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04 Apr 2010
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तितर-बितर मन : एक बड़बड़ाहट

तितर-बितर मन : एक बड़बड़ाहटतितर-बितर मनभीतर कुनमुना रहा एक आलापजो अनगढ़ सपनों से बन पड़ा है.गला सूख रहा; सारे आदर्श वाक्य निस्तेज से हैं.सब समझ लेता है मन, उधेड़बुन पर जाती नहीं.दरक रहे केंचुल संस्कारों के, रेंग रही देह शाश्वत पहनावे में से.ताना-बाना
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
टैग: mind
Mar 04 2010 08:34 AM
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“ सहज..2010..”

नए साल पर लिखना चाहिए कुछ..इतना तो बनता ही है..यार..!2009 जा चुका है. कहाँ कुछ चला जाता है..? कुछ नहीं जाता...सब कुछ यहीं रहता है..चेहरे पे, नसों मे, बहता रहता है...मेरी प्रतिक्रियाएँ बताती हैं मेरी हालत..। कुछ देखने-टोकने की आदत जाती नहीं..क्या करूँ..?
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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ब्लॉग-जगत मे 'बात' : "बात की चूड़ी मर गई"

ब्लॉग-जगत मे 'बात' : "बात की चूड़ी मर गई" हम ब्लागर हैं. हम विचार चुनते हैं, बहुधा सोचते हैं..और देर-सबेर उसे पोस्ट मे तब्दील करते हैं..टिप्पणियाँ आती हैं...लोग कहते हैं कि चर्चा शुरू हो गई. अब हम टिप्पणियाँ कर रहे हैं. प्रति टिप्पणियाँ कर रहे हैं..ह
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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माँ

सच है माँ के कर्तव्य कभी ख़तम नहीं होते.. ! डा. अनुराग जी  की पोस्ट  यथार्थ का क्रास वेरिफिकेशन  पढ़ते हुए एक बेहद अच्छी कविता याद आ गयी जो मैंने कभी कादम्बिनी में पढी थी और जिसे राहुल राजेश जी ने लिखा है.आज वही आप सभी के समक
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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माँ

सच है माँ के कर्तव्य कभी ख़तम नहीं होते.. ! डा. अनुराग जी की पोस्ट यथार्थ का क्रास वेरिफिकेशन पढ़ते हुए एक बेहद अच्छी कविता याद आ गयी जो मैंने कभी कादम्बिनी में पढी थी और जिसे राहुल राजेश जी ने लिखा है.आज वही आप सभी के समक्ष रख रहा हूँ...!!
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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लेकॉनिक टिप्पणी का अभियोग ........ऐसा है क्या....? प्रेरणा : आदरणीय ज्ञानदत्त जी...

लेकॉनिक टिप्पणी का अभियोग ........ऐसा है क्या....? प्रेरणा : आदरणीय ज्ञानदत्त जी. ..  भूमिका : आजकल व्यस्त हूँ, या यूँ कहें कुछ ऐसा ही रहना चाहता हूँ. मै जिस मध्यम स्तरीय पारिवारिक विन्यास से हूँ वहां अभी कुछ समय पहले तक सेलफोन भी विलासिता का प्
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
Dec 04 2009 10:05 AM
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तुमसे...!!!

सुबह एक अनगढ़ गजल सी रचना डाल थी, मैंने.."अब सवाल ज्यादा सुकून देते हैं.." उस वक़्त भी जानता था कि इसमे ठीक-ठाक कमियां हैं..आदरणीय गिरिजेश राव साहब ने एक मीठी झिड़की दी मेल पर और फिर उसी रचना को अपने यत्न भर फिरसे गढ़ने बैठ गया. बड़े भाई श्
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
Nov 28 2009 02:55 PM
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अब सवाल ज्यादा सुकून देते हैं.

मुझे पता है कि मै बस लिखने लगता हूँ. ईमानदारी से मुझे शिल्प का अभ्यास नहीं है. गलतियाँ बर्दाश्त करियेगा..और बदले में मुझे एक मुस्कान दीजियेगा... अब सवाल ज्यादा सुकून देते हैं. अब सवाल ज्यादा सुकून देते हैं. राख, शोलों से ज्यादा जुनून देते हैं. यार तु
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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कि;

आज एक बेहद हलकी सी कुछ पंक्तियाँ.. कि; कि; वे दोनों एक-एक जगह के रईस हैं..! कि; उन दोनों की पहुँच बाकी की पहुँच से बाहर है..! कि; वे दोनों एक दूसरे को अपनी बता देना चाहते हैं..! कि; दोनों सामने वाले को अपने सामने कुछ नहीं समझते हैं..! बाकी;
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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पचासवीं पोस्ट और मेरी पहली कहानी..."उन्माद की उड़नतश्तरी"

