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जीवन के अनमोल रंग

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07 Jun 2010
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बुद्धि जीवी की जय हो

हाँ मैं बुद्धि-जीवी हूँ, पर इसमें गलती मेरी नहीं. कुछ ऐसा ही कहा मेरे एक जानकार मित्र ने जब हमारी किसी छोटी सी बात पर कहा-सुनी हो गयी। यूँ तो बुद्धि जीवी होने में कोई बुराई नहीं पर बात यह है की बुद्धि जीवी को अक्सर लोग कुछ अलग ही नज़रिए से देखते हैं। जी
 
पियूष अग्रवाल
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उधेड़बुन - एक आधुनिक शहर

आइये! स्वागत है आपका इस शहर में जिसका नाम है उधेड़बुन। यह भारत के तमाम उन छोटे बड़े शहरों, खासकर उनमहानगरों से अलग है जहाँ तेज़ी से भागती हुई ज़िन्दगी और इंसान के बीच का फासला दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। पर खासबात यह है की उधेड़बुन शहर का निर्माण भी उन्ही
 
पियूष अग्रवाल
Jun 04 2010 01:50 PM
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शराबी की ज़िन्दगी

जो पूछ बैठे हम एक शराबी से शराबखाने का पता,बोला वह की आप भी देखने से लगते हैं लापता,इस बात पे हमने भी बोल दिया,अरे ओ पियक्कड़-ऐ-आज़महमें तो है बस एक रात का गम, पर तुम ज़रा पिया करो थोडा कम,हिचकिचाते जिया करते हो,कश-म-कश में पड़े रहते हो,अब तो नाम भूल जाना
 
पियूष अग्रवाल
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भेड़ - चाल

सुनिए! सुनिए! सुनिए!बच्चे बूढ़े और जवान आप सब सुनिए।सुनिए, इस उभरते हुए भारत की दास्ताँ। भारत के नागरिकों , आप सब सुनिए।कान लगा के सुनिए या सर घुमा के सुनिए,पर सुनिए।यह बंदा ढून्ढ लाया है एक जवाबजिसके लिए किये गए न जाने कितने सवाल।तो हजूर जवाब है इसका
 
पियूष अग्रवाल
May 22 2010 02:38 PM
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एक हुस्न की तारीफ में शब्द पड़ रहे हैं कम

जब शब्द न हों हुस्न की खूबसूरती बयां करने के लिए तो दिल कुछ ऐसा कहता है।एक हुस्न की तारीफ में शब्द पड़ रहे हैं कम,जिनसे मिलने की जुस्तजू हर पल कर रहे हैं हम।दिलों को लूट लेना उनका शौक सा लगता है,दिल लुटा देना हमने भी सीख रखा है।वह लुफ्त लेते हैं हमको दर्द
 
पियूष अग्रवाल
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जब भी यह दिल उदास होता है - सीमा (१९७१)

जब भी यह दिल उदास होता हैजाने कौन आस पास होता हैहोंठ चुप चाप बोलते हो जबसांस कुछ तेज़ तेज़ चलती होआँखें जब दे रही हो आवाजेंठंडी आँहों में सांस जलती होठंडी आँहों में सांस जलती हो..जब भी यह दिल उदास होता हैजाने कौन आस पास होता हैआँख में तैरती हैं
 
पियूष अग्रवाल
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लाख शब्दों में एक बात..बंद करो बंद करो!

बस और नहीं..कहा ना अब और नहीं झेला जाता यह शब्दों और समय के साथ होता हुआ दुर्व्यवहार। आप ही कहिये कब तक झेलें हम इन अल्ल्हड़ और पढ़े लिखे जाहिलों की जमात को। जब बोलना शुरू करते हैं तो ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेते। एक बात को जब तक पचास तरीके से न बोल लें
 
पियूष अग्रवाल
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आदतन तुम ने कर दिए वादे

आदतन तुम ने कर दिए वादेआदतन हम ने ऐतबार किया तेरी राहों में बारहा रुक करहम ने अपना ही इंतज़ार किया अब ना मांगेंगे ज़िन्दगी या रबयह गुनाह हम ने एक बार किया। - गुलज़ार साहेब http://creative.linux-delhi.org/?q=user/4/track
 
पियूष अग्रवाल
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आखिर हर्ज़ ही क्या है!

