ख़बरों का पोस्टमार्टम ....

कुछ ख़बरों का पोस्टमार्टम ... .. चाँद पर पानी .................... आदमी की आँखों से जब मर जाएगा अभी तो मिला है चाँद पर , कल सूरज पर भी नज़र आएगा .... शाइनी को स्लीप डिस्क का अटेक डॉक्टरों का चेहरा पड़ गया सर्द जिसके पास रीढ़ की हड्डी ही नहीं उसको भी हुआ
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है कोई ऐसा अनुवादक

बुकर पुरकार का ऐसा अनुवाद शायद ही कोई अनुवादक कर पाए ....हुआ यह कि कल हमारे क्षेत्र में बी .एड यानी की भावी अध्यापकों के लिए प्रवेश परीक्षा थी ...प्रश्नपत्र में यूँ तो अनेक गलतियां थी ...लेकिन सबसे बड़ी गलती जिस पर आप ही बताइए पेपर सेट करने वाले को क्या
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कुछ छिपे चेहरे .....

इक्यासी वर्ष के तारा राम 'कवि' उत्तराखंड के नैनीताल जनपद के एक सुदूरवर्ती ब्लाक 'ओखलकांडा' में रहते हैं . वे राष्ट्रीय कुष्ठ निवारण कार्यक्रम से जुड़े हुए हैं .उनका काम विद्यालयों में जाकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में
Sep 15 2009 10:50 PM
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सोचिये कैसा लगेगा आपको

संपादित करें सोचिये कैसा लगेगा आपको जब आप रोज़ सुबह किसी रिज़र्व फॉरेस्ट क्षेत्र से होकर के अपने काम पर जाते हों और सारे रास्ते आपको मासूम जानवरों के कुचले हुए क्षत विक्षत शरीर दिखाई पड़ते हों । हल्द्वानी -हरिद्वार राष्ट्रीय राजमार्ग में कोर्बेट का
Sep 09 2009 06:00 PM
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हास्य व्यंग्य लिखने वाले हाथों को ये क्यूँ लिखना पड़ा ?

मैं शिक्षा के क्षेत्र से जुडी हूँ ,मुझे गर्व है कि मेरे खानदान में शिक्षा को एक पवित्र कर्म माना जाता है .मेरे पिता डिग्री कॉलेज से अंग्रेजी के प्रोफेसर के पद सेवानिवृत्त हुए ,और माँ अभी भी एक स्कूल में पढ़ाती है ,बहिन भी कॉलेज में है, भाभी भी शिक्षिका है
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आप सबकी आभारी हूँ .

शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में ....आप सभी लोगों ने मेरे नए ब्लॉग 'मास्टरनी - नामा' के प्रति अपना प्रेम प्रर्दशित किया ,उसके लिए मैं आप सबकी आभारी हूँ . आजकल वे लोग भी शिक्षा व्यवस्था को कोसने लगे हैं जिन्हें शिक्षा के असल मायने तक पता नहीं होते . जो
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मेरे सपने ....

हर आवाज़ पे मचल जाते हैं हर आहट पे सिमट जाते हैं मेरे सपने भी फुटपाथ के बच्चों से हैं कोई प्यार का टुकडा फेंके तो क़दमों से लिपट जाते हैं
Sep 02 2009 10:46 PM
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वो पल

कुछ पल के लिए चमका था मेरी आँखों में जुगनू बनकर उजाले से उसके आज तक रोशन है पैरहन मेरा ........
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टीचरनी का ब्लॉग

साथियों ये मेरा नया ब्लॉग है ....इसमे आपको एक टीचर के अनुभव और उसके विचार पढने को मिलेंगे ... फिलहाल कुछ फुटकर लाइनें टाफियों के छिलके चिडियों के पर टूटे खिलोनों के टुकड़े और एक कागज़ की नाव कितना खूबसूरत है छोटे बच्चे का गाँव ...
Aug 23 2009 11:29 AM