पचासवीं पोस्ट और मेरी पहली कहानी..."उन्माद की उड़नतश्तरी" यह आज मेरी 50 वीं प्रविष्टि है. शुरू-शुरू में बस ब्लोगिंग क्या होती है; इस आशय से शुरू किया था. पर जब मैंने देखा कि एक विशाल और विज्ञ पाठक समूह जाल पर है और सक्रिय रूप से अपनी प्रखरता और सजगता
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
टैग: Delhi
Nov 18 2009 06:11 PM
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सड़क

गोरखपुर से सीधे दिल्ली आया तो बहुत कुछ झेलना पड़ा था..उन्हीं दिनों में लिखी थी एक कविता अनगढ़ सी..एक शाम का सच है ये..मै भीड़-भाड़ वाली सड़क से चला जा रहा हूँ और क्या-क्या सोचते जा रहा हूँ..लोग टकरा रहे हैं और ठीक-ठाक बके जा रहे हैं.... ] चलूँ; जरा न
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
टैग: पापा
Nov 12 2009 07:12 AM
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अब, जबकि..!

सोचा, आज उस पर एक कविता लिखूंगा, पर.... .कैसे..?   जबकि,  मेरे दिमाग में केवल तुम हो,  कविता के लिए शब्द कैसे खोजूं ..? जबकि, मेरे दिल में  सिर्फ तुम्हारा रंग छाया है  कविता को कोई और रंग कैसे दे दूं..?   जबकि मेरे तन-मन
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
Oct 28 2009 08:31 AM
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श्रीश उवाच: क्या हम कभी इतने 'सभ्य' नहीं रहे कि 'हाशिया' ही ना रहे...?

श्रीश उवाच: क्या हम कभी इतने 'सभ्य' नहीं रहे कि 'हाशिया' ही ना रहे...? " THANKS FOR VISITING....I HOPE YOU AGAIN, SOON...MAKE THE WORLD GREENER"
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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क्या हम कभी इतने 'सभ्य' नहीं रहे कि 'हाशिया' ही ना रहे...?

आज दीवाली है, खासा अकेला हूँ. सोचता हूँ, ये दीवाली, किनके लिए है, किनके लिए नहीं. एक लड़की जो फुलझड़ियॉ खरीद रही है, दूसरी बेच रही है, एक को 'खुशी' शायद खरीद लेने पर भी ना मिले, और दूसरी को भी 'खुशी' शायद बेच लेने पर भी ना मिले. हम कमरे साफ कर रहे है
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
Oct 18 2009 02:35 AM
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दीया, तुम जलना..

दीवाली पर अभी तुरत लिखी एक छोटी कविता. जो जीवन देकर उजाला देता है, उससे की मैंने विनती. ... दीया, तुम जलना..   अंतरतम का मालिन्य मिटाना  विद्युत-स्फूर्त ले आना.   दीया, तुम जलना.   जलना तुम मंदिर-मंदिर  हर गांव नगर में जलना&n
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
टैग: आँगन
Oct 15 2009 09:25 PM
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निकल आते हैं आंसू हंसते-हंसते,ये किस गम की कसक है हर खुशी में .

निदा फाज़ली की नज्में कुछ इस तरह चर्चित हैं कि अपने आस-पास साधारण, सामान्य हर तरह का आदमी उनकी पंक्तियाँ कह रहा होता है पर अक्सर सुनाने वाले और सुनने वाले दोनों को ही पता नहीं होता कि ये निदा फाज़ली की लाइनें हैं...निदा फाज़ली उन चुनिन्दा लोगों में श
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
Oct 14 2009 07:51 PM
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सदाग्रह..शांति, सद्भावना के लिए....

सदाग्रह एक विमर्श मंच है जहाँ प्रयास होगा विभिन्न समाधानों के लिए एक बौद्धिक पहल का...विमर्श से एक शांतिपूर्ण समाधान की खोज और एक अपील इसे अपनाने की सहभागी बंधुओं से....आपका रचनात्मक सहयोग अपेक्षित है... सदाग्रह पर जाने के लिए यहाँ क्लिक करें...... h
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
Oct 14 2009 07:51 PM
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शायद फ़िक्र हो..

स्मार्ट दूकानदार, मुस्कुराकर, अठन्नी वापस नहीं करता..  शायद फ़िक्र हो.. भिखमंगों की. नये कपड़ों की जरूरत  लगातार बनी रहती है  शायद फ़िक्र हो हमें, अधनंगों की.  चीजें कुछ फैशन के लिहाज से पुरानी पड़ जाती हैं,  इमारतों को फ़िक्
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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कैसा लगता है, जब फुटपाथ पर कोई लड़की सिगरेट बेचती है...?

सचमुच एक दृश्य देखा  मैंने दिल्ली के फुटपाथ  पर...और फिर... . कैसा लगता है, जब फुटपाथ पर कोई लड़की सिगरेट बेचती है...?  पर यहाँ लड़की अपनी झोपड़ी के पास मजबूत धागों में गुटखे व चट्टे पर सिगरेट, पान, सलाई सजा रही है;  अपने पैरों से
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
Oct 14 2009 07:51 PM
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पुनर्पाठ...तुम्हारा..