सोच रहा हूँ ज़िन्दगी से थोडा कुछ मांग लेने में हर्ज़ ही क्या है।सर्दियों की थोड़ी नर्म सी धूप,और साथ में अपने गाँव के पीपल की छांव,कुछ मट्टी भी मांग लेता हूँ गंगा किनारे की,बारिश में नहाये खेतों की भीनी खुशबू के साथ,सुबह के पंछियों की चेह्चाहाट भी मिल
 
पियूष अग्रवाल
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कालेज के स्टुडेंट - काका हाथरसी

फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸ लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट। कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸ दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती। कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸ मौज कर रहे पुत्र¸ हड्डियाँ घिसते फादर। पढ़ना–लिखना व्यर्थ हैं¸ दिन
 
पियूष अग्रवाल
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है हर ज़िन्दगी का बस यही तो तराना

हर पल में चलना और बस चलते रहना, गिरना, संभालना और उठ खड़े होना,लड़ना, नष्ट होना और लुप्त होकर फिर जन्म लेना,थकना, थक के चूर होना और फिर शुरू हो जाना, रो रो के हसना और हस्ते हस्ते रोना, खोना, मिलना, और फिर गुमशुदा हो जाना,डूबना, उभारना और फिर डूब जाना, रूठे
 
पियूष अग्रवाल
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Apr 21 2010 10:18 PM
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सरदार मुझे गोली मार दो!

सोचिये की शोले में अगर इस ससेने में कुछ ऐसा हुआ होता तोह क्या होता :-)गब्बर : कितने आदमी थे?साम्भा : सर्कार दो थे।गब्बर: मुझे गिनती नहीं आती, २ कितने होते हैं?साम्भा: दो एक के बाद आता है।गब्बर: और दो के पहले क्या आता है?साम्भा: दो के पहले एक आता
 
पियूष अग्रवाल
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ऋषिकेश - एक झलक लाखों देवताओं की नगरी की

पेश है मेरी हाल की ऋषिकेश यात्रा से विशेष विडियो सिर्फ RGB और चिट्ठाजगत के दोस्तों के लिए। उम्मीद है आपको पसंद आएगे।http://creative.linux-delhi.org/?q=user/4/track
 
पियूष अग्रवाल
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मेरा नाम केसर है!

नाम : केसरगाँव : मोत्वाराजिला: अमीरपुर , मध्य प्रदेशयह कहानी किसी छोटे से गाँव में रहने वाली अबला, मासूम याज़ुल्म की पीड़ित औरत की नहीं है बल्कि एक साधारण भेष मेंछुपी असाधारण केसर की है जो आजकल महानगर दिल्ली केकनाट प्लेस में फल बेचती है। दो दिन पहले
 
पियूष अग्रवाल
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२१वि शताब्दी के डिजिटल समुदाय में आपका स्वागत है

व्यक्तियों और समुदाय के बीच में हमेशा से ही अटूट सम्बन्ध रहा है पर २१वि शताब्दी के शुरू में ही समाज के पिच्क्सलिकरण हो जाने के कारण इसमें एक और कड़ी जुड़ गयी है। यह समाज और इस समाज के सभी लोग डिजिटल हो चुके हैं। टूटे हुए पिक्सलों (pixels) की तरह यहाँ के
 
पियूष अग्रवाल
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मेरा त्यागपत्र कबूल करें - १४११

श्रीमान प्रधान मंत्री जी और मेरे प्यारे दोस्तों,जानता हूँ की आज़ाद भारत में सांस लेते ६३ साल बीत चुके हैं और यह मेरा पहला ख़त है, पर बीते कुछ वर्षों में कुछ ऐसी घटनाएँ घटी की मुझे यह पत्र लिखना पड़ रहा है।मुझे आज भी याद है वह दिन जब गणतंत्र भारत के
 