१) मै; तुम्हे शिद्दत से चाहता हूँ, पर तुम नहीं. आत्मविश्वास ने समाधान किया: 'सफल हो जाने पर कौन नहीं चाहेगा मुझे,,,? "....पर उन्ही लोगो में पाकर क्या मै चाह सकूँगा ..तब..तुम्हे..?  (२) तुमने जब टटोला तो मैंने महसूस किया.. अपना अस्तित्व सर पर हाथ
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
Oct 05 2009 09:24 AM
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बैंडिट क्वीन

फिल्म देखा तो स्तब्ध रह गया मै, मुझे विश्वास नहीं हुआ कि ऐसा हो सकता है. किसी एक जाति की ज्यादती की तो बात ही नहीं है, क्योकि जो भी शीर्ष पर रहा है, उससे ऐसी ज्यादतियां हुई हैं.पर मानवता सबसे कम मानवों में है, कभी-कभी ऐसा ही लगने लगता है....... खमोश
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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लिखी मैंने एक गजल: "रूबरू"

लाख सोचों ना हो वो रूबरू यारों, सोच लेने के भरम में दुनिया यारों.   साथ देते रहे हर लम्हा मुस्कुराते हुए, शाम हर रोज गिला करके सो जाती यारों.   मेरी हर साँस फासले कम करने में गयी, हर सहर, मंजिलें अपनी खो जाती यारों.   जबसे जागा है, सुन
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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"...मुझमे तुम कितनी हो..?''

"...मुझमे तुम कितनी हो..?''  हर आहट, वो सरसराहट लगती है,  जैसे डाल गया हो डाकिया; चिट्ठी   दरवाजे के नीचे से.  अब, हर आहट निराश करती है.  हर महीने टुकड़ों में मिलने आती रही तुम देती दस्तक सरसराहटों से .  सारी
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
टैग: आहट
Sep 24 2009 06:31 AM
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चीन की यह घुसपैठ...

देशों के पारस्परिक  सम्बन्ध, व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों से बहुत भिन्न नही होते. जवाबदेही का अंतर होता है. प्राथमिक उद्देश्य अवसर की निरंतरता व सुरक्षा ही होती है. मिले अवसरों का युक्तिसंगत प्रयोग , देश की घरेलू मशीनरी की जिम्मेदारी होती है और
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
Sep 21 2009 10:05 PM
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..वैसे हम, बचपन के घनिष्ठ हुआ करते थे.....

कक्षा छोटी थी, हम छोटे थे.. हमारा आकाश छोटा था.  कक्षा बड़ी हुई, हम बड़े हुए, हमारा आकाश बड़ा हुआ.  मस्त थे, व्यस्त थे, हँसने के अभ्यस्त थे. त्रस्त हुए, पस्त हुए, सहने के अभ्यस्त हुए.  तब, परेशान होते थे, निहाल हो जाते थे. दुखी होते
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
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कुंवर बेचैन की एक रचना--- अंगुलियाँ थाम के

अंगुलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसेराह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसेउसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों सेमैंने खुद रो के बहुत देर हँसाया था जिसेछू के होंठों को मेरे मुझसे बहुत दूर गईवो ग़ज़ल मैंने बड़े शौक से गाया था जिसेमुझसे नाराज़ है इक शख़्स
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
Sep 16 2009 08:56 PM
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" वजूद"

अब, कितना कठिन हो चला है.. कतरा-कतरा कर के पल बिताना. पल दो पल ऐसे हों , जब काम की खट-पट ना हो..इसके लिए हर पल खटते रहे.. बचपन की नैतिक-शिक्षा, जवानी की मजबूरी और अधेड़पन की जिम्मेदारियों से उपजी सक्रियता ने.. एक व्यक्तित्व तो दिया..पर... पल दो पल ठहरकर,
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
टैग: वजूद
Sep 10 2009 11:25 PM
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"तुम मुस्कुरा रही हो, गंभीर.."

      विस्तृत प्रांगण तिरछी लम्बी पगडंडी अभी बस हलकी चहल-पहल , विश्वविद्यालय में, दूर; उस सिरे से आती तुम गंभीर, किन्तु सौम्य, मद्धिम-मद्धिम तुम में एक मीठा तनाव है, शायद, हर एक-एक कदम पर जैसे सुलझा रही हो, एक-एक प्रश्न. तुम मुस्कुरा
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
Sep 10 2009 11:24 PM
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तुम....?

मै बुलाता हूँ तुम्हे, हहाकर मिलता हूँ, भर लेता हूँ, तुम्हे बाँहों में. तुम अपनी एक फीकी हंसी में रंग भरने का प्रयास करते हो. जूझती जिंदगी में अचानक मिली , तुम्हारी जीत पर नाचता हूँ, और करता हूँ, तुम्हारी ताली की प्रतीक्षा. मुझे खुश-मिजाज कहते हैं, लोग
 
श्रीश पाठक 'प्रखर'
Sep 09 2009 06:52 PM