पियूष अग्रवाल
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फीके पड़ते होली के रंग

सबसे पहले मैं अपने सभी पाठकों को होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं देना चाहता हूँ। माफ़ी चाहता हूँ की सेहत ख़राब होने के चलते मैं इस साल होली नहीं मना सका परन्तु दिल में जोश फिर भी हर साल की तरह अपनी पूरी सीमा पे था। होली का त्यौहार ही कुछ ऐसा है की हर इंसान
 
पियूष अग्रवाल
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कुमाऊँ और उत्तराखंड की शान - जिल्लिंग - पहला दिन

इस निरंतर भागते जीवन में हर इंसान कभी न कभी एकांत के कुछ पल चाहता है जब वह इस आपाधापी भरी ज़िन्दगी से बहुत दूर निकल जाना चाहता है। ऐसे में हम बस सामान बांधते हैं और निकल पड़ते हैं यात्रा पर, फिर चाहे वह कहीं भी हो। और कुछ दोस्त इस राह में हमारा साथ देने
 
पियूष अग्रवाल
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कुमाऊँ और उत्तराखंड की शान - जिल्लिंग - दूसरा दिन

पहला भाग 19 फ़रवरी , २०१० किसी भी हिल स्टेशन की तरह भीमताल की सुबह भी बेहद हसीन थी। होटल लेक रेसोर्ट की बालकनी से बहार का नज़ारा बेहद खुशनुमा और दिल-ओ-दिमाग को तर-ओ-ताज़ा करने वाला था। धुली हुई और साफ़ सड़क, स्कूल को जाते छोटे बच्चे, उगते हुए सूरज की रौशनी
 
पियूष अग्रवाल
Feb 25 2010 06:45 PM
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ऐ हुस्न - तेरा हर गुरूर सर आँखों पे

कहते हैं हुस्न का गुरूर करना जायज़ है,पर ज़रा इश्क के दिल से भी कोई पूछ ले कभी,कैसा लगता है चाँद कोजब चांदनी को खुद से अलग करना पड़ता है।माना की हुस्न की ताजगी में यह सारी कायनातधुली हुई सी लगती है,पर इश्क के जल जाने में भीएक अजीब कशिश सी है।जंगलों,
 
पियूष अग्रवाल
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Feb 14 2010 04:38 PM
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वृंदावना मथुरा यात्रा - भाग १

सभी को मेरा राधे - राधेकई सालों के बाद आखिर मुझे अपने परिवार के साथ वृन्दावन एवं मथुरा जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वैसे तोह मथुरा पिताजी की जन्मभूमि है और उनका अधिकतर बचपन मथुरा में ही बीता, पर ७० के दशक में दादा-दादी सहित सारा परिवार दिल्ली में आकर बस
 
पियूष अग्रवाल
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ऐ गणतंत्र तुझे सलाम!

आज़ाद भारत के ६१ वे गणतंत्र के दिन मुझे इकबाल की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं जो हिंदुस्तान के इतिहास मेंस्वरानाक्षरों में कही जाती हैं। सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्तां हमाराहम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसतां हमारा गुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन
 
पियूष अग्रवाल
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कहीं तोह होगी वह

कहीं तोह होगी ...वह छुपी छुपी सीअपनी सी...ख़ामोशी से कुछ कहतीऔर फिर चुपके से खामोश होती वह।दीवानी ही है वह... हाँ! दीवानी ही है वहपीछे पीछे ही हूँ तेरेऐ बेकाबू धड़कन मेरी,सांसें बनके तेरी। छूना तोह बहुत चाहा...स्वप्नों के उस पार भी पहुंचे,ढूँढ़ते हुए तेरे
 
पियूष अग्रवाल
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लोहरी मुबारक

आया ख़ुशी का त्यौहार है,फसलों में भी लोहरी की बहार है,सरसों के खेतों से मक्के के खेतों तक, छेड़ा यह कैसा मल्हार है। नाचो गाओ धूम मचाओ, ढोल नगाड़ों पे गिद्दा पाओ। छोटे बच्चों में रेवड़ी और मूंफली बत्वाओ। कुछ देर के लिए सब परेशानियाँ भूल जाओ। मदमस्त होकर
 
पियूष अग्रवाल
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हाहाकार अनलिमिटेड

आदरणीय सभापति  महोदय …अतिथि  विशेष  शिक्षण  मंत्री  श्री  R Dtripati [tripathi] जी  ..मान्यनिया  शिक्षगन  और  मेरे  पियारे  [pyare]सह्पतियो  [sahapathiyon]…आज  अगर  I.C.E
 
पियूष अग्रवाल
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एक दीवाना एक दीवानी

एक पल को भूल जा की तेरी भी कोई हस्ती है,उसके इश्क में डूबी ज़िन्दगी भी एक मस्ती है, छलक जाने दे खुदको उस हुस्न के प्याले से, मचल जाने दे दीवानी रात को मदमस्त उजालों पे. यह वादा है की हुस्न भी नज़रें बिचेगा एक दिन,होगी बावरी हर दीवानी तेरे इश्क पे उस
 
पियूष अग्रवाल
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रेसोलूशन मुर्गा

साल २०१० का पहला दिन और हर साल की तरह इस साल भी मेरे कानों में रेसोलुशन नामक मुर्गा सुबह सुबह बांक दे चुका था। रजाई को मैंने कस के थाम रखा था परन्तु वोह मुर्गा मुझे यह याद दिलाने पे आमादा था की २०१० में मुझे जल्दी उठना ही है। खैर मैंने भी हार नहीं मानी,
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फुर फुर फुर फुर

उड़ना मुझे पसंद है, सूरज के सातों घोडों को हवा के पंख लगा के उनकी सवारी करना, एक विचित्र अनुभव है। मनो मेरी कल्पना कुछ पल के लिए बादलों के उस पार खड़ी मुझपे मुस्कुरा रही हो। अब तोह ऐसा लगता है की इस निरंतर भागती कल्पना की गति को रोक पाना काफ़ी कठिन है
Dec 29 2009 11:54 AM
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तनहा दिल तनहा सफर

विश्वास नहीं होता, एक बरस बीत गया हौज़ खास के इस खूबसूरत आशियाने में। यूँ मानो की कल की ही बात हो जब मैं पहले दिन यहाँ आया था। दिल में एक मायूसी सी न जाने कब से घर किए बैठी थी। वोह रात मैं कभी नहीं भूल सकता। ज़िन्दगी से बहुत सी उम्मीदें लिए मैंने इस
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खुशबू

मेरे शब्दों की खुशबु में छुपी है दास्ताँ मेरी। या फ़िर जीवन की खुशबु से उभरे हैं यह शब्द सारे? यह शब्द और खुशबु हैं पास मेरे सदियों से, अंधेरे और उजाले की तरह, ख्वाबों और ख्यालों की तरह। कहते हैं खुशबुएँ किसी एक वादी में नहीं रहती। शायद सच ही कहते हैं
Dec 29 2009 11:54 AM
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एकमात्र सच

कैसे भूल जाऊं ? और क्यूँ ? मानो की जीवन का कोई मोल ही नहीं रहा। दम घुट रहा है यहाँ पे। अरे, रोको इन्हे ! रोको! कहाँ जा रहे हैं यह लोग? मुझे बहुत डर लग रहा है। फ़िर से कई नन्हे चेहरों की हँसी गुम जाएगी। ठहरो ! लगता है कहीं किसी के रोने की आवाज़ आ रही ह
Dec 29 2009 11:54 AM
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एक और उम्मीद

टूटे सपनों के उस पार भी है ज़िन्दगी, गम के किनारे ही चलती है हर खुशी। जमा ले नज़र उस रास्ते पर तू, धुंध हटने पर फ़िर दिखेगी मुस्कुराती ज़िन्दगी। कुछ दोस्त भी नज़र आएंगे इन राहों में, शायद दुश्मन भी मिले हर मोड़ पे तुझे। थाम ले होंसले का दामन पल भर को,
Dec 29 2009 11:54 AM
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एक पैगाम

कल्पना हो कभी, और कभी जीवन का अटूट सच। सुर हो कभी, और हो खामोशियों में गूंजने वाली धड़कन भी। अपनी सी ही हो, और कभी अनजान खुशी की दस्तक जैसी। इससे पहले की तुम अपने दिल की बात कहो, मैं कहना चाहता हूँ की मेरे गाव का रास्ता एक टूटी पगडण्डी से होकर जाता ह
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रंगों की खुशबू या खुशबू के रंग

रंग बिना जीवन मानो हसी बिना बचपन, जोश बिना योवन, अश्रु बिना क्रंदन, वर्षा बिना सावन और पेड़ बिना आँगन। ऐसे ही कुछ अनमोल रंगों का ताना बाना है हम सबकी ज़िन्दगी जहाँ खुशियों और दुःख के कई पड़ाव पार करके हम अंत में जब पीछे मुडके देखते हैं तोह रह जाते हैं
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वह सुबह

बदलता है समय और बदल जाती है हमारी सुबह। खुशबुएँ, रास्ते, दोस्त, मंजिलें, कल्पना, विचार, आख़िर सभी कुछ तोह बदल जाता है। जी हाँ, प्रकृति का दूसरा नाम शायद बदलाव ही है। ऐसी ही बदलती हुई सुबह थी वह, राहगीरों की नज़रें बता रही थी की वे काफ़ी खुश हैं। शहर क
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सिर्फ़ एक ख्वाब

सिर्फ़ एक ख्वाब देखना चाहता हूँ, दिल टूटने का डर है, और दिल को भी यह ख़बर है, फिर भी उम्मीद के आसमान में, अपने सपनों के पंख फैलाना चाहता हूँ, सिर्फ़ एक ख्वाब ही तोह देखना चाहता हूँ बेजुबान हुआ तोह क्या, इन चाँद बची धडकनों से, हर दिल तक अपना एहसास पहु
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फर्क सिर्फ़ प्यार का है

फर्क सिर्फ़ प्यार का है, ज़ंग और अमन में, आंसू और हँसी में फर्क सिर्फ़ प्यार का है। रिश्तों की दूरी, अजनबी की करीबी में फर्क सिर्फ़ प्यार का है। अनसुनी धड़कन, और दीवाने हुए मन में फर्क सिर्फ़ प्यार का है। नहाए खेतों और तपती रेत में, फर्क सिर्फ़ प्यार
Dec 29 2009 11:54 AM
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मुश्किल है

उस नमी को भूल पाना मुश्किल है , उस हँसी को भूल पाना मुश्किल है, बारिशों में भीगी तेरी धडकनों को भूल पाना मुश्किल है। खामोशी में कही वोह हर बात याद है, उस कमरे से खिसकती वोह रात भी याद है, नशे में अभी तक हूँ शायद, इसलिए पिछली सर्दियों की हर मुलाकात मु
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चाचा छक्कन की दिलचस्प दास्ताँ - पार्ट २ ( पहला भाग )

आख़िर कौन भुला सकता है ३० साल पहले की वह रंगों में नहाई वृन्दावन की मदमस्त सुबह। मेरे जीवन का ऐसा अनुभव जो शायद किसी के भी जीवन का रुख मोड़ सकता है। मेरे बाबा यानि की राए बहादुर दिन दयाल के ही एक बचपन के मित्र गोकुल दास जी, जो मथुरा के काफ़ी पुराने र
Dec 29 2009 11:54 AM
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एक संदेश चोर के नाम

प्यारे चोर भाई, आशा है आप अभी तक दिल्ली की सीमा पार करके बहुत दूर निकल गए होगे। इतनी दूर की अब तोह आपसे इस जीवन में मिलना भी कठिन हो जाएगा। खैर कोई बात नहीं, कल दिन में घटी घटना के बाद मैं रात भर नहीं सो पाया, इसलिए नहीं की आप हमारी नई गाड़ी बिना बता
Dec 29 2009 11:54 